14/07/2026
सेवा में,
माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय
सर्वोच्च न्यायालय, भारत
नई दिल्ली।
विषय : प्रतियोगी एवं भर्ती परीक्षाओं में लगातार प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं से आहत छात्रों एवं प्रख्यात शिक्षाविद् के आमरण अनशन, उनके जीवन पर उत्पन्न गंभीर संकट तथा सरकार द्वारा संवाद न किए जाने के संबंध में स्वतः संज्ञान लेकर आवश्यक हस्तक्षेप किए जाने हेतु प्रार्थना।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि हम, अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद, संविधान के प्रति अपनी निष्ठा तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के दायित्व का निर्वहन करते हुए आपका ध्यान एक अत्यंत गंभीर, संवेदनशील एवं मानवीय विषय की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं।
देश में प्रतियोगी एवं भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लगातार लीक होने की घटनाओं ने लाखों-करोड़ों छात्रों के भविष्य, उनके कठिन परिश्रम तथा शासन व्यवस्था की निष्पक्षता पर उनके विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया है। वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले अनेक छात्र निराशा, मानसिक तनाव और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों में न्याय, जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर नेहा (AISA President)
मनीष (AISA UP President)
दानिश (JNUSU Jt. Secretary)
दीपक (AISA DU Vice President) हृषिकेश (President,
Barak Hostel, JNU) आमीन (Former CC Member, AUD Students Council) आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनके साथ देश के प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पर्यावरणविद् श्री सोनम वांगचुक भी आमरण अनशन कर रहे हैं।
अत्यंत चिंता का विषय है कि लगातार 16 दिनों से चल रहे इस आमरण अनशन के कारण अनशनकारियों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिक श्री सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य के निरंतर गिरने की सूचनाएँ सार्वजनिक रूप से सामने आ रही हैं। यदि समय रहते संवाद और समाधान का मार्ग नहीं अपनाया गया तो उनके जीवन सहित अन्य आमरण अनशनरत छात्रों के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह स्थिति अत्यंत वेदनापूर्ण है कि उसके छात्र और एक सम्मानित शिक्षाविद् अपनी मांगों को सुने जाने के लिए अपने प्राणों को दाँव पर लगाने को विवश हों।
श्री सोनम वांगचुक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में देश की एक अमूल्य बौद्धिक धरोहर हैं। इसी प्रकार आमरण अनशन पर बैठे छात्र भारत के भविष्य के निर्माता हैं। यदि संवाद के अभाव में इनके जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो यह केवल व्यक्तियों की क्षति नहीं होगी, बल्कि राष्ट्र की ऐसी अपूरणीय क्षति होगी जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
महोदय, भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संवाद, संवेदनशीलता, असहमति के सम्मान तथा जनभावनाओं की कद्र में निहित है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और न्याय की मांग करने का अधिकार प्रदान करता है। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि जनता की पीड़ा को सुनना और संवाद के माध्यम से समाधान निकालना भी है। यदि शांतिपूर्ण एवं अहिंसक लोकतांत्रिक आंदोलनों की भी उपेक्षा की जाने लगे, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किसान आंदोलन के दौरान भी लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए सरकार को आंदोलनरत किसानों के साथ बातचीत कर समाधान तलाशने की दिशा में प्रेरित किया था। न्यायालय का वह हस्तक्षेप भारतीय लोकतंत्र में संवाद की गरिमा और संविधान की आत्मा के अनुरूप था। आज देश के छात्र भी अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता जैसे राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों को लेकर शांतिपूर्ण आमरण अनशन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में न्यायालय की वही संवेदनशील एवं मानवीय भूमिका पुनः अपेक्षित है।
माननीय महोदय,
आप केवल भारत के प्रधान न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक, मौलिक अधिकारों के प्रहरी तथा करोड़ों नागरिकों की अंतिम न्यायिक आशा हैं। जब देश के छात्र और एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ शिक्षाविद् अपने प्राणों की परवाह किए बिना न्याय की गुहार लगा रहे हों और उनके साथ सार्थक संवाद का कोई प्रयास दिखाई न दे रहा हो, तब समूचे राष्ट्र की आशाएँ स्वाभाविक रूप से माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर उठती हैं।
हम आपसे करबद्ध एवं विनम्र प्रार्थना करते हैं कि इस अत्यंत गंभीर और मानवीय विषय पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेकर भारत सरकार को निर्देशित करने की कृपा करें कि वह तत्काल आमरण अनशन पर बैठे छात्रों एवं श्री सोनम वांगचुक के प्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक, निष्पक्ष एवं सार्थक वार्ता प्रारंभ करे, उनके जीवन एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करे तथा उनकी मांगों के न्यायसंगत समाधान हेतु प्रभावी कदम उठाए।
मान्यवर, यदि समय रहते संवाद स्थापित हो जाता है और किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना टल जाती है, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों के जीवन की रक्षा नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवेदनशीलता, संविधान की गरिमा तथा न्यायपालिका में जनता के अटूट विश्वास की भी रक्षा होगी।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति दमन में नहीं, बल्कि संवाद में होती है; और न्याय की सर्वोच्च प्रतिष्ठा तब होती है, जब वह जीवन, संवेदना और संविधान—तीनों की एक साथ रक्षा करे।
इसी अटूट विश्वास के साथ हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय से इस विषय में तत्काल मानवीय एवं संवैधानिक हस्तक्षेप की विनम्र प्रार्थना करते हैं।
सादर।
भवदीय,
(के.के. राय, एडवोकेट)
संरक्षक,
(राजवेंद्र सिंह, एडवोकेट)
संयोजक,
(मो0 सईद सिद्दीक़ी, एडवोकेट)
सह-संयोजक
(प्रमोद कुमार गुप्ता, एडवोकेट)
सदस्य,
(चार्ली प्रकाश, एडवोकेट)
सदस्य,
अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद।
9415734354, 9452539900