Adhivakta Manch Allahabad

Adhivakta Manch Allahabad अधिवक्ता मंच लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता को समर्पित अधिवक्ताओं का जनवादी मंच

23/07/2026

युवाओ का भविष्य उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा है और अभी भी नहीं उनकी प्राथमिकता उनके दोस्तों खासकर अडानी के लिए देश लुटाना है और आरएसएस को चढ़ावा लुटवाना है। ये कितने झूठे हैं नौजवान जानते हैं इसलिए बहकावे में नहीं आयेंगे ..

इलाहाबाद के अधिवक्ता साथियों और नागरिकों आइये अपने पुरखे की शहादत स्थली को नमन करें और काले अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हों...
22/07/2026

इलाहाबाद के अधिवक्ता साथियों और नागरिकों आइये अपने पुरखे की शहादत स्थली को नमन करें और काले अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हों।

22/07/2026
प्रेस विज्ञप्ति  #अधिवक्ताओं ने हाई कोर्ट के सामने प्रदर्शन करते हुए छात्रों की  धर्मेंद्र प्रधान के स्तीफे की मांग का स...
20/07/2026

प्रेस विज्ञप्ति

#अधिवक्ताओं ने हाई कोर्ट के सामने प्रदर्शन करते हुए छात्रों की धर्मेंद्र प्रधान के स्तीफे की मांग का समर्थन किया।

#लंबे समय से जारी आंदोलन के बावजूद सरकार की ओर से बात चीत न करने और पुलिस के बल पर छात्रों की आवाज़ को कुचल देने की अधिवक्ता मंच ने भर्त्सना की और इसे असंवेदनशील,अमानवीय और लोकतंत्र की आत्मा की खिलाफ बताया।

आज दिनांक 20 जुलाई को अधिवक्ता मंच इलाहाबाद की ओर से दिल्ली में जारी छात्रों के आंदोलन के समर्थन में विरोध प्रदर्शन किया गया। हाई कोर्ट इलाहाबाद के सामने इकट्ठा हुए अधिवक्ताओं ने छात्रों की मांगों का पुरजोर समर्थन देते हुए सरकार की तानाशाही, अमानवीय और असंवेदनशीलता की भर्त्सना की। अधिवक्ताओं ने जानेमाने वैज्ञानिक सोनम वांगचुक , छात्र नेताओं नेहा बोरा, मनीष और अमीन आदि के स्वास्थ्य के बारे में चिंतव्यक्त की और उनके साथ और आंदोलन की मांगों के साथ एकजुटता प्रकट करते हुए कहा कि लोकतंत्र की प्राथमिक कसौटी है कि सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो और लगातार हो रहे पेपरलीक को सरकार ठीक नहीं कर पा रही है इसलिए इसके लिए जिम्मेदार मंत्री को हटाया जाना चाहिए और राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी का नाम से बनाई गई संस्था की लगातार विफलता ये साबित करती है कि पेपर लीक किसी चूक का नहीं बल्कि गलत नीति के कारण हो रही है इसलिए NTA को रद्द किया जाना चाहिए। इस दौरान हुई सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने सरकार की शिक्षा को बर्बाद करके बेरोजगार नौजवानों के साथ धोखा करने और उनके अंदर नफरत कुंठा और हताशा भरने की नीति की देश के लिए घातक है। सभा को महा प्रसाद, रज्जन यादव, शमशुल इस्लाम, इरशाद, राय साहेब यादव, अविनाश वर्मा, जितेंद्र नायक, सुहैल अहमद, अब्दुल मजीद, घनश्याम मौर्य, अवधेश, प्रमोद कुमार गुप्त, अनिल यादव, अब्बास, रेहान, विकास मौर्य, घनश्याम मौर्य, भास्कर पासवान, आदि अधिवक्ताओं ने संबोधित किया। अंत में सभा को संबोधित करते हुए अधिवक्ता मंच के संयोजक राजवेंद्र सिंह ने उपस्थित अधिवक्ताओं और वादकारियों का आह्वाहन करते हुए कहा कि शिक्षा को बचाने की लड़ाई देश को बचाने की लड़ाई है और मोदी सरकार देश के लोकतंत्र और कानून के राज को खत्म करके पूरे की संपदा अंबानी और अदानी को लुटाने में लगी है और लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों को लगातार खत्म कर रही है । अदालत सहित देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं को लगभग समाप्त किया जा चुका है अतः एक बार फिर से हम भारत के लोगों को आगे आना होगा और अधिवक्ताओं को आंदोलनकारी आम छात्र नौजवान मजदूर किसानों की लड़ाई के साथ खड़ा होकर और बुलंद करना होगा। उन्होंने कहा कि भले ही आज दिल्ली में जारी छात्रों के आंदोलन समाप्त हो जाए लेकिन देश और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई जारी रहेगी। सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता शमीमुद्दीन खान ने किया और संचालन अधिवक्ता मंच के सह संयोजक मो0 सईद सिद्दीक़ी ने किया। सभा के अंत में अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ अधिवक्ता शमीमुद्दीन खान ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए हर जनांदोलन में मुखर होकर साथ खड़े होने की अपील की। इस दौरान धर्मेंद्र प्रधान स्तीफा दो, NTA को रद्द करो, छात्रों और अधिवक्ताओं की एकता जिंदाबाद, शिक्षा विरोधी छात्र विरोधी लोकतंत्र विरोधी मोदी सरकार मुरादाबाद आदि नारे लगाए गए। विरोध प्रदर्शन में रविंदर सिंह, जे पी राव, राजेश श्रीवास्तव, राकेश कुमार यादव, संजय गुप्ता, फैयाज खान, जितेंद्र, सोमू यादव, माणिक चंद, सैयद मसीह, कमलेश रतन, प्यारे मोहन, जनार्दन यादव, माता प्रसाद पाल, विश्वविजय, अरीब, यशवंत सिंह आदि बड़ी संख्या में अधिवक्ता और वादकारी उपस्थित रहे।

भवदीय,
मोहम्मद सईद सिद्दीक़ी,
सह-संयोजक अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद।
9452539900

14/07/2026

सेवा में,
माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय
सर्वोच्च न्यायालय, भारत
नई दिल्ली।
विषय : प्रतियोगी एवं भर्ती परीक्षाओं में लगातार प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं से आहत छात्रों एवं प्रख्यात शिक्षाविद् के आमरण अनशन, उनके जीवन पर उत्पन्न गंभीर संकट तथा सरकार द्वारा संवाद न किए जाने के संबंध में स्वतः संज्ञान लेकर आवश्यक हस्तक्षेप किए जाने हेतु प्रार्थना।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि हम, अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद, संविधान के प्रति अपनी निष्ठा तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के दायित्व का निर्वहन करते हुए आपका ध्यान एक अत्यंत गंभीर, संवेदनशील एवं मानवीय विषय की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं।
देश में प्रतियोगी एवं भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लगातार लीक होने की घटनाओं ने लाखों-करोड़ों छात्रों के भविष्य, उनके कठिन परिश्रम तथा शासन व्यवस्था की निष्पक्षता पर उनके विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया है। वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले अनेक छात्र निराशा, मानसिक तनाव और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों में न्याय, जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर नेहा (AISA President)
मनीष (AISA UP President)
दानिश (JNUSU Jt. Secretary)
दीपक (AISA DU Vice President) हृषिकेश (President,
Barak Hostel, JNU) आमीन (Former CC Member, AUD Students Council) आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनके साथ देश के प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पर्यावरणविद् श्री सोनम वांगचुक भी आमरण अनशन कर रहे हैं।
अत्यंत चिंता का विषय है कि लगातार 16 दिनों से चल रहे इस आमरण अनशन के कारण अनशनकारियों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिक श्री सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य के निरंतर गिरने की सूचनाएँ सार्वजनिक रूप से सामने आ रही हैं। यदि समय रहते संवाद और समाधान का मार्ग नहीं अपनाया गया तो उनके जीवन सहित अन्य आमरण अनशनरत छात्रों के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह स्थिति अत्यंत वेदनापूर्ण है कि उसके छात्र और एक सम्मानित शिक्षाविद् अपनी मांगों को सुने जाने के लिए अपने प्राणों को दाँव पर लगाने को विवश हों।
श्री सोनम वांगचुक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में देश की एक अमूल्य बौद्धिक धरोहर हैं। इसी प्रकार आमरण अनशन पर बैठे छात्र भारत के भविष्य के निर्माता हैं। यदि संवाद के अभाव में इनके जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो यह केवल व्यक्तियों की क्षति नहीं होगी, बल्कि राष्ट्र की ऐसी अपूरणीय क्षति होगी जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
महोदय, भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संवाद, संवेदनशीलता, असहमति के सम्मान तथा जनभावनाओं की कद्र में निहित है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और न्याय की मांग करने का अधिकार प्रदान करता है। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि जनता की पीड़ा को सुनना और संवाद के माध्यम से समाधान निकालना भी है। यदि शांतिपूर्ण एवं अहिंसक लोकतांत्रिक आंदोलनों की भी उपेक्षा की जाने लगे, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किसान आंदोलन के दौरान भी लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए सरकार को आंदोलनरत किसानों के साथ बातचीत कर समाधान तलाशने की दिशा में प्रेरित किया था। न्यायालय का वह हस्तक्षेप भारतीय लोकतंत्र में संवाद की गरिमा और संविधान की आत्मा के अनुरूप था। आज देश के छात्र भी अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता जैसे राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों को लेकर शांतिपूर्ण आमरण अनशन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में न्यायालय की वही संवेदनशील एवं मानवीय भूमिका पुनः अपेक्षित है।
माननीय महोदय,
आप केवल भारत के प्रधान न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक, मौलिक अधिकारों के प्रहरी तथा करोड़ों नागरिकों की अंतिम न्यायिक आशा हैं। जब देश के छात्र और एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ शिक्षाविद् अपने प्राणों की परवाह किए बिना न्याय की गुहार लगा रहे हों और उनके साथ सार्थक संवाद का कोई प्रयास दिखाई न दे रहा हो, तब समूचे राष्ट्र की आशाएँ स्वाभाविक रूप से माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर उठती हैं।
हम आपसे करबद्ध एवं विनम्र प्रार्थना करते हैं कि इस अत्यंत गंभीर और मानवीय विषय पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेकर भारत सरकार को निर्देशित करने की कृपा करें कि वह तत्काल आमरण अनशन पर बैठे छात्रों एवं श्री सोनम वांगचुक के प्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक, निष्पक्ष एवं सार्थक वार्ता प्रारंभ करे, उनके जीवन एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करे तथा उनकी मांगों के न्यायसंगत समाधान हेतु प्रभावी कदम उठाए।
मान्यवर, यदि समय रहते संवाद स्थापित हो जाता है और किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना टल जाती है, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों के जीवन की रक्षा नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवेदनशीलता, संविधान की गरिमा तथा न्यायपालिका में जनता के अटूट विश्वास की भी रक्षा होगी।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति दमन में नहीं, बल्कि संवाद में होती है; और न्याय की सर्वोच्च प्रतिष्ठा तब होती है, जब वह जीवन, संवेदना और संविधान—तीनों की एक साथ रक्षा करे।
इसी अटूट विश्वास के साथ हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय से इस विषय में तत्काल मानवीय एवं संवैधानिक हस्तक्षेप की विनम्र प्रार्थना करते हैं।
सादर।
भवदीय,

(के.के. राय, एडवोकेट)
संरक्षक,
(राजवेंद्र सिंह, एडवोकेट)
संयोजक,

(मो0 सईद सिद्दीक़ी, एडवोकेट)
सह-संयोजक

(प्रमोद कुमार गुप्ता, एडवोकेट)
सदस्य,

(चार्ली प्रकाश, एडवोकेट)
सदस्य,
अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद।
9415734354, 9452539900

13/06/2026

*प्रेस बयान*

केंद्रीय कानून मंत्री के साथ देश के मुख्य न्यायाधीश समेत लगभग 75 न्यायाधीशों का सरकारी खर्च पर लंदन में “छुट्टियां” मनाना भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका की गरिमा और संविधान की आत्मा — तीनों पर एक गंभीर आघात है। जिस समय देश की करोड़ों जनता महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य संकट से जूझ रही है, उस समय सत्ता और न्यायपालिका के शीर्ष लोग विदेशी धरती पर सरकारी मेहमाननवाजी और विलासिता का आनंद लेते दिखाई दे रहे हैं। यह केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि जनता के संघर्षों का खुला उपहास है।
प्रधानमंत्री देशवासियों को खाने के तेल का कम प्रयोग करने, मितव्ययिता अपनाने और विदेश यात्राओं से बचने की नसीहत देते हैं, लेकिन उन्हीं की सरकार जनता के टैक्स के पैसों से न्यायाधीशों और मंत्रियों के विदेशी “पिकनिक कार्यक्रम” आयोजित कर रही है। यह दोहरा चरित्र, नैतिक पाखंड और जनता के साथ निर्मम छल का सबसे कुरूप उदाहरण है।
अधिवक्ता मंच इलाहाबाद स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता है कि न्यायपालिका का दायित्व सत्ता के साथ विदेशी पर्यटन करना नहीं, बल्कि सत्ता की मनमानियों पर संवैधानिक अंकुश लगाना है। लेकिन जब कानून मंत्री और शीर्ष न्यायाधीश एक साथ विदेशी दौरों और सरकारी आतिथ्य में दिखाई देते हैं, तब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि जनता अब यह विश्वास करने लगी है कि न्यायपालिका में सरकार की मनमानियों को रोकने का साहस कमजोर पड़ चुका है और सरकार के खिलाफ फैसले करते हुए न्याय की भावना को स्थापित करने का नैतिक बल भी क्षीण होता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में झूठे मुकदमों में फंसाए गए राजनीतिक विरोधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और असहमति की आवाज उठाने वाले नागरिकों को समय पर न्याय देने में न्यायालयों की विफलता ने इस आशंका को और गहरा किया है।
संविधान और उसके मूल्यों की रक्षा करते हुए लोकतंत्र को मजबूत करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी से पीछे हटती दिखाई दे रही न्यायपालिका में बैठे अनेक लोग आज अपने संवैधानिक दायित्वों से अधिक निजी महत्वाकांक्षाओं, पदलोलुपता और सरकारी विलासिता की आकांक्षाओं से संचालित होते प्रतीत हो रहे हैं। जनता के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि सत्ता के साथ बढ़ती निकटता और सरकारी सुविधाओं के आकर्षण ने न्यायपालिका की नैतिक दृढ़ता को कमजोर किया है।
देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। गरीब आदमी तारीख पर तारीख झेलते-झेलते बर्बाद हो रहा है। निचली अदालतों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, लेकिन न्यायपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग विदेशी होटलों, आलीशान आयोजनों और सरकारी खर्च पर आयोजित सेमिनारों में व्यस्त हैं। यह स्थिति न्याय व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को गहरे स्तर पर चोट पहुंचा रही है।
अधिवक्ता मंच इलाहाबाद मानता है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका की यह बढ़ती सांठगांठ लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। यदि न्यायपालिका सत्ता के साथ विशेषाधिकारों का उपभोग करती दिखाई देगी, तो आम नागरिक का यह विश्वास समाप्त होता जाएगा कि अदालतें सत्ता के विरुद्ध खड़े होकर संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा कर सकती हैं।
यह देश जानना चाहता है कि आखिर किस अधिकार से जनता के खून-पसीने की कमाई को न्यायाधीशों और मंत्रियों के विदेशी दौरों और शाही आयोजनों पर खर्च किया जा रहा है? क्या यही संवैधानिक नैतिकता है? क्या यही न्यायिक गरिमा है?
अधिवक्ता मंच इलाहाबाद इस पूरे विदेशी दौरे, उस पर हुए सरकारी खर्च और उससे जुड़े सभी निर्णयों का तत्काल सार्वजनिक खुलासा करने, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने तथा सरकारी धन से होने वाले इस प्रकार के विलासितापूर्ण आयोजनों पर पूर्ण रोक लगाने की मांग करता है।
यदि न्यायपालिका जनता के दुःख-दर्द से कटकर सत्ता की सहयात्री बनती जाएगी, तो यह केवल न्यायपालिका की साख का संकट नहीं होगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और संविधान — दोनों के भविष्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।
द्वारा:
राजवेंद्र सिंह, संयोजक
मो0 सईद सिद्दीक़ी, सह संयोजक
अधिवक्ता मंच इलाहाबाद।
9415734354, 9452539900

30/05/2026

अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद
की ओर से
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन
Manan Kumar Mishra
के नाम खुला पत्र
मान्यवर,
आपका यह बयान कि “देश में 35 से 40 प्रतिशत वकील फर्जी हैं” केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय के आत्मसम्मान पर हमला है। यह बयान किसी टीवी बहस के प्रवक्ता ने नहीं, बल्कि उस संस्था के अध्यक्ष ने दिया है जिसे देश के अधिवक्ताओं की गरिमा, स्वतंत्रता और पेशेवर मानकों की रक्षा करनी चाहिए।
लेकिन सच यह है कि आपका यह बयान अधिवक्ताओं पर आरोप कम और आपकी अपनी विफलताओं का सार्वजनिक इकबाल ज्यादा है।
यदि वास्तव में देश में इतनी बड़ी संख्या में फर्जी वकील मौजूद हैं, तो सबसे पहले कठघरे में आप स्वयं खड़े हैं। क्योंकि वर्षों से बार काउंसिल ऑफ इंडिया का नेतृत्व आपके हाथों में रहा है। डिग्री सत्यापन से लेकर नामांकन व्यवस्था तक, लॉ कॉलेजों की मान्यता से लेकर विधि शिक्षा की निगरानी तक — हर महत्वपूर्ण तंत्र आपकी अध्यक्षता और प्रभाव के अधीन संचालित होता रहा है।
फिर यह बताइए कि—
बिना भवनों वाले लॉ कॉलेजों को मान्यता किसने दी?
बिना योग्य शिक्षकों और पुस्तकालयों के संस्थानों को “लीगल एजुकेशन” का लाइसेंस किसने दिया?
विधि शिक्षा को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त निजी दुकानों में बदलने दिया किसने?
निरीक्षणों को औपचारिक भ्रष्टाचार और कागजी खानापूर्ति में बदलने दिया किसने?
आज अदालतों में जो गुणवत्ता-विहीन विधि स्नातकों की भीड़ दिखाई देती है, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं है। यह आपकी अध्यक्षता में वर्षों तक चलाए गए उस विनाशकारी मॉडल का परिणाम है जिसमें शिक्षा नहीं, मान्यता का कारोबार फलता-फूलता रहा।
विडंबना यह है कि इस पूरे पतन की जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय आपने पूरे अधिवक्ता समाज को ही “फर्जी” घोषित कर दिया। यह वही मानसिकता है जिसमें नेतृत्व अपनी असफलता छिपाने के लिए जनता को दोषी ठहराने लगता है।
देश का अधिवक्ता समाज यह भी देख रहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया धीरे-धीरे अधिवक्ताओं की स्वतंत्र संस्था कम और सत्ता प्रतिष्ठान के अनौपचारिक सहयोगी मंच में अधिक बदलती गई। अदालतों में संघर्षरत युवा अधिवक्ताओं की समस्याओं पर आपकी आवाज़ कभी उतनी मुखर नहीं रही, जितनी सत्ता के प्रति आपकी विनम्रता रही है।
आपके सार्वजनिक आचरण से यह धारणा गहरी हुई है कि बार काउंसिल का नेतृत्व अब अधिवक्ताओं की लड़ाई लड़ने के बजाय सत्ता की कृपा प्राप्त करने में अधिक रुचि रखता है। राज्यसभा की राजनीति और सत्ता के गलियारों में स्वीकार्यता की आकांक्षा ने बार काउंसिल की संस्थागत गरिमा को गंभीर क्षति पहुँचाई है।
देश के तीन नए आपराधिक कानूनों—
Bharatiya Nyaya Sanhita,
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita
और
Bharatiya Sakshya Adhiniyam
को लेकर जब देशभर के अधिवक्ताओं में व्यापक असंतोष था, जब जिला बारों से लेकर उच्च न्यायालयों तक गंभीर आपत्तियाँ उठ रही थीं, जब वकील समुदाय लोकतांत्रिक विमर्श और प्रतिरोध चाहता था — तब आपने उस असंतोष को संगठित करने के बजाय उसे ठंडा करने की भूमिका निभाई। आपने अधिवक्ताओं की आवाज़ बनने के बजाय सत्ता को असुविधा से बचाने का काम किया।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक स्वतंत्र, निर्भीक और लोकतांत्रिक संस्था होना चाहिए था, लेकिन आपके कार्यकाल में यह संस्था लगातार केंद्रीकृत, अपारदर्शी और सत्ता-अनुकूल होती गई। अधिवक्ताओं का विश्वास कमजोर हुआ, विधि शिक्षा का स्तर गिरा, युवा वकीलों का भविष्य असुरक्षित हुआ और संस्था की नैतिक विश्वसनीयता लगातार क्षीण होती गई।
आज जब आप पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, तब देश का अधिवक्ता समाज आपसे पूछ रहा है —
यदि सब कुछ इतना ही सड़ा हुआ है, तो वर्षों से शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति की जवाबदेही कहाँ तय होगी?
किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में नैतिकता का न्यूनतम सिद्धांत यह कहता है कि जो व्यक्ति अपने ही कार्यकाल को इतनी भयावह विफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो, उसे पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं रह जाता।
अतः अब समय आ गया है कि आप अधिवक्ता समुदाय को अपमानित करने के बजाय अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन पद से तत्काल त्यागपत्र दें।
क्योंकि वकालत अभी भी लोकतंत्र का स्वतंत्र स्तंभ है —
और इसे किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, सत्ता-निकटता और प्रशासनिक विफलताओं की ढाल नहीं बनने दिया जा सकता।
— अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद
9415734354, 9452539900

प्रेस विज्ञप्तिअधिवक्ता मंच, इलाहाबादअधिवक्ता मंच, इलाहाबाद, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकलपीठ द्वारा पारित उस अंतरिम आदे...
12/02/2026

प्रेस विज्ञप्ति
अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद

अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकलपीठ द्वारा पारित उस अंतरिम आदेश पर गंभीर आपत्ति और गहरी चिंता व्यक्त करता है, जिसके द्वारा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, संभल द्वारा धारा 156(3) दंप्रसं के अंतर्गत पारित FIR दर्ज करने के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी गई है।
फुल बेंच के ऐतिहासिक निर्णय Father Thomas vs. State of U.P. में यह विधि स्पष्ट और बाध्यकारी रूप से प्रतिपादित है कि मजिस्ट्रेट का 156(3) का आदेश एक न्यायिक आदेश है, जिसमें उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप अत्यंत सीमित और अपवादस्वरूप ही होना चाहिए। यदि किसी एकलपीठ को फुल बेंच द्वारा प्रतिपादित विधि से असहमति हो, तो स्थापित न्यायिक परिपाटी यह अपेक्षा करती है कि मामला लार्जर बेंच को संदर्भित किया जाए—न कि फुल बेंच के सिद्धांतों की उपेक्षा कर दी जाए। वर्तमान परिदृश्य न्यायिक अनुशासन की इसी स्थापित परंपरा से विचलन दर्शाता है।
CJM का आदेश किसी को दोषी ठहराने का नहीं था; वह केवल विधिसम्मत जांच प्रारंभ कराने का निर्देश था। सामान्य विधिक क्रम यह था कि FIR दर्ज होती, निष्पक्ष जांच होती, और यदि कोई निर्दोष होता तो जांच के निष्कर्ष स्वयं उसे मुक्त कर देते। इसके विपरीत, जांच की प्रक्रिया को प्रारंभ होने से पहले ही रोक देना न्याय की स्वाभाविक धारा को अवरुद्ध करना है।
मामले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह भी बताया गया है कि घायल व्यक्ति के शरीर से जो गोली बरामद हुई, वह पुलिस के मानक हथियार से चली गोली से भिन्न प्रतीत होती है। यह तथ्य मामले को और गंभीर बनाता है—क्या वैध शस्त्रों से इतर हथियारों का उपयोग हुआ, या पुलिस कार्रवाई की आड़ में किसी अन्य द्वारा गोली चलाई गई? ऐसे प्रश्नों का उत्तर केवल विधिसम्मत FIR और उसके पश्चात होने वाली निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता था। इसलिए मजिस्ट्रेट के आदेश में हस्तक्षेप न केवल विधि सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि सत्य के अन्वेषण की प्रक्रिया को भी बाधित करता है।
अधिवक्ता मंच राज्य सरकार की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है। न्यायिक आदेश के विरुद्ध पुलिस अधिकारियों के पक्ष में सक्रिय पैरवी करना तथा अपर महाधिवक्ता द्वारा उन्हीं के समर्थन में तर्क रखना, विधि के शासन की उस भावना के अनुरूप नहीं है जहाँ राज्य का दायित्व निष्पक्षता का होता है, न कि पक्षधरता का। यह प्रवृत्ति अधीनस्थ न्यायपालिका के आत्मबल और संस्थागत सम्मान के लिए भी प्रतिकूल संकेत देती है।
अधिवक्ता मंच का मत है कि इस प्रकार का हस्तक्षेप एक प्रतिकूल नजीर (bad precedent) स्थापित कर सकता है, जिससे भविष्य में भी मजिस्ट्रेटों द्वारा पारित विधिसम्मत आदेशों के क्रियान्वयन में अनावश्यक अवरोध उत्पन्न होंगे। यह न्याय की मंशा के विपरीत है तथा पीड़ित परिवार के साथ अन्याय का कारण बनता है।
उपरोक्त परिस्थितियों में, अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद, यह मांग करता है कि इस प्रकरण को लार्जर बेंच को संदर्भित कर न्यायिक अनुशासन, फुल बेंच की बाध्यकारी विधि, और निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों के अनुरूप पुनः विचार किया जाए।
न्याय का तकाज़ा है कि जांच रुके नहीं—सत्य सामने आए, और विधि का शासन प्रभावी रहे।
राजवेंद्र सिंह, संयोजक
मो0 सईद सिद्दीकी, सह संयोजक
प्रमोद गुप्ता, एडवोकेट
चार्ली प्रकाश, एडवोकेट
नीतेश कुमार एडवोकेट
राकेश कुमार यादव एडवोकेट
सदस्य, कार्यपरिषद
अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद।

मानवाधिकार दिवस के अवसर पर होनेवाले चर्चा में आपका स्वागत है..
09/12/2025

मानवाधिकार दिवस के अवसर पर होनेवाले चर्चा में आपका स्वागत है..

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