सतरंगी सलाम ट्रस्ट

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08/08/2026

शीर्षक: स्वास्थ्य और शिक्षा का संस्थागत विध्वंस और सरकारों की राजनीतिक जवाबदेही: राजनीतिक दलों के पाखंड से

जब कोई समाज बीमार और अशिक्षित होता है, तो उसकी राजनीतिक व्यवस्था चाहे कितनी भी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के दावे कर ले, वह अंदर से खोखली और अमानवीय हो चुकी होती है।

आज़ादी के दशकों बाद भी यदि हमारे देश के किसी भी राज्य में - चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल (पार्टी) द्वारा शासित क्यों न हो - एक गरीब परिवार का बच्चा बुनियादी इलाज के अभाव में दम तोड़ दे या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिलने के कारण जीवनभर के संघर्ष में फंस जाए, तो यह किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि पूरी शासन प्रणाली की नैतिक हार है

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी स्पष्टता से रखती है कि स्वास्थ्य और शिक्षा वे दो मूल स्तंभ हैं जिन पर किसी भी राष्ट्र का भविष्य टिकता है
लेकिन विडंबना यह है कि आज इन दोनों क्षेत्रों को चुनावी वादों और विज्ञापनों का जरिया तो बनाया जाता है, लेकिन धरातल पर ये दोनों व्यवस्थाएं घोर उपेक्षा और संस्थागत पंगुता का शिकार हैं।

आइए, इस गंभीर मुद्दे पर बिना किसी दलीय पक्षपात के, सीधे और दो टूक बात करें।

1. स्वास्थ्य व्यवस्था का सच: जिला अस्पतालों से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक की लाचारी

जब हम उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों, पूर्वांचल के तराई जिलों या देश के विभिन्न राज्यों के सरकारी अस्पतालों की ओर देखते हैं,
तो वहां की तस्वीर किसी मानवीय त्रासदी से कम नहीं होती:

* डॉक्टरों और संसाधनों का अकाल: कागजों पर आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बड़े-बड़े आंकड़े पेश किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) पर न तो नियमित डॉक्टर मिलते हैं, न जीवन रक्षक दवाएं और न ही बुनियादी जांच की सुविधाएं।

* गरीबों की मजबूरी और निजी लूट: सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की इसी विफलता का फायदा उठाकर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स और प्राइवेट मेडिकल माफिया आम जनता की गाढ़ी कमाई लूट रहे हैं।
एक साधारण सी बीमारी का इलाज भी आज गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को कर्ज के दलदल में धकेल देने के लिए काफी है।

* पार्टी कोई भी हो, हालात जस के तस: चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल हो - केंद्र हो या राज्य - स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रचार-प्रसार में खर्च हो जाता है,
जबकि अस्पतालों की दीवारों से प्लास्टर उखड़ रहा होता है और स्ट्रेचर की कमी के कारण मरीज जमीन पर दम तोड़ने को विवश होते हैं।

2. शिक्षा और स्वास्थ्य का अंतर्संबंध: एक खोखली होती युवा पीढ़ी

स्वास्थ्य और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।
जिस देश में युवा कुपोषण, मानसिक तनाव और अस्वस्थ माहौल के बीच जीने को मजबूर हों, वहां उच्च शिक्षा और नवाचार की उम्मीद करना बेमानी है।

* मानसिक स्वास्थ्य का संकट: NEET, CBSE और प्रतियोगी परीक्षाओं के भारी दबाव, पेपर लीक के तनाव और रोजगार की अनिश्चितता ने आज के युवाओं को गंभीर अवसाद (Depression) की आग में झोंक दिया है
लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस मानसिक आपातकाल से निपटने के लिए कोई मजबूत संस्थागत तंत्र मौजूद नहीं है।

* संस्थागत संवेदनशीलता का अभाव: सत्ता में बैठे लोगों के लिए छात्र और मरीज केवल 'वोट बैंक' या 'आंकड़े' हैं।
जब तक शासन प्रणाली में मानवीय संवेदनशीलता और संवैधानिक जवाबदेही वापस नहीं लाई जाएगी, तब तक यह चक्रव्यूह यूं ही चलता रहेगा।

3. सरकारों से सीधे और दो टूक सवाल (चाहे केंद्र हो, राज्य हो, या केंद्रीय स्तर की विपक्ष-शासित प्रदेश हों)

AISSA की ओर से हम उन सभी सत्ताधारियों से - चाहे वे किसी भी दल के झंडे के पीछे छिपे हों -
यह सीधे सवाल पूछते हैं:

* बजट का वास्तविक आवंटन कहां जाता है?:
स्वास्थ्य और शिक्षा पर जीडीपी का या राज्य के कुल बजट का वह हिस्सा आखिर कहां गायब हो जाता है, जिसके दम पर विश्वस्तरीय व्यवस्था बनाने के दावे किए जाते हैं?
यदि बजट है, तो जमीन पर डॉक्टर, दवाएं, शिक्षक और प्रयोगशालाएं क्यों नदारद हैं?

* दल बदलने से व्यवस्था क्यों नहीं बदलती?: चाहे राज्य में कोई भी पार्टी शासन कर रही हो - शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमेशा घिसी-पिटी नीतियां और लापरवाही ही क्यों देखने को मिलती है?
क्या जनता की बुनियादी जरूरतें सिर्फ चुनावी भाषणों का एजेंडा बनकर रह गई हैं?

* लापरवाही पर आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं?:
परीक्षा तंत्र के फेल होने पर या सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकीय लापरवाही से किसी की जान जाने पर केवल 'जांच कमेटी' बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया जाता है?
क्या प्रशासनिक अधिकारियों और जिम्मेदार मंत्रियों की सीधी जवाबदेही और कानूनी सजा तय करने का कोई सख्त कानून नहीं बनना चाहिए?

4. आम जनमानस के नाम अंतिम संदेश

अब यह तय करने का समय आ गया है कि हम कब तक अपनी बुनियादी जरूरतों (इलाज, पढ़ाई और गरिमापूर्ण जीवन) को छोड़कर सतही बहकावे में अपनी ऊर्जा नष्ट करते रहेंगे।

* दलगत सीमाओं से ऊपर उठें: जब तक आम जनता खुद आगे बढ़कर अपनी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगी, तब तक कोई भी सरकार अपने मन से कुछ नहीं करेगी।

* अधिकारों के लिए एकजुटता:

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) हर उस नागरिक और छात्र के साथ खड़ी है जो यह मांग करता है कि अस्पताल और स्कूल हर नागरिक का अधिकार हैं, कोई भीख नहीं।

स्वास्थ्य और शिक्षा की इस लड़ाई में खामोश रहना अपने ही भविष्य के साथ गद्दारी है।
जागो, सवाल पूछो और व्यवस्था को जवाबदेह बनाओ!

06/08/2026

शीर्षक: उत्तर भारत के शिक्षा मानचित्र का ध्वंस: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर पूर्वांचल और तराई के 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' की दास्तान और AISSA का वैचारिक रुख

जब हम उत्तर भारत के अकादमिक और ऐतिहासिक परिदृश्य का सिंहावलोकन करते हैं, तो एक समय वह दौर था जब प्रयागराज (इलाहाबाद) और पूरे पूर्वांचल-बिहार बेल्ट को देश की वैचारिक, बौद्धिक और राजनीतिक चेतना की नर्सरी कहा जाता था।
इसी भूमि से निकले मेधावियों ने देश के विधि, न्याय, विज्ञान और शासन तंत्र को दिशा दी
लेकिन आज, उसी ऐतिहासिक बेल्ट की स्थिति क्या है?
क्या कारण है कि कभी 'पूर्व के ऑक्सफोर्ड' कहे जाने वाले संस्थान आज प्रशासनिक पंगुता, राजनीतिक उपेक्षा और संस्थागत सड़न के प्रतीक बन चुके हैं?
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस गहरे ऐतिहासिक और वर्तमान संकट की परतें उधेड़ते हुए यह स्पष्ट करना चाहती है कि शिक्षा का यह विध्वंस कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित व्यवस्थागत विफलता है।

आइए, इस पूरे भौगोलिक और संस्थागत पतन के उस सच पर बात करें जिसे मुख्यधारा के विमर्श में सुनियोजित तरीके से दबा दिया जाता है।

1. इलाहाबाद विश्वविद्यालय और पूर्वांचल का अकादमिक अवसाद

एक समय था जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की सीढ़ियों से देश की सर्वोच्च नीतियां और वैचारिक क्रांतियां जन्म लेती थीं।
आज स्थिति इसके विपरीत है:

* रिक्तियों का अंतहीन चक्र: विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं के पद वर्षों से खाली पड़े हैं।
नियमित नियुक्तियों के अभाव में ये संस्थान केवल कागजी डिग्रियां बांटने वाली फैब्रीकेशन यूनिट बनकर रह गए हैं।

* संविदा और तदर्थवाद का अभिशाप: जब उच्च शिक्षा को 'गेस्ट फैकल्टी' और 'एड-हॉक' व्यवस्था के भरोसे छोड़ दिया जाता है, तो वहां अकादमिक स्वायत्तता और स्वतंत्र अनुसंधान की संभावना स्वतः समाप्त हो जाती है।
शिक्षक अपनी नौकरी बचाने के संघर्ष में व्यस्त रहता है और छात्र दिशाहीन हो जाते हैं।

* बौद्धिक प्रवास (Brain Drain): उत्तर भारत के इन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के युवा प्रतिभाएं गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और शोध के अभाव में दक्षिण या पश्चिम के राज्यों की ओर पलायन करने को विवश हैं, या फिर प्रशासनिक परीक्षा चक्रव्यूह में उलझकर अपना जीवन गंवा रहे हैं।

2. शिक्षा प्रणाली का 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' बनना

जब किसी राज्य या क्षेत्र में शिक्षा की नींव कमजोर होती है, तो पूरा समाज एक ऐसे 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' में धंस जाता है जहां से बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है:

* नियामक संस्थाओं की निष्क्रियता: यूजीसी (UGC) से लेकर राज्य के उच्च शिक्षा परिषदों तक, आज हर नियामक संस्था अपनी वैधानिक भूमिका निभाने में पूरी तरह विफल साबित हुई है।
भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इन संस्थाओं की रीढ़ तोड़ दी है।

* बुनियादी ढांचे का अभाव: सिद्धार्थनगर से लेकर पूर्वांचल के तराई जिलों तक फैले महाविद्यालयों में आज भी न तो ढंग की प्रयोगशालाएं हैं, न ही आधुनिक ग्रंथालय।
पुस्तकालयों में पुरानी और आउटडेटेड किताबें छात्रों का भविष्य संवारने के बजाय उन्हें सदी पीछे धकेल रही हैं।

* बाजारवाद और शिक्षा का कमोडिटीकरण: शिक्षा अब ज्ञान या सामाजिक मुक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने का सबसे बड़ा उद्योग बन चुकी है।
गरीब और वंचित वर्ग का छात्र इस महंगी होती शिक्षा प्रणाली में प्रतियोगिता की दौड़ से बहुत पहले ही बाहर हो जाता है।

3. प्रशासनिक पंगुता और वैचारिक शून्यता

इस पूरे संकट के मूल में शासन-प्रशासन की वह उदासीनता है जो युवाओं के भविष्य को केवल आंकड़ों के खेल के रूप में देखती है:

* श्वेत-पत्र (White Paper) से दूरी क्यों?:
सरकारें शिक्षा के विकास के नाम पर अरबों रुपये के विज्ञापनों का ढोल पीटती हैं, लेकिन वे कभी इस बात पर श्वेत-पत्र जारी नहीं करतीं कि विश्वविद्यालयों में खाली पड़े 40-50% पद क्यों नहीं भरे जा रहे?
चयन परीक्षाओं के कैलेंडर हर साल पटरी से क्यों उतर जाते हैं?

* संस्थागत निरंतरता का अभाव: जब तक शिक्षा नीति को राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडे से ऊपर उठाकर एक स्थिर, पारदर्शी और संवैधानिक ढांचे के तहत संचालित नहीं किया जाएगा, तब तक हर नई पीढ़ी इसी तरह की प्रशासनिक अराजकता का शिकार बनती रहेगी।

4. AISSA का स्पष्ट दृष्टिकोण और सुधार का रोडमैप

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी दृढ़ता से रखती है कि केवल बयानबाजी या मोमबत्ती मार्च से इस संस्थागत बीमारी का इलाज संभव नहीं है।
इसके लिए एक ठोस, नियम-बद्ध और पारदर्शी कार्यप्रणाली की आवश्यकता है:

* तत्काल रिक्तियां भरो अभियान: देश और राज्य के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े सभी पदों को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर पारदर्शी तरीके से भरा जाए।

* परीक्षा तंत्र की शुचिता: चयन परीक्षाओं (चाहे वे यूनिवर्सिटी की हों या राष्ट्रीय स्तर की) में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त और जवाबदेह वैधानिक प्रावधान लागू हो, जिसमें पेपर लीक या लापरवाही के लिए सीधे प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

* शिक्षा का बजट आवंटन: जीडीपी का एक बड़ा और वास्तविक हिस्सा शिक्षा और शोध के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आरक्षित किया जाए, जो केवल कागजों पर न होकर जमीन पर दिखे।

निष्कर्ष:

उत्तर भारत के शिक्षा मानचित्र का यह वर्तमान संकट आने वाले दशकों के हमारे सामाजिक और आर्थिक स्वास्थ्य को तय करेगा।
यदि आज इस 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' के खिलाफ मुखर होकर संस्थागत जवाबदेही नहीं मांगी गई, तो यह अंधकार हमारी पूरी आने वाली पीढ़ी को निगल जाएगा।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस ऐतिहासिक और व्यवस्थागत लड़ाई में हर उस छात्र, शोधार्थी और नागरिक के साथ चट्टान की तरह खड़ी है जो न्याय, पारदर्शिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार की मांग करता है।

04/08/2026

शिक्षा का संस्थागत पतन और व्यवस्थागत अंधकार

आज जब हम झारखंड से लेकर देश के कोने-कोने तक सड़कों पर उतरते युवाओं को देखते हैं, तो यह केवल कुछ तात्कालिक घटनाओं का रोष मात्र प्रतीत नहीं होता।

यह उस गहरी, कैंसर जैसी फैल चुकी संस्थागत सड़न का परिणाम है जिसने हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था को एक ‘रेगुलेटरी ब्लैक होल’ में तब्दील कर दिया है।

उत्तर भारत के BIMARU और पूर्वांचल बेल्ट से लेकर देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक, आज शिक्षा प्रणाली अपने सबसे गहरे वैचारिक, प्रशासनिक और नैतिक संकट से गुजर रही है।

इस गंभीर दौर में, ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) तमाम जायज़ छात्र संघर्षों और व्यवस्थागत सुधार की मांगों के साथ पूरी वैधानिक और संस्थागत प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है।

आइए, इस पूरे संकट की गहराई में उतरकर उन बुनियादी सच्चाइयों का विश्लेषण करें, जिन पर पर्दा डालने का प्रयास लगातार सत्ता के गलियारों से किया जाता रहा है।

1. रिक्त पदों का मकड़जाल और तदर्थवाद (Ad-hocism) की संस्कृति

जब हम ज़मीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो सबसे भयावह तस्वीर विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े लाखों पदों की दिखती है।
क्या यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक है? कतई नहीं।
यह एक सोची-समझी नीति का परिणाम है, जिसके तहत शिक्षण संस्थानों को नियमित फैकल्टी के बिना चलाया जा रहा है।

* संविदा और तदर्थवाद का जाल: विश्वविद्यालयों से लेकर डिग्री कॉलेजों तक, आज शिक्षा को परमानेंट फैकल्टी के बजाय संविदा (Ad-hoc) और ठेके की व्यवस्था पर धकेल दिया गया है।
जब पढ़ाने वाले शिक्षक ही नौकरी की अनिश्चितता और मानसिक तनाव के साए में जिएंगे, तो वे छात्रों को गुणवत्तापूर्ण वैचारिक और अकादमिक दिशा कैसे दे पाएंगे?

* बजट और नियुक्तियों पर चुप्पी: कागजों पर उच्च शिक्षा के विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्वीकृत पदों को भरने के लिए वर्षों तक फाइलें धूल फांकती रहती हैं।
सिद्धार्थनगर, पूर्वांचल और देश के अन्य तराई व ग्रामीण अंचलों के विश्वविद्यालयों में आज भी बुनियादी शैक्षणिक संसाधन और योग्य शिक्षकों का भारी अभाव है।
क्या यह जानबूझकर शिक्षा को आम पहुंच से दूर करने का षड्यंत्र नहीं है?

2. परीक्षा तंत्र का बाजारीकरण और मानसिक आपातकाल (NEET, CBSE और चयन परीक्षाएं)

आज का युवा वर्ग एक ऐसी व्यवस्था में जीने को विवश है जहाँ शिक्षा ज्ञान की प्राप्ति का माध्यम न होकर एक खर्चीला और क्रूर कमोडिटी बन चुकी है।
NEET, CBSE और राज्य स्तरीय चयन परीक्षाओं का वर्तमान ढांचा छात्रों के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है।

* पेपर लीक और संस्थागत पंगुता: हर साल निकलने वाली पेपर लीक की अंतहीन कतारें और परीक्षा एजेंसियों (जैसे NTA) की लगातार नाकामी यह साबित करती है कि पूरा सिस्टम अंदर से खोखला हो चुका है।
परीक्षा की लंबी तैयारी के बाद जब एक छात्र को यह पता चलता है कि उसका हक किसी धन्नासेठ या पेपर माफिया ने चोरी कर लिया है, तो उस युवा के भीतर जो विध्वंस पैदा होता है, वह समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

* शैडो एजुकेशन और कोचिंग सिंडिकेट: आज स्कूल और विश्वविद्यालय केवल कागजी संस्थान बनकर रह गए हैं, जबकि असली शिक्षा का बाजार बड़े-बड़े कोचिंग सिंडिकेट्स के हाथ में है।
यह 'शैडो एजुकेशन' तंत्र गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के संसाधनों को चूस रहा है और छात्रों को गंभीर अवसाद (Depression) व संज्ञानात्मक संकट में धकेल रहा है।

3.
जुमलों, विज्ञापनों और डिजिटल कैंपेन से शिक्षा की बदहाली को छुपाया नहीं जा सकता।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) की ओर से हम सीधे, स्पष्ट और तीखे सवाल सत्ता के शीर्ष पर बैठे जिम्मेदारों से पूछते हैं:

राज्य सरकार से सवाल:

* रिक्त पदों पर श्वेत-पत्र क्यों नहीं?: राज्य के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में वर्षों से खाली पड़े लाखों पदों को भरने के बजाय सरकार श्वेत-पत्र (White Paper) जारी करने से क्यों कतरा रही है?
क्या शिक्षा को जानबूझकर पंगु बनाया जा रहा है?

* भर्ती घोटालों पर प्रशासनिक कार्रवाई: चयन परीक्षाओं में बार-बार होने वाले भ्रष्टाचार और पेपर लीक के मामलों में केवल लीपापोती क्यों की जाती है?
क्या भ्रष्ट तंत्र और राजनैतिक संरक्षण के गठजोड़ को तोड़ने की कोई वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति बची है?

* क्षेत्रीय उपेक्षा: पूर्वांचल और ग्रामीण अंचलों के उच्च शिक्षण संस्थानों में आधुनिक अकादमिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए बजट का बड़ा हिस्सा कागजों से बाहर जमीन पर क्यों नहीं उतरता?

केंद्र सरकार से सवाल:

* राष्ट्रीय परीक्षा तंत्र (NTA/NEET) की विफलता का जिम्मेदार कौन?: राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाओं की साख लगातार गिर रही है।
क्या केंद्र सरकार के पास इस बात का कोई उत्तर है कि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ कब तक चलेगा?

* कोचिंग माफिया पर नियंत्रण का कानून कहां है?: अनियंत्रित कोचिंग सिंडिकेट्स द्वारा छात्रों के हो रहे आर्थिक और मानसिक शोषण को रोकने के लिए कोई कठोर राष्ट्रीय नियामक नीति क्यों नहीं बनाई जाती?

* डेमोग्राफिक डिविडेंड या आपदा?: जिस युवा आबादी को देश की सबसे बड़ी ताकत (Demographic Dividend) कहा जाता है, उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित रखकर क्या सरकार देश को एक गहरे सामाजिक और आर्थिक अंधकार की ओर नहीं धकेल रही है?

4. आम जनमानस और नागरिक समाज से गंभीर अपील

यह लड़ाई केवल उन छात्रों की नहीं है जो आज सड़कों पर धूप और ठंड में न्याय की भीख मांग रहे हैं; यह लड़ाई इस पूरे समाज के भविष्य की है।

* मुद्दों की राजनीति बनाम सतही बहकावे: जब तक हमारा समाज चुनाव और सामाजिक बहसों में जाति, धर्म और सतही मुद्दों के जाल से बाहर निकलकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को अपना मुख्य राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाएगा, तब तक हर आने वाली पीढ़ी इसी तरह व्यवस्था के कोल्हू में पिसती रहेगी।

* तटस्थता का त्याग करें: आज झारखंड से लेकर देश भर के छात्र जो अपनी बुनियादी शिक्षा और पारदर्शी परीक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यदि समाज उन्हें अकेला छोड़ देता है, तो यह हमारी नैतिक पराजय होगी।

* संस्थागत जवाबदेही की मांग: नागरिक समाज को अब अपनी नींद से जागना होगा।
अपने स्थानीय कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के पतन पर चुप्पी साधना भविष्य के साथ गद्दारी के समान है।

निष्कर्ष और संकल्प

शिक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक और अपरिहार्य अधिकार है।
इसे मुनाफे का धंधा और व्यवस्था की नाकामी का शिकार नहीं बनने दिया जा सकता।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) पूरी दृढ़ता, वैधानिक स्पष्टता और संस्थागत अनुशासन के साथ इस बात की घोषणा करती है कि जब तक शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, रिक्त पदों पर पूर्ण बहाली और परीक्षा तंत्र की शुचिता सुनिश्चित नहीं होती, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।

युवाओं जागो, सवाल पूछो और अपने भविष्य के अधिकारों के लिए इस जड़ हो चुके सिस्टम को हिलाकर रख दो!

अगर केंद्र सरकार से नहीं पूछ सकते हो तो राज्य सरकार से पूछो और अगर अपने राज्य सरकार से नहीं पूछ सकते हो तो किसी दूसरे पार्टी द्वारा शासित प्रदेश सरकार से ही पूछ लो लेकिन पूछो ... स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था पर कुछ तो बोलो 🙏

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (AU) का पतन किसी एक तात्कालिक घटना, छात्र राजनीति या किसी परीक्षा के पैटर्न बदलने का परिणाम नहीं ...
04/08/2026

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (AU) का पतन किसी एक तात्कालिक घटना, छात्र राजनीति या किसी परीक्षा के पैटर्न बदलने का परिणाम नहीं है।
यह दशकों से चली आ रही गहरी संस्थागत, प्रशासनिक और संरचनात्मक विफलताओं का नतीजा है।

यदि सतही कारणों को हटा दें, तो इस ऐतिहासिक संस्थान के पतन के कारण कौन से है?

1. प्रशासनिक पंगुता और वैधानिक शिथिलता (Administrative Paralysis)

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था में निर्णय लेने की क्षमता लगभग समाप्त हो चुकी है।

★ नौकरशाही का अत्यधिक केंद्रीकरण: विश्वविद्यालय अब अकादमिक स्वायत्तता से नहीं, बल्कि एक भारी-भरकम और असंवेदनशील नौकरशाही के इशारे पर चल रहा है।

★ संस्थागत संवाद का अभाव: प्रशासन और छात्रों/शिक्षकों के बीच किसी भी प्रकार के स्वस्थ संवाद का प्लेटफॉर्म खत्म हो चुका है।
हर छोटी समस्या का समाधान या तो फाइलों में उलझ जाता है या प्रशासनिक तानाशाही से दबा दिया जाता है।

2. फैकल्टी का गंभीर अकाल और तदर्थवाद (Severe Faculty Shortage & Ad-hocism)

किसी भी विश्वविद्यालय की रीढ़ उसके प्रोफेसर और शोधार्थी होते हैं, और यहीं पर सबसे बड़ा आघात लगा है।

★ भारी रिक्तियां: वर्षों तक नियमित नियुक्तियां न होना और जो पद भरे भी गए, उनमें पारदर्शिता की कमी ने योग्य अकादमिक नेतृत्व को बाहर कर दिया।

★ तदर्थवाद (Ad-hocism) संस्कृति: अधिकांश विभागों में नियमित प्रोफेसर्स के बजाय संविदा (Ad-hoc) और गेस्ट फैकल्टी के भरोसे पढ़ाई चल रही है।
ऐसे शिक्षक न तो लंबे समय तक संस्था के प्रति जवाबदेह होते हैं और न ही उनके पास उच्च स्तरीय शोध (Research) के लिए कोई संसाधन या प्रेरणा होती है।

3. अकादमिक रूप से अप्रचलित पाठ्यक्रम (Outdated Curriculum)

समय बदल चुका है, दुनिया बदल चुकी है, लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शैक्षणिक ढांचा आज भी बीती सदी में अटका हुआ है।

★ रटंत विद्या पर जोर: पाठ्यक्रम (Syllabus) न तो वैश्विक मानकों के अनुकूल हैं और न ही समकालीन उद्योग या समाज की जरूरतों को पूरा करते हैं। इसमें क्रिटिकल थिंकिंग (Critical Thinking) या इनोवेशन के लिए कोई जगह नहीं बची है।

★ ज्ञान सृजन से दूरी: कक्षाएं केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं। प्रोफेसरों द्वारा समय पर कोर्स पूरा न कराना और परीक्षाओं का अनिश्चित अकादमिक कैलेंडर छात्रों की पूरी ऊर्जा को बर्बाद कर रहा है।

4. अनुसंधान (Research) और बौद्धिक संस्कृति का क्षय

जो विश्वविद्यालय कभी देश को दिशा देने वाले विचारक, वैज्ञानिक और राजनेता पैदा करता था, वहाँ आज 'मूल शोध' (Original Research) लगभग शून्य हो चुका है।

★ फंड्स और लैब्स की बदहाली: साइंस लैब्स पुरानी हो चुकी हैं, लाइब्रेरी में आधुनिक जर्नल्स और बुक्स का अकाल है, और रिसर्च स्कॉलर्स को मिलने वाली फेलोशिप या तो समय पर नहीं मिलती या वह बेहद अपर्याप्त है।

★ क्वालिटी ओवर क्वांटिटी: शोध के नाम पर केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं, जिनका समाज या राष्ट्र के विकास से कोई वास्ता नहीं है।

5. बुनियादी ढांचे और डिजिटल अवसंरचना का अभाव (Infrastructure Decay)

बदलते दौर में जहां दुनिया डिजिटल और स्मार्ट लर्निंग की ओर बढ़ रही है, AU का भौतिक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा चुका है।

★ जर्जर हॉस्टल, टूटे हुए क्लासरूम, और खराब पठन-पाठन का माहौल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है।
डिजिटल रिसोर्सेस की कमी के कारण यहाँ का छात्र वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में पिछड़ जाता है।

6. स्वायत्तता का ह्रास और राजनीतिक हस्तक्षेप

शैक्षणिक संस्थानों की गरिमा उनकी स्वायत्तता में निहित होती है।
जब-जब सत्ता या बाहरी राजनीतिक दबाव अकादमिक नियुक्तियों और निर्णयों पर हावी हुआ, तब-तब विश्वविद्यालय की मेधा कुचली गई।
वैचारिक स्वतंत्रता का गला घोंटने से परिसरों में एक भय और घुटन का माहौल पैदा हुआ है, जिसने स्वतंत्र बौद्धिक ऊर्जा को पूरी तरह सोख लिया है।

04/08/2026

आज झारखंड सहित पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था के हालात और छात्रों के संघर्ष जिस मोड़ पर हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं।

रोजगार, पारदर्शी परीक्षाएं, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग को लेकर युवा सड़क पर उतर रहे हैं।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) की तरफ से हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि हम इन तमाम प्रदर्शनों और शिक्षा से जुड़ी जायज़ मांगों के साथ पूरी तरह खड़े हैं।

जब तक शिक्षा को केवल एक औपचारिकता या 'मार्केट' मानकर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया जाता रहेगा, तब तक यह असंतोष थमेगा नहीं।
हम इन व्यवस्थागत विफलताओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं और न्यायसंगत व छात्र-हितैषी हर मांग का पुरज़ोर समर्थन करते हैं।

विधानमण्डलों और संसद का विशेष सत्र बुला करके शिक्षा व्यवस्था पर लाइव चर्चा होना चाहिए और आवश्यक प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए और समय समय पर इसकी स्वंतत्र समीक्षा होनी चाहिए ।

शिक्षा व स्वास्थ्य को गंदी दलगत राजनीति से मुक्त किया जाना चाहिए ।

छात्र संगठनों को भी दलगत राजनीति से मुक्त होने की आवश्यकता है।

हम राजनीति से मुक्त होने की बात नहीं कर रहे है बल्कि अंधी दलगत राजनीति से दूर होने की बात कर रहे है।

कृपया अपने विचार जरूर साझा करें ।

17/07/2026

📢 सामाजिक कार्यक्रम | 19 जुलाई 2026 | प्रयागराज

समाज में सकारात्मक परिवर्तन केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सामूहिक प्रयासों से भी आता है।
शिक्षा, जागरूकता, स्वच्छता और सामाजिक उत्तरदायित्व ऐसे ही प्रयासों की मजबूत नींव हैं।

इसी उद्देश्य के साथ All India Satrangi Salaam Association (AISSA) द्वारा रविवार, 19 जुलाई 2026 को गौ (गऊ) घाट, प्रयागराज में एक सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

कार्यक्रम के अंतर्गत झुग्गी-बस्ती के बच्चों के साथ शिक्षा एवं जागरूकता सत्र आयोजित किया जाएगा ...
इसके पश्चात बच्चों एवं स्थानीय समुदाय के सहयोग से स्वच्छता एवं पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
इस पहल का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि समाज में सहभागिता, जिम्मेदारी और सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करना है।

दिनांक : रविवार, 19 जुलाई 2026

समय : 2:30 PM से 6:30 PM

📍 स्थान : गौ (गऊ) घाट, प्रयागराज

All India Satrangi Salaam Association (AISSA) एक पंजीकृत सामाजिक संस्था है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, जागरूकता, सामाजिक उत्तरदायित्व, समानता, गरिमा तथा जनहित से जुड़े विभिन्न विषयों पर समाज के साथ मिलकर कार्य करती है।
संस्था का विश्वास है कि सकारात्मक परिवर्तन तभी संभव है, जब समाज स्वयं उसके निर्माण में सहभागी बने।

यदि आप इस सामाजिक पहल का समर्थन करना चाहते हैं, तो आपका हार्दिक स्वागत है।

आप अपनी सुविधा एवं स्वेच्छा से कॉपी, पेंसिल, रबर, बिस्कुट, फल, टॉफी, पेयजल, दस्ताने, कचरा एकत्र करने हेतु बैग अथवा अन्य उपयोगी सामग्री के माध्यम से सहयोग कर सकते हैं। आपका छोटा-सा सहयोग भी बच्चों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा तथा इस कार्यक्रम को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

यदि परिस्थितियाँ अनुकूल रहीं, तो कार्यक्रम के उपरान्त YouTube / Instagram Live के माध्यम से कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ भी साझा की जाएँगी।

आइए, शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक उत्तरदायित्व की इस पहल में सहभागी बनें तथा एक सकारात्मक समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।

धन्यवाद।

Sanjay Kesharwani
📞 9651528719

16/07/2026

सेवा, शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व की दिशा में एक नया संकल्प

अखिल भारतीय सतरंगी सलाम संगठन (AISSA) के लिए जुलाई 2026 एक विशेष अवसर लेकर आया है।
इसी माह हमारे संगठन के औपचारिक गठन के दो वर्ष पूर्ण हो रहे हैं।
यह केवल स्थापना दिवस मनाने का अवसर नहीं, बल्कि पिछले दो वर्षों की यात्रा का आत्ममूल्यांकन करने, समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने और नए संकल्प के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी है

इसी उद्देश्य से AISSA द्वारा जुलाई 2026 में सामाजिक, शैक्षणिक एवं डिजिटल गतिविधियों की एक श्रृंखला आयोजित की जा रही है।

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19 जुलाई 2026 (रविवार)
📍 गौघाट, प्रयागराज

🌿 सामुदायिक सेवा कार्यक्रम

• झुग्गी-बस्ती के बच्चों के बीच शैक्षणिक एवं जनजागरूकता कार्यक्रम।

• स्वच्छता एवं पर्यावरण जनजागरूकता अभियान।

यदि आप स्वयंसेवक के रूप में जुड़ना चाहते हैं अथवा कॉपी, पेंसिल, पुस्तकें, बिस्कुट, फल, पेयजल, स्वच्छता सामग्री या अन्य उपयोगी वस्तुओं के माध्यम से स्वैच्छिक सहयोग करना चाहते हैं, तो आपका हार्दिक स्वागत है।

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🎉 16–22 जुलाई 2026



AISSA के द्वितीय औपचारिक स्थापना दिवस के अवसर पर संस्था की दो वर्षों की यात्रा, प्रमुख गतिविधियाँ, अनुभव, उपलब्धियाँ तथा भविष्य की दिशा को समर्पित एक विशेष डिजिटल अभियान चलाया जाएगा

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✋ Digital Pledge Campaign

इस अभियान के माध्यम से सदस्य, स्वयंसेवक, समर्थक एवं आम नागरिक शिक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संरक्षण तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपना सार्वजनिक संकल्प व्यक्त कर सकेंगे

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🎙 YouTube Live Discussion

स्थापना दिवस के अवसर पर एक सार्वजनिक YouTube Live Discussion आयोजित किया जाएगा, जिसमें शिक्षा, समाज, युवा, नागरिक उत्तरदायित्व तथा समसामयिक विषयों पर सार्थक चर्चा की जाएगी

विषय, समय एवं अन्य विवरण शीघ्र साझा किए जाएँगे

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22 जुलाई 2026 (बुधवार)

🎉 AISSA : Second Formal Foundation Day

इस अवसर पर किसी विद्यालय में विद्यार्थियों के बीच एक विशेष शैक्षणिक एवं जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा

इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि बच्चों में जिज्ञासा, तार्किक सोच, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण चेतना तथा सकारात्मक नागरिक मूल्यों को प्रोत्साहित करना है

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हम सभी सदस्यों, स्वयंसेवकों, समर्थकों एवं समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक से आग्रह करते हैं कि इन पहलों का हिस्सा बनें।
आपका समय, आपका सहयोग, आपके विचार और आपका छोटा-सा योगदान भी समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है

आइए, AISSA के दूसरे औपचारिक स्थापना दिवस को केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सेवा, शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सामूहिक संकल्प का अवसर बनाएं

📞 संपर्क

Sanjay: 9651528719

Sangam: 8881870260

🌐 SatrangiSalaam.in

13/07/2026

🌿 समाज के लिए एक छोटा कदम, सकारात्मक बदलाव की ओर ...

All India Satrangi Salaam Association (AISSA) द्वारा आगामी 19 जुलाई 2026 (रविवार) को प्रयागराज के गौघाट क्षेत्र में "स्वच्छता एवं जनजागरूकता कार्यक्रम" आयोजित किया जा रहा है

प्रस्तावित कार्यक्रम के अंतर्गत झुग्गी-बस्ती के बच्चों के साथ शैक्षणिक संवाद, स्वच्छता अभियान तथा पर्यावरण एवं सामाजिक जागरूकता से जुड़े प्रयास किए जाएंगे

हमारा विश्वास है कि सामाजिक परिवर्तन केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सामूहिक प्रयासों से भी संभव है

यदि आप स्वयंसेवक के रूप में जुड़ना चाहते हैं, या कॉपी, पेंसिल, पुस्तकें, फल, बिस्कुट, पेयजल, स्वच्छता सामग्री अथवा अन्य उपयोगी वस्तुओं के माध्यम से स्वैच्छिक सहयोग करना चाहते हैं, तो आपका हार्दिक स्वागत है

📅 दिनांक : 19 जुलाई 2026 (रविवार)
🕝 समय : दोपहर 2:30 बजे से
📍 स्थान : गौघाट, प्रयागराज

📞 संपर्क
Sanjay Kesharwani
+91 96515 28719

Sangam
+91 88818 70260

आइए, मिलकर शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक उत्तरदायित्व की दिशा में एक सार्थक कदम बढ़ाएँ।



AISSA Foundation Day 2026
सेवा संकल्प अभियान
(शिक्षा • स्वच्छता • जनजागरूकता • पर्यावरण)

06/07/2026

⚠️ सावधान! भुगतान करने से पहले एक प्रश्न अवश्य पूछें।

आजकल अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी और सामाजिक सेवाओं के नाम पर विभिन्न प्रकार के आवेदन, प्रमाणपत्र, पहचान-पत्र, पंजीकरण और अन्य प्रक्रियाएँ संचालित की जाती हैं।

ऐसी किसी भी प्रक्रिया में यदि आपसे धनराशि माँगी जाती है, तो भुगतान करने से पहले ये प्रश्न अवश्य पूछें -

✅ क्या यह सरकारी शुल्क (Government Fee) है?
✅ या यह केवल सेवा शुल्क (Service Charge) है?
✅ यह राशि किस कार्य के लिए ली जा रही है?
✅ क्या इसकी रसीद या लिखित विवरण उपलब्ध कराया जाएगा?

✅ क्या यह कार्य आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से स्वयं भी किया जा सकता है?

पारदर्शिता किसी भी सेवा की सबसे पहली पहचान है।
यदि शुल्क लिया जा रहा है, तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए।
बिना जानकारी के कभी भी भुगतान न करें।

यदि कोई व्यक्ति या संस्था AISSA (All India Satrangi Salaam Association) के नाम पर किसी प्रकार का शुल्क, चंदा, सदस्यता शुल्क, आवेदन शुल्क या अन्य धनराशि माँगती है, तो बिना आधिकारिक पुष्टि के भुगतान न करें।
यदि भुगतान करें, तो उसकी विधिवत रसीद अवश्य प्राप्त करें।

यदि कोई व्यक्ति AISSA के नाम का अनुचित उपयोग करता है या किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न करता है, तो कृपया उसकी जानकारी हमें उपलब्ध कराएँ ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

जागरूक नागरिक बनिए।
प्रश्न पूछिए।
रसीद लीजिए
और केवल पारदर्शी प्रक्रियाओं पर ही विश्वास कीजिए।

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