सतरंगी सलाम ट्रस्ट

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We work across education, human rights, health, culture & inclusion - amplifying silenced voices. “सतरंगी सलाम” Discriminations के खिलाफ और Equality, LGBTQ+ Rights के लिए Volunteers की एक मुहिम है ।
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01/09/2026

युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य: वर्जनाएं (Taboos), अपराधबोध और समाज का दबाव

हमारे समाज में आज भी युवाओं की प्राकृतिक शारीरिक इच्छाओं और हस्तमैथुन (Ma********on) जैसी सामान्य प्रक्रियाओं को लेकर गहरी भ्रांतियां और डर फैला हुआ है।
इन अवैज्ञानिक दावों के कारण कई युवा भारी अपराधबोध (Guilt) और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

अखिल भारतीय सतरंगी सलाम संगठन (AISSA) युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर तथ्य-आधारित और वैज्ञानिक विमर्श का समर्थन करता है।

* यह प्राकृतिक है, पाप नहीं:

चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान के अनुसार, हस्तमैथुन एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। इससे शरीर में कोई कमजोरी, अंगों को नुकसान या बाल झड़ने जैसी समस्याएं नहीं होतीं। यह तनाव (Stress) कम करने में मददगार है।

* सीमाएं और लत (Addiction):

चिंता केवल तब करनी चाहिए जब यह आपकी पढ़ाई, करियर या सामाजिक जीवन में बाधा बनने लगे और एक लत का रूप ले ले। दिनचर्या प्रभावित न होने तक यह पूरी तरह सुरक्षित है।

* स्वाभाविक इच्छाओं की स्वीकृति:

20 से 30 वर्ष की उम्र में उच्च कामेच्छा (High Libido) और अलग-अलग यौन फैंटेसी होना एक स्वस्थ वयस्क की निशानी है।
इसे लेकर खुद को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना बिल्कुल गलत है।

* करियर और शरीर का दोहरा दबाव:

आज का युवा एक तरफ 25-30 की उम्र तक तुरंत 'आर्थिक रूप से सेटल' होने के भारी दबाव से जूझ रहा है, और दूसरी तरफ अपनी स्वाभाविक यौन इच्छाओं के अपराधबोध से।

अपनी प्राकृतिक भावनाओं को बिना किसी शर्म के स्वीकार करें।
किसी भी रिश्ते में आगे बढ़ें तो वह 100% आपसी सहमति (Consent) पर आधारित हो।
खुद पर बेवजह दबाव न डालें और अपनी ऊर्जा को अपने करियर और रचनात्मकता में लगाएं।

15/08/2026

आज़ादी की जंग सिर्फ खंदकों, जंगलों और फांसी के फंदों तक सीमित नहीं थी।
इस युद्ध का एक बड़ा मोर्चा उन पन्नों पर लड़ा गया, जिनकी स्याही ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव में तेजाब का काम किया।

अंग्रेज तोपों से ज्यादा उन तर्कों, मुकदमों और अखबारों से खौफ खाते थे, जिन्होंने दुनिया के सामने उनके शोषक चेहरे को बेनकाब कर दिया था। तलवारों पर पाबंदी लगाई जा सकती थी, लेकिन विचारों की उड़ान को रोकना नामुमकिन था।

काज़ी नज़रुल इस्लाम की बगावती कविताओं ने बंगाल में जो आग लगाई, उसकी तपिश सीधे लंदन तक महसूस की गई। रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी और सुभद्रा कुमारी चौहान की ओजस्वी पंक्तियों ने मुर्दा हो चुकी रगों में भी उबाल ला दिया था।

मैथिलीशरण गुप्त, बंकिम चंद्र चटर्जी और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे साहित्यकारों ने राष्ट्रवाद को घर-घर का हिस्सा बना दिया। उनकी कलम से निकले शब्द किसी भी हथियार से ज्यादा मारक साबित हुए।

पत्रकारिता के मोर्चे पर 'बॉम्बे क्रॉनिकल' के संपादक सैयद अब्दुल्ला बरेलवी और 'प्रताप' के गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी जान की परवाह किए बिना सच लिखा। विद्यार्थी जी ने तो सांप्रदायिक सौहार्द के लिए अपनी जान ही कुर्बान कर दी।

विदेशी मूल के होने के बावजूद ब्रिटिश पत्रकार बी. जी. हॉर्निमन ने जलियांवाला बाग हत्याकांड की क्रूरता को अपनी कलम से पूरी दुनिया के सामने नंगा कर दिया। उन्होंने अपनी चमड़ी के रंग का नहीं, बल्कि इंसानियत का साथ दिया।
कृष्ण कुमार मित्र, सखाराम गणेश देउस्कर, बालमुकुंद गुप्त और प्रताप नारायण मिश्र जैसे निर्भीक संपादकों ने ब्रिटिश नीतियों की धज्जियां उड़ा दीं। शिव प्रसाद गुप्त और कमलापति त्रिपाठी ने काशी को राष्ट्रवादी पत्रकारिता का अजेय गढ़ बना दिया।

बौद्धिक जागरण के इस महायज्ञ में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान युगांतरकारी था। उनकी पत्रिका 'सरस्वती' ने भाषाई अस्मिता और राष्ट्रीयता की ऐसी अलख जगाई, जिसने एक पूरी पीढ़ी को स्वाधीनता आंदोलन के लिए तैयार कर दिया।

मन्नन द्विवेदी 'गजपुरी' और 'वियोगी हरि' (हरिप्रसाद द्विवेदी) ने अपनी कविताओं और समाज सुधार के कार्यों से बगावत की वह आग भड़काई, जिसके लिए उन्हें ब्रिटिश जेलों की काल कोठरियों में अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं।
सत्यनारायण दुबे, सोहन लाल द्विवेदी, राम नरेश त्रिपाठी और विष्णु कृष्ण चिपलूनकर जैसे विचारकों ने अपनी-अपनी भाषाओं में स्वदेशी और स्वतंत्रता का ऐसा शंखनाद किया कि अंग्रेजी प्रशासन पंगु हो गया।

दक्षिण भारत में गरिमेला सत्यनारायण के तेलुगु गीतों ने वह अकल्पनीय क्रांति ला दी कि अंग्रेजों को उनके गाए शब्दों से डर लगने लगा था।
जब हमारे क्रांतिकारी पकड़े जाते थे और ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी पर लटकाना चाहती थी, तब अदालत के कटघरे में हमारे वकील ढाल बनकर खड़े होते थे। अदालत का कमरा उनका कुरुक्षेत्र था।

काकोरी कांड के नायकों को बचाने के लिए अदालत में गरजने वाले गोविंद वल्लभ पंत हों, या आजाद हिंद फौज (INA) के अधिकारियों का ऐतिहासिक मुकदमा लड़ने वाले महान वकील भूलाभाई देसाई और कैलाश नाथ काटजू।
टी. प्रकाशम (आंध्र केसरी) ने तो साइमन कमीशन का विरोध करते हुए मद्रास में पुलिस की बंदूकों के सामने अपना सीना तान दिया था। वे सिर्फ वकील नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े महानायक थे।

सच्चिदानंद सिन्हा, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, सी. पी. रामास्वामी अय्यर, मुकुंद रामाराव जयकर और डॉ. हरिसिंह गौर जैसे न्यायविदों ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की बुनियाद समानता और विधिक अधिकारों पर खड़ी हो।
तेज बहादुर सप्रू, हृदय नाथ कुंजरू और मोतीलाल नेहरू ने अपने कानूनी ज्ञान और तर्कों से कई बार ब्रिटिश वायसरायों को निरुत्तर कर दिया।

अंग्रेजों के बनाए कानूनों को उन्हीं पर पलटने वाले वकीलों में आसफ अली का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जिन्होंने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का असेंबली बम कांड का ऐतिहासिक मुकदमा लड़ा था।
दादाभाई नौरोजी ने अपनी 'Drain of Wealth' थ्योरी से एक-एक पैसे का हिसाब देकर साबित किया कि कैसे अंग्रेज भारत को चूस रहे हैं। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 'अल हिलाल' के जरिए समाज को समझाया कि अज्ञानता ही सबसे बड़ी गुलामी है।

ग्रामीण स्तर पर पंडित कुंजीलाल दुबे, शालीग्राम दुबे और सत्यनारायण दुबे जैसे नेताओं ने किसानों को लगान न देने के लिए कानूनी और वैचारिक रूप से पूरी तरह तैयार किया।
कपिल देव दुबे, राम प्रसाद दुबे, बैजनाथ दुबे, शारदा प्रसाद दुबे, भगवती प्रसाद दुबे, राम लखन दुबे, चन्द्रशेखर दुबे और मदन मोहन दुबे जैसे जमीनी सिपाहियों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संचार व्यवस्था ठप करने से लेकर विदेशी कपड़ों की होली जलाने तक का मोर्चा संभाला।

अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पारसी वीरांगना मैडम भीकाजी कामा ने विदेशी धरती पर भारत का झंडा फहराकर पूरी दुनिया को समर्थन देने पर मजबूर कर दिया।
हंसा मेहता ने विदेशी दुकानों पर पिकेटिंग की और मानवाधिकारों की ऐसी लड़ाई लड़ी कि उनका नाम सयुंक्त राष्ट्र तक गूंजा। भारत छोड़ो आंदोलन में जब सारे नेता गिरफ्तार थे, तब युवा उषा मेहता ने 'सीक्रेट कांग्रेस रेडियो' चलाकर देश को रुकने नहीं दिया।

मजदूरों और शोषितों के कानूनी हकों के लिए लड़ने वाले बी. पी. वाडिया और एस. एच. झाबवाला ने यह दिखाया कि जब तक देश के आखिरी मजदूर को न्याय नहीं मिलता, तब तक हर आज़ादी अधूरी है।
यूसुफ मेहरअली और डॉ. सैफुद्दीन किचलू जैसे बौद्धिक नेताओं ने अपने तर्कों और नारों से पूरे प्रशासन को हिला दिया। 'साइमन गो बैक' और 'भारत छोड़ो' जैसे नारे इसी वैचारिक उपज का परिणाम थे।

यह वैचारिक और कानूनी लड़ाई इस बात का प्रमाण है कि अधिकार सिर्फ मांगे नहीं जाते, वे तर्कों, कानूनी ज्ञान और संस्थागत एकजुटता से हासिल किए जाते हैं।
कलम, कानून और विचार की इस साझी विरासत के बिना हमारा स्वतंत्रता संग्राम कभी अपने मुकाम तक नहीं पहुँच पाता। अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज आज भी इन्हीं नायकों से प्रेरणा लेती है।

15/08/2026

इतिहास की किताबों के कुछ पन्ने हमेशा से खामोश रहे हैं।

जब भी 15 अगस्त का सूरज उगता है, हम चंद गिने-चुने चेहरों को याद कर लेते हैं
​लेकिन इस आज़ादी की नींव किसी महल या वातानुकूलित कमरे में नहीं रखी गई थी।

यह नींव जंगलों, बस्तियों और समाज के हर उस पायदान पर खड़े लोगों के खून-पसीने से सींची गई थी, जिन्होंने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया।

​1857 की उस पहली महान बगावत को याद कीजिए। इस क्रांति की सबसे बड़ी ताकत इसका साझा संघर्ष था।
​जब बैरकपुर छावनी में कारतूसों में चर्बी की बात उठी, तो वाल्मीकि समाज के वीर मातादीन भंगी ने इस सच्चाई को सामने लाकर क्रांति की पहली चिंगारी सुलगाई थी। उसी चिंगारी को महान क्रांतिकारी मंगल पांडे ने अपनी बंदूक से शोला बना दिया और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
​यह एकता का वह प्रतीक था, जिसने अंग्रेजों के दिलों में खौफ भर दिया था। यह लड़ाई किसी एक जाति, एक धर्म या एक रियासत की नहीं थी।

​अवध के सिकंदर बाग को कौन भूल सकता है? वहाँ एक पेड़ पर छिपकर 36 अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतारने वाली पासी समाज की वीरांगना उदा देवी का शौर्य आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।

​झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की रक्षा के लिए अपनी जान दांव पर लगाने वाली कोरी समाज की झलकारी बाई हों, या फिर दक्षिण भारत में अंग्रेजों के शस्त्रागार में अपने शरीर पर घी डालकर खुद को जला लेने वाली अरुंथतियार समाज की कुइली।

​इनका बलिदान चीख-चीख कर कहता है कि राष्ट्रवाद पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार कभी नहीं रहा।
​अंग्रेजों ने भारत में सबसे ज्यादा खौफ अगर किसी से खाया था, तो वे हमारे आदिवासी और वनवासी वीर थे।

​1784 में जब पूरा देश लगभग सो रहा था, तब संथाल परगना में तिलका मांझी ने अपने तीर कमान से ब्रिटिश सत्ता को सीधे चुनौती दी थी। उन्होंने अपने जंगल और जमीन के लिए पहली शहादत दी थी।

​बाद के वर्षों में सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने ऐतिहासिक 'संथाल हूल' कर दिया। आधुनिक ब्रिटिश बंदूकों का सामना कुल्हाड़ियों और तीरों से किया गया।
​फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू जैसी निडर बहनों ने ब्रिटिश कैंपों में घुसकर कई सैनिकों को काट डाला था।

​भील जनजाति के टंट्या भील को अंग्रेज खौफ के मारे 'रॉबिन हुड' कहते थे। उन्होंने 12 साल तक अंग्रेजी हुकूमत की नींद हराम कर रखी थी। भीमा नायक और खाज्या नायक ने 1857 में मध्य प्रदेश के बीहड़ों और जंगलों से अंग्रेजों के खिलाफ सीधा मोर्चा संभाला था।

​मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियों पर यू तिरोत सिंह और कियांग नांगबाह ने अपने पारंपरिक हथियारों से ब्रिटिश तोपों का सामना किया। पा तोगन संगमा ने गारो हिल्स में अपने लोगों को कटने से बचाने के लिए जान दे दी।
​बस्तर में गुंडा धूर का 'भूमकाल विद्रोह' हो, या छत्तीसगढ़ में बिंझवार जनजाति के शहीद वीर नारायण सिंह का बलिदान, हर वनवासी ने अपना लहू दिया है।

​गोंड जनजाति के बाबूराव शेडमाके, कोली जनजाति के रूपलो कोली, कुरिचिया के थलक्कल चंदू और कोंध जनजाति के रेंदो मांझी व चक्र बिसोई ने कभी अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार नहीं की।

​उरांव जनजाति के बुधू भगत और जतरा भगत ने 'जल, जंगल और जमीन' के लिए जो शंखनाद किया, वह आज भी गूंजता है। दिवा किसुन जैसे संथाल वीरों ने झारखंड की माटी को सींचा।

​पूर्वोत्तर की बात करें तो नागा जनजाति के जादोनांग, ए. जेड. फिजो, विशु नागा, क्रूसिएत्सो और खाशिबा ने अपनी जमीन के लिए खून बहाया। मिजो पहाड़ियों में रोपुइलियानी, ख्वांगचेरा, लालबुरा, तांगखुमा और वनपा ने विदेशी सत्ता को नाकों चने चबवा दिए।

​दक्षिण भारत के घने जंगलों में कोया और चेंचू जनजातियों के टोमा डोरा, मल्लैया, रेड्डी डोरा, गंटम डोरा और मल्लु डोरा ने विद्रोह का झंडा बुलंद रखा।

​थारू और भोटिया जैसी सूक्ष्म जनजातियों के देव सिंह भोटिया, दान सिंह मालदार, राम सिंह थारू, शंभू दान और वीर सिंह ने साबित किया कि देशप्रेम की कोई सरहद नहीं होती।

​1857 के उस खूनी दौर में मुस्लिम योद्धाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर कुर्बानी दी। बेगम हजरत महल ने अवध में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। मौलवी लियाकत अली ने इलाहाबाद से कमान संभाली और मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने फैजाबाद से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।

​फज्ल-ए-हक खैराबादी ने जिहाद का फतवा दिया और काला पानी में जान दे दी। पटना में पीर अली खान हंसते-हंसते फांसी चढ़ गए। कानपुर की तवायफ अज़ीज़ुन निसा ने युद्ध के मैदान में घोड़े पर बैठकर अंग्रेजों पर गोलियां दागीं और जनरल बख्त खान ने दिल्ली में कमान संभाली।

​दलित और शोषित समाज की महाबीरी देवी, चेतराम जाटव, बांके चमार जैसे नायकों को इतिहास ने भले ही हाशिया दे दिया, लेकिन उनका रक्त इस तिरंगे में हमेशा लाल रंग बनकर धड़कता है। मक्का पासी, महाराजा बिजली पासी, झूरी सिंह और शिवनंदन लाल ने ग्रामीण स्तर पर अंग्रेजों का कड़ा प्रतिरोध किया।

​बाद के वर्षों में जब यह आंदोलन राजनीतिक और सामाजिक हुआ, तब बाबू जगजीवन राम, अय्यंकाली, रेत्तमालई श्रीनिवासन और एम. सी. राजा जैसे नायकों ने शोषितों की आवाज मजबूती से उठाई।

​पेरियार ई. वी. रामासामी और नारायण गुरु ने ब्रिटिश समर्थक जातिवादी नीतियों और अमानवीय छुआछूत के खिलाफ जो सामाजिक लड़ाई लड़ी, वह भी इस आज़ादी के विमर्श का ही एक अहम हिस्सा है।

​महार समाज के शिवराम जानबा कांबले, किशन फागूजी बंसोडे, वीर वालंगकर, दीनानाथ भावे और बी. सी. कांबले ने शोषितों में बौद्धिक चेतना जगाई।

​सिक्किम की निडर सेनानी हेलेन लेपचा (सावित्री देवी) हों या दलित-बौद्ध जागरण के समर्थक भदन्त बोधानन्द महास्थविर, हर किसी ने अपने हिस्से की लड़ाई लड़ी।

​इन सभी ने उस 'सतरंगी' भारत की नींव रखी, जहाँ न्याय, समानता और मानवाधिकार सर्वोपरि हैं।

​अखिल भारतीय सतरंगी सलाम संगठन का यह स्पष्ट मानना है कि इन गुमनाम और वंचित नायकों के बिना भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक अधूरा पन्ना है। समाज का हर वो तबका जो आज हाशिए पर है, उसने इस देश की नींव में अपना खून दिया है।

​यह माटी हम सबकी है। यह देश हम सबका है।
इन सतरंगी शूरवीरों के बलिदान को हमारा शत-शत नमन!
​जय हिंद। वन्दे मातरम्।

✍️ भारतेन्दु विमल दुबे
संस्थापक - All India Satrangi Salaam Association

13/08/2026

शीर्षक: दलीय चश्मे से परे और राजनीतिक निष्ठाओं के पार: स्वास्थ्य और शिक्षा पर सवाल पूछने का अदम्य साहस

राजनीति लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन जब राजनीति नागरिकों के जीवन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी सरोकारों से ऊपर उठकर केवल दलों की भक्ति और अंधी प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन जाए, तो वह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन जाती है।

आज देश की विडंबना यह है कि नागरिक अपनी नागरिक पहचान भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का सिपाही बन चुका है।
अपनी पसंद की पार्टी हो तो उसकी हर नाकामी पर पर्दा डालना और विरोधी पार्टी हो तो हर बात पर विरोध करना - इस मानसिक गुलामी ने हमारे समाज को अंदर से खोखला कर दिया है

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों के स्कूल की छत टपकने पर, अस्पतालों में दवा न मिलने पर या परीक्षा में पेपर लीक होने पर राजनीतिक दल का झंडा देखकर दर्द बदल जाता है? बिल्कुल नहीं।

भूख, बीमारी और अशिक्षा किसी पार्टी का कार्ड देखकर नहीं आती।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी बेबाकी और कड़े शब्दों में रखती है कि यदि आप केंद्र सरकार से सवाल करने से डरते हैं या बचना चाहते हैं, तो अपनी राज्य सरकार से पूछिए।

यदि अपनी राज्य सरकार से सवाल करने में आपकी राजनीतिक निष्ठाएं आड़े आती हैं, तो किसी दूसरे दल द्वारा शासित प्रदेश की व्यवस्था से ही सही, लेकिन पूछिए जरूर! स्वास्थ्य और शिक्षा के मोर्चे पर अब और मौन रहना संभव नहीं है।

आइए, इस दलीय पाखंड और राजनीतिक संकीर्णता की दीवारों को तोड़कर सीधी बात करें।

1. दलीय निष्ठाओं का अंधकूप और नागरिकों का पतन
आज हमारे समाज में एक अजीबोगरीब मानसिक बीमारी घर कर चुकी है - पार्टी की वफादारी को राष्ट्रभक्ति मान लेना।

* सुविधाजनक चुप्पी: जब केंद्र में आपकी मनपसंद पार्टी है, तो आप राज्य की कमियों को पकड़ते हैं; और जब राज्य में आपकी पार्टी है, तो आप केंद्र की विफलताओं को छिपाने के लिए तर्क गढ़ने लगते हैं।
इस दोहरे मानदंड में पिस कौन रहा है? वह आम नागरिक और उसका बेटा-बेटी, जो सरकारी स्कूल की बदहाली या अस्पताल की लाचारी के कारण हर दिन घुट-घुट कर जी रहा है।

* बदलाव क्यों नहीं आता?: जब तक जनता राजनेताओं को यह अहसास नहीं कराएगी कि वे हमारे नुमाइंदे हैं, हमारे मालिक नहीं, तब तक सत्ता में कोई भी दल आए, व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलेगा।
शिक्षा और स्वास्थ्य को जब तक हम दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक 'सार्वभौमिक अधिकार' (Universal Right) नहीं मानेंगे, तब तक हर सरकार हमारा शोषण करती रहेगी।

2. चाहे सरकार किसी की भी हो: जवाबदेही से कोई छूट नहीं
यह स्पष्ट होना चाहिए कि आलोचना किसी पार्टी विशेष की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है जो जनता के टैक्स के पैसों पर पलकर भी उसे बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रही है।

* राज्यों के अपने बहाने: कई बार राज्य सरकारें अपनी हर नाकामी का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़कर बरी होना चाहती हैं।
यदि आपके राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं वेंटीलेटर पर हैं, मेडिकल कॉलेज खाली पड़े हैं, और शिक्षक सड़कों पर प्रदर्शन करने को मजबूर हैं, तो इसका जवाब राज्य के मुखिया को देना ही होगा। आप यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि केंद्र सहयोग नहीं कर रहा।

* विपक्ष शासित राज्यों का सच: यह भ्रम भी दूर होना चाहिए कि विपक्ष द्वारा शासित प्रदेशों में शिक्षा और स्वास्थ्य का स्वर्ग बना हुआ है।
वहां भी हाल उतना ही बदतर है। अस्पतालों में बेड की कमी, डॉक्टरों की मनमानी और स्कूलों की जर्जर हालत लगभग हर राज्य की साझा तस्वीर है
इसलिए, पार्टी कोई भी हो - चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष - जनता को हर एक से तीखे सवाल पूछने का अधिकार है और उसे यह अधिकार छीनने नहीं देना चाहिए।

3. स्वास्थ्य और शिक्षा पर मौन सबसे बड़ा अपराध

जब महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा की बर्बादी और स्वास्थ्य की बदहाली पर लोग चुप हो जाते हैं, तो शासक वर्ग निरंकुश हो जाता है।

* धर्म और जाति के पर्दे: आज जब भी कोई नागरिक अपनी बदहाल शिक्षा या स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो सत्ता और उसके तंत्र तुरंत ध्यान भटकाने के लिए ऐसे मुद्दे सामने ले आते हैं जो समाज को आपस में बांट दें।
क्या एक भूखा या बीमार व्यक्ति केवल इसलिए अपनी जान दे देगा क्योंकि उसे किसी खास पहचान के नाम पर बहलाया जा रहा है?

* अंतिम कीमत: शिक्षा और स्वास्थ्य पर किया गया समझौता सीधे तौर पर हमारी आने वाली पीढ़ियों के कत्ल के समान है। यदि आज हम नहीं बोले, तो कल हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

4. AISSA का स्पष्ट आह्वान: जागो और सवाल करो

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस संपूर्ण विमर्श के निष्कर्ष के रूप में देश के हर छात्र, युवा, और जिम्मेदार नागरिक से यह अंतिम अपील करती है:

* दलीय चश्मा उतार फेंकिए: जब बात आपके बच्चे के भविष्य, उसकी पढ़ाई और उसके इलाज की हो, तो अपनी जेब में रखा पार्टी का झंडा बाहर निकालकर रख दीजिए। सबसे पहले आप एक नागरिक हैं, किसी पार्टी के एजेंट नहीं।

* जवाब मांगिए, हर मंच से मांगिए: यदि केंद्र में बैठे लोग युवाओं के भविष्य और परीक्षा तंत्र की बर्बादी पर मौन हैं, तो उनसे सवाल कीजिए। यदि राज्य के मंत्री अपनी विफलताओं पर पर्दा डाल रहे हैं, तो उन्हें कटघरे में खड़ा कीजिए।

* स्वास्थ्य और शिक्षा को मुख्यधारा का चुनावी मुद्दा बनाइए: जब तक हर चुनाव का एजेंडा सड़क, स्कूल, अस्पताल, और पारदर्शी रोजगार नहीं बनेगा, तब तक नेताओं के भाषणों में जनता केवल एक 'वोट बैंक' बनकर रह जाएगी।

अंतिम संदेश:

यह समय तटस्थ रहने का नहीं है।
यदि आप अन्याय और व्यवस्थागत सड़न को देखकर भी चुप रहते हैं, तो आप इस अपराध में बराबर के साझेदार हैं।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात की पुरजोर घोषणा करती है कि जब तक देश के हर कोने में बैठे आखिरी बच्चे तक को मुफ्त, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और गरिमापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल जातीं, और जब तक शासन प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी व जवाबदेह नहीं हो जाती, तब तक यह वैचारिक और सामाजिक संघर्ष थमेगा नहीं।

पूछिए!
केंद्र से पूछिए, राज्य से पूछिए, किसी भी दल की सरकार हो - उससे पूछिए! क्योंकि यह देश आपका है, और यह भविष्य आपका है।

13/08/2026

🧬 CD4 Count और TND का मतलब क्या है?

HIV के संदर्भ में CD4 Count और Viral Load दो महत्वपूर्ण medical indicators हैं

🔹 CD4 Count

CD4 cells शरीर की immune system का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

सामान्यतः CD4 count अधिक होना बेहतर immune function का संकेत माना जाता है, लेकिन किसी व्यक्ति की स्थिति का आकलन केवल एक CD4 report से नहीं किया जा सकता।

🔹 TND : Target Not Detected

जब HIV Viral Load test में virus laboratory की निर्धारित detection limit पर detect नहीं होता, तो report में TND (Target Not Detected) लिखा जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि HIV शरीर से समाप्त हो गया है। इसका अर्थ है कि वर्तमान treatment के प्रभाव से virus की मात्रा इतनी कम है कि उस test की detection सीमा पर वह detect नहीं हुआ।

💊 ART treatment नियमित रूप से लेना और medical follow-up बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

याद रखें:

Undetectable ≠ HIV cured

लेकिन sustained undetectable viral load HIV treatment की सफलता का एक महत्वपूर्ण संकेत है।

वैज्ञानिक evidence के अनुसार, HIV-positive व्यक्ति यदि effective ART पर रहते हुए sustained undetectable viral load बनाए रखता है, तो sexual transmission का risk effectively zero होता है --
U=U (Undetectable = Untransmittable).

❗ किसी भी व्यक्ति की report को देखकर स्वयं diagnosis या treatment decision न लें।
HIV testing, CD4 और Viral Load की interpretation qualified healthcare professional से कराएँ।

जानकारी फैलाएँ, stigma नहीं।

Test. Treat. Support. Respect.

All India Satrangi Salaam Association (AISSA)
Awareness • Acceptance • Dignity • Rights

08/08/2026

शीर्षक: स्वास्थ्य और शिक्षा का संस्थागत विध्वंस और सरकारों की राजनीतिक जवाबदेही: राजनीतिक दलों के पाखंड से

जब कोई समाज बीमार और अशिक्षित होता है, तो उसकी राजनीतिक व्यवस्था चाहे कितनी भी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के दावे कर ले, वह अंदर से खोखली और अमानवीय हो चुकी होती है।

आज़ादी के दशकों बाद भी यदि हमारे देश के किसी भी राज्य में - चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल (पार्टी) द्वारा शासित क्यों न हो - एक गरीब परिवार का बच्चा बुनियादी इलाज के अभाव में दम तोड़ दे या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिलने के कारण जीवनभर के संघर्ष में फंस जाए, तो यह किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि पूरी शासन प्रणाली की नैतिक हार है

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी स्पष्टता से रखती है कि स्वास्थ्य और शिक्षा वे दो मूल स्तंभ हैं जिन पर किसी भी राष्ट्र का भविष्य टिकता है
लेकिन विडंबना यह है कि आज इन दोनों क्षेत्रों को चुनावी वादों और विज्ञापनों का जरिया तो बनाया जाता है, लेकिन धरातल पर ये दोनों व्यवस्थाएं घोर उपेक्षा और संस्थागत पंगुता का शिकार हैं।

आइए, इस गंभीर मुद्दे पर बिना किसी दलीय पक्षपात के, सीधे और दो टूक बात करें।

1. स्वास्थ्य व्यवस्था का सच: जिला अस्पतालों से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक की लाचारी

जब हम उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों, पूर्वांचल के तराई जिलों या देश के विभिन्न राज्यों के सरकारी अस्पतालों की ओर देखते हैं,
तो वहां की तस्वीर किसी मानवीय त्रासदी से कम नहीं होती:

* डॉक्टरों और संसाधनों का अकाल: कागजों पर आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बड़े-बड़े आंकड़े पेश किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) पर न तो नियमित डॉक्टर मिलते हैं, न जीवन रक्षक दवाएं और न ही बुनियादी जांच की सुविधाएं।

* गरीबों की मजबूरी और निजी लूट: सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की इसी विफलता का फायदा उठाकर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स और प्राइवेट मेडिकल माफिया आम जनता की गाढ़ी कमाई लूट रहे हैं।
एक साधारण सी बीमारी का इलाज भी आज गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को कर्ज के दलदल में धकेल देने के लिए काफी है।

* पार्टी कोई भी हो, हालात जस के तस: चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल हो - केंद्र हो या राज्य - स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रचार-प्रसार में खर्च हो जाता है,
जबकि अस्पतालों की दीवारों से प्लास्टर उखड़ रहा होता है और स्ट्रेचर की कमी के कारण मरीज जमीन पर दम तोड़ने को विवश होते हैं।

2. शिक्षा और स्वास्थ्य का अंतर्संबंध: एक खोखली होती युवा पीढ़ी

स्वास्थ्य और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।
जिस देश में युवा कुपोषण, मानसिक तनाव और अस्वस्थ माहौल के बीच जीने को मजबूर हों, वहां उच्च शिक्षा और नवाचार की उम्मीद करना बेमानी है।

* मानसिक स्वास्थ्य का संकट: NEET, CBSE और प्रतियोगी परीक्षाओं के भारी दबाव, पेपर लीक के तनाव और रोजगार की अनिश्चितता ने आज के युवाओं को गंभीर अवसाद (Depression) की आग में झोंक दिया है
लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस मानसिक आपातकाल से निपटने के लिए कोई मजबूत संस्थागत तंत्र मौजूद नहीं है।

* संस्थागत संवेदनशीलता का अभाव: सत्ता में बैठे लोगों के लिए छात्र और मरीज केवल 'वोट बैंक' या 'आंकड़े' हैं।
जब तक शासन प्रणाली में मानवीय संवेदनशीलता और संवैधानिक जवाबदेही वापस नहीं लाई जाएगी, तब तक यह चक्रव्यूह यूं ही चलता रहेगा।

3. सरकारों से सीधे और दो टूक सवाल (चाहे केंद्र हो, राज्य हो, या केंद्रीय स्तर की विपक्ष-शासित प्रदेश हों)

AISSA की ओर से हम उन सभी सत्ताधारियों से - चाहे वे किसी भी दल के झंडे के पीछे छिपे हों -
यह सीधे सवाल पूछते हैं:

* बजट का वास्तविक आवंटन कहां जाता है?:
स्वास्थ्य और शिक्षा पर जीडीपी का या राज्य के कुल बजट का वह हिस्सा आखिर कहां गायब हो जाता है, जिसके दम पर विश्वस्तरीय व्यवस्था बनाने के दावे किए जाते हैं?
यदि बजट है, तो जमीन पर डॉक्टर, दवाएं, शिक्षक और प्रयोगशालाएं क्यों नदारद हैं?

* दल बदलने से व्यवस्था क्यों नहीं बदलती?: चाहे राज्य में कोई भी पार्टी शासन कर रही हो - शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमेशा घिसी-पिटी नीतियां और लापरवाही ही क्यों देखने को मिलती है?
क्या जनता की बुनियादी जरूरतें सिर्फ चुनावी भाषणों का एजेंडा बनकर रह गई हैं?

* लापरवाही पर आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं?:
परीक्षा तंत्र के फेल होने पर या सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकीय लापरवाही से किसी की जान जाने पर केवल 'जांच कमेटी' बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया जाता है?
क्या प्रशासनिक अधिकारियों और जिम्मेदार मंत्रियों की सीधी जवाबदेही और कानूनी सजा तय करने का कोई सख्त कानून नहीं बनना चाहिए?

4. आम जनमानस के नाम अंतिम संदेश

अब यह तय करने का समय आ गया है कि हम कब तक अपनी बुनियादी जरूरतों (इलाज, पढ़ाई और गरिमापूर्ण जीवन) को छोड़कर सतही बहकावे में अपनी ऊर्जा नष्ट करते रहेंगे।

* दलगत सीमाओं से ऊपर उठें: जब तक आम जनता खुद आगे बढ़कर अपनी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगी, तब तक कोई भी सरकार अपने मन से कुछ नहीं करेगी।

* अधिकारों के लिए एकजुटता:

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) हर उस नागरिक और छात्र के साथ खड़ी है जो यह मांग करता है कि अस्पताल और स्कूल हर नागरिक का अधिकार हैं, कोई भीख नहीं।

स्वास्थ्य और शिक्षा की इस लड़ाई में खामोश रहना अपने ही भविष्य के साथ गद्दारी है।
जागो, सवाल पूछो और व्यवस्था को जवाबदेह बनाओ!

06/08/2026

शीर्षक: उत्तर भारत के शिक्षा मानचित्र का ध्वंस: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर पूर्वांचल और तराई के 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' की दास्तान और AISSA का वैचारिक रुख

जब हम उत्तर भारत के अकादमिक और ऐतिहासिक परिदृश्य का सिंहावलोकन करते हैं, तो एक समय वह दौर था जब प्रयागराज (इलाहाबाद) और पूरे पूर्वांचल-बिहार बेल्ट को देश की वैचारिक, बौद्धिक और राजनीतिक चेतना की नर्सरी कहा जाता था।
इसी भूमि से निकले मेधावियों ने देश के विधि, न्याय, विज्ञान और शासन तंत्र को दिशा दी
लेकिन आज, उसी ऐतिहासिक बेल्ट की स्थिति क्या है?
क्या कारण है कि कभी 'पूर्व के ऑक्सफोर्ड' कहे जाने वाले संस्थान आज प्रशासनिक पंगुता, राजनीतिक उपेक्षा और संस्थागत सड़न के प्रतीक बन चुके हैं?
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस गहरे ऐतिहासिक और वर्तमान संकट की परतें उधेड़ते हुए यह स्पष्ट करना चाहती है कि शिक्षा का यह विध्वंस कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित व्यवस्थागत विफलता है।

आइए, इस पूरे भौगोलिक और संस्थागत पतन के उस सच पर बात करें जिसे मुख्यधारा के विमर्श में सुनियोजित तरीके से दबा दिया जाता है।

1. इलाहाबाद विश्वविद्यालय और पूर्वांचल का अकादमिक अवसाद

एक समय था जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की सीढ़ियों से देश की सर्वोच्च नीतियां और वैचारिक क्रांतियां जन्म लेती थीं।
आज स्थिति इसके विपरीत है:

* रिक्तियों का अंतहीन चक्र: विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं के पद वर्षों से खाली पड़े हैं।
नियमित नियुक्तियों के अभाव में ये संस्थान केवल कागजी डिग्रियां बांटने वाली फैब्रीकेशन यूनिट बनकर रह गए हैं।

* संविदा और तदर्थवाद का अभिशाप: जब उच्च शिक्षा को 'गेस्ट फैकल्टी' और 'एड-हॉक' व्यवस्था के भरोसे छोड़ दिया जाता है, तो वहां अकादमिक स्वायत्तता और स्वतंत्र अनुसंधान की संभावना स्वतः समाप्त हो जाती है।
शिक्षक अपनी नौकरी बचाने के संघर्ष में व्यस्त रहता है और छात्र दिशाहीन हो जाते हैं।

* बौद्धिक प्रवास (Brain Drain): उत्तर भारत के इन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के युवा प्रतिभाएं गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और शोध के अभाव में दक्षिण या पश्चिम के राज्यों की ओर पलायन करने को विवश हैं, या फिर प्रशासनिक परीक्षा चक्रव्यूह में उलझकर अपना जीवन गंवा रहे हैं।

2. शिक्षा प्रणाली का 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' बनना

जब किसी राज्य या क्षेत्र में शिक्षा की नींव कमजोर होती है, तो पूरा समाज एक ऐसे 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' में धंस जाता है जहां से बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है:

* नियामक संस्थाओं की निष्क्रियता: यूजीसी (UGC) से लेकर राज्य के उच्च शिक्षा परिषदों तक, आज हर नियामक संस्था अपनी वैधानिक भूमिका निभाने में पूरी तरह विफल साबित हुई है।
भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इन संस्थाओं की रीढ़ तोड़ दी है।

* बुनियादी ढांचे का अभाव: सिद्धार्थनगर से लेकर पूर्वांचल के तराई जिलों तक फैले महाविद्यालयों में आज भी न तो ढंग की प्रयोगशालाएं हैं, न ही आधुनिक ग्रंथालय।
पुस्तकालयों में पुरानी और आउटडेटेड किताबें छात्रों का भविष्य संवारने के बजाय उन्हें सदी पीछे धकेल रही हैं।

* बाजारवाद और शिक्षा का कमोडिटीकरण: शिक्षा अब ज्ञान या सामाजिक मुक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने का सबसे बड़ा उद्योग बन चुकी है।
गरीब और वंचित वर्ग का छात्र इस महंगी होती शिक्षा प्रणाली में प्रतियोगिता की दौड़ से बहुत पहले ही बाहर हो जाता है।

3. प्रशासनिक पंगुता और वैचारिक शून्यता

इस पूरे संकट के मूल में शासन-प्रशासन की वह उदासीनता है जो युवाओं के भविष्य को केवल आंकड़ों के खेल के रूप में देखती है:

* श्वेत-पत्र (White Paper) से दूरी क्यों?:
सरकारें शिक्षा के विकास के नाम पर अरबों रुपये के विज्ञापनों का ढोल पीटती हैं, लेकिन वे कभी इस बात पर श्वेत-पत्र जारी नहीं करतीं कि विश्वविद्यालयों में खाली पड़े 40-50% पद क्यों नहीं भरे जा रहे?
चयन परीक्षाओं के कैलेंडर हर साल पटरी से क्यों उतर जाते हैं?

* संस्थागत निरंतरता का अभाव: जब तक शिक्षा नीति को राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडे से ऊपर उठाकर एक स्थिर, पारदर्शी और संवैधानिक ढांचे के तहत संचालित नहीं किया जाएगा, तब तक हर नई पीढ़ी इसी तरह की प्रशासनिक अराजकता का शिकार बनती रहेगी।

4. AISSA का स्पष्ट दृष्टिकोण और सुधार का रोडमैप

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी दृढ़ता से रखती है कि केवल बयानबाजी या मोमबत्ती मार्च से इस संस्थागत बीमारी का इलाज संभव नहीं है।
इसके लिए एक ठोस, नियम-बद्ध और पारदर्शी कार्यप्रणाली की आवश्यकता है:

* तत्काल रिक्तियां भरो अभियान: देश और राज्य के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े सभी पदों को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर पारदर्शी तरीके से भरा जाए।

* परीक्षा तंत्र की शुचिता: चयन परीक्षाओं (चाहे वे यूनिवर्सिटी की हों या राष्ट्रीय स्तर की) में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त और जवाबदेह वैधानिक प्रावधान लागू हो, जिसमें पेपर लीक या लापरवाही के लिए सीधे प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

* शिक्षा का बजट आवंटन: जीडीपी का एक बड़ा और वास्तविक हिस्सा शिक्षा और शोध के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आरक्षित किया जाए, जो केवल कागजों पर न होकर जमीन पर दिखे।

निष्कर्ष:

उत्तर भारत के शिक्षा मानचित्र का यह वर्तमान संकट आने वाले दशकों के हमारे सामाजिक और आर्थिक स्वास्थ्य को तय करेगा।
यदि आज इस 'रेगुलेटरी ब्लैक होल' के खिलाफ मुखर होकर संस्थागत जवाबदेही नहीं मांगी गई, तो यह अंधकार हमारी पूरी आने वाली पीढ़ी को निगल जाएगा।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस ऐतिहासिक और व्यवस्थागत लड़ाई में हर उस छात्र, शोधार्थी और नागरिक के साथ चट्टान की तरह खड़ी है जो न्याय, पारदर्शिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार की मांग करता है।

04/08/2026

शिक्षा का संस्थागत पतन और व्यवस्थागत अंधकार

आज जब हम झारखंड से लेकर देश के कोने-कोने तक सड़कों पर उतरते युवाओं को देखते हैं, तो यह केवल कुछ तात्कालिक घटनाओं का रोष मात्र प्रतीत नहीं होता।

यह उस गहरी, कैंसर जैसी फैल चुकी संस्थागत सड़न का परिणाम है जिसने हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था को एक ‘रेगुलेटरी ब्लैक होल’ में तब्दील कर दिया है।

उत्तर भारत के BIMARU और पूर्वांचल बेल्ट से लेकर देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक, आज शिक्षा प्रणाली अपने सबसे गहरे वैचारिक, प्रशासनिक और नैतिक संकट से गुजर रही है।

इस गंभीर दौर में, ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) तमाम जायज़ छात्र संघर्षों और व्यवस्थागत सुधार की मांगों के साथ पूरी वैधानिक और संस्थागत प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है।

आइए, इस पूरे संकट की गहराई में उतरकर उन बुनियादी सच्चाइयों का विश्लेषण करें, जिन पर पर्दा डालने का प्रयास लगातार सत्ता के गलियारों से किया जाता रहा है।

1. रिक्त पदों का मकड़जाल और तदर्थवाद (Ad-hocism) की संस्कृति

जब हम ज़मीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो सबसे भयावह तस्वीर विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े लाखों पदों की दिखती है।
क्या यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक है? कतई नहीं।
यह एक सोची-समझी नीति का परिणाम है, जिसके तहत शिक्षण संस्थानों को नियमित फैकल्टी के बिना चलाया जा रहा है।

* संविदा और तदर्थवाद का जाल: विश्वविद्यालयों से लेकर डिग्री कॉलेजों तक, आज शिक्षा को परमानेंट फैकल्टी के बजाय संविदा (Ad-hoc) और ठेके की व्यवस्था पर धकेल दिया गया है।
जब पढ़ाने वाले शिक्षक ही नौकरी की अनिश्चितता और मानसिक तनाव के साए में जिएंगे, तो वे छात्रों को गुणवत्तापूर्ण वैचारिक और अकादमिक दिशा कैसे दे पाएंगे?

* बजट और नियुक्तियों पर चुप्पी: कागजों पर उच्च शिक्षा के विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्वीकृत पदों को भरने के लिए वर्षों तक फाइलें धूल फांकती रहती हैं।
सिद्धार्थनगर, पूर्वांचल और देश के अन्य तराई व ग्रामीण अंचलों के विश्वविद्यालयों में आज भी बुनियादी शैक्षणिक संसाधन और योग्य शिक्षकों का भारी अभाव है।
क्या यह जानबूझकर शिक्षा को आम पहुंच से दूर करने का षड्यंत्र नहीं है?

2. परीक्षा तंत्र का बाजारीकरण और मानसिक आपातकाल (NEET, CBSE और चयन परीक्षाएं)

आज का युवा वर्ग एक ऐसी व्यवस्था में जीने को विवश है जहाँ शिक्षा ज्ञान की प्राप्ति का माध्यम न होकर एक खर्चीला और क्रूर कमोडिटी बन चुकी है।
NEET, CBSE और राज्य स्तरीय चयन परीक्षाओं का वर्तमान ढांचा छात्रों के लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है।

* पेपर लीक और संस्थागत पंगुता: हर साल निकलने वाली पेपर लीक की अंतहीन कतारें और परीक्षा एजेंसियों (जैसे NTA) की लगातार नाकामी यह साबित करती है कि पूरा सिस्टम अंदर से खोखला हो चुका है।
परीक्षा की लंबी तैयारी के बाद जब एक छात्र को यह पता चलता है कि उसका हक किसी धन्नासेठ या पेपर माफिया ने चोरी कर लिया है, तो उस युवा के भीतर जो विध्वंस पैदा होता है, वह समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

* शैडो एजुकेशन और कोचिंग सिंडिकेट: आज स्कूल और विश्वविद्यालय केवल कागजी संस्थान बनकर रह गए हैं, जबकि असली शिक्षा का बाजार बड़े-बड़े कोचिंग सिंडिकेट्स के हाथ में है।
यह 'शैडो एजुकेशन' तंत्र गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के संसाधनों को चूस रहा है और छात्रों को गंभीर अवसाद (Depression) व संज्ञानात्मक संकट में धकेल रहा है।

3.
जुमलों, विज्ञापनों और डिजिटल कैंपेन से शिक्षा की बदहाली को छुपाया नहीं जा सकता।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) की ओर से हम सीधे, स्पष्ट और तीखे सवाल सत्ता के शीर्ष पर बैठे जिम्मेदारों से पूछते हैं:

राज्य सरकार से सवाल:

* रिक्त पदों पर श्वेत-पत्र क्यों नहीं?: राज्य के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में वर्षों से खाली पड़े लाखों पदों को भरने के बजाय सरकार श्वेत-पत्र (White Paper) जारी करने से क्यों कतरा रही है?
क्या शिक्षा को जानबूझकर पंगु बनाया जा रहा है?

* भर्ती घोटालों पर प्रशासनिक कार्रवाई: चयन परीक्षाओं में बार-बार होने वाले भ्रष्टाचार और पेपर लीक के मामलों में केवल लीपापोती क्यों की जाती है?
क्या भ्रष्ट तंत्र और राजनैतिक संरक्षण के गठजोड़ को तोड़ने की कोई वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति बची है?

* क्षेत्रीय उपेक्षा: पूर्वांचल और ग्रामीण अंचलों के उच्च शिक्षण संस्थानों में आधुनिक अकादमिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए बजट का बड़ा हिस्सा कागजों से बाहर जमीन पर क्यों नहीं उतरता?

केंद्र सरकार से सवाल:

* राष्ट्रीय परीक्षा तंत्र (NTA/NEET) की विफलता का जिम्मेदार कौन?: राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाओं की साख लगातार गिर रही है।
क्या केंद्र सरकार के पास इस बात का कोई उत्तर है कि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ कब तक चलेगा?

* कोचिंग माफिया पर नियंत्रण का कानून कहां है?: अनियंत्रित कोचिंग सिंडिकेट्स द्वारा छात्रों के हो रहे आर्थिक और मानसिक शोषण को रोकने के लिए कोई कठोर राष्ट्रीय नियामक नीति क्यों नहीं बनाई जाती?

* डेमोग्राफिक डिविडेंड या आपदा?: जिस युवा आबादी को देश की सबसे बड़ी ताकत (Demographic Dividend) कहा जाता है, उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित रखकर क्या सरकार देश को एक गहरे सामाजिक और आर्थिक अंधकार की ओर नहीं धकेल रही है?

4. आम जनमानस और नागरिक समाज से गंभीर अपील

यह लड़ाई केवल उन छात्रों की नहीं है जो आज सड़कों पर धूप और ठंड में न्याय की भीख मांग रहे हैं; यह लड़ाई इस पूरे समाज के भविष्य की है।

* मुद्दों की राजनीति बनाम सतही बहकावे: जब तक हमारा समाज चुनाव और सामाजिक बहसों में जाति, धर्म और सतही मुद्दों के जाल से बाहर निकलकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को अपना मुख्य राजनीतिक एजेंडा नहीं बनाएगा, तब तक हर आने वाली पीढ़ी इसी तरह व्यवस्था के कोल्हू में पिसती रहेगी।

* तटस्थता का त्याग करें: आज झारखंड से लेकर देश भर के छात्र जो अपनी बुनियादी शिक्षा और पारदर्शी परीक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यदि समाज उन्हें अकेला छोड़ देता है, तो यह हमारी नैतिक पराजय होगी।

* संस्थागत जवाबदेही की मांग: नागरिक समाज को अब अपनी नींद से जागना होगा।
अपने स्थानीय कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के पतन पर चुप्पी साधना भविष्य के साथ गद्दारी के समान है।

निष्कर्ष और संकल्प

शिक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक और अपरिहार्य अधिकार है।
इसे मुनाफे का धंधा और व्यवस्था की नाकामी का शिकार नहीं बनने दिया जा सकता।

ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) पूरी दृढ़ता, वैधानिक स्पष्टता और संस्थागत अनुशासन के साथ इस बात की घोषणा करती है कि जब तक शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, रिक्त पदों पर पूर्ण बहाली और परीक्षा तंत्र की शुचिता सुनिश्चित नहीं होती, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।

युवाओं जागो, सवाल पूछो और अपने भविष्य के अधिकारों के लिए इस जड़ हो चुके सिस्टम को हिलाकर रख दो!

अगर केंद्र सरकार से नहीं पूछ सकते हो तो राज्य सरकार से पूछो और अगर अपने राज्य सरकार से नहीं पूछ सकते हो तो किसी दूसरे पार्टी द्वारा शासित प्रदेश सरकार से ही पूछ लो लेकिन पूछो ... स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था पर कुछ तो बोलो 🙏

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Peepal Gaon, Police Chowki K Samne
Allahabad
211003

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