08/08/2026
शीर्षक: स्वास्थ्य और शिक्षा का संस्थागत विध्वंस और सरकारों की राजनीतिक जवाबदेही: राजनीतिक दलों के पाखंड से
जब कोई समाज बीमार और अशिक्षित होता है, तो उसकी राजनीतिक व्यवस्था चाहे कितनी भी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के दावे कर ले, वह अंदर से खोखली और अमानवीय हो चुकी होती है।
आज़ादी के दशकों बाद भी यदि हमारे देश के किसी भी राज्य में - चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल (पार्टी) द्वारा शासित क्यों न हो - एक गरीब परिवार का बच्चा बुनियादी इलाज के अभाव में दम तोड़ दे या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिलने के कारण जीवनभर के संघर्ष में फंस जाए, तो यह किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि पूरी शासन प्रणाली की नैतिक हार है
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी स्पष्टता से रखती है कि स्वास्थ्य और शिक्षा वे दो मूल स्तंभ हैं जिन पर किसी भी राष्ट्र का भविष्य टिकता है
लेकिन विडंबना यह है कि आज इन दोनों क्षेत्रों को चुनावी वादों और विज्ञापनों का जरिया तो बनाया जाता है, लेकिन धरातल पर ये दोनों व्यवस्थाएं घोर उपेक्षा और संस्थागत पंगुता का शिकार हैं।
आइए, इस गंभीर मुद्दे पर बिना किसी दलीय पक्षपात के, सीधे और दो टूक बात करें।
1. स्वास्थ्य व्यवस्था का सच: जिला अस्पतालों से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक की लाचारी
जब हम उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों, पूर्वांचल के तराई जिलों या देश के विभिन्न राज्यों के सरकारी अस्पतालों की ओर देखते हैं,
तो वहां की तस्वीर किसी मानवीय त्रासदी से कम नहीं होती:
* डॉक्टरों और संसाधनों का अकाल: कागजों पर आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बड़े-बड़े आंकड़े पेश किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) पर न तो नियमित डॉक्टर मिलते हैं, न जीवन रक्षक दवाएं और न ही बुनियादी जांच की सुविधाएं।
* गरीबों की मजबूरी और निजी लूट: सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की इसी विफलता का फायदा उठाकर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स और प्राइवेट मेडिकल माफिया आम जनता की गाढ़ी कमाई लूट रहे हैं।
एक साधारण सी बीमारी का इलाज भी आज गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को कर्ज के दलदल में धकेल देने के लिए काफी है।
* पार्टी कोई भी हो, हालात जस के तस: चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल हो - केंद्र हो या राज्य - स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रचार-प्रसार में खर्च हो जाता है,
जबकि अस्पतालों की दीवारों से प्लास्टर उखड़ रहा होता है और स्ट्रेचर की कमी के कारण मरीज जमीन पर दम तोड़ने को विवश होते हैं।
2. शिक्षा और स्वास्थ्य का अंतर्संबंध: एक खोखली होती युवा पीढ़ी
स्वास्थ्य और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।
जिस देश में युवा कुपोषण, मानसिक तनाव और अस्वस्थ माहौल के बीच जीने को मजबूर हों, वहां उच्च शिक्षा और नवाचार की उम्मीद करना बेमानी है।
* मानसिक स्वास्थ्य का संकट: NEET, CBSE और प्रतियोगी परीक्षाओं के भारी दबाव, पेपर लीक के तनाव और रोजगार की अनिश्चितता ने आज के युवाओं को गंभीर अवसाद (Depression) की आग में झोंक दिया है
लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस मानसिक आपातकाल से निपटने के लिए कोई मजबूत संस्थागत तंत्र मौजूद नहीं है।
* संस्थागत संवेदनशीलता का अभाव: सत्ता में बैठे लोगों के लिए छात्र और मरीज केवल 'वोट बैंक' या 'आंकड़े' हैं।
जब तक शासन प्रणाली में मानवीय संवेदनशीलता और संवैधानिक जवाबदेही वापस नहीं लाई जाएगी, तब तक यह चक्रव्यूह यूं ही चलता रहेगा।
3. सरकारों से सीधे और दो टूक सवाल (चाहे केंद्र हो, राज्य हो, या केंद्रीय स्तर की विपक्ष-शासित प्रदेश हों)
AISSA की ओर से हम उन सभी सत्ताधारियों से - चाहे वे किसी भी दल के झंडे के पीछे छिपे हों -
यह सीधे सवाल पूछते हैं:
* बजट का वास्तविक आवंटन कहां जाता है?:
स्वास्थ्य और शिक्षा पर जीडीपी का या राज्य के कुल बजट का वह हिस्सा आखिर कहां गायब हो जाता है, जिसके दम पर विश्वस्तरीय व्यवस्था बनाने के दावे किए जाते हैं?
यदि बजट है, तो जमीन पर डॉक्टर, दवाएं, शिक्षक और प्रयोगशालाएं क्यों नदारद हैं?
* दल बदलने से व्यवस्था क्यों नहीं बदलती?: चाहे राज्य में कोई भी पार्टी शासन कर रही हो - शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमेशा घिसी-पिटी नीतियां और लापरवाही ही क्यों देखने को मिलती है?
क्या जनता की बुनियादी जरूरतें सिर्फ चुनावी भाषणों का एजेंडा बनकर रह गई हैं?
* लापरवाही पर आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं?:
परीक्षा तंत्र के फेल होने पर या सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकीय लापरवाही से किसी की जान जाने पर केवल 'जांच कमेटी' बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया जाता है?
क्या प्रशासनिक अधिकारियों और जिम्मेदार मंत्रियों की सीधी जवाबदेही और कानूनी सजा तय करने का कोई सख्त कानून नहीं बनना चाहिए?
4. आम जनमानस के नाम अंतिम संदेश
अब यह तय करने का समय आ गया है कि हम कब तक अपनी बुनियादी जरूरतों (इलाज, पढ़ाई और गरिमापूर्ण जीवन) को छोड़कर सतही बहकावे में अपनी ऊर्जा नष्ट करते रहेंगे।
* दलगत सीमाओं से ऊपर उठें: जब तक आम जनता खुद आगे बढ़कर अपनी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगी, तब तक कोई भी सरकार अपने मन से कुछ नहीं करेगी।
* अधिकारों के लिए एकजुटता:
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) हर उस नागरिक और छात्र के साथ खड़ी है जो यह मांग करता है कि अस्पताल और स्कूल हर नागरिक का अधिकार हैं, कोई भीख नहीं।
स्वास्थ्य और शिक्षा की इस लड़ाई में खामोश रहना अपने ही भविष्य के साथ गद्दारी है।
जागो, सवाल पूछो और व्यवस्था को जवाबदेह बनाओ!