13/08/2026
शीर्षक: दलीय चश्मे से परे और राजनीतिक निष्ठाओं के पार: स्वास्थ्य और शिक्षा पर सवाल पूछने का अदम्य साहस
राजनीति लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन जब राजनीति नागरिकों के जीवन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी सरोकारों से ऊपर उठकर केवल दलों की भक्ति और अंधी प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन जाए, तो वह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन जाती है।
आज देश की विडंबना यह है कि नागरिक अपनी नागरिक पहचान भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का सिपाही बन चुका है।
अपनी पसंद की पार्टी हो तो उसकी हर नाकामी पर पर्दा डालना और विरोधी पार्टी हो तो हर बात पर विरोध करना - इस मानसिक गुलामी ने हमारे समाज को अंदर से खोखला कर दिया है
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों के स्कूल की छत टपकने पर, अस्पतालों में दवा न मिलने पर या परीक्षा में पेपर लीक होने पर राजनीतिक दल का झंडा देखकर दर्द बदल जाता है? बिल्कुल नहीं।
भूख, बीमारी और अशिक्षा किसी पार्टी का कार्ड देखकर नहीं आती।
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात को पूरी बेबाकी और कड़े शब्दों में रखती है कि यदि आप केंद्र सरकार से सवाल करने से डरते हैं या बचना चाहते हैं, तो अपनी राज्य सरकार से पूछिए।
यदि अपनी राज्य सरकार से सवाल करने में आपकी राजनीतिक निष्ठाएं आड़े आती हैं, तो किसी दूसरे दल द्वारा शासित प्रदेश की व्यवस्था से ही सही, लेकिन पूछिए जरूर! स्वास्थ्य और शिक्षा के मोर्चे पर अब और मौन रहना संभव नहीं है।
आइए, इस दलीय पाखंड और राजनीतिक संकीर्णता की दीवारों को तोड़कर सीधी बात करें।
1. दलीय निष्ठाओं का अंधकूप और नागरिकों का पतन
आज हमारे समाज में एक अजीबोगरीब मानसिक बीमारी घर कर चुकी है - पार्टी की वफादारी को राष्ट्रभक्ति मान लेना।
* सुविधाजनक चुप्पी: जब केंद्र में आपकी मनपसंद पार्टी है, तो आप राज्य की कमियों को पकड़ते हैं; और जब राज्य में आपकी पार्टी है, तो आप केंद्र की विफलताओं को छिपाने के लिए तर्क गढ़ने लगते हैं।
इस दोहरे मानदंड में पिस कौन रहा है? वह आम नागरिक और उसका बेटा-बेटी, जो सरकारी स्कूल की बदहाली या अस्पताल की लाचारी के कारण हर दिन घुट-घुट कर जी रहा है।
* बदलाव क्यों नहीं आता?: जब तक जनता राजनेताओं को यह अहसास नहीं कराएगी कि वे हमारे नुमाइंदे हैं, हमारे मालिक नहीं, तब तक सत्ता में कोई भी दल आए, व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलेगा।
शिक्षा और स्वास्थ्य को जब तक हम दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक 'सार्वभौमिक अधिकार' (Universal Right) नहीं मानेंगे, तब तक हर सरकार हमारा शोषण करती रहेगी।
2. चाहे सरकार किसी की भी हो: जवाबदेही से कोई छूट नहीं
यह स्पष्ट होना चाहिए कि आलोचना किसी पार्टी विशेष की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है जो जनता के टैक्स के पैसों पर पलकर भी उसे बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रही है।
* राज्यों के अपने बहाने: कई बार राज्य सरकारें अपनी हर नाकामी का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़कर बरी होना चाहती हैं।
यदि आपके राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं वेंटीलेटर पर हैं, मेडिकल कॉलेज खाली पड़े हैं, और शिक्षक सड़कों पर प्रदर्शन करने को मजबूर हैं, तो इसका जवाब राज्य के मुखिया को देना ही होगा। आप यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि केंद्र सहयोग नहीं कर रहा।
* विपक्ष शासित राज्यों का सच: यह भ्रम भी दूर होना चाहिए कि विपक्ष द्वारा शासित प्रदेशों में शिक्षा और स्वास्थ्य का स्वर्ग बना हुआ है।
वहां भी हाल उतना ही बदतर है। अस्पतालों में बेड की कमी, डॉक्टरों की मनमानी और स्कूलों की जर्जर हालत लगभग हर राज्य की साझा तस्वीर है
इसलिए, पार्टी कोई भी हो - चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष - जनता को हर एक से तीखे सवाल पूछने का अधिकार है और उसे यह अधिकार छीनने नहीं देना चाहिए।
3. स्वास्थ्य और शिक्षा पर मौन सबसे बड़ा अपराध
जब महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा की बर्बादी और स्वास्थ्य की बदहाली पर लोग चुप हो जाते हैं, तो शासक वर्ग निरंकुश हो जाता है।
* धर्म और जाति के पर्दे: आज जब भी कोई नागरिक अपनी बदहाल शिक्षा या स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो सत्ता और उसके तंत्र तुरंत ध्यान भटकाने के लिए ऐसे मुद्दे सामने ले आते हैं जो समाज को आपस में बांट दें।
क्या एक भूखा या बीमार व्यक्ति केवल इसलिए अपनी जान दे देगा क्योंकि उसे किसी खास पहचान के नाम पर बहलाया जा रहा है?
* अंतिम कीमत: शिक्षा और स्वास्थ्य पर किया गया समझौता सीधे तौर पर हमारी आने वाली पीढ़ियों के कत्ल के समान है। यदि आज हम नहीं बोले, तो कल हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।
4. AISSA का स्पष्ट आह्वान: जागो और सवाल करो
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस संपूर्ण विमर्श के निष्कर्ष के रूप में देश के हर छात्र, युवा, और जिम्मेदार नागरिक से यह अंतिम अपील करती है:
* दलीय चश्मा उतार फेंकिए: जब बात आपके बच्चे के भविष्य, उसकी पढ़ाई और उसके इलाज की हो, तो अपनी जेब में रखा पार्टी का झंडा बाहर निकालकर रख दीजिए। सबसे पहले आप एक नागरिक हैं, किसी पार्टी के एजेंट नहीं।
* जवाब मांगिए, हर मंच से मांगिए: यदि केंद्र में बैठे लोग युवाओं के भविष्य और परीक्षा तंत्र की बर्बादी पर मौन हैं, तो उनसे सवाल कीजिए। यदि राज्य के मंत्री अपनी विफलताओं पर पर्दा डाल रहे हैं, तो उन्हें कटघरे में खड़ा कीजिए।
* स्वास्थ्य और शिक्षा को मुख्यधारा का चुनावी मुद्दा बनाइए: जब तक हर चुनाव का एजेंडा सड़क, स्कूल, अस्पताल, और पारदर्शी रोजगार नहीं बनेगा, तब तक नेताओं के भाषणों में जनता केवल एक 'वोट बैंक' बनकर रह जाएगी।
अंतिम संदेश:
यह समय तटस्थ रहने का नहीं है।
यदि आप अन्याय और व्यवस्थागत सड़न को देखकर भी चुप रहते हैं, तो आप इस अपराध में बराबर के साझेदार हैं।
ऑल इंडिया सतरंगी सलाम एसोसिएशन (AISSA) इस बात की पुरजोर घोषणा करती है कि जब तक देश के हर कोने में बैठे आखिरी बच्चे तक को मुफ्त, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और गरिमापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल जातीं, और जब तक शासन प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी व जवाबदेह नहीं हो जाती, तब तक यह वैचारिक और सामाजिक संघर्ष थमेगा नहीं।
पूछिए!
केंद्र से पूछिए, राज्य से पूछिए, किसी भी दल की सरकार हो - उससे पूछिए! क्योंकि यह देश आपका है, और यह भविष्य आपका है।