04/10/2026
नज़र नज़र से मिलाना कोई मज़ाक़ नहीं…
मिला के आँख चुराना कोई मज़ाक़ नहीं। ✨
उर्दू अदब की ख़ूबसूरत विरासत और अल्फ़ाज़ के जादू को समर्पित, मशहूर शायर ज़िया फ़तेहाबादी की यह ग़ज़ल आज भी दिल को छू जाती है। ❤️🩹
“गिरे हुओं को उठाना कोई मज़ाक़ नहीं…”
इन अशआर में मोहब्बत भी है, दर्द भी, ख़्वाब भी और ज़िंदगी की गहरी समझ भी।
📜 ज़िया-ए-हक़ फ़ाउंडेशन
उर्दू अदब और उसकी ख़ूबसूरत विरासत को सलाम।