01/08/2026
भारतीय इतिहास के पन्नों में एक ऐसा जांबाज छिपा है, जिसे अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई थी, मुल्तान की कुख्यात जेल की कोठरी में रखा था, लेकिन उस शेर-दिल इंसान ने अपनी बहादुरी और देश के हालातों के दम पर मौत को भी मात दे दी थी!
आइए, 'History Secret' के इस खास आर्टिकल में जानते हैं आजाद हिंद फौज (INA) के उस महान क्रांतिकारी की अनकही दास्तान, जिनका पूरा जीवन संघर्ष, त्याग और स्वाभिमान की मिसाल था—नाम था कैप्टन अब्बास अली!
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा स्थित कलंदरगढ़ी के एक रईस और प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में जन्मे कैप्टन अब्बास अली का जीवन शुरू से ही असाधारण था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में पढ़ाई के दौरान जब चारों तरफ आजादी का माहौल गर्म था, तभी उनके भीतर देश को परतंत्रता की जंजीरों से मुक्त कराने की एक ऐसी आग सुलग उठी, जो कभी ठंडी नहीं हुई।
वर्ष 1943 का वह ऐतिहासिक दौर शायद ही कोई भूला हो, जब म्यांमार (रंगून) में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ओजस्वी आगमन हुआ था। नेताजी के "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" और 'दिल्ली चलो' के नारों ने युवाओं में बिजली दौड़ा दी थी। नेताजी के व्यक्तित्व से इस कदर प्रेरित हुए कि अब्बास अली ने अपनी आरामदायक जिंदगी और पढ़ाई को पीछे छोड़ते हुए सीधे 'आजाद हिंद फौज' (INA) की वर्दी पहन ली। अपनी निष्ठा और असाधारण नेतृत्व क्षमता के दम पर उन्हें जल्द ही 'कैप्टन' के पद से नवाजा गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दौर में जब आजाद हिंद फौज को अंतरराष्ट्रीय और सामरिक मजबूरियों के चलते अस्थायी रूप से हथियार डालने पड़े, तब ब्रिटिश हुकूमत बौखला उठी। अंग्रेजों ने INA के सैनिकों को देशद्रोही घोषित कर दिया और उन पर ऐतिहासिक मुकदमे चलाए गए।
कैप्टन अब्बास अली को गिरफ्तार कर पाकिस्तान के मुल्तान स्थित उस किले में कैद कर दिया गया, जहाँ के कैदियों की रूह काँप जाती थी। अंग्रेजी हुकूमत ने उनके विद्रोही तेवरों को देखते हुए कोर्ट मार्शल के जरिए उन्हें सीधे फांसी की सजा सुना दी।
लेकिन कहते हैं न कि जिसे देश की मिट्टी बचाना चाहती है, उसे मौत भी नहीं छू सकती। देश के भीतर सुलग रहे राजनीतिक हालातों, भारी जन-आक्रोश और अंतरिम सरकार के गठन के दबाव के चलते अंग्रेजों को झुकना पड़ा और उनकी फांसी की सजा टल गई। कैप्टन साहब मौत के जबड़े से सुरक्षित बाहर निकल आए!
बंटवारे का दर्द और वो ऐतिहासिक जवाब जो रोंगटे खड़े कर दे
साल 1947 में जब देश का खौफनाक और दर्दनाक विभाजन हुआ, तो लाखों लोगों को अपनी मातृभूमि छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। कैप्टन अब्बास अली के सामने भी विकल्प रखे गए और कथित तौर पर उन्हें पाकिस्तान में ही रुकने की सलाह दी गई।
लेकिन एक सच्चे सिपाही और देश के आशिक का खून खौल उठा। उन्होंने पाकिस्तान जाने से साफ इंकार करते हुए दुनिया को जो जवाब दिया, वह आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है:
"मैं इसी हिंदुस्तान की पावन धरती पर पैदा हुआ, यहीं पढ़ा-लिखा और इसी देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों की गोलियों के सामने डटा रहा... लिहाजा, मैं अपने वतन को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा!"
अक्सर लोगों को लगता है कि देश आजाद होने के बाद इन वीरों का संघर्ष खत्म हो गया था, लेकिन असल कहानी इसके बाद शुरू हुई। आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को उनका हक और पहचान दिलाने के लिए कैप्टन साहब ने लंबा संघर्ष किया।
वे सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि जीवन के अंतिम पड़ाव तक देश में फैल रही सामाजिक बुराइयों, भ्रष्टाचार, असमानता और अन्याय के खिलाफ एक मुखर आवाज बने रहे। 91 वर्ष की लंबी आयु तक देश-प्रेम की अलख जगाने वाले, सादगी की मूरत और आजाद हिंद फौज के इस सच्चे सिपाही का जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र सर्वोपरि कैसे होता है।
⚠️ Disclaimer:
यह पोस्ट कैप्टन अब्बास अली के जीवन, प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेजों, INA के अभिलेखों और उनके परिवार/जीवनी पर आधारित मीडिया रिपोर्ट्स के तथ्यों के आधार पर के पाठकों के लिए तैयार की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक भारत के अनसुने स्वतंत्रता संग्राम के सही और प्रामाणिक इतिहास को पहुँचाना है।
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