Aghorpeeth Jansewa Abhed Ashram, Pondi - Dalha

Aghorpeeth Jansewa Abhed Ashram, Pondi - Dalha This is the official page of Aghorpeeth Jansewa Abhed Ashram, Pondi. The aim of this page is to get connected with the people and to give them updates.

13/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

ई पण्डित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह
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लेकिन ऐसे ही जमीन बाबा को नहीं दिखा दी गई। लल्लू सिंह बताने लगे:

तो बहुत आत्मविश्वास के साथ समूह की स्थापना हुई। सभी कार्यक्रम हाजी सुलेमान के बगीचे में शुरु हो गए। उसी समय बाबा शतचण्डी जग में रोडवेज की बस से जा रहे थे। उस समय लोग साधन विहीन थे। रोडवेज की बस में बाबा को कानपुर के लिये चढ़ाया गया। उस वक्त बाबा ने कहा कि मैं तो जा रहा हूँ कानपुर, लेकिन हिन्दुस्तान की सधुवाई का ढँग बदलना होगा। काशी में कुष्टी अस्पताल के लिये भूमि खरीद के हमरा बैनामा का कगज देब कि ना देब? मैं था, मेरे छोटे-छोटे लड़के थे, मेरी धर्मपत्नी थीं, और मेरा एक मित्र था, पृथ्वीलाल जैन। मैंने उत्तर में कहा था, "यदि आप की कृपा हो जाय तो सब कुछ हो सकता है।"

बस कानपुर के लिये चली गई। उसी समय मैंने पृथ्वीलाल जैन से कहा, "भाई, तुम तो हम से पुराने भक्त हो। बताओ की वह जमीन कहाँ है? उसको आज ही देखा जायगा।"

वह मेरा मित्र अब दिवंगत हो चुका है। लेकिन उसके जैसा आत्मविश्वासी व्यक्ति मैंने अब तक नहीं पाया है। उसने कहा, "चल, तेरी जमीन तुझे ही नहीं पता है। आज ही दिखाता हूँ।"

वह मुझको राजघाट, गंगा जी के पार, पड़ाव पर ले गया। वह जमीन वहाँ जहाँ पर कि आज आश्रम है, उस समय बिल्कुल उबड़-खाबड़, काशी के लोगों के आत्महत्या की भूमि थी। उसके माध्यम से मैं उस जमीन पर घूमता रहा। लेकिन जब मैं उस स्थान पर घूम रहा था तो मेरी आत्मा कह रही थी कि पृथ्वी माता बोल रही हैं कि तुम हमको खरीद लो। आत्मा प्रकाशित होने के बाद जो विश्वास होता है, उस विश्वास को मैंने पाया। प्रत्येक काम लोग उनको पूछ कर करते थे, मैं उनको स्मरण करके करता था। हुकुम हो गया, उसको करना ही करना है। मेरा यह दृढ़ विश्वास था कि यदि आप चाहेंगे नहीं तो यह होगा नहीं। इसीलिये अपने सहयोगी मित्रों के सहयोग से, रामनगर सब-रजिस्ट्रार से बैनामे का कागज तैयार करा के, मात्र तीन सौ रुपये में उस जमीन के एक अंश को लिया था।

गार्ड साहब ने और बताया:

रातों रात हम लोग चौका घाट से लाकर एक औघड़ की समाधि वहाँ लगा दिये। वह साधु राजेश्वर राम बाबा के पहले की गद्दी का शिष्य था और चौका घाट में तपस्या करते हुए शरीर छोड़ा था। उसी समाधि के ऊपर बाबा की मड़ई बनी। उस समय शहर के कलक्टर इत्यादि और पी•डब्ल्यू•डी के अफसर भी बाबा के सम्पर्क में आ चुके थे। तो उनके सहयोग से यह भूमि मिली और कार्य शुरु हुआ। आज वही संस्था आपके सामने है।

(203) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

12/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

ई पण्डित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह
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अब संस्था के संविधान के विषय में भी सुनिये छोटे बाबू की बात:

छोटे बाबू को पढ़ने-लिखने का कोई शौक नहीं था। इस कला में अपने आप को निपुण भी नहीं मानते थे। लेकिन बाबा इनसे ही समूह का संविधान लिखने को कहे। इन्होंने प्रतिवाद किया, "हम्मे लिक्खा-पढ़ी ना आवत ह।"

लेकिन बाबा ने कहा, "न, तोहरा लिखहीं के पड़ी।"

तो धीरे-धीरे जैसे भी इनसे बन पड़ा लिखना शुरु किया। और होते-होते वह 70-80 पन्नों का अच्छा-खासा दस्तावेज तैयार हो गया। बाद में उसी में संशोधन कर के समूह का संविधान तैयार किया गया। छोटे बाबू बोले, जिससे बाबा को जो काम करवाना रहता था उसी के अनुकूल उसे वैसी शक्ति भी दे देते थे।

गार्ड साहब ने और जोड़ा।

संस्था रजिस्टर हो जान के बाद बाबा बोले कि संस्था बन गई है तो इसका कार्यक्रम भी होना चाहिये। हम लोग बोले कि सरकार, जो आज्ञा हो वैसा ही कार्यक्रम बनाया जाय। बाबा बोले कि देखो, परिवार के लोग भी कुष्ठी बन्धु को घृणा से देखते हैं, समाज के हर वर्ग के लोग तो उनसे घृणा करते ही हैं। तुम लोग कुष्ठी बन्धुओं की सेवा करो। उनका उपचार करो। उन्हें आरोग्य करो।

उस समय बनवारी लाल नाम का एक खत्री था। वह लहरतारा से होती हुई जो सड़क जी•टी• रोड जाती है फूलनपुर, उस पर कुछ जमीन बाबा को देना चाहते था। बाबा हमको कहे उसको देख आने को। हमको वह स्थान जँचा नहीं। पड़ाव पर पी•डब्ल्यू•डी की जमीन थी। उसमें से पी•डब्ल्यू•डी ने अपनी माटी निकाली थी। वह महाजनों की जमीन थी जिसको गवर्नमेन्ट ने ले लिया था। जमीन कुछ उँची थी। बाबा को हम लोग दिखाए तो बाबा को पसन्द आई।

(202) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

11/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

ई पण्डित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह
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बाबा को प्रणाम किया तो उन्होंने कहा, "जा, मामाजी से भेंट कई ल, ताहरा लायक कउनो काम होई त ऊ बता दिहें।"

मैंने जाकर मामा जी को प्रणाम किया और कहा कि मेरे लायक कोई काम हो तो बता दीजिये। उन्होंने कहा कि सब कुछ है। बस पूजा का कलश नहीं है। मैंने कहा फिर सोच लीजिये। लाइन पार कर के रात को नौ बजे हम जाएँगे। फिर ऐसा न हो कि कोई चीज छूट जाए। देखकर उन्होंने कहा, बस, पूजा का कलश ले आइये। मैं गया। रात साढ़े नौ बजे पूजा का कलश लाकर रख दिया। हमारे पंडित अंजनीनंदन मिश्र के मित्र रामधारी शास्त्री जी पूजा का संचालन कर रहे थे। साढ़े बारह बजे रात को उन्होंने बाबा से जाकर कहा, "बाबा, कोई ऐसा व्यक्ति दीजिये जिसके हाथों से संस्था को प्राण दिया जावे।"

बाबा बोले, "हमरा ओकील साहब के बुलाव।"

गए तो बाबा बोले, "ई पण्डित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह।"

पंडित जी ले गए। उन्होंने हवन, पूजन, संकल्प सब कराया। उनकी आज्ञा से हमने अपने जीवन की प्रथम और आखिरी बलि भी वहाँ दी। श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना हो गई। उसके बाद पूज्य अघोरेश्वर अध्यक्ष, महाराजा जशपुर और महारानी जशपुर उपाध्यक्ष, लल्लू सिंह मंत्री, श्यामनारायण पाण्डेय संयुक्त मंत्री, भैयालाल सर्राफ कोषाध्यक्ष बने। संस्था का लखनऊ में रजिस्ट्रेन करवा कर, सन् 1961 में ले आए। संस्था रजिस्टर हो गई। और हाजी सुलेमान के बगीचे में संस्था का प्रथम कार्यालय स्थापित हुआ। बाबा की आज्ञा से 2164 नंबर का टेलीफोन उसी स्थान पर लगवाया गया।

संस्था की जब स्थापना हुई, तो निर्देश के मुताबिक, भीख माँगने के अलावा और कोई साधन नहीं था। हमारे प्रेमीजन गाँव से भीख माँग कर ले आते थे। उसी अन्नपूर्णा को पकाया जाता था। संस्था के उस दुर्दिन का मैं अभी भी विचार करता रहता हूँ कि अगर चावल ठीक से मिल गया तो फोरन का कोई साधन नहीं जुट पाता था। हमारे प्रेमी चावल पका के, माड़ में नून डालकर खाते थे। लेकिन जो मस्ती मैंने उस समय देखी है, उस मस्ती का अब कोई रुप नजर नहीं आता है।

बाबा रात को मौज में रहते थे तो पाँड़े जी से कहते थे, "ए पाँड़े, हऊ चौक का कुबेर का पान का दोकान बहुत अच्छा न बाड़े!"

चाहे जाड़ा हो या गर्मी, पाँड़े जी फौरन अपनी साइकिल पर बैठ कर महुआडीह से चौक तक जाते थे, वहाँ से पान लगवाकर लाके बाबा को खिलाते थे। हम लोग बहुत थोड़े थे। लेकिन आनन्द की कोई परिभाषा या अनुभूति हो सकती है, तो बाबा के सान्निध्य में हम लोगों ने उसको देखा है।

(201) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

10/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

ई पण्डित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह
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पास होने के बाद मैंने कचहरी जाना शुरु कर दिया। उस वक्त बाबा स्थान परिवर्तन की गतिविधियों के साथ थे। आज अगर शिवाला में हैं तो दूसरे दिन हड़हा में। तीसरे दिन हाजी सुलेमान के बगीचा में। उनके मन की मस्ती, कभी गंगा किनारे हैं, तो कभी कहीं और हैं। इस दौरान, हमारे एक मित्र बाबू फुलैना सिंह टफिक में हेड मुंशी थे, इस प्रक्रिया में हमारे साथ हमेशा यह पता लगाते रहते थे बाबा आज कहाँ हैं। शिवाला में राजा साहब जशपुर की कोठी में हैं, या दालमण्डी में लल्ली मिस्त्री के यहाँ बनारस में। और जब पता चलता था तो नित्यं साइकिल लेकर उनका दर्शन करने पहुँच जाते थे। करीब 1955-56 के आसपास इमामी हाजी सुलेमान साहब के मुंशी के माध्यम से बाबा का परिचय हाजी साहब से हुआ। उनकी माँ की प्रेरणा से बाबा हाजी सुलेमान साहब के बगीचे में रहने लगे। हालाँकि अभी भी भ्रमणशील रहते थे, लेकिन 1957-58 के आसपास सुलेमान साहब के बगीचे में स्थायी रूप से रहने लगे थे। श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना वहीं उस बगीचे में ही हुई थी। और मैं इस पुनीत संस्था का प्रथम मंत्री मनोनित हुआ था।

समूह की स्थापना के एक दिन पहले मुझे अपनी कचहरी के एक मुंशी जी के भतीजे की बारात में जाना था। मैंने बाबा से आज्ञा माँगी तो उन्होंने कहा, आप बारात में जाइये जरुर, लेकिन दूसरे दिन शाम तक वापस चले आइयेगा। मुझे नहीं मालूम था कि बाबा किस काम से मुझे बुला रहे हैं। हुकुम था इसलिये दो बजे वहाँ से चला और गोमती के किनारे आया। वहाँ पहुँचा और बेजोड़ आँधी-पानी शुरु हो गई। मेरे पास एक धोती, कुर्ता और चदरा था। मैं पूरी तरह भीग गया। जब रजवारी स्टेशन तक पहुँचा तो मुझे चिन्ता होने लगी कि ऐसे भीगे कपड़े पहने हुए टिकट खरीदने कैसे जाऊँगा। जब तक मैं यह सोचूँ तब तक गाड़ी आ गई। ईश्वर की कृपा से, हमारे ससुर भी उसी लाइन में गार्ड थे। गार्ड का डिब्बा ठीक हमारे सामने आकर लगा।

गार्ड ने मुझे देखकर पहचाना और पूछा, "आप इस वेश-भूषा में कैसे?"

जब मैंने सब किस्सा बताया तो उन्होंने कहा, "आइये, ब्रेक में बैठ जाइये।"

ब्रेक में बैठकर मैंने कहा कि आप रोडवेज के सामने गाड़ी को रुकवा दीजियेगा। मैं इस वेश-भूषा में स्टेशन पर नहीं जाऊँगा। उतरकर मैं अपने घर आ गया। कपड़े बदल कर साढ़े-सात बजे शाम को हाजी सुलेमान के बगीचे में पहुँचा। देखा कि बगीचे में तमाम गाना-बजाना, जलसा हो रहा है।

(200) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

09/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

सर्वेश्वरी समूह कैसे बना
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बाबा से लोग धीरे-धीरे जुड़ रहे थे इसका कुछ तो आभास आपको हो ही गया होगा। अब समूह के विषय में बात शुरु कर करता हूँ, क्योंकि वे इस संस्था के प्रथम मन्त्री थे। दिनांक 21 सितम्बर, 1961 को सर्वेश्वरी समूह की स्थापना हुई थी। आगे की कथा आप स्वयं लल्लू सिंह जी एडवोकेट से सुनिये:

ई पण्डित जी जौन कहें, तौन कुल कर दिह
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1954 में मैं एल•एल•बी• फाइनल बरस का विद्यार्थी था। विद्यार्थी जीवन से ही बाबा किनाराम स्थल पर आकर प्रणाम करता रहा हूँ। मेरे अन्दर यह प्रेरणा हुई कि यदि ईश्वर चाहे तो मैं पास हो सकता हूँ, अन्यथा नहीं। हमारे गाँव के भाई केदार सिंह ईश्वरगंगी पर रहते थे। एक दिन उन्होंने कहा, चलो बाबा का दर्शन कर आएँ। नाटी इमली में जहाँ पर भगवान राम, भरत और शत्रुघ्न जी का मिलाप होता है, वहीं एक कोने में चाँप गुरु की कोठी में बाबा कुर्सी पर बैठे थे। कोठी ऊपर बेहया से छवाई हुई थी। चाँप गुरु नीचे हारमोनियम बजाकर बाबा को भजन सुना रहे थे। हमारे भाई ने बाबा से परिचय कराकर हमारे बारे में कहा, "इनको आशीर्वाद दे दीजिये।"

बाबा ने अपनी भोजपुरी भाषा में कहा, "ताहर भाई ह, हमरो कउनो काम करी?"

भैया हमारे हठी स्वभाव के थे। उन्होंने कहा, "पहले कुछो होई तब न तोहरे कउनो काम के होई। कि पहिलेहीं कामे के हो जाई।"

मस्ती थी पूज्य गुरुदेव की। उन्होंने कहा मुझसे, "चल जा संगम। संगम बा, त्रिवेणी में निहा के, जल लाके काशी में संकठा माई के अंगूठा पर चढ़ा दिह। जा।

(199) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

08/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

क्यों रे। इस तरह नहाया जाता है?
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छांगुर जी की कुछ कथाएँ तो आप पहले ही सुन चुके हैं। एक और कथा याद आ रही है तो सुना देता हूँ:

बाबा से जब हम पहली बार मिले तब उनकी उम्र बहुत छोटी थी। लल्ली के घर के पास हाड़केश्वर जी का मन्दिर है। वहाँ पीपल का पेड़ है, और शिव जी का पुराना मन्दिर भी है वहीं बाबा को हमने पाया। उस समय बाबा झूल पहनते थे और सिर पर काली पगड़ी बाँधे रहते थे। उनका चेहरा देख कर यही मन करता था कि बस देखते ही रह जाएँ, इतना तेज था उनके मुख पर।

एक बार हमने बाबा की कृपा पाई करीब सौ-सवा सौ फीट पानी के अन्दर। हुआ यह कि लल्ली के भाई थे, गुद्दल। उनका और हमारा साथ हो गया गंगा जी जाने का। वे तैरने में बहुत तेज थे। तो एक दिन हम लोग जब गंगा जी नहाने गए। गुद्दल डुबकी लगा कर बहुत नीचे तक चले जाते थे, और हम भी। पानी बहुत गहरा था वहाँ। बार-बार डुबकी लगाने पर भी जमीन की थाह नहीं मिलती थी। फिर उन्होंने कहा कि अरे, कसम खा के जाओ नीचे, तब पता लगेगा कितना गहरा है। हमने भी मन ही मन प्रतिज्ञा कर ली कि अब तो पता लगा के ही रहेंगे। हम डुबकी लगा के नीचे जाने लगे। जब काफी नीचे आ गए तो मन में हुआ कि यार, बहुत नीचे आ गए, उपर भी जाना है। लेकिन फिर साहस कर के नीचे गए। फिर मन में आया कि अब ऊपर जाना चाहिये। लेकिन फिर साहस कर के और नीचे गए। अब सोचे कि अब तो जरुर ही ऊपर भागना चाहिये। हम घूमे, तो हमारा जमीन से लड़ गया। पैर टिक गया तो हमने पानी काट कर सिर नीचे किया। सिर नीचे किया तो एक गुफा का अंधकारमय द्वार दिखा। और ध्यान से देखा तो लगा कि वाकई किसी बहुत पुरानी गुफा का, बनाया हुआ मुँह ही है। हमने घबराकर भागना चाहा तो एक महुआ का पत्ता जमीन पर पड़ा हुआ दिखा। देखने में वह विशालकाय पत्ता सवा फिट से कम का नहीं था। उसके पास ही हमको एक कंकड भी पड़ा हुआ मिला। उस कंकड़ को उठा कर हमने अपनी लंगोट में डाल लिया। अब ऊपर आने लगे सैकड़ों बार पानी काट कर, तो पानी की चोट से हमारे दोनों कंधे भभाने लगे। किनारे आकर मैं बैठ गया और मौन होकर यह सोचने लगा कि इतनी देर तक मैं पानी के भीतर रह कैसे गया? इतना दम हमारे भीतर कहाँ से आ गया। हम थक गए थे, दम टूट गया था। बिना नहाए ही हम वापस चले आए। तीन दिन तक हमारे कंधे भभाते रहे। खैर, दूसरे दिन बाबा के दर्शन के लिये गए तो बाबा बिना कुछ पूछे ही कहते हैं, "क्यों रे। इस तरह नहाया जाता है?"

दोपहर ढलती जा रही है। मेरी स्मृति भी दुगुने वेग से नजारे दिखा रही है।

(198) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

07/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

ना, कपड़ा बदले के त रहे द
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सरकार बोले, "हाथ द। ई रोकी त एही से चल चलल जाई। जल्दी पहुँच जाइल जाई।"

हम लोग हाथ दिये। ऊ लोग शायद ध्यान नहीं दिये, मोटर निकल गई। हम लोग रिक्शे पर चलते रहे। कुछ दूर जाने जाने के बाद देखे कि उनकी मोटर बिगड़ गई थी। वे लोग तमाम कोशिश कर रहे थे लेकिन वह चल ही नहीं रही थी। जब तक हम लोग वहाँ पहुँचे। उनमें एक बूढ़ा आदमी था। वह बोला कि मालूम पड़ता है रिक्शा पर सरकार ही गए हैं। तब ऊ लोग दौड़े-दौड़े आए की चलिये सरकार, चलिये, हम लोगों के साथ चलिये। चलिये सरकार, खाना खिलाएँगे।

बाबा बोले, "ना, हम ना जाब।"

तब ऊ लोग बोले कि बाबा मोटरिया बिगड़ गइल बा, चलतै ना हौ। बड़ा मुश्किल बा।

बाबा बोले, "जा, हैण्डिल-उण्डिल मार लोग। चल जाई।"

ऊ लोग हैण्डिल मारे तो गाड़ी चल गई। हम लोग रिक्शे पर ही चलते रहे। मुगलसराय के पहले एक स्टेशन है वहाँ इक्केवालों की भीड़ लगी हुई थी। सब कहने लगे बाबा हमारे इक्के पर चलिये, बाबा हमारे इक्के पर चलिये। तो उनमें से एक इक्के पर बैठ कर हम लोग बारह बजे बनारस पहुँचे। धन्नूसाव के यहांँ ठीक जन्मदिन का समय हो रहा था। हम लोग अन्दर गए। और हम खाना खा कर चले थे तो हमको खट्टी डकारें आने लगी थीं। हम मन ही मन बहुत परेशान थे। लेकिन बाबा को कुछ नहीं बोले। बाबा वहीं धन्नू साव की दुकान पर बैठ गए और चरणामृत प्रसाद चढ़ने लगा।

बाबा उनको बोले, "एक गिलास चरणामृत इनके दे द।"

उसको पिये और हम बिल्कुल स्वस्थ हो गए। बाबा हमारी हालत को जान गए थे। वहाँ सुबह चार बजे तक बाबा बैठे रहे।

फिर बोले, तू काम पर जइब हो?"

हम बोले कि हाँ बाबा, काम पर तो जाना ही है।

"तब जा" कह कर बाबा विदा कर दिये।

हम घर आए तो लुंगी में देखकर घर के लोग घबराए। तब हम उनको पूरी बात बता कर आश्वस्त किये।

(197) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

06/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

6

ना, कपड़ा बदले के त रहे द
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अस्थाना साहब के बड़े भाई उस समय चन्दौली में थे। होटल में एक और मित्र के साथ बैठ कर खाना खा रहे थे। तब तक सरकार सकलडीहा वाले आश्रम से बहुत सारे लोगों के साथ उधर से आ रहे थे।

पचासों आदमी उनके साथ थे। बाबा उसी होटल में चले आए। हर-हर महादेव होने लगा। तब तक ये दोनों हाथ-मुँह धोकर उधर से आए। चरणस्पर्श किये।

"यहाँ कैसे?" बाबा पूछे।

बताए कि आजकल तो यहीं हैं। बाबा होटल के मैनेजर को बुलाए। ठाकुरदास नाम था उसका। बोले, "ये दोनों लड़के हमारे हैं। देखियेगा, इनको खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं हो।"

उसने कहा कि बाबा क्या कहें, ये तो एडवान्स दिये बिना खाते ही नहीं है, लेकिन इन लोगों को खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं होगी।

बाबा हमसे पूछे, "चलब ना?"

हम तो लुंगी पहल कर खाना खा रहे थे। कहे कि बाबा कपड़ा बदल के चलत हईं।

बाबा बोले, "ना, कपड़ा बदले के त रहे द। अउर नहीं, चले के बा, त चल।"

हम चल दिये। और आज तक कभी लुंगी पहन कर तो चन्दौली से यहाँ तक (बनारस) आए नहीं थे। संकोच लग रहा था। लेकिन उनका हुकुम हो गया तो चले। और कोई सवारी तो थी नहीं। एक रिक्शे पर लोग बैठा दिये।

उन लोगों से बाबा बोले, "अब तूँ लोग जा, हम चल जाब।"

लोगों ने हमारे हाथ में एक झोला पकड़ा दिया था, उसको पकड़ कर हम बाबा के साथ चल दिये। यहाँ पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। बिजली वगैरह तो थी नहीं। चारों ओर घुप्प अंधेरा और सन्नाटा। ग्यारह बजने को आए। मैदगिनी पर धन्नूराम साव थे जिनकी मोटर चलती थी। उनके यहांँ जन्मदिन का समारोह था। बाबा कहते आ रहे थे कि कहीं अइसन न हो कि जन्मदिन के समय निकल जाय। कुछ दूर और रिक्शा चला तो दूर से दूधवाली मोटर आती दिखाई पड़ी।

(196) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

05/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

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चल रे, तू लोग के शेर देखाइब
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सोगड़ा बाबा को हमेशा से बहुत प्रिय रहा है। वहाँ की और भी कुछ कथाएँ सुनाता हूँ। सत्यनारायण जी, जिनकी चार्ज-बैटरी की दुकान वाराणसी में है, कहने लगे:

मैनेजर पण्डा और सोमनाथ हमको बता रहे थे जशपुर के जंगल में बाबा उन लोगों से बोले, चल रे, तू लोग के शेर देखाइब। अब बाबा बोल दिये तो ना का तो सवाल ही नहीं था। अच्छा सरकार, चल। लोग चले बाबा के साथ। आगे-आगे बाबा, और पीछे-पीछे मैनेजर पण्डा और सोमनाथ। चले जा रहे हैं साहब। अन्दर जंगल में घुस गए तो बाबा एक ठो मन्त्र बताए इन लोगों को। कि देख, ई मन्त्र पढ़त जाए बराबर। आगे शेर मिली। लेकिन देख, एगो कंकर उठा के ओके मत मारे। अगर मार देब कंकरो से तो ऊ मर जाई और बड़ा भारी पाप लगी। तोहूँ के लगी और हमहूँ के लगी। मारे मत। हम आगे-आगे जात हईं, तूँ लोग पीछे-पीछे आव। मैनेजर पण्डा हमको बता रहे थे कि जब काफी अन्दर चले गए तो देखे कि शेरनी अपने बच्चों के साथ है। बच्चे सब खेल रहे हैं। थोड़ा और आगे बढ़े तो और कई शेर देखे। एक ठो बहुत लम्बा-चौड़ा शेर आकर बाबा के सामने खड़ा हो गया। बाबा कुछ मन्त्र पढ़ के अपना हाथ अइसे हिलाए तो ऊ कूद के भाग गया जंगल में। बाबा पूछे इन लोगों से कि का हो? अउर तूँ लोग देखब शेर के, कि अब चलीं? ई लोग का तो जान रहा आफत में। बोले, सरकार अब चलल जाय आश्रम में। अब ना देखब अउर। ई लोग लौट के आए आश्रम। जब हमसे मुलाकात हुई और हमको ई किस्सा बताए तो हम पूछे, एक बात बताव। ऊ मन्त्र जो बाबा बताए थे कि ए के पढ़ के कंकरो से मार देब तो ऊ मर जाई, ऊ मन्त्र याद हौ? दोनों आदमी हमसे कहे कि ऊ हमें जंगले तक याद रहल। जब हम जंगल से बाहर अइलीं तो हम्मे भूल गइल। हम कहे, मर्दे, जब तक तोहरा जान के डर रहल तब तक राम-राम याद रहल, और जब ऊ डर निकस गइल तो राम गायब।

इसी प्रकार बाबा कभी सोगड़ा, कभी नारायणपुर, कभी मडुवाडीह, सब भ्रमण करते रहते थे। एक संस्मरण अस्थाना जी के बड़े भाई ने बताया था, उसको भी सुनाता हूँ:

(195) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

04/06/2026

*☆ भगवानराम लीलामृत☆*

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ब्रह्मनिष्ठालय में माँ काली
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अब सोगड़ा आश्रम में माँ काली के आगमन की कथा नूना बाबू से सुनिये। बाबा शारदीय नवरात्र प्राय: सोगड़ा में ही किया करते थे। उन दिनों जशपुर में दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी पूजन का आयोजन होता था। एक बार बाबा ने पूछ लिया कि यहांँ काली पूजा होती है या नहीं। यह सुनकर नूना बाबू ने विचार किया कि काली पूजा तो होनी ही चाहिये। लेकिन इस पूजा में बहुत व्यवधान आए। समाज के लोग समझ नहीं पा रहे थे कि लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ काली पूजा बिना बलि दिये कैसे सम्पन्न होगी। महाराजा साहब भी इस बात को लेकर नूना बाबू से कुछ अप्रसन्न हो गए। लेकिन पूजा हुई। लोगों ने विशेषकर कलकत्ता से एक पण्डित जी को इस पूजा के लिये आमन्त्रित किया। नूना बाबू लिखते हैं:

"माँ काली के पूजन के समय सभी अतिथियों सहित महाराजा साहब पूजा स्थल पर आए, दर्शन किये और राजमहल चले गए। राजमहल से वे जनसेवा अभेद आश्रम, नारायणपुर चले गए। दूसरे दिन माँ काली के पूजनोपरान्त उनकी शोभा यात्रा निकाली गई और उन्हें ब्रह्मनिष्ठालय आश्रम, सोगड़ा पहुँचाया गया। सोगड़ा से मैं जैसे ही घर पहुँचा, महाराजा साहब ने गाड़ी भेजकर मुझे बुलवा भेजा और संदेश भिजवाया कि परम् पूज्य.....बाबा राजमहल में प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं अत्यन्त ही आह्लादित हुआ और तुरंत गाड़ी में बैठकर राजमहल पहुँचा। परम् पूज्य.....बाबा राजमहल के गोल कमरे में बैठे हुए थे। जब मैं उनका चरणस्पर्श कर खड़ा हुआ तो उन्होंने पूछा --

'कइसे-कइसे पूजा कइल ह?'

"मैंने समस्त पूजा-विधि से उन्हें विस्तारपूर्वक अवगत कराया।.... इसके पाश्चात् महाराजा साहब....बाबा से भोजन के लिये अनुरोध करने लगे। इस पर....बाबा ने कहा --

'महाराजा साहेब। देख ना, नूना बाबू इहाँ पूजा कइलन अउर माई के आशरम में रख अइलन। उहवाँ माँ भगवती बारी आउर हम इहवाँ खा लेब ई ठीक ना होई। अच्छा होई कि हम जलदी आशरम पहुँच जाईं '

"इतना कह कर....बाबा चलने के लिये उठ खड़े हुए। महाराजा साहब ने भोज्य पदार्थ टिफिन बाक्स में रखवाया और फिर हम लोग गाड़ी में बैठकर सोगड़ा आश्रम पहुँचे। ....बाबा गाड़ी से उतरकर सीधे माँ काली के पास पहुँचे और पाँच मिनट तक उन्हें देखते हुए खड़े रहे। उस दिन हम बिना भोजन किये ही रह गए और सब भूखे ही सो गए। उस वर्ष के बाद से.....बाबा स्वयं अनेक बार अघोर पीठ 'गम्हरिया' में माँ काली का पूजन किया है। अभी तक वहाँ काली पूजन होता आ रहा है।"

(194) क्रमशः -----:

।।प, पू, अघोरेश्वर।।
।।।अघोर पीठ जन सेवा अभेद आश्रम ट्रस्ट।।।
।।।पोंड़ी दल्हा अकलतरा।।

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