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शिव तत्व — पूजा से मानवता और संस्कार तकनीरजा फाउंडेशन, शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेरGen Z  राजस्थान — आपकी आवाज़, आपके न्याय...
24/08/2026

शिव तत्व — पूजा से मानवता और संस्कार तक
नीरजा फाउंडेशन, शुभम कॉलोनी, कायड़, अजमेर
Gen Z राजस्थान — आपकी आवाज़, आपके न्याय के माध्यम से
श्रीमती सीमा पाराशर, सचिव
भगवान शिव केवल पूजा के देवता नहीं, बल्कि मानव जीवन को करुणा, समानता, क्षमा, संयम और कल्याण का मार्ग दिखाने वाले शिव-तत्व के प्रतीक हैं। शिव की पूजा का वास्तविक उद्देश्य केवल जल, पुष्प, बेलपत्र या अन्य पूजन सामग्री अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस चेतना को जागृत करना है जो प्रत्येक जीव के प्रति संवेदना रखे, समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत व्यक्ति को भी सम्मान दे तथा बिना किसी स्वार्थ के मानवता के लिए कुछ करने की प्रेरणा दे। संसार में मनुष्य प्रायः उसी से प्रेम करता है जो उसके उपयोग का हो, जो उसके काम आए या जिससे उसे कोई लाभ प्राप्त हो, जबकि शिव का स्वरूप हमें उपयोगिता से परे प्रेम और करुणा का संदेश देता है। भूतभावन और भूतनाथ के रूप में शिव हमें यह समझाते हैं कि जिन्हें समाज अपने से दूर करता है, उनके प्रति भी स्नेह, सम्मान और सहानुभूति रखना ही वास्तविक मानवीय संस्कार है।
शिव-तत्व हमें यह भी सिखाता है कि यदि हम किसी जरूरतमंद को बहुत कुछ देने की स्थिति में नहीं हैं, तो कम से कम उसके साथ सम्मान और प्रेम से व्यवहार तो कर सकते हैं। किसी निर्धन को भोजन देना सेवा है, किसी बच्चे की शिक्षा में सहायता करना सेवा है, किसी वृद्ध को सहारा देना सेवा है, किसी निराश व्यक्ति को आशा देना सेवा है और किसी अकेले व्यक्ति के साथ कुछ क्षण आत्मीयता से बैठ जाना भी सेवा है। कई बार मनुष्य को आर्थिक सहायता से पहले सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए वास्तविक शिव-पूजा वह है जो मंदिर से निकलकर हमारे व्यवहार में दिखाई दे और जिसके कारण किसी दूसरे मनुष्य के जीवन में थोड़ी-सी सहजता, आशा और प्रसन्नता आए।
भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप में भी मानव जीवन के लिए गहरा संदेश छिपा है। समुद्र-मंथन से निकले विष को शिव द्वारा धारण करने की कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन और समाज में उत्पन्न हर कड़वाहट को आगे बढ़ाना आवश्यक नहीं है। परिवार में किसी के कटु शब्द, रिश्तों में उत्पन्न कोई गलतफहमी, समाज में फैली कोई नकारात्मकता या किसी व्यक्ति का व्यवहार हमें आहत करे, तो उसका उत्तर उसी विष से देना आवश्यक नहीं। शिव-तत्व हमें संयम रखना, कड़वाहट को अपने भीतर रोकना और परिस्थितियों को और अधिक विषैला बनाने से बचना सिखाता है। यही संस्कार परिवारों और समाज को टूटने से बचा सकते हैं।
इसी प्रकार शिव की पूजा हमें बाहरी आडंबर से अधिक आंतरिक परिवर्तन की ओर ले जानी चाहिए। पूजा-पाठ, धार्मिक परंपराएँ और कर्मकांड हमारी आस्था और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनका उद्देश्य तभी पूर्ण होता है जब उनसे हमारे विचार और व्यवहार भी बेहतर हों। यदि धार्मिक आस्था के नाम पर धन और संसाधनों का अत्यधिक प्रदर्शन हो, लेकिन हमारे आसपास कोई जरूरतमंद शिक्षा, भोजन, उपचार या सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा हो, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं पर विचार अवश्य करना चाहिए। धार्मिक भावना का अर्थ पूजा छोड़ना नहीं, बल्कि पूजा के साथ मानव-सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व को जोड़ना है। हमारी सामर्थ्य का कुछ अंश यदि किसी जरूरतमंद को आत्मनिर्भर बनाने, किसी बच्चे को पढ़ाने, किसी बीमार की सहायता करने या किसी असहाय को सम्मान देने में लगाया जाए, तो यही धर्म की मानवीय भावना को जीवन में उतारना है।
सच्ची सेवा भी वही है जिसमें सहायता पाने वाले व्यक्ति का आत्मसम्मान सुरक्षित रहे। किसी जरूरतमंद की सहायता करके उसे छोटा महसूस कराना सेवा का उद्देश्य नहीं हो सकता। सहायता का लक्ष्य केवल किसी की तत्काल आवश्यकता पूरी करना नहीं, बल्कि जहाँ संभव हो वहाँ उसे शिक्षा, रोजगार, कौशल, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाना भी होना चाहिए। भोजन देना पुण्य है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना उससे भी बड़ा सामाजिक योगदान हो सकता है। यही वह सोच है जो मानव के संस्कारों को बदलती है और समाज में वास्तविक परिवर्तन लाती है।
समाज केवल कानूनों और व्यवस्थाओं से नहीं बदलता; समाज तब बदलता है जब मनुष्य के संस्कार बदलते हैं। जब हम अपने बच्चों को यह सिखाते हैं कि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति उसके सम्मान का आधार नहीं है, किसी कमजोर व्यक्ति का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, वृद्ध व्यक्ति बोझ नहीं बल्कि अनुभव का स्रोत है, निर्धन व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है और किसी मनुष्य को उसकी परिस्थिति के कारण छोटा नहीं समझना चाहिए—तभी शिव-तत्व हमारे घरों और समाज में जीवित होता है। मनुष्य की वास्तविक कीमत उसके धन, पद, रूप, प्रतिष्ठा अथवा उपयोगिता से नहीं, बल्कि उसके मनुष्य होने से है।
और शिव-पूजा के इसी मानवीय और संस्कारात्मक भाव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है—क्षमा और नई शुरुआत। भगवान शिव की आराधना हमें यह संस्कार भी दे कि किसी व्यक्ति से कोई भूल हो जाए तो उसकी एक गलती को उसके पूरे व्यक्तित्व का अंतिम सत्य न बना दिया जाए। यदि कोई व्यक्ति अपनी गलती को समझता है, तो उसे सुधार का अवसर देना चाहिए। पुरानी बातों को बार-बार याद करके वर्तमान संबंधों को नष्ट करना न तो बुद्धिमानी है और न ही शिव-तत्व की भावना। अतीत की गलतियों से सीखना आवश्यक है, लेकिन उन्हें जीवन भर ढोते रहना आवश्यक नहीं। किसी को क्षमा करना उसकी गलती को सही ठहराना नहीं है; बल्कि यह अपने मन को उस कड़वाहट से मुक्त करना है जो स्वयं हमारे जीवन को प्रभावित करती रहती है। साथ ही, क्षमा का अर्थ यह भी है कि हम स्वयं संकल्प लें कि जिन गलतियों ने कभी संबंधों को चोट पहुँचाई, उन्हें भविष्य में दोहराया नहीं जाएगा और जीवन को नई दिशा के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।
दुर्भाग्य से आज मनुष्य कई बार किसी छोटी-सी बात, अधूरी जानकारी, गलतफहमी अथवा स्वयं के मन में पैदा की गई किसी धारणा को इतना बड़ा बना देता है कि एक छोटी-सी सच्चाई उसके मन में कल्पनाओं का विशाल और विकराल रूप ले लेती है। फिर वह उस कल्पना को ही सत्य मानकर व्यक्ति, रिश्ते और संबंधों के बारे में निर्णय लेने लगता है। परिणाम यह होता है कि जहाँ थोड़ी-सी बातचीत से समाधान हो सकता था, वहाँ दूरी पैदा हो जाती है; जहाँ क्षमा से संबंध बच सकता था, वहाँ अहंकार आ जाता है; जहाँ एक पुरानी भूल को पीछे छोड़कर नई शुरुआत की जा सकती थी, वहाँ वही बात बार-बार दोहराकर वर्षों के संबंध, मित्रता और याराना तक समाप्त हो जाते हैं।
इसलिए शिव-तत्व हमें यह संदेश देता है कि हर बात को अपनी कल्पना से बड़ा मत बनाइए, हर गलती को जीवन भर का अपराध मत बनाइए और हर गलतफहमी को संबंध समाप्त करने का कारण मत बनाइए। जहाँ सत्य जानने के लिए बातचीत संभव हो, वहाँ बातचीत कीजिए; जहाँ गलती हुई है, वहाँ स्वीकार और सुधार का अवसर दीजिए; जहाँ क्षमा संभव है, वहाँ क्षमा कीजिए और जहाँ अतीत से सीख मिल गई है, वहाँ उसी गलती को भविष्य में न दोहराने का संकल्प लेकर आगे बढ़िए। जीवन का उद्देश्य पुराने घावों को बार-बार कुरेदना नहीं, बल्कि उनसे सीख लेकर भविष्य को बेहतर बनाना है।
शिव-तत्व का सार यही है—मनुष्य को तोड़ना नहीं, जोड़ना; अपमानित करना नहीं, सम्मान देना; गलती पर हमेशा के लिए दंडित करना नहीं, सुधार का अवसर देना; अतीत में उलझे रहना नहीं, उससे सीख लेकर भविष्य की ओर बढ़ना। जब शिव की पूजा हमारे भीतर से अहंकार को कम करे, मन में करुणा बढ़ाए, दूसरों की भूल को समझने की क्षमता दे, क्षमा का संस्कार पैदा करे और हमें अपने व्यवहार में सुधार करने के लिए प्रेरित करे, तभी पूजा अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुँचती है।
मंदिर में चढ़ाया गया जल यदि हमारे भीतर की कठोरता को शीतल कर दे, पूजा का दीपक हमारे विचारों में प्रकाश भर दे और शिव का स्मरण हमारे व्यवहार में मानवता जगा दे—तो यही शिव-पूजा का सबसे सुंदर फल है।
यही शिव-तत्व है।
यही मानवता है।
यही संस्कार हैं।
और यही जीवन को पुनः सही दिशा में आगे बढ़ाने का मार्ग है।

आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं, वास्तविक लाभार्थी तक अधिकार पहुँचाने की मुहिमआरक्षण भारत के संविधान, सामाजिक न्याय औ...
23/08/2026

आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार नहीं, वास्तविक लाभार्थी तक अधिकार पहुँचाने की मुहिम
आरक्षण भारत के संविधान, सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक वंचना से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसका उद्देश्य केवल कुछ पदों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि उन वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर देना है, जो लंबे समय तक सामाजिक और शैक्षिक अवसरों से वंचित रहे हैं। इसलिए आज बहस केवल “आरक्षण रहे या समाप्त हो” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि आरक्षण और उससे जुड़ी सरकारी सहायता का वास्तविक लाभ सबसे जरूरतमंद परिवार तक पहुँच रहा है या नहीं।
इसी प्रश्न को केंद्र में रखकर एक व्यापक, शांतिपूर्ण और संवैधानिक जन-जागरण अभियान की आवश्यकता महसूस होती है।
घर-घर पहुँचेगा अभियान, सामने आएगी वास्तविक तस्वीर
इस अभियान का पहला उद्देश्य किसी जाति या समुदाय के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि गरीब और वंचित परिवारों की वास्तविक स्थिति को समझना होना चाहिए।
घर-घर जाकर SC, ST, OBC तथा अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित परिवारों से संवाद किया जाए। उनसे पूछा जाए—
क्या उनके बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है?
क्या उन्हें छात्रवृत्ति और सरकारी अनुदान की जानकारी और वास्तविक लाभ मिल रहा है?
क्या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं?
क्या परिवार आर्थिक कठिनाइयों के कारण अपने बच्चों की पढ़ाई बीच में तो नहीं छुड़ा रहा?
क्या सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में पात्र परिवार तक पहुँच रहा है?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल भाषणों में नहीं, बल्कि जमीनी सर्वेक्षण और तथ्यात्मक आंकड़ों में सामने आने चाहिए।
आरक्षण का लाभ उसी तक पहुँचे जिसे वास्तव में आवश्यकता है
आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े तथा वंचित वर्गों को आगे बढ़ाना है। इसलिए यह विचार करना भी आवश्यक है कि क्या वर्तमान व्यवस्था में ऐसे प्रावधानों की आवश्यकता है, जिनसे लगातार लाभ प्राप्त कर चुके अपेक्षाकृत सक्षम परिवारों की तुलना में उन परिवारों तक अवसर और सहायता अधिक प्रभावी रूप से पहुँच सके, जो अभी भी वास्तविक वंचना में जीवन जी रहे हैं।
यह विषय कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से जटिल है। इसलिए किसी भी परिवर्तन की मांग संविधान, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सीमाओं के भीतर रखी जानी चाहिए।
उद्देश्य किसी वर्ग का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि सामाजिक न्याय की व्यवस्था का लाभ समाज के भीतर सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक भी पहुँचे।
नौकरी में योग्यता और शिक्षा में समान अवसर
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि गरीब परिवारों के बच्चों को उस स्तर तक पहुँचने के लिए आवश्यक संसाधन कौन उपलब्ध कराएगा, जहाँ वे अपनी योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
यदि किसी बच्चे के पास अच्छी शिक्षा, कोचिंग, पुस्तकें, डिजिटल संसाधन और आर्थिक सुरक्षा नहीं है, तो केवल परीक्षा में उसके प्रदर्शन को देखकर उसकी वास्तविक क्षमता का मूल्यांकन करना भी कठिन हो जाता है।
इसलिए सरकार से मांग होनी चाहिए कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों के लिए—
छात्रवृत्ति, निःशुल्क या रियायती शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, कौशल प्रशिक्षण, छात्रावास, डिजिटल शिक्षा और अन्य आवश्यक अनुदान प्रभावी रूप से उपलब्ध कराए जाएँ।
आरक्षण की बहस के साथ-साथ समान अवसर की बुनियादी व्यवस्था मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है।
पांच किलो अनाज से आगे की सोच
गरीब परिवार को तत्काल राहत के लिए खाद्यान्न या अन्य सहायता आवश्यक हो सकती है, लेकिन किसी परिवार और उसके बच्चों का भविष्य केवल ऐसी सहायता से सुरक्षित नहीं हो सकता।
गरीब बच्चे को ऐसा अवसर चाहिए जिससे वह पढ़ सके, कौशल प्राप्त कर सके, प्रतियोगिता में उतर सके और अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
इसलिए सामाजिक न्याय की चर्चा केवल तत्काल राहत तक सीमित न रहकर शिक्षा, रोजगार, कौशल, आर्थिक आत्मनिर्भरता और दीर्घकालीन अवसरों तक पहुँचनी चाहिए।
आंदोलन का स्वरूप कैसा हो?
इस मुहिम को किसी राजनीतिक दल या जातीय संघर्ष का आंदोलन बनाने के बजाय सामाजिक अधिकार और नीति-सुधार का जन-अभियान बनाया जाना चाहिए।
घर-घर संवाद हो।
वास्तविक आंकड़े एकत्र किए जाएँ।
गरीब परिवारों की समस्याओं का दस्तावेज तैयार हो।
विशेषज्ञों और कानूनविदों से चर्चा हो।
जनप्रतिनिधियों के सामने तथ्य रखे जाएँ।
सरकार से लिखित और स्पष्ट मांग की जाए।
और आवश्यकता होने पर शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से व्यापक जनमत तैयार किया जाए।
अब निर्णय भावनाओं से नहीं, वास्तविकता देखकर
SC, ST और OBC समाज के गरीब परिवारों सहित प्रत्येक वंचित परिवार से यह आग्रह होना चाहिए कि वे किसी भी नीति का समर्थन या विरोध केवल राजनीतिक नारों के आधार पर न करें। पहले यह देखें कि वर्तमान व्यवस्था से उन्हें और उनके बच्चों को वास्तविक रूप से क्या मिला है और क्या नहीं मिला।
यदि व्यवस्था में कमी है तो उस कमी को दूर करने की मांग उठाएँ। यदि किसी योजना का लाभ पात्र परिवार तक नहीं पहुँच रहा है तो उसके लिए जवाबदेही तय करने की मांग करें। और यदि नीति में परिवर्तन आवश्यक है तो उसके लिए संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक मार्ग अपनाएँ।
यह मुहिम किसी के अधिकार छीनने की मुहिम नहीं होनी चाहिए।
यह मुहिम होनी चाहिए—
“वास्तविक वंचित को वास्तविक अधिकार मिले।”
“गरीब बच्चे को शिक्षा और अवसर मिले।”
“सरकारी सहायता पात्र व्यक्ति तक पहुँचे।”
“नीतियों की समीक्षा आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर हो।”
और सबसे महत्वपूर्ण—
“सामाजिक न्याय का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।”
यही इस आंदोलन की मूल संरचना और व्यापक उद्देश्य होना चाहिए। यदि यह अभियान जातीय संघर्ष और राजनीतिक विरोध से ऊपर उठकर गरीब, वंचित और जरूरतमंद परिवारों के भविष्य की लड़ाई बनता है, तो इसकी व्यापकता भी बढ़ेगी और इसकी विश्वसनीयता भी।
क्योंकि अंततः सवाल केवल आरक्षण का नहीं है—
सवाल उस बच्चे के भविष्य का है, जिसके हाथ में आज किताब होनी चाहिए, लेकिन आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण उसके हाथ में अवसर नहीं है।

श्रीकृष्ण का रात्रि में जन्म : एक दिव्य संदेशभगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ, यह केवल एक धार्मिक अथवा पौराणिक...
22/08/2026

श्रीकृष्ण का रात्रि में जन्म : एक दिव्य संदेश

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ, यह केवल एक धार्मिक अथवा पौराणिक प्रसंग नहीं है, बल्कि मानव जीवन को दिशा देने वाला एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है। ईश्वर सदैव किसी न किसी रूप में, कभी समय के माध्यम से, कभी अपनी लीला के माध्यम से, कभी किसी अवतार के रूप में और कभी किसी घटना के द्वारा पृथ्वी पर निवास करने वाले मनुष्य को सत्य, धर्म और जीवन का मार्ग समझाते रहे हैं। किंतु मनुष्य की सहज प्रवृत्ति यह रही है कि वह ईश्वर की लीला को घटना के रूप में तो देख लेता है, पर उसके भीतर छिपे संकेत और संदेश को समझने के लिए आवश्यक आत्मचिंतन कम करता है। श्रीकृष्ण का रात्रि में जन्म इसी गहरे संदेश को समझने का अवसर देता है।
श्रीकृष्ण का जन्म उस समय हुआ जब चारों ओर अंधकार था। इस अंधकार को केवल रात का प्राकृतिक अंधकार मानना इस प्रसंग की आध्यात्मिक गहराई को सीमित कर देना होगा। रात्रि का अंधकार मनुष्य के भीतर व्याप्त अज्ञान, भय, अहंकार, स्वार्थ, क्रोध, ईर्ष्या और अन्याय का भी प्रतीक है। जब मनुष्य के विचारों पर नकारात्मकता हावी हो जाती है, जब उसका विवेक कमजोर पड़ जाता है और जब उसके कर्मों का संचालन सत्य के स्थान पर स्वार्थ करने लगता है, तब उसके जीवन में भी एक गहरी रात्रि उतर आती है। ऐसे ही अंधकार के मध्य श्रीकृष्ण का जन्म यह दिव्य संदेश देता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश का जन्म उसी अंधकार के बीच हो सकता है।
श्रीकृष्ण के रात्रि-जन्म का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि मनुष्य को बाहरी प्रकाश के साथ-साथ अपने भीतर के प्रकाश को पहचानना चाहिए। दिन का प्रकाश संसार को दिखाई देता है, लेकिन रात का अंधकार व्यक्ति को अपने अंतर्मन में झांकने का अवसर देता है। इसलिए जन्माष्टमी की आधी रात मानो प्रत्येक मनुष्य से यह प्रश्न करती है कि उसके भीतर कौन-सा अंधकार है और वह उसे किस प्रकार प्रकाश में बदल सकता है। क्या उसके भीतर क्रोध है, अहंकार है, ईर्ष्या है, किसी के प्रति कटुता है, अथवा ऐसी कोई सोच है जो उसके अपने जीवन और संबंधों को कमजोर कर रही है? श्रीकृष्ण का जन्म हमें प्रेरणा देता है कि इन कमजोरियों से भागने के बजाय उन्हें पहचानें और अपने विवेक, सत्य, प्रेम तथा संयम के प्रकाश से उन्हें दूर करने का प्रयास करें।
कृष्ण का संदेश मनुष्य के विचार, कर्म और व्यवहार—तीनों को प्रभावित करने वाला है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसके कर्मों में दिखाई देता है और उसके कर्म धीरे-धीरे उसके चरित्र का निर्माण करते हैं। यदि विचारों में क्रोध और अहंकार है तो व्यवहार में कठोरता आना स्वाभाविक है। यदि विचारों में स्वार्थ है तो संबंधों में दूरी बढ़ती है। इसके विपरीत यदि विचारों में प्रेम, धैर्य, करुणा और विवेक है तो वही भाव अच्छे कर्मों और मधुर व्यवहार का आधार बनते हैं। इस दृष्टि से श्रीकृष्ण का रात्रि-जन्म मनुष्य को सबसे पहले अपने विचारों को शुद्ध करने का संदेश देता है, क्योंकि विचार ही कर्म का बीज होते हैं।
कथा का कंस भी केवल इतिहास या पौराणिक प्रसंग का एक पात्र भर नहीं है। वह मनुष्य के भीतर जन्म लेने वाली उन प्रवृत्तियों का प्रतीक है जो उसके विवेक को कैद कर लेती हैं। क्रोध, अहंकार, लोभ, भय, ईर्ष्या, अधिकार की अंधी भावना और दूसरों को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति—ये सभी मनुष्य के भीतर के कंस का रूप ले सकती हैं। जब व्यक्ति इन प्रवृत्तियों के अधीन होकर निर्णय लेने लगता है, तब उसके विचार, कर्म और व्यवहार में अंधकार बढ़ने लगता है। श्रीकृष्ण का जन्म हमें प्रेरित करता है कि हम सबसे पहले अपने भीतर के कंस को पहचानें और उसके ऊपर विवेक, संयम और धर्म की विजय स्थापित करें।
यह संदेश स्त्री और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। जीवन में स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयात्री और सहयोगी हैं। परिवार तभी स्वस्थ बनता है जब उसमें अधिकार के स्थान पर सम्मान, अहंकार के स्थान पर संवाद और स्वार्थ के स्थान पर सहयोग हो। पति-पत्नी यदि एक-दूसरे को नियंत्रित करने के बजाय समझने का प्रयास करें, एक-दूसरे की भावनाओं और संघर्षों का सम्मान करें तथा कठिन समय में एक-दूसरे का सहारा बनें, तो परिवार में वही प्रकाश जन्म लेता है जिसका प्रतीक श्रीकृष्ण का जन्म है। इसी प्रकार माता-पिता यदि बच्चों पर केवल अपनी इच्छाएं थोपने के बजाय उनके मन और विचारों को समझें, तो आने वाली पीढ़ी में स्वस्थ सोच और संस्कारों का निर्माण होता है।
श्रीकृष्ण के जन्म का संदेश केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक जीवन को भी दिशा देता है। समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे। किसी भी स्त्री का सम्मान करना, पुरुष की जिम्मेदारियों को समझना, बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा का ध्यान रखना, बुजुर्गों के अनुभव का सम्मान करना तथा कमजोर व्यक्ति के प्रति संवेदनशील रहना—ये सभी धर्म के व्यावहारिक रूप हैं। मंदिर में भगवान के सामने सिर झुकाना भक्ति है, लेकिन जीवन में किसी मनुष्य का सम्मान करना उस भक्ति को व्यवहार में उतारना है।
ईश्वर के संदेश को समझने की सबसे बड़ी आवश्यकता आज इसलिए है क्योंकि मनुष्य ज्ञान और साधनों में आगे बढ़ने के बावजूद अपने अंतर्मन में अनेक संघर्षों से घिरा हुआ है। आधुनिक जीवन में तनाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलापन, पारिवारिक मतभेद और असंतोष बढ़ते दिखाई देते हैं। ऐसे समय में श्रीकृष्ण का रात्रि-जन्म हमें याद दिलाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने भीतर का प्रकाश बुझने नहीं देना चाहिए। कठिन समय में धैर्य रखना, सही निर्णय लेना, अपने कर्म के प्रति ईमानदार रहना और सत्य का साथ न छोड़ना ही कृष्ण-संदेश का व्यावहारिक स्वरूप है।
इसलिए जन्माष्टमी केवल पूजा, व्रत, झांकी और उत्सव की तिथि नहीं है। यह आत्मचिंतन और आत्मसुधार का अवसर भी है। इस दिन हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने विचारों में सत्य, अपने कर्मों में ईमानदारी, अपने व्यवहार में प्रेम, अपने संबंधों में सम्मान और अपने निर्णयों में विवेक को स्थान देंगे। हम दूसरों की कमियों को देखने से पहले अपने भीतर की कमियों को पहचानने का प्रयास करेंगे और अपने जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति के मन, सम्मान या जीवन को अनावश्यक पीड़ा पहुंचे।
वास्तव में श्रीकृष्ण का जन्म केवल मथुरा की कारागार में हुआ था, ऐसा मानना उनके संदेश को सीमित कर देना है। कृष्ण का जन्म आज भी वहां होता है जहां अज्ञान के स्थान पर ज्ञान जन्म लेता है, क्रोध के स्थान पर करुणा जन्म लेती है, अहंकार के स्थान पर विनम्रता जन्म लेती है, निराशा के स्थान पर आशा जन्म लेती है और स्वार्थ के स्थान पर मानवता जन्म लेती है। जब कोई व्यक्ति कठिन परिस्थिति में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ता, जब कोई स्त्री अपने सम्मान के लिए दृढ़ता से खड़ी होती है, जब कोई पुरुष अपनी शक्ति का उपयोग संरक्षण और जिम्मेदारी के लिए करता है, जब पति-पत्नी अहंकार के स्थान पर संवाद को चुनते हैं और जब माता-पिता अपनी अगली पीढ़ी को संस्कार देने का संकल्प लेते हैं, तब वास्तव में जीवन में कृष्ण-चेतना का जन्म होता है।
श्रीकृष्ण का रात्रि में अवतरण इसलिए मानवता के लिए एक अमर संदेश है कि अंधकार अंत नहीं है। कई बार सबसे गहरे अंधकार के बाद ही प्रकाश का नया अध्याय शुरू होता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि मनुष्य अपने विचारों को जागृत रखे, अपने कर्मों को धर्म से जोड़े और अपने व्यवहार में मानवता को स्थान दे। यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है और यही वह संदेश है जिसे प्रत्येक स्त्री और पुरुष अपने व्यक्तिगत जीवन, परिवार और समाज में उतारकर अपने जीवन को अधिक सार्थक, संतुलित और श्रेष्ठ बना सकता है।
नीरजा फाउंडेशन ट्रस्ट
सचिव श्रीमती सीमा पाराशर
शुभम कॉलोनी कायड 7737115459
Gen Z Rajasthan

वरिष्ठ नागरिक दिवस — जीवन की संध्या नहीं, अनुभव का उजालाश्रीमती सीमा पाराशरसचिव, नीरजा फाउन्डेशन, अजमेर के मुखवचनमनुष्य ...
21/08/2026

वरिष्ठ नागरिक दिवस — जीवन की संध्या नहीं, अनुभव का उजाला
श्रीमती सीमा पाराशर

सचिव, नीरजा फाउन्डेशन, अजमेर के मुखवचन
मनुष्य का जीवन मुझे एक नदी की तरह लगता है। जन्म के झरने से निकलकर यह बचपन, यौवन और प्रौढ़ावस्था के अनेक पड़ावों से गुजरता हुआ अंततः वृद्धावस्था के सागर की ओर बढ़ता है। लेकिन जीवन की इस अंतिम अवस्था को केवल उम्र का बढ़ना मान लेना शायद जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अनुभवों के साथ अन्याय है।
21 अगस्त, वरिष्ठ नागरिक दिवस, हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि हमारे बुजुर्ग परिवार और समाज पर कोई बोझ नहीं, बल्कि हमारी सबसे मूल्यवान विरासत हैं। उनके चेहरे की झुर्रियों में संघर्ष की कहानी है, उनके अनुभवों में जीवन की पाठशाला है और उनकी स्मृतियों में वह इतिहास छिपा है, जिसे किताबों में पूरी तरह नहीं पाया जा सकता।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम अपने बच्चों की शिक्षा, करियर, सुविधाओं और भविष्य की चिंता में इतने व्यस्त हो गए हैं कि कभी-कभी उसी व्यक्ति के लिए समय नहीं निकाल पाते, जिसने हमारे बचपन को अपना वर्तमान बनाकर हमारे भविष्य की नींव रखी थी। माता-पिता ने हमारी छोटी-छोटी जरूरतों को अपनी प्राथमिकता बनाया, हमारी गलतियों को क्षमा किया और हमारी सफलता को अपनी सफलता माना। इसलिए जीवन के उस पड़ाव पर जब उन्हें हमारी जरूरत सबसे अधिक होती है, हमारा उनके पास होना केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारा नैतिक दायित्व भी है।
वरिष्ठ नागरिकों को केवल दवा, भोजन और आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता होती है सम्मान, संवाद और अपनापन की। कई बार दस मिनट की आत्मीय बातचीत, उनके पास बैठकर उनकी पुरानी यादें सुन लेना या बिना किसी जल्दी के उनका हाथ पकड़ लेना उनके लिए किसी बड़ी सुविधा से अधिक मूल्यवान होता है।
हमें यह भी समझना होगा कि बुजुर्गों की भावनाएं उतनी ही संवेदनशील होती हैं जितनी बच्चों की। जब उन्हें परिवार के निर्णयों से अलग कर दिया जाता है, उनकी बात को महत्व नहीं दिया जाता या उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि अब उनकी कोई उपयोगिता नहीं है, तब उनके भीतर एक गहरा अकेलापन जन्म लेता है। उम्र शरीर की शक्ति को कम कर सकती है, लेकिन व्यक्ति के अनुभव, आत्मसम्मान और भावनाओं को समाप्त नहीं करती।
और यदि कभी हमारी ओर से अपने माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों, छोटे बच्चों या किसी रिश्तेदार के प्रति ऐसा व्यवहार हो गया हो, जिससे रिश्तों में दूरी आई हो, तो पहल करने में हमें अपनी उम्र या पद का अहंकार नहीं करना चाहिए। माफी मांगने की शुरुआत छोटा नहीं, बल्कि बड़ा व्यक्ति ही कर सकता है। रिश्ते जीतने के लिए कई बार अपने अहंकार को हारना पड़ता है।
मेरी दृष्टि में वरिष्ठ नागरिक दिवस केवल बुजुर्गों को सम्मान देने का एक दिन नहीं है। यह हम सभी के लिए आत्ममंथन का दिन है—क्या हम अपने घर के बुजुर्गों को वह समय दे रहे हैं, जिसके वे अधिकारी हैं? क्या हम उनकी सलाह सुनते हैं? क्या उनके निर्णयों और अनुभवों का सम्मान करते हैं? और क्या हम अपने बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि बुजुर्गों का सम्मान केवल परंपरा नहीं, बल्कि संस्कार है?
नीरजा फाउन्डेशन की ओर से मेरा मानना है कि जिस समाज में बुजुर्ग सम्मानित होते हैं, वहां पीढ़ियों के बीच संवाद मजबूत होता है और परिवारों की जड़ें गहरी होती हैं। हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां बुजुर्ग अपने घर में स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और उपयोगी महसूस करें तथा बच्चे उनके अनुभवों से सीख सकें।
उम्र बढ़ना जीवन की कमजोरी नहीं, जीवन के अनुभवों का संचय है।
आइए, आज हम संकल्प लें कि अपने वरिष्ठ नागरिकों को केवल सम्मान के शब्द नहीं, बल्कि अपने समय, स्नेह, संवाद और साथ का उपहार देंगे।
क्योंकि जिस घर में बुजुर्गों का आशीर्वाद और अनुभव सुरक्षित रहता है, उस घर की आने वाली पीढ़ियां केवल बड़ी नहीं होतीं—वे संस्कारवान भी बनती हैं।
— श्रीमती सीमा पाराशर
सचिव, नीरजा फाउन्डेशन, अजमेर

सावन 2026: शिवपिंडी की आधी परिक्रमा और मानव जीवन का गहरा संदेशमर्यादा में रहना, अहंकार छोड़ना और स्वयं को भीतर से देखना ...
21/08/2026

सावन 2026: शिवपिंडी की आधी परिक्रमा और मानव जीवन का गहरा संदेश
मर्यादा में रहना, अहंकार छोड़ना और स्वयं को भीतर से देखना ही शिवत्व की ओर यात्रा है
नीरजा फाउन्डेशन, अजमेर — सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय के उद्गार
श्रावण मास केवल शिवलिंग पर जल चढ़ाने और पूजा-अर्चना करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन को भीतर से देखने और सुधारने का समय भी है। शिव की आराधना हमें बाहरी आडंबर से भीतर की यात्रा की ओर ले जाती है। शिवपिंडी की परिक्रमा भी इसी गहरे जीवन-दर्शन का प्रतीक है। परंपरागत रूप से मानव-स्थापित शिवलिंग की परिक्रमा करते समय अभिषेक का जल जिस मार्ग से बाहर निकलता है, उसे सोमसूत्र या जलाधारी कहा जाता है और उसे लांघने से बचते हुए परिक्रमा करने की परंपरा रही है। इसी कारण कई परंपराओं में शिवलिंग की अर्ध या सोमसूत्री परिक्रमा का विधान मिलता है।
लेकिन प्रश्न यह है कि भगवान शिव की पूजा में हमें इस नियम से अपने जीवन के लिए क्या सीख मिलती है?
सबसे पहली सीख है—मर्यादा। मनुष्य आज स्वतंत्रता के नाम पर अनेक सीमाओं को भूलता जा रहा है। परिवार की मर्यादा, रिश्तों की मर्यादा, वाणी की मर्यादा, पद की मर्यादा और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व की मर्यादा—जब इनका अतिक्रमण होता है तो व्यक्ति को लगता है कि वह आगे बढ़ रहा है, जबकि वास्तव में वह अपने ही जीवन की शांति से दूर जा रहा होता है। शिव की परिक्रमा में सोमसूत्र को न लांघना मानो यह स्मरण कराता है कि हर शक्ति के साथ एक सीमा जुड़ी होती है। सीमा का सम्मान ही शक्ति का सम्मान है।
दूसरी सीख है—अहंकार का त्याग। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल शायद यही है कि वह अपने ज्ञान, धन, पद, अनुभव और संबंधों को ही अपनी पूर्णता मान बैठता है। उसे लगता है कि वह सब जानता है, सब समझता है और दूसरों को समझाने का अधिकार रखता है। जबकि शिव का स्वरूप हमें अनंतता का बोध कराता है। उनके सामने मनुष्य का ज्ञान कितना सीमित है! आधी परिक्रमा हमें जैसे धीरे से कहती है—“जहाँ तुम्हें लगता है कि तुम पूर्ण हो गए, वहीं थोड़ा ठहरो और स्वीकार करो कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।” यही विनम्रता मनुष्य को बड़ा बनाती है।
आज परिवारों में बढ़ती दूरियों के पीछे भी यही अहंकार दिखाई देता है। बड़े सोचते हैं कि उम्र के कारण केवल वही सही हैं और छोटे सोचते हैं कि नई पीढ़ी होने के कारण उनका विचार ही अंतिम सत्य है। परिणाम यह होता है कि दोनों अपनी-अपनी जगह खड़े रहते हैं और संबंध बीच में टूट जाता है। शिव की परिक्रमा हमें सिखाती है कि कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखना भी आवश्यक है। हमें देखना चाहिए कि हम कहाँ से चले थे, किसके साथ चले थे और रास्ते में किसे पीछे छोड़ आए।
यही तीसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण सीख है—आत्मनिरीक्षण। परिक्रमा में एक बिंदु पर पहुँचकर हमें लौटना पड़ता है। जीवन भी ऐसा ही है। हम दिन-रात सफलता, धन, प्रतिष्ठा और सुविधाओं के पीछे दौड़ते रहते हैं, लेकिन बहुत कम रुककर स्वयं से पूछते हैं—क्या मैं सही दिशा में जा रहा हूँ? क्या मेरी सफलता के कारण मेरे अपने मुझसे दूर तो नहीं हो रहे? क्या मेरी वाणी से किसी को चोट तो नहीं पहुँच रही? क्या मेरे व्यवहार में अहंकार तो नहीं आ गया?
शिव की आधी परिक्रमा इसलिए केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन का आत्ममूल्यांकन बन सकती है। यह हमें बताती है कि जीवन में केवल आगे बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है; समय-समय पर रुकना, पीछे देखना, अपनी भूल स्वीकार करना और आवश्यकता पड़े तो दिशा बदलना भी उतना ही आवश्यक है।
आज मनुष्य का एक बड़ा अहम वहम यह है कि “मेरे बिना कुछ नहीं हो सकता।” घर में भी, संस्था में भी, समाज में भी और रिश्तों में भी। यही अहं धीरे-धीरे व्यक्ति को अकेला कर देता है। शिव हमें इसका ठीक विपरीत संदेश देते हैं। महादेव होकर भी वे सहज हैं, वैभव से दूर हैं, विष को धारण करते हैं और दूसरों के कल्याण को अपने सुख से ऊपर रखते हैं। शिवत्व का अर्थ केवल शिव की पूजा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर से “मैं” को थोड़ा कम करके “हम” को बढ़ाना है।
एक और बड़ा भ्रम है—“मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है?” मनुष्य अपनी नीयत को देखता है, लेकिन अपने व्यवहार का प्रभाव भूल जाता है। कभी एक कठोर शब्द, कभी उपेक्षा, कभी अपमान, कभी अनावश्यक अधिकार और कभी अपने अहंकार के कारण किसी अपने का मन दुख सकता है। शिव आराधना हमें केवल ईश्वर से क्षमा मांगना नहीं सिखाती; वह हमें यह साहस भी देती है कि आवश्यकता पड़े तो जिस व्यक्ति का मन हमने दुखाया है, उसके सामने स्वयं झुककर क्षमा मांगें। यही वास्तविक प्रायश्चित है।
श्रावण में चढ़ाया गया श्वेत अक्षत भी हमें इसी निष्काम भाव की याद दिला सकता है। पूजा का वास्तविक अर्थ केवल यह मांगना नहीं कि “मुझे क्या मिलेगा?”, बल्कि यह भी पूछना है—“मैं अपने जीवन से क्या दे सकता हूँ?” बेलपत्र, पुष्प और जल तभी सार्थक हैं जब उनके साथ हमारा व्यवहार भी निर्मल हो।
इसलिए इस सावन जब हम शिवलिंग की परिक्रमा करें, तो केवल मंदिर की परिक्रमा न करें—अपने जीवन की भी एक परिक्रमा करें। अपने बचपन को याद करें, अपने माता-पिता को याद करें, उन लोगों को याद करें जिन्होंने कठिन समय में साथ दिया, उन संबंधों को याद करें जिनमें हमारी किसी गलती से दूरी आई और उन क्षणों को याद करें जहाँ हमारा अहंकार हमारे प्रेम से बड़ा हो गया।
शिव की आधी परिक्रमा हमें शायद यही कहती है—हर रास्ते पर अंत तक दौड़ना जरूरी नहीं; कहीं-कहीं रुककर लौटना ही बुद्धिमानी है। हर बात में जीतना जरूरी नहीं; कहीं-कहीं झुक जाना ही रिश्ते बचाता है। हर बात साबित करना जरूरी नहीं; कभी-कभी मौन ही सबसे बड़ा उत्तर होता है। और हर गलती पर दूसरे को दोष देना जरूरी नहीं; कभी स्वयं को देखना ही शिव की ओर पहला कदम है।
सावन 2026 में शिव के चरणों में यही प्रार्थना हो कि हमारे भीतर की कठोरता पिघले, अहंकार कम हो, मन में विकारपूर्ण विचारों की समाप्ति हो तो रिश्तों में मधुरता आए और हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस प्राप्त करें।
शिव की आधी परिक्रमा हमें अधूरा नहीं करती; वह हमें यह समझाती है कि अपने मन व कर्म मे अहंकार की पूर्णता को छोड़कर ही हम शिव की पूर्णता के निकट जा सकते हैं।
हर-हर महादेव!
श्रीमती सीमा पाराशर
सचिव, नीरजा फाउन्डेशन, अजमेर
“पूजा केवल मंदिर में नहीं, हमारे आचरण व व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।”

संपादकीय: मन का कचरा साफ करें — 'मासिक क्षमा-इतवार' एक सामाजिक औषधिनीरज फाउंडेशन, कश्मीर की पहल पर हर माह के अंतिम रविवा...
20/08/2026

संपादकीय: मन का कचरा साफ करें — 'मासिक क्षमा-इतवार' एक सामाजिक औषधि
नीरज फाउंडेशन, कश्मीर की पहल पर हर माह के अंतिम रविवार को 'क्षमा-पर्व' मनाने का विचार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आज के तनावग्रस्त समाज के लिए एक आवश्यक 'मेंटल डिटॉक्स' है। जैन धर्म के पर्वाधिराज पर्युषण का मूल संदेश 'अपने भीतर ठहरना' और 'मिच्छामि दुक्कड़म्' कहना है। नीरज फाउंडेशन की दृष्टि में इस पर्व का उद्देश्य परिवार के प्रत्येक सदस्य को आत्म-मंथन का अवसर देना है।

वर्ष भर हम जाने-अनजाने कई संकल्प लेते हैं, कई योजनाएँ बनाते हैं। कुछ पूरी होती हैं, कुछ अधूरी रह जाती हैं। कुछ वादे निभ नहीं पाते, कुछ कार्य शुरू करके छोड़ देते हैं। कई बार मन में किसी के प्रति कटु वाणी या बुरे विचार जन्म लेते हैं, जिन्हें हम कह तो नहीं पाते, पर मन में पाल लेते हैं। यही अधूरी बातें, टूटे वादे, अनकही कड़वाहट और दबी हुई कुंठाएँ धीरे-धीरे दुख का कारण बनती हैं।

मानव मस्तिष्क एक सुपर कंप्यूटर की तरह है। जिस प्रकार हम अपने मोबाइल और कंप्यूटर से समय-समय पर जंक फाइल, कैश और वायरस साफ करते हैं, उसी प्रकार मन-मस्तिष्क के इस अदृश्य कचरे को साफ करना भी अनिवार्य है। यदि यह कचरा निरंतर जमा होता रहे, तो यह निश्चित रूप से बड़ी बीमारियों का रूप ले लेता है — कभी मानसिक तनाव, ओवरथिंकिंग, डिप्रेशन के रूप में; कभी ब्लड प्रेशर, अनिद्रा या अन्य शारीरिक विकार के रूप में; और कभी पारिवारिक कलह, विद्रोह या सामाजिक बहिष्कार के रूप में।

इस मानसिक कचरे को साफ करने का सर्वोत्तम तरीका हमारी भारतीय परंपरा में पहले से मौजूद है — आपस में गले मिलकर, सच्चे मन से एक-दूसरे को माफ करना। गले मिलने से दिल से दिल की नज़दीकी बढ़ती है और आत्मा से आत्मा की दूरी मिटती है। 'मिच्छामि दुक्कड़म्' केवल शब्द नहीं, एक औषधि है। पर शर्त यही है कि यह सच्चे मन से किया जाए। यदि इसे केवल औपचारिकता के तौर पर, मन में पाप, द्वेष और नकारात्मक विचार रखकर किया जाए, तो उसका प्रभाव भी नकारात्मक ही मिलेगा। कपट से की गई क्षमा, क्षमा नहीं, एक नया बोझ है।

इसलिए नीरज फाउंडेशन का आह्वान है — हर माह के अंतिम इतवार को परिवार साथ बैठे। प्रत्येक सदस्य आत्म-निरीक्षण करे कि इस माह उसने कौन-सा वादा तोड़ा, कौन-सा कार्य अधूरा छोड़ा, किसके प्रति मन में बुरा सोचा। फिर ईश्वर को साक्षी मानकर, उन सबके लिए क्षमा माँगे और यदि संभव हो तो संबंधित व्यक्ति से संचार के माध्यम से माफी का संदेश अवश्य पहुँचाए।

मन में किसी प्रकार की गुलामी न बचने दें। गिले-शिकवे, अहंकार और काल्पनिक भय की गुलामी ही रिश्तों को, शरीर को और समाज को बीमार करती है। 'सबको क्षमा, सबसे क्षमा' — यही उत्तम क्षमा है। यही वह प्राचीन तरीका है जो आज के युग में मानसिक स्वास्थ्य की सबसे आधुनिक थैरेपी बन सकता है।

आइए, 'अगले मन से नहीं, आज से' शुरुआत करें। क्योंकि अहंकार छोड़ने से बड़ा कोई धर्म नहीं, और मन साफ रखने से बड़ी कोई औषधि नहीं। उत्तम क्षमा। मिच्छामि दुक्कड़म्।

19/08/2026
नीरजा फाउंडेशन, अजमेर  सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय के उद्गार  〰️〰️〰️❗❗〰️〰️〰️“शिव परिवार : पूजा से प्रेरणा तक”  श्रा...
19/08/2026

नीरजा फाउंडेशन, अजमेर
सचिव श्रीमती सीमा पाराशर के हृदय के उद्गार

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“शिव परिवार : पूजा से प्रेरणा तक”
श्रावण मास के पावन अवसर पर समस्त परिवारों के नाम मेरा विनम्र संदेश

प्रिय स्वजनों,

सावन का महीना आते ही मन शिवमय हो जाता है। हम सब बहनें, बेटियां, माताएं भोर से उठकर भोलेनाथ को जल चढ़ाने जाती हैं। यह क्रम पीढ़ियों से चला आ रहा है। पर आज मन में एक टीस उठती है — हम शिव को जल तो रोज चढ़ाते हैं, पर क्या कभी हमने शिव के परिवार को ‘परिवार’ की दृष्टि से हृदय में उतारा?

मैं जब शिव परिवार को देखती हूं तो आंखें भर आती हैं। कैसा अद्भुत परिवार है हमारा भोलेनाथ का! माँ पार्वती का वाहन शेर और बाबा का नंदी। शेर का भोजन वृषभ है, फिर भी दोनों में बैर नहीं। कार्तिकेय का मोर और बाबा के गले का सर्प — जन्मजात शत्रु, पर एक ही आंगन में खेलते हैं। गणेश जी का मूषक, जो सर्प का आहार है, फिर भी निर्भय होकर दादा के पास बैठा है।

बहनों, यह कोई कहानी नहीं, हमारे घर का आईना है। आज हमारे घरों में भी तो यही हो रहा है न? बेटे की सोच अलग, बेटी के सपने अलग, सास-बहू की पसंद अलग, पति-पत्नी के विचार अलग। हम इसे ‘जनरेशन गैप’ कहकर मन में दीवार खड़ी कर लेते हैं। पर शिव परिवार कहता है — मतभेद होना प्रकृति है, मनभेद होना विकृति है।

मैं एक मां हूं, एक बेटी हूं, एक पत्नी हूं। मैं जानती हूं कि जब घर में मनभेद हो जाता है तो सबसे पहले स्त्री का ही आंचल भीगता है। इसलिए आज मैं हाथ जोड़कर अपने युवाओं से, अपनी बहनों से, अपने भाइयों से कहना चाहती हूं — दृष्टि बदलिए।

दृष्टि ही सृष्टि बदलती है।
किसी भी घटना को देखने की दो नजरें होती हैं। एक नजर सिर्फ पूजा देखती है, दूसरी नजर पूजा के पीछे की प्रेरणा देखती है। जो दृष्टि समाज में प्रेम का ‘स्वाद’ घोल दे, जो टूटे दिलों को जोड़ दे, वही दृष्टि आज ‘हिट’ है, वही शिव की असली आराधना है।

जब हम शिव परिवार को समझ लेंगे तो पाएंगे कि विरोध में भी एकता संभव है। बेटा देर रात तक लैपटॉप पर काम करे तो उसे ‘बिगड़ा’ मत कहिए, बेटी जींस पहने तो उसे ‘संस्कारहीन’ मत समझिए। संवाद रखिए, क्योंकि जहां संवाद है वहां समाधान है।

इस श्रावण मैं नीरजा फाउंडेशन की ओर से आप सबसे केवल एक प्रार्थना करती हूं — मंदिर में जल चढ़ाने के साथ-साथ अपने घर में ‘स्वीकृति का जल’ भी चढ़ाइए। एक-दूसरे की भिन्नता को स्वीकार कीजिए। याद रखिए, जिस घर में प्रेम का दीप जलता है, वही असली शिवालय है।

जब परिवार जुड़ेगा, तभी समाज सुधरेगा।
और जब समाज सुधरेगा, तभी देश का विकास सधेगा।

आइए, इस सावन हम संकल्प लें — “विचार अनेक, परिवार एक।”

आपकी अपनी,
सीमा पाराशर
सचिव, नीरजा फाउंडेशन, अजमेर

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हर हर महादेव

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