Neerja foundation trust Ajmer

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10/01/2026

अब सहनशीलता नहीं, निर्णायक राष्ट्रनीति चाहिए
आज जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल यह पूछते हैं कि “कब तक हम अपने अपमान को सहन करते रहेंगे”, तो यह केवल एक व्यक्ति का कथन नहीं, बल्कि हिंदू समाज और भारतीय राष्ट्र की दबी हुई चेतावनी है। यह चेतावनी उन शक्तियों के लिए है जिन्होंने दशकों से भारत की सहनशीलता को कायरता समझ लिया।
सवाल सीधा है—
क्या भारत केवल हमलों की गिनती करता रहेगा, या अब जवाबी नीति बनाएगा?
हिंदुओं पर हमले और सेकुलर मौन
मंदिरों पर हमले हों, हिंदू यात्राओं पर पथराव हो, साधुओं की हत्या हो या आस्था का सार्वजनिक अपमान—हर बार एक ही दृश्य दिखता है:
अपराधी को “भटका हुआ युवा” कहा जाता है
पीड़ित हिंदू से “संयम” की अपील होती है
और सत्ता में बैठे लोग “स्थिति नियंत्रण में है” का रटा-रटाया बयान देते हैं
यह सेकुलरिज़्म नहीं, चयनात्मक चुप्पी है।
डोभाल सिद्धांत: हमला हुआ तो जवाब तय
अजित डोभाल का पूरा सुरक्षा सिद्धांत यही रहा है—
यदि आप मुझ पर हमला करेंगे, तो मुझे केवल बचाव नहीं, आपको नुकसान पहुँचाने का अधिकार है।
यही नीति सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक में दिखी। यही नीति अब आंतरिक सुरक्षा में भी लागू होनी चाहिए।
जो समाज अपने मंदिर, साधु और श्रद्धालु की रक्षा नहीं कर सकता, वह राष्ट्र कहलाने का नैतिक अधिकार खो देता है।
शास्त्र स्पष्ट हैं—कायर शांति अधर्म है
जो लोग हर निर्णायक कदम को “हिंसा” कहकर बदनाम करते हैं, वे शास्त्र नहीं पढ़ते।
भगवद्गीता स्पष्ट कहती है:
“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ”
(हे अर्जुन, कायरता मत अपनाओ)
महाभारत में भीष्म, द्रोण, कृष्ण—सबने कहा:
अधर्म के विरुद्ध निष्क्रिय रहना भी अधर्म है।
हिंदू धर्म कभी भी अन्याय सहने का उपदेश नहीं देता—वह धर्म की रक्षा के लिए शक्ति की बात करता है।
राजनीति की सबसे बड़ी विफलता
आज की राजनीति की सबसे बड़ी विफलता यह है कि:
हिंदुओं को केवल मतदाता समझा गया
उनकी आस्था को समझौते की वस्तु बना दिया गया
और उनकी सुरक्षा को वोट बैंक के नीचे दबा दिया गया
अब यह गणित बदल रहा है।
अब सवाल वोट का नहीं, अस्तित्व और सम्मान का है।
अब संदेश स्पष्ट होना चाहिए
अब राज्य और समाज—दोनों को साफ संदेश देना होगा:
मंदिर पर हमला = राष्ट्र पर हमला
आस्था का अपमान = कानून के तहत कठोर दंड
बार-बार अपराध = शून्य सहनशीलता
यह बदला नहीं, न्याय आधारित प्रतिरोध है।
यह अराजकता नहीं, राज्य की संप्रभु शक्ति का प्रयोग है।
निष्कर्ष: जो तैयार नहीं, वह सुरक्षित नहीं
अजित डोभाल का कथन डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है।
जो समाज तैयार नहीं रहता, उसका इतिहास दूसरे लिखते हैं।
अब समय आ गया है कि हिंदू समाज और भारतीय राज्य—दोनों यह स्पष्ट करें: अपमान की एक सीमा होती है।
और उस सीमा के बाद राष्ट्र बोलता है—कर्म में।

03/01/2026
24/12/2025

संतान नहीं परियोजना—हिंदू माता-पिता को अपनी सोच की दिशा बदलनी होगी
आज के समय में हिंदू समाज के समक्ष एक अत्यंत गंभीर और आत्ममंथन का विषय है—हम अपने बच्चों को संतान मान रहे हैं या अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं की परियोजना बना रहे हैं। माता-पिता का दायित्व केवल जन्म देना और पालन-पोषण करना नहीं, बल्कि संतान को उसके स्वभाव, रुचि, क्षमता और मानसिक बनावट के अनुरूप जीवन पथ पर आगे बढ़ने में मार्गदर्शन देना है। दुर्भाग्यवश, आज यह दायित्व दबाव, तुलना और अपेक्षाओं के बोझ तले दबता जा रहा है।
हर बच्चा एक स्वतंत्र चेतना के साथ जन्म लेता है। उसकी सोचने की क्षमता, उसकी शारीरिक-मानसिक बनावट, उसकी रुचियाँ और उसकी प्रतिभा—सब अलग-अलग होती हैं। कोई पढ़ाई में प्रखर होता है, कोई कला में, कोई खेल में, कोई तकनीक में तो कोई सेवा और अध्यात्म की ओर उन्मुख होता है। परंतु आज का अभिभावक वर्ग अक्सर यह भूल जाता है कि सभी बच्चों के लिए एक ही साँचा नहीं हो सकता।
डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, या किसी तथाकथित “सफल” आदर्श को पाने का अनावश्यक दबाव बच्चों के मन पर गहरा आघात करता है। यह दबाव न केवल उनकी रचनात्मकता को कुचलता है, बल्कि आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और निर्णय-क्षमता को भी कमजोर करता है। परिणामस्वरूप हम ऐसे युवा तैयार कर रहे हैं जो डिग्रियों से तो लैस हैं, पर आत्मिक संतोष, स्पष्ट लक्ष्य और जीवन-दृष्टि से वंचित हैं।
हिंदू दर्शन सदैव स्वधर्म की बात करता है—अर्थात व्यक्ति का अपना स्वभाव, अपनी प्रकृति और अपनी योग्यता के अनुसार कर्म। भगवद्गीता स्पष्ट कहती है कि परधर्म का आचरण भयावह होता है, जबकि स्वधर्म में स्थिर रहना कल्याणकारी। यही सिद्धांत संतान के पालन-पोषण पर भी लागू होता है। माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों की रुचि को पहचानें, उनकी क्षमता को समझें और उसी दिशा में शिक्षा व मार्गदर्शन दें।
आदर्श माता-पिता वही हैं जो आदेश नहीं, संवाद करें; दबाव नहीं, दिशा दें; और तुलना नहीं, प्रोत्साहन करें। बच्चों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि उनका मूल्य केवल अंकों, पदों या पैकेज से नहीं, बल्कि उनके चरित्र, कौशल और समाज के प्रति योगदान से तय होता है।
आज आवश्यकता है कि हिंदू समाज अपने पारिवारिक संस्कारों की पुनर्समीक्षा करे। संतान को प्रतिस्पर्धा का ईंधन नहीं, बल्कि संस्कार, आत्मबल और आत्मनिर्भरता का आधार बनाए। जब हम बच्चों को उनके स्वभाव के अनुरूप आगे बढ़ने देंगे, तभी वे सशक्त, संतुलित और राष्ट्र के लिए उपयोगी नागरिक बन पाएँगे।
संतान को दिशा दीजिए, दबाव नहीं—यही समय की पुकार है, यही सच्चा अभिभावक धर्म।
Gen z Rajasthan
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