18/06/2026
आदर्श व्यक्तित्व संत शिरोमणि राजऋषि पीपाजी महाराज (गागरोण नरेश प्रतापराव चौहान से लोकदेवता पीपाजी बनने तक की एक धर्मयात्रा)
© आलेख- दयालसिंह चौहान- सिलारी
राजस्थान की धरती के लिए कहा जाता है - संत, सती और सूरमा, इण धरती उपजंत। लेकिन युगों बाद ऐसा घटित होता है, जब कोई सूरमा यकायक संत हो जाए। ऐसे ही राजस्थान में मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख राजऋषि संत शिरोमणि पीपाजी महाराज हुऐ, जो गढ़ गागरोण के सूर्यवंशी क्षत्रिय चक्रवर्ती चाहमान राजवंश की खीची शाखा से थे। इनका जन्म वि.सं. 1380 चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हुआ। इनकी माता का नाम लक्ष्मीवती व पिता का नाम महाराज कड़वाराव था। पीपाजी का असली नाम प्रतापसिंह था। ख्यातों के अनुसार गागरोण पर पहले डोड परमार राजपूतों का शासन था। बाद में 12 वी शताब्दी में गूंदलराव खीची (चौहान) ने जायल (नागौर) से आकर अजमेर के महाराज पृथ्वीराज द्वितीय के शासनकाल में कालीसिंध नदी पर बने प्राचीन गागरोण क्षेत्र के डोडों के बारह गढ़ों पर उनको परास्त कर अपना शासन स्थापित कर लिया। इसी खीची शाखा में देवणसी हुए, जिन्होंने बीजलदेव डोड को परास्त कर फिर से इस क्षेत्र पर अधिकार जमाया। पहले इस जल दुर्ग को डोडगढ़ या धूलरगढ़ नाम से भी जाना जाता था, पर देवणसी ने अपनी बहन गंगा के नाम से गढ़ बनाकर उसका नाम गढ़ गागरोण रखा। गागरोण नाम प्रचलित होने के पीछे एक किवदन्ती यह भी है कि श्रीकृष्ण के कुलगुरु महर्षि गर्ग की तपस्थली होने से इसका नाम गागरोण पड़ा। यह दुर्ग युनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल है। पीपाजी देवणसी खीची की 11वीं पीढ़ी में यहाँ के शासक हुए। पिता के देहांत के बाद वि.सं. 1400 में पीपाजी का गागरोण के राजा के रूप में राज्याभिषेक हुआ।
राव पीपाजी ने अपने राज्यकाल में कई युद्धों का सामना किया। टोडा युद्ध इन्होंने अपने ससुर डूंगरसी सोलंकी की सहायतार्थ लड़ा था। फिरोजशाह तुगलक़ के समय उसकी सेना ने मालवा जाते समय गढ़ गागरोण का घेरा भी डाला था, पर वह पराजित हुआ। अपने अल्प राज्यकाल में पीपाजी द्वारा फिरोजशाह तुगलक, मलिक जर्दफिरोज व लल्लन पठान जैसे योद्धाओं को पराजित कर अपनी वीरता का लोहा मनवाया। वे गागरोण राज्य के वीर साहसी एवं प्रजापालक शासक थे। पीपाजी के ये युद्ध उनकी वीर-वृति के सूचक हैं, पर अचानक एक घटना ने उन्हें सांसारिकता से विलग कर दिया। लोकाख्यानों के अनुसार पीपाजी शिकार के शौक़ीन थे और अक्सर शिकार करने जाते थे। एक दिन उनके सामने से एक हिरणी निकली, जिस पर पीपाजी ने तलवार से वार किया। हिरणी के दो टुकड़े हो गये। गर्भवती हिरणी के साथ ही उसका बच्चा भी कट गया। बस वही उनके जीवन परिवर्तन का क्षण सिद्ध हुआ। वे करुणा के आलोक से जगमगा उठे। युद्ध में रक्त की धारा बहा देने वाला वीरवर योद्धा, एक रूदन से परास्त हुआ। उन्होंने युद्धघोष छोड़, धर्मघोष की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने रक्तरंजित तलवार त्याग दी और वैराग्यवृति धारण कर ली। राजपाट उन्हें बौने और व्यर्थ लगने लगे। वे फिर राजधानी लौटे ही नहीं, वहीँ कुटिया बनाकर रहने लगे और भक्ति में लीन हो गए। ऐसी मान्यता है कि वे अपनी कुलदेवी से नित्य प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया करते थे। दैवीय प्रेरणा से पीपाजी गुरु की तलाश में काशी के संतश्रेष्ठ जगतगुरु रामानन्दाचार्य जी की शरण में गए तथा गुरु आदेश पर कुएं में कूदने को तैयार हो गए। रामानन्दाचार्यजी पीपाजी से बहुत प्रभावित हुए व उनको गागरोण जाकर प्रजा सेवा करते हुए भक्ति करने व राजसी संत जीवन व्यतित करने का आदेश दिया। एक वर्ष पश्चात रामानन्दाचार्य जी अपनी शिष्य मंडली के साथ गागरोण पधारे व पीपाजी को वि.सं. 1417 आसाढ शुक्ल पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) को दीक्षा देकर वैष्णव धर्म के प्रचार के लिये नियुक्त किया। रामानन्दाचार्यजी के 12 शिष्यों में पीपाजी भी एक बने। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जहां रामानन्दाचार्यजी के अन्य शिष्य पिछड़े व दलित समुदाय से थे, वही पीपाजी ही एकमात्र क्षत्रिय समुदाय से शिष्य थे। पीपाजी अपना सारा राजपाठ अपने भतीजे कल्याणराव को सौंप कर गुरु आज्ञा से अपनी सबसे छोटी रानी सीताजी जो टोडा के सोलंकी वंश से थी के साथ वैष्णव धर्म प्रचार यात्रा पर निकल पडे। पीपाजी का संपूर्ण जीवन चमत्कारों से भरा हुआ था। राजकाल में देवीय साक्षात्कार करने का चमत्कार प्रमुख है। उसके बाद सन्यास काल में स्वर्ण द्वारिका में 7 दिनों का प्रवास, पीपावाव में रणछोडरायजी की प्रतिमाओं को निकालना व अकालग्रस्त क्षेत्र में अन्नक्षेत्र चलाना, सिंह को अहिंसा का उपदेश देना, लाठियों को हरे बांस में बदलना, एक ही समय में पांच विभिन्न स्थानों पर उपस्थित होना, मृत तेली को जीवनदान देना, सीताजी का सिंहनी के रूप में आना आदि कई चमत्कार जनश्रुतियों व लोकाख्यानों में प्रचलित हैं। सीताजी का टोडा रायसिंह नगर में 1433 वैशाख सुदी पूर्णिमा को स्वर्गवास हो गया। इनकी छतरी बुध सागर पर टोडा में स्थित है। पीपाजी ने "चिंतावानी जोग" नामक ग्रन्थ की रचना की। पीपाजी महाराज सीताजी के स्वर्गवास होने के पश्चात 1434 में चैत्र सुदी 1 को पुनः अपने नगर गागरोण पहुंचे। नगर के समीप बहने वाली कालीसिंध और आहू नदी के पवित्र संगम के पास गुफा बनाकर रहने लगे। अंततः विक्रम संवत 1441 की चैत्र शुक्ल नवमी को सभी भक्त मंडली को पूर्व सूचना देकर संत पीपाजी ओंकार की रट लगाते हुएं अपने प्राणों को ब्रह्मांड में सदा के लिए समाधिस्थ हो गए।
गुरु नानकदेवजी ने पीपाजी के पोते अनंतदासजी के पास से पीपाजी की रचना टोडा नगर में ही प्राप्त की थी। इस बात का प्रमाण अनंतदास द्वारा लिखित 'परचई' के पच्चीसवें प्रसंग से भी मिलता है। इस रचना को बाद में गुरु अर्जुनदेवजी ने 'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल की थी। बाड़मेर के समदड़ी कस्बे में पीपाजी का विशाल मंदिर है जहाँ हर वर्ष मेला भरता है। गागरोण और मसुरिया (जोधपुर) में भी पीपाजी का मेला भरता हैं। गढ़ गागरोण में पीपाजी का मंदिर, छतरी और बाग़ है। काशी में ‘पीपाकूप’, द्वारिका के पास आरमाड़ा में ‘पीपावट’, अमरोली (गुजरात) में ‘पीपाबाव’ है। कालीसिंध और आहड़ नदियों के संगम पर एक पीपाजी का गुफामन्दिर भी स्थित है। गागरोण गढ़ में 2 शाके हुए, पहला शाका 1423 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान अलपखां गौरी (होशंगशाह) ने आक्रमण किया। गागरोण के शासक वीर अचलदास खींची ने अलप खां से युद्ध लड़ा व दुर्ग में जौहर हुआ। दूसरा शाका 1444 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने आक्रमण किया। इस समय गागरोण के शासक पल्हणसी खीची थे। वीरांगनाओं ने जौहर व वीरों ने केसरिया किया। राजस्थान की धरती पर सर्वाधिक 6 साके चाहमान वंश ने ही किये हैं। महमूद खिलजी ने गागरोण का नाम मुस्तफाबाद रख दिया था, लेकिन आज भी यह दुर्ग गागरोण नाम से ही जाना जाता है।
समाज सुधार की दृष्टि से संत पीपाजी ने निर्गुण भक्ति परम्परा का सूत्रपात किया था। बाहरी आडम्बरों, कर्मकांडो एवं रूढ़ियों की कड़ी आलोचना की तथा बताया कि ईश्वर निर्गुण व निराकार है तथा सर्वत्र व्याप्त है और करुणा उनके संदेशों का सार है। संत पीपाजी ने अपने विचारों और कृतित्व से समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। पीपाजी ने भारत में चली आ रही वर्ण व्यवस्था में नवीन वर्ग, श्रमिक वर्ग सृजित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पीपाजी के धर्मोपदेश के बाद 52 राजपूत जागीरदार/रिश्तेदार जो 36 क्षत्रिय वंश के राजा थे उन्होंने धर्म संगत शिक्षा ग्रहण की व उनके अनुयायी बने थे। उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी उन्हीं के वंशज मानने की शपथ ली। आगे चलकर इन्हीं 52 राजपूत राजाओ का क्षत्रिय समुदाय बना जो पीपावत/पीपावंशीय राजपूत कहलाये। इनके अलावा भी कई जाति धर्म के लोग संत पीपाजी को अपना आराध्य मानते हैं।
लोक भजन की यह पंक्ति पीपाजी महाराज पर सटीक बैठती है- पांच ने मार, पच्चीस वश कर ले, जद जाणूं थारी रजपूती। अर्थात् पांच इन्द्रियों का क्षमन कर, तत्संबंधी पच्चीस प्रवृत्तियों को वश कर ले, वह सच्चा क्षत्रिय है।
संत पीपाजी ने सिद्ध किया कि क्षत्रिय यदि युद्धभूमि में शत्रुओं का संहार कर सकता है, तो संन्यास मार्ग पर चलते हुए अपने मन की दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन भी। चक्रवर्ती चाहमान वंश की खीची शाखा में जन्में ऐसे महान राजऋषि संत पीपाजी महाराज ऊर्फ प्रतापसिंहजी को मेरा बारम्बार नमन।
ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
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