23/02/2025
साँचौर (सत्यपुर) के प्रतापी चौहान शासक राव बलभद्र चौहान के संबंध में आज मेरा आलेख मरुधरा न्यूज में प्रकाशित किया गया। 🏹🚩🌞
नाडोल के महाराव आल्हण के पुत्र विजयसिंहजी ने 1184 ई फाल्गुन बदी 11 को सत्यपुर या साँचौर का क्षेत्र विजयराज दहिया से जीता था, इसके बाद से साँचौर पर साँचौरा (सोनगरा) चौहानों का अधिकार रहा और ये उनकी रियासत रही। साँचौर को प्राकृत ग्रंथों में 'सच्चउर' कहा गया है। राव बलभद्र चौहान (बल्लू जी) मेरे और सांचौरी क्षेत्र के समस्त चौहानो के यशस्वी पूर्वज राव सावंतसिंहजी चौहान के पुत्र थे। सावंतसिंहजी राव मेहकरण जी के पुत्र थे। मारवाड़ के लगभग जितने भी साँचौरा चौहानों के ठिकाने है वह सब राव मेहकरण जी के ही वंशज है, कुछ ठिकाने भेरूदास जी के वंशजों के भी है। लेकिन राव मेहकरण जी के पुत्र "राव सांवतसिंहजी" ने मारवाड़ में ठिकाना लेना मंजूर नहीं किया और संघर्ष करते रहे तथा राव साँवतसिंह ने 1625 ई में अपने नाम से "साँवतसर" (किशनगढ़ के पास) नगर की स्थापना की तथा वहां गढ़ बनवाया तथा 1645 ई में शाहजहां से 52 गांवों की जागीर प्राप्त की। राव बलभद्र चौहान (बल्लू जी) राव सावंतसिंहजी चौहान के 5वे पुत्र थे जिन्होंने अपने बाहुबल व शौर्य से शाहजहां से अपने पूर्वजो के खोए हुए साँचौर राज्य को विक्रम संवत 1699 में पुनः प्राप्त किया। इस तरह अपने पूर्वजों की सांचौर रियासत को जीतकर पुनः तीसरी बार चौहानों का साँचौर पर राज स्थापित किया व साँचौरा चौहानों की रियासत साँचौर के परम प्रतापी शासक हुए। राव बल्लूजी ने अपनी प्रजा की भावना के अनुरूप आमजन हितार्थ शासन प्रदान किया। अपनी पुत्री का विवाह किशनगढ़ रियासत के 5वे राजा रूपसिंह के साथ किया तथा उनके पुत्र राजा मानसिंह इनके दोहिते थे। इनके पास 7 सदी जात व 400 असवार की सेना थी यानी 700 पैदल सैनिक व 400 घुड़सवार की सेना थी। अराजकता के उस दौर में राव बल्लूजी ने आमजन को सुरक्षा और सुशासन देकर साँचौरी क्षेत्र के काफी उजड़े गांवों को पुनः बसाया, साँचौर में मंदिर बनवाए तथा साँचौर शहर में पेयजल की सुदृढ़ व्यवस्था भी करवाई। साँचौर का ऐतिहासिक तीर्थ स्थल "श्री धनकेश्वर महादेव मठ" में लगे शिलालेख के अनुसार विक्रम संवत 1710 को धन तेरस के दिन इस मठ की स्थापना श्री जैतपुरी महाराज द्वारा की गई थी तथा साँचौर के शासक राव बल्लूजी चौहान ने 84 गांव का कटला व एक बिलौने का घी इस मठ के ताम्रपत्र में दिया। राव बल्लू धर्मत के युद्ध में भी शामिल थे। नागौर, शाकंभरी, अजयमेरू, दिल्ली, नाडोल, जालौर, कोटा, बूंदी, सिरोही, साँचौर व सांवतसर पर राज स्थापित करने वाले अपने सूर्यवंश के देदीप्यमान चक्रवर्ती चौहान राजवंश के अपने महान पूर्वजों की तरह राव बल्लू जी ने भी अपने वंश की कीर्ति को और उज्ज्वल किया, जो आज भी कायम है। विक्रम संवत 1717 में साँचौर के इन महान शासक बल्लूजी चौहान की मृत्यु हुई। बल्लू जी के तीन पुत्र वेणीदास, नरहरदासजी और सहसमलजी हुए, जिनके वंशजों ने बड़े बड़े ठिकाने साँचौरी में स्थापित किए। राव बल्लू के ज्येष्ठ पुत्र वेणीदास के पुत्र सगतसिंह पठानों से लड़ते साँचौर में काम आए जिनकी देवली बल्लू जी के साथ ही स्थापित है। राव बल्लू के द्वितीय पुत्र नरहरदासजी धर्मत के बाद धौलपुर के नजदीक चौमू गढ़ के युद्ध में दाराशिकोह के पक्ष में लड़ते हुए अपने बहनोई राजा रूपसिंह किशनगढ़ के साथ काम आए थे, उनकी कुँवरानी बघेली जी ने अपने पीहर दियोदर में अग्नि प्रवेश कर सती हुई। कनिष्ठ पुत्र सहसमलजी की पुत्री का विवाह मारवाड़ के महाराज अजीत सिंह जी से हुआ।
क्या चौहान वंश की साँचौरा और सोनगरा शाखा अलग अलग है?
उत्तर - साँचौरा=सोनगरा एक ही है। जालोर की स्वर्णगिरी पहाड़ी से चौहानों की शाखा जिसने साँचौर पर राज किया वो सोनगरा चौहान थी, फिर समय के साथ इसी शाखा के परिवार मारवाड़, बाड़मेर, बीकानेर, पाली, जयपुर व मालवा(मध्यप्रदेश) में जाकर बसे वो साँचौरा चौहान कहलाये। दरअसल जब राव राणा के हाथ से साँचौर का राज चला गया तब कई सोनगरा चौहानों ने मारवाड़ में आकर आपने शौर्य से कई जागीरियां स्थापित कर ली थी। तो मारवाड़ में उनको "साँचौर रा चौहान" कहने लगे गए, इसलिए धीरे धीरे "साँचौरा" शब्द चलन में आ गया। यानी सोनगरा और साँचौरा चौहान एक ही है, साँचौर में निवास करने वाले सोनगरा चौहान ही कहलाते है और जो उनके भाई बंद जिनके परिवार साँचौर से बाहर जाकर दूसरी जगह बस गए वो साँचौरा चौहान कहलाए (साँचौरा - साँचौर रा चौहान)। मारवाड़ में सांचौरा (सोनगरा) चौहानों के लगभग 71 बड़े ठिकाने रहे (कुल 202 गांव) - इन ठिकानेदारों ने भी खुद को "साँचौरा चौहान" शब्द अंगीकार कर लिया। लेकिन जिन साँचौरा चौहानों ने मारवाड़ रियासत की सेवा में रहना मंजूर नहीं किया, उन्होंने पुनः साँचौर रियासत प्राप्त की।
साँचौर के इन महान शासक राव बल्लू जी की स्मृति को चीर स्थायी रखने के लिए साँचौर शहर में कचहरी परिसर के सामने वाले चौराहे का नामकरण उनके नाम पर करके शासक राव बलभद्र चौहान की मूर्ति साँचौर कचहरी मुख्यालय के सामने स्थापित की गई हैं।
साँचौर पर शासन करने वाले चौहान शासकों की राजावली :
1) राव विजयसिंह (1184 ई फाल्गुन बदी ग्यारस को विजयराज दहिया से साँचौर जीतकर राज्य पर अधिकार किया)
2) राव पदमसिंह,
3) राव शोभित,
4) राव साल्हा - 1311 ई जालोर युद्ध के प्रधान सेनापति, युद्ध में वीरगति प्राप्त की साँचौर खोया,
5) राव हापा
6) राव विक्रमसिंह(भाई के गोद),
7) राव संग्रामसिंह,
8) राव प्रतापसिंह,
9) राव वरजांग - 72 युद्धों के योद्धा, 1421 ई में साँचौर का राज्य खोया,
10) राव जयसिंहदेव - 1434 ई में साँचौर पुनः जीता,
11) राव तेजसिंह(भाई गोद),
12) राव शोभा (भाई का पुत्र गद्दी पर),
13) राव जगमाल (जैसींगदेव का पुत्र गोद),
14) राव पीथम राव (जगमाल को हटा कर तेजसिंह का पुत्र गद्दी पर),
15) राव बाघा,
16) राव नींबा,
17) राव राणा - साँचौर का राज खोया,
18) राव महकरण
19) राव साँवंतसिंह - अपने नाम से 1625 ई में सांवतसर नगर बसाया किशनगढ़ के पास में,
20) राव बलभद्र (बल्लू जी) - 1642 ई पुनः साँचौर का राज्य प्राप्त किया।
ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
जय मां आशापुरा 🚩🙏
© आलेख - दयालसिंह चौहान - सिलारी