Rajkumar Rajput'S Of India

Rajkumar Rajput'S Of India सूर्यवंशी ~चौहान राजपूत

बून्दी के 785वें स्थापना दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएंबून्दी नगर तथा हाड़ौती राज्य के संस्थापक "राव देवराज...
24/06/2026

बून्दी के 785वें स्थापना दिवस पर आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं
बून्दी नगर तथा हाड़ौती राज्य के संस्थापक "राव देवराज हाड़ा" को कोटि-कोटि नमन

इतिहास-
बम्बावदा ठिकाने के शासक राव देवराज हाड़ा ने विक्रम संवत 1298 आषाढ़ कृष्ण नवमी,मंगलवार (24 जून 1241) को बन्धु घाटी में जैता मीणा को पराजित कर बून्दी की स्थापना की थी।
राव देवराज हाडा की पुत्री के विवाह में जोगणिया माता, जोगण का वेश धारण कर पधारी थी अतः वे जोगणिया माता के नाम से प्रसिद्ध हुई। जोगणिया माता के आदेशानुसार राव देवराज हाडा ने बंधु घाटी के क्षेत्र को जीतकर बून्दी की स्थापना की थी।

प्रसिद्ध इतिहासकार जेम्स टॉड, सूर्यमल्ल मिश्रण व जगदीश सिंह गहलोत के अनुसार बून्दी स्थापना से पूर्व यहाँ मीणा जनजाति का कबीला निवास करता था।जिसके सरदार जैता मीणा थे। इस स्थान के पहाड़ी क्षेत्र को बन्धु घाटी व वर्तमान बून्दी जहाँ बसी है उसे बन्धु का नाल कहा जाता था।

राणा कुम्भा के रणकपुर के अभिलेख में बून्दी के तत्कालीन नाम वृंदावती का उल्लेख है।

राव देवराज हाडा द्वारा उमरथूना में महल, बावड़ी और हिंगलाज माता के मंदिर का निर्माण करवाया तथा उमरथूना के समीप वर्तमान भवानीपुरा में बांगा माता के मंदिर व बावड़ी का निर्माण करवाया गया।

स्थापना-
किसी शहर की स्थापना का अर्थ है वहाँ प्रशासन कायम करना तथा उस भूभाग की सुरक्षा के दायित्व का निर्वहन करना।किसी शहर को स्थापित करते समय वहाँ सभी जाति-वर्गों के लोगों को वहाँ लाकर बसाया जाता था जैसे ब्राह्मण,वैश्य,सैनी,धोबी,हरिजन आदि सभी समाज।उस समय सभी लोग नए भूभाग में तभी रह सकते थे जब उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए।

राव देवराज हाडा द्वारा बून्दी शहर एवं रियासत की स्थापना के बाद उनके सभी हाड़ा वंशजो ने कठिन परिश्रम से बन्धु नाल के भयानक जंगल को काटकर इस शहर में लगातार सुधार किया, नाल में तालाब गाँव के पहाड़ को काटकर भरती भरवाई गयी व नाळ के प्रवाह को रोककर नवलसागर झील का निर्माण भी करवाया गया।इसके पश्चात अधिकाधिक लोगों को यहाँ बसाया गया इस प्रकार बून्दी शहर की स्थापना हुई।

तारागढ़ व गढ़ पैलेस-
सन 1354 में राव बर सिंह हाड़ा ने बढ़ते बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा हेतु पहाड़ी पर तारागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।

16वीं शताब्दी के बाद तारागढ़ किले के नीचे तलहटी में भव्य महलों का निर्माण करवाया गया, जो समस्त राजस्थान में राजपूत स्थापत्यकला का अनूठा उदाहरण है।

जग जाणी रे शूरमा,मुच्छा तणी आन।
रमणी रमता रम रमी,झुक्या न हाडा चौहान।।

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श्री सुंधा माता मंदिर व जालोर का सोनगरा राजवंशश्री सुंधा माता मंदिर, राजस्थान के जालौर जिले में सुंधा पहाड़ी की चोटी पर ...
23/06/2026

श्री सुंधा माता मंदिर व जालोर का सोनगरा राजवंश

श्री सुंधा माता मंदिर, राजस्थान के जालौर जिले में सुंधा पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। जसवंतपुरा के पहाड़ों को सुन्धा पहाड़ कहा जाता हैं। देवी चामुंडा का यह मंदिर लगभग 900 साल पुराना है व अरावली पर्वतमाला में 1220 मीटर की ऊंचाई पर मंदिर स्थित है। सुंधा पर्वत की रमणीक एवं सुरम्य घाटी में सागी नदी से लगभग 40-45 फीट ऊंची एक प्राचीन सुरंग से जुड़ी गुफा में अघटेश्वरी चामुंडा का यह पुनीत धाम युगों-युगों से सुशोभित माना जाता है।
ज्ञात इतिहास के अनुसार चक्रवर्ती चाहमान वंश की जालौर की सोनगरा शाखा के प्रतापी शासक चाचिंगदेव चौहान ने सुन्धा पर्वत पर चामुण्डा माता का मन्दिर व मंडप बनवाया था। जन जन की आस्था का केंद्र सुंधा पर्वत पर एक गुफानुमा गर्भग्रह में माँ चामुंडा के सिर की पूजा होती हैं। गुफा के अंदर माता की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है, जो महिषासुर मर्दिनी के रूप में प्रसिद्ध हैं। देवी की यह प्रतिमा बहुत ही सजीव लगती है, जिसमें माता के हाथ में खड्ग और त्रिशूल धारण किए हुए हैं। चामुण्डा माता की प्रतिमा के पास एक शिवलिंग भुर्भुवः स्ववेश्वर (भूरेश्वर) महादेव स्थापित हैं। इस प्रकार सुंधा पर्वत के अंचल में यहाँ शिव और शक्ति दोनों एक साथ प्रतिष्ठित है। मान्यता है कि त्रिपुर राक्षस का वध करने के लिए आदिदेव महादेव ने सुंधा पर्वत पर ही तप किया था। गुफानुमा कक्ष में दक्षिण दिशा वाली दीवार के पूर्वी कोने में एक विवर मुख (भोयरें का मुंह) है, जो एक लम्बी सुरंग है व पूर्व दिशा में काफी दूर तक है। सर्प और अन्य जीवों के भय के कारण इसे बन्द कर दिया गया। यह सुरंग कहां तक जाती है, इस सम्बन्ध में प्रमाणिक रुप से तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन किंवदंती है की यह सुरंग आबू पर्वत तक जाती है। मंदिर के गुंबद पर स्वर्ण कलश सुशोभित है। जिसके चारों ओर पंक्तिबद्ध करीब 180 कलश है।

सुंधा माता के अवतरण की कथा: सुंधा माता से जुड़ी एक जनश्रुति है जो इस स्थान की महत्ता को और बढ़ाती है। इस कथा के अनुसार, एक बार बकासुर नामक राक्षस ने धरती पर अत्याचार मचाया हुआ था। उसका वध करने के लिए चामुंडा माता अपनी सात शक्तियों (सप्त मातृकाओं) समेत यहां पर अवतरित हुईं और बकासुर का वध किया। सात शक्तियों की मूर्तियां चामुंडा (सुंधा माता) के पार्श्व में प्रतिष्ठित हैं। ये शक्तियां ऐन्द्री, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ब्रह्माणी और शाम्भवी के रूप में जानी जाती हैं।

शिलालेखों में इतिहास: मंदिर परिसर में ऐतिहासिक महत्व के कई शिलालेख भी स्थापित है, जो इस क्षेत्र के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। सन् 1205 ई के लेख में चाहमान वंश को वत्स गोत्री व सूर्यवंशी होना लिखा हैं। जालौर के चौहान शासक चाचिंगदेव के शासनकाल (1257-1277 ई) में वि.सं.1319 (1262 ई) का शिलालेख जो प्रशस्ति के रूप में दो पत्थरों पर खुदा हुआ है। अक्षर नागरी हैं और भाषा संस्कृत है तथा दोनों पत्थरों पर छंदों की कुल संख्या 59 हैं जिस पर नाडोल व जालौर के चाहमान राजवंश की वंशावली एवं उनकी विजयों का प्रशंसात्मक विवरण दिया गया है। इसमें चाचिंगदेव का महिमामंडन भी किया गया है। चाचिंगदेव के सुन्धा पर्वत शिलालेख वैशाख मास विक्रम संवत् 1262 ई. से हमें यह प्रामाणिक जानकारी मिलती हैं की अक्षय तृतीया के दिन विधि-विधान से मां चामुंडा की प्रतिष्ठा इस मंदिर में करवाई गई थी व मंडप का निर्माण चाचिंगदेव द्वारा करवाया गया था। जिससे स्पष्ट होता है कि इस सुगंधगिरी अथवा सौगन्धिक पर्वत पर पहले से ही माँ चामुंडा विराजमान थी तथा चामुंडा "अघटेश्वरी" नाम से लोक प्रसिद्ध व पूजी जाती थी। सुंधामाता को अघटेश्वरी कहा जाता है जिसका अभिप्राय है- "वह घट (धड़) रहित देवी, जिसका केवल सिर ही पूजा जाता है।" ख्यात में मन्दिर निर्माण का समय विक्रम संवत् 1312 या 1255 ई लिखा हैं, लेकिन इस समय जालोर के शासक उदयसिंहजी थे। अतः हो सकता हैं कि चाचिंगदेव ने युवराज रहते हुए ही देवी के इस मन्दिर का निर्माण करवाया हो।
सुन्धा माताजी के मन्दिर में लगे शिलालेख में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं :-
मरौ मेरोस्तुल्यस्त्रिदशललनाकेलि सदृशं
सुगन्धाद्रिर्ना नातरुनिकटसन्नाहसुभगः।
तन्मूर्घ्नि त्रिदशेन्द्रपूजितपदाम्भोजद्वयां देवतां।
चामुण्डामघटेश्वरीति विदितामभ्यर्चितां पूर्वजैः,
नत्वाऽभ्यर्च्य नरेश्वरोऽथ विदधेऽस्या मन्दिरे मण्डपम्॥
अर्थात् मरुभूमि में सुमेरु पर्वत के समान, देवाङ्गनाओं की क्रीडास्थली सुगन्धगिरि (सुन्धा पर्वत) हैं जो अनेक प्रकार के वृक्षों के समूह से रमणीय हैं। उस (सुन्धा पर्वत) के शिखर पर राजा (चाचिंगदेव) ने देवराज द्वारा पूजित चरण कमलों वाली, अघटेश्वरी नाम से विख्यात एवं अपने पूर्वजों द्वारा पूजित चामुण्डा की अर्चना करके इसके मन्दिर में मण्डप बनवाया। सुन्धा माताजी जालोर के चौहान राजवंश की आराध्य देवी हैं। यहां स्थापित शिलालेख में उन्हें चाचिंगदेव जी के पूर्वजों द्वारा "अभ्यर्चित" कहा गया हैं।
सुन्धा पर्वत शिलालेख के अनुसार चाचिंगदेव गुजरात के राजा वीरम को मारने वाले, शत्रु शल्य को नीचा दिखाने वाले तथा संग और पातुक को हराने वाले थे। इनमें वीरम गुजरात का कोई प्रतापी राजा था। धभोई के शिलालेख में शल्य नामक राजा का उल्लेख है। वंथली के शासक संग का भी उल्लेख हैं। अजमेर के संग्रहालय में रखे एक शिलालेख से ज्ञात होता हैं कि चाचिंगदेव जी की रानी का नाम लक्ष्मीदेवी और कन्या का नाम रूपादेवी था। अन्य शिलालेख 1326 और 1727 ई. के है जो इस क्षेत्र के बदलते राजनीतिक और धार्मिक परिदृश्य को उजागर करते हैं।
लोक मानस में एक दूहा प्रचलित है:-
सिर सुंधा धड़ कोरटा, पग सुंदरला री पाल।
आप माता चामुण्डा इसरी, गले फूलां री माल॥
अर्थात् सुंधा पर्वत पर माता के सिर की पूजा की जाती है, चामुंडा जी का धड़ कोटड़ा में तथा चरण सुंदरला पाल (जालोर) में पूजित है।

मंदिर की पौराणिक मान्यता: देवी भागवत व तंत्र चूड़ामणि में ऐसी कथा है और किंवदंती है कि सतयुग में एक समय दक्ष प्रजापति ने शिव से अपमानित होकर ब्राहस्पत्य नामक यज्ञ किया। जिसमें दक्ष ने अपने जवाई शिवजी और अपनी पुत्री सती को आमंत्रित नहीं किया। निमंत्रण न पाकर भी सती अपने पिता के यहां आ गई। घर आने पर भी दक्ष ने सती का सत्कार नहीं किया। अपितु क्रोध कर शिव की बुराई की। पति की निन्दा सती से सहन नहीं हुई और वे यज्ञ कुण्ड में कूद गई। इस पर शिव अपने वीरभद्र आदि अनुचरों के साथ वहां पहुंचे, यज्ञ में तांडव मचाकर विध्वंस किया। उन्मत्त अवस्था में शिवजी ने यज्ञ वेदी में जली हुई अपनी पत्नी सती की मृत देह को कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के टुकड़े-टुकड़े कर छिन्न-भिन्न कर दिया। उनके शरीर के अंग भिन्न-भिन्न स्थानों पर जहां जहां गिरे, वहां शक्ति पीठ स्थापित हुऐ। सुगन्धा नामक स्थान पर सती मां की नासिका गिरी। यही पौराणिक कथा संभवत: देवी के मात्र सिर पूजने की प्रथा का मूल कारण रही है। जिससे वे 'अघटेश्वरी' के नाम से यहां पूजी जाने लगी।

इस मंदिर की स्थापना करने वाले वीर यौद्धा चाचिंगदेव चहुँआण की एक संगमरमर की देवली सुंधा माता मंदिर परिसर में स्थापित हैं। इस देवली पर अश्वारोही ढाल और खड्गधारी यौद्धा की बहुत खूबसूरत मूर्ति उत्कीर्ण है। इस देवली पर चाचिंगदेव चौहान लिखा हुआ है। देवी की पूजा के बाद इस देवली पर जाकर श्रद्धालु इस मंदिर के संस्थापक चौहान वीरवर चाचिंगदेव की भी पूजा करते है। जनमानस में एक और प्रचलित लोक कथा अनुसार 1576 ई के हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ शासक राणा प्रताप को अपने कष्ट के दिनों में आबू क्षैत्र के तत्कालीन शासक अर्बुदाधीपति सुरत्राण देवड़ा ने अपने इलाके की विभिन्न जगहो पर ठहरा कर शरण दी जिसमें एक सुंधा पर्वत भी है। प्राचीन काल में इस मंदिर में पूजा नाथ योगियों द्वारा की जाती थी। सिरोही के देवड़ा चौहानों ने सोनाणी, देडोल और सुंधा की ढाणी गांवों की भूमि नाथ योगी रबादनाथ जी को दी थी, जो उस समय सुंधा माता मंदिर में पूजा करते थे। पर्वत चोटी पर स्थित मंदिर पर पहुंचने के लिए एक विशाल प्रवेश द्वार बना हुआ है, जहाँ से पहाड़ी पर चढ़ने के लिए पक्की सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। वर्तमान में आसानी के लिए 800 मीटर लंबे मार्ग वाला राजस्थान का प्रथम रोप-वे भी यहां संचालित है।

जालौर के सोनगरा वंश का इतिहास: ऋषि जाबाली के कारण जालौर का मूल नाम जाबालीपुर था। जालौर का किला सोनगिरि पहाड़ी पर स्थित है अतः जालौर का चौहान राजवंश के शासक सोनगरा चौहान कहलाये। 1173 ई. में कीर्तिपाल ने कुन्तपाल परमार को हराकर जालौर में चौहान राज्य की स्थापना की थी। कीर्तिपाल ने कायन्द्रा के युद्ध में भाग लिया था। सुन्धा अभिलेख में कीर्तिपाल को राजेश्वर कहा गया। कीर्तिपाल के पुत्र समरसिंह ने जालौर दुर्ग में परकोटा, शस्त्रागार तथा कोषागार का निर्माण करवाया। उनके पुत्र उदयसिंह ने 1228 ई में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश को हराया तथा मंडोर व नाडोल छीन लिए। उदयसिंह के पुत्र चाचिंगदेव के शासन काल में दिल्ली के दो सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तथा बलबन जालौर पर आक्रमण करने की साहस नहीं कर पाये थे। उनके पुत्र सामंतसिंह ने 1291 ई. में दिल्ली के शासक जलालुद्दीन खिलजी द्वारा जालौर व सांचौर क्षेत्र पर किए आक्रमण को विफल कर दिया। उनके पुत्र कान्हड़देव सोनगरा ने 1299 ई. के गुजरात आक्रमण के दौरान अलाउद्दीन खिलजी को जालौर से निकलने नहीं दिया व गुजरात आक्रमण से लौटते समय अलाउद्दीन खिलजी की सेना पर कान्हड़देव की सेना ने आक्रमण कर दिया तथा अलाउद्दीन खिलजी की सेना के द्वारा सोमनाथ मंदिर से ला रहे शिवलिंग के टुकड़े छीन लिए थे। उनके पुत्र रावल वीरमदेव ने अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा से विवाह करने से इंकार किया फलस्वरूप खिलजी ने 1311 ई. में जालौर पर आक्रमण कर दिया। 1311 ई. में कान्हड़देव सोनगरा तथा वीरमदेव के नेतृत्व में जालौर में साका किया गया था। राजस्थान की धरती पर सर्वाधिक 6 साके चाहमान वंश ने किए।

ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी

चौहानों का अजमेर से हाड़ोती में आगमन व अन्य क्षेत्रों में पलायन -तराइन के द्वितीय युद्ध में छल द्वारा मोहम्मद गौरी ने सम्...
23/06/2026

चौहानों का अजमेर से हाड़ोती में आगमन व अन्य क्षेत्रों में पलायन -

तराइन के द्वितीय युद्ध में छल द्वारा मोहम्मद गौरी ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय को पराजित कर दिया था।

500वर्षों से चौहानों से लड़ रहे विदेशी आक्रांताओ को यह स्पष्ट हो चूका था कि चौहानो के होते हुए भारत पर शासन नही किया जा सकता।
इसलिए उन्होंने चौहानो के समूल नाश का प्रण कर लिया।
इसके बाद चौहानो ने विपरीत परिस्थितियों से हार जाने के स्थान पर राजस्थान के अलग-अलग भागो में पलायन कर अपनी शक्ति को संचित किया तथा कालांतर में जालौर, सिरोही, हाड़ोती (बून्दी, कोटा), गागरोन, नाडोल, रणथम्भोर जैसी रियासतों का उदय हुआ।

इसी दौरान कुछ चौहान सिरदार उपरमाल/बम्बावदा में आए तथा चौहानो कि हाडा शाखा कि स्थापना की तथा राव देवराज हाडा ने सन 1241में वृंदावती, वर्तमान बून्दी में हाड़ोती राज्य की नीव रखी।

साम्भर में 551ई. में चौहान राजवंश की स्थापना से लेकर लगभग 1500 वर्षों तक चौहानो ने भारत भूमि की रक्षा की है।

712ई. से 1192 तक चौहानो ने विदेशी आक्रमणकारियो से भारत की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई।

उदाहरणस्वरूप -
गोविन्द तृतीय गजनी से लड़े,
दुर्लभराज -इब्राहिम से लड़े,
विग्रहराज-शहाबुद्दीन से लड़े,
पृथ्वीराज -बगुलीशाह से लड़े,
अजयराज -बहलिम से लड़े,
अर्णोराज -तुर्को से लड़े,
विग्रहराज -खुसरो मलिक से लड़े,
पृथ्वीराज द्वितीय -खुसरो मलिक से लड़े,
पृथ्वीराज तृतीय-मोहम्मद गौरी से लड़े।

हम्मीरदेव (1301) और कान्हड़देव चौहान (1311) -अलाउद्दीन खिलजी से लड़े,
गागरोन के अचलदास खींची -होशंगशाह से लड़े (1421),

रणथम्बोर के युद्ध में राव सुर्जन हाडा -अकबर से लड़े,

दत्ताणी के युद्ध में सुरताण देवड़ा(1583)- अकबर से लड़े।

इतनी गर्दने कटी है, चौहान क्षत्रिय वंश लड़ा है, तब ये धर्म और संस्कृति बची है।

इतिहास गवाह है चौहानो ने अपनी मातृभूमि, धर्म संस्कृति की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

चौहानो के शौर्य और साहस से प्रभावित होकर कवि ने कहा है -

जग जाणी रे शूरमा,मुच्छा तणी आन।
रमणी रमता रम रमी,झुक्या न चौहान।।

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🚩🚩राठ प्रदेश की चौहान🚩🚩    नीमराना के चौहान (राठ प्रदेश की चौहान शाखा) का इतिहास केवल किले तक सीमित नहीं था, बल्कि इनके ...
23/06/2026

🚩🚩राठ प्रदेश की चौहान🚩🚩

नीमराना के चौहान (राठ प्रदेश की चौहान शाखा) का इतिहास केवल किले तक सीमित नहीं था, बल्कि इनके कई गाँव, जमींदारियाँ और वीर परंपराएँ भी प्रसिद्ध रही हैं। लोक परंपरा और क्षेत्रीय इतिहास के आधार पर उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

1. नीमराना चौहानों के गाँव और जमींदारी

नीमराना ठिकाने के अधीन या प्रभाव क्षेत्र में माने जाने वाले प्रमुख गाँव/इलाके:

नीमराना

मंडावर

बहरोड़

कोटपुतली

नारनौल के आसपास के कुछ क्षेत्र

बीजवाड़ चौहान — बाद की शाखा का एक प्रसिद्ध गढ़।

इन क्षेत्रों में चौहान जमींदारों की उपस्थिति लंबे समय तक रही।

2. वीरता और युद्ध परंपरा

नीमराना चौहान अपनी युद्धक क्षमता, घुड़सवारी और धनुर्विद्या के लिए प्रसिद्ध माने जाते थे।
लोक दोहा:

“काठ नवै पर राठ नवै ना”
अर्थ — नीमराना के चौहान टूट सकते हैं, पर झुकते नहीं।

यह राठ प्रदेश की पहचान बन गया।

लोक परंपरा में कहा जाता है कि: सम्राट Prithviraj Chauhan → काका कन्हा देव → राठ प्रदेश शाखा → राव राजदेव सिंह → नीमराना

ऐतिहासिक रूप से नीमराना को चौहान वंशजों की तीसरी राजधानी माना जाता है, जिसकी स्थापना 1464 ई. में हुई थी।

3. 1857 की क्रांति में योगदान

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में नीमराना और आसपास के चौहान जमींदारों का प्रत्यक्ष योगदान माना जाता है:

क्षेत्र के कई स्थानीय राजपूत और जमींदारों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोही पक्ष को सहयोग दिया।

Indian Rebellion of 1857 के दौरान अलवर–मेवात क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष था।

स्थानीय परंपराओं में कहा जाता है कि नीमराना चौहानों ने क्रांतिकारियों को आश्रय और रसद दी।

हालाँकि, नीमराना शाखा के किसी एक प्रमुख चौहान सरदार का नाम 1857 के बड़े लिखित अभिलेखों में स्पष्ट रूप से कम मिलता है; अधिक जानकारी क्षेत्रीय वंशावलियों और ठिकाना रिकॉर्ड में मिलती है।

ऐतिहासिक महत्व

नीमराना चौहान केवल ठिकानेदार नहीं थे; वे राठ प्रदेश की राजपूती अस्मिता के रक्षक माने जाते हैं। उनकी जमींदारी व्यवस्था, युद्धक परंपरा और स्थानीय स्वशासन ने इस क्षेत्र की पहचान बनाई।

राजा मदन सिंह चौहान का इतिहास नीमराना और मंडावर की चौहान परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

राजा मदन सिंह चौहान का इतिहास

लोक परंपराओं के अनुसार राजा मदन सिंह चौहान, काका कन्हा देव की वंश परंपरा से जुड़े माने जाते हैं। जब चौहान शक्ति अलग-अलग शाखाओं में विभाजित हुई, तब उनके वंशजों ने राठ प्रदेश में अपना प्रभाव स्थापित किया।

राजा मदन सिंह को विशेष रूप से मंडावर नगर बसाने वाला शासक माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने इस क्षेत्र को एक मजबूत राजपूती ठिकाने के रूप में विकसित किया।

उनके शासन में राठ प्रदेश की पहचान और मजबूत हुई।

प्रसिद्ध लोकवाणी

“काठ नवै पर राठ नवै ना”

यह दोहा राठ प्रदेश के चौहान वीरों के अटल स्वाभिमान को दर्शाता है।

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🚩 #खींची चौहान शाखा की असोथर रियासत की नींव देवगज सिंह ने लगभग 1543 ई. में रखी थी।देवगज सिंह मूलतः राघोगढ़ (खींचीवाड़ा) ...
22/06/2026

🚩 #खींची
चौहान शाखा की असोथर रियासत की नींव देवगज सिंह ने लगभग 1543 ई. में रखी थी।

देवगज सिंह मूलतः राघोगढ़ (खींचीवाड़ा) से आए थे।

उनके वंश में आगे अरारू सिंह हुए।

अरारू सिंह के पुत्र थे राजा भगवंतराय खींची।

असोथर (वर्तमान फतेहपुर क्षेत्र) खींची चौहानों का प्रमुख केंद्र था।

भगवंतराय खींची ने अपने समय में एक स्वतंत्र और प्रभावशाली राज्य स्थापित किया।

वे लंबे समय तक मुगल सत्ता के विरुद्ध डटे रहे और कर-अधीनता स्वीकार नहीं की।

मुख्य संघर्ष

उनका संघर्ष मुख्यतः मुगल साम्राज्य और बाद में अवध के नवाब सआदत अली खान प्रथम से हुआ।

1734 ई. में कड़ा-कोरा के फौजदार जन निसार खान की मृत्यु के बाद मुगल दरबार ने ध्यान दिया।

वजीर क़मर-उद-दीन खान ने सेना भेजी।

बाद में मुहम्मद खान बंगश को अभियान सौंपा गया।

1735 ई. में नवाब सआदत अली खान ने बड़ी सेना लेकर आक्रमण किया।

मुडचौरा का युद्ध (लगभग 1735 ई.)

भगवंतराय खींची के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम लड़ाइयों में माना जाता है। यह युद्ध असोथर रियासत और अवध-मुगल सत्ता के बीच हुआ था।

युद्ध की पृष्ठभूमि

असोथर रियासत खींची चौहानों के अधीन स्वतंत्र रूप से शासन कर रही थी।

भगवंतराय खींची ने मुगल और अवध की अधीनता स्वीकार नहीं की।

इससे नवाब सआदत अली खान और मुगल अधिकारियों को यह चुनौती लगी।

युद्ध का कारण

कर (लगान) और राजनीतिक अधीनता को लेकर विवाद बढ़ा।

नवाब ने इसे दबाने के लिए बड़ी सेना भेजी।

कहा जाता है कि मुडचौरा (वर्तमान गाजीपुर के पास) में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हुईं।

युद्ध का घटनाक्रम

भगवंतराय खींची के साथ उनके भतीजे भवानी सिंह भी रणभूमि में थे।

खींची सेना संख्या में कम थी, लेकिन युद्धकौशल और साहस में प्रबल थी।

प्रारंभिक चरण में भगवंतराय की सेना ने नवाबी सेना को पीछे धकेल दिया।

लोक परंपराओं के अनुसार युद्ध का रुख उनके पक्ष में था।

विश्वासघात और अंत

युद्ध के निर्णायक मोड़ पर दुर्जन सिंह नामक सहयोगी ने विश्वासघात किया।

इससे खींची सेना की रणनीति टूट गई।

भगवंतराय खींची और भवानी सिंह ने अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।

परिणाम

असोथर रियासत की स्वतंत्र शक्ति कमजोर हुई।

लेकिन भगवंतराय का नाम लोकगाथाओं में अमर हो गया।

लोककथा में कहा जाता है:
“रण बीच खींची अडिग रहे, प्राण गए पर मान न डिगे।”

असोथर रियासत और भगवंतराय खींची के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण बात यह मानी जाती है कि उनकी मृत्यु के बाद भी खींची चौहानों का प्रभाव क्षेत्र में बना रहा।

भगवंतराय खींची के बाद

उनके पश्चात असोथर की गद्दी उनके वंशजों ने संभाली।

हालांकि मुगल और नवाबी दबाव के कारण रियासत की शक्ति पहले जैसी नहीं रही।

फिर भी स्थानीय स्तर पर खींची वंश का सम्मान और प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा।

ऐतिहासिक महत्व

भगवंतराय खींची को असोथर में स्वतंत्रता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

उनका संघर्ष यह दिखाता है कि छोटे राजवंश भी बड़ी सल्तनतों के सामने डटकर खड़े हुए।

लोकगीतों और वंशावली परंपराओं में उनकी वीरता आज भी जीवित है।

एक लोकभावना में कहा जाता है:
“खींची की आन, रण में पहचान; सिर कट जाए पर झुके ना मान।”
#चाहमान_वंश #मोहिल_चौहान #चाहमान_राजवंश #मालवगण #चौहान #मालव #राजपूत #क्षत्रिय
#खिंची

21/06/2026

चौहान वंश का निकास मालव कुल से हुआ मालव कुल की राजर्षी शाखा मैं वीर चाहमान का जन्म हुआ इसी वीर पुरूष के नाम पर वीर चौहानो का नामकरण हुआ
इन्ही मालव वीरो ने सिकंदर का सामना किया और सिकंदर को बुरी तरीके से घायल कर दिया जिसके कारण कुछ ही महीनों में सिकंदर मौत के काल मैं समा गया
चाहमान राजवंश
विश्व विजेता चाहमान राजवंश
चहुंदिशाण चक्रवर्ती चौहान
क्षत्रिय ऑफ बरेली Kshatriya of bareilly
#मालव #श्रीरामवंशज_क्षत्रिय_चाहमान_राजवंश
#चाहमान_राजवंश #मालवगण

🚩 #विश्व_विजेता_सुधन्वा_चौहानजगद्गुरु आदि शंकराचार्य के शिष्य  #धर्मरक्षक  #राष्ट्ररक्षक  #संस्कृति_रक्षक "सम्राट सुधन्व...
19/06/2026

🚩 #विश्व_विजेता_सुधन्वा_चौहान
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के शिष्य #धर्मरक्षक #राष्ट्ररक्षक #संस्कृति_रक्षक "सम्राट सुधन्वा चौहान"
🚩 ्षात्रधर्म ⚔️
विश्व विजेता सम्राट सुधन्वा चौहान सन ५००-४७० ई. पूर्व दक्षिणी अवन्ति के शासक थे। माहिष्मती नगरी(MP का महेश्वर नामक स्थान) उनकी राजधानी थी.
सम्राट सुधन्वा चौहान को विश्व सम्राट बनाने में गुरु आदि शंकराचार्य की विशेष कृपा थी।

:::::गुरु आदि शंकराचार्य की शिक्षा
एवं
:::::सुधन्वा चौहान का शौर्य और पराक्रम

शास्त्र और शस्त्र दोनो के गठबंधन ने सनातन धर्म ध्वजा को विश्व की चारो दिशाओ में लहराकर भारत विश्व विजय का स्वर्णिम इतिहास रचा था।

अभी तक हमे केवल गुरु चाणक्य और चन्द्रगुप्त की कहानी ज्ञात थी.
परन्तु आदि शंकराचार्य एवं सुधन्वा चौहान के इतिहास से हम अनजान थे।

#दिग्विजयी_सम्राट_सुधन्वा_चौहान #विश्व_विजेता_चाहमान_राजवंश 🚩 ゚everyone

आदर्श व्यक्तित्व संत शिरोमणि राजऋषि पीपाजी महाराज (गागरोण नरेश प्रतापराव चौहान से लोकदेवता पीपाजी बनने तक की एक धर्मयात्...
18/06/2026

आदर्श व्यक्तित्व संत शिरोमणि राजऋषि पीपाजी महाराज (गागरोण नरेश प्रतापराव चौहान से लोकदेवता पीपाजी बनने तक की एक धर्मयात्रा)
© आलेख- दयालसिंह चौहान- सिलारी

राजस्थान की धरती के लिए कहा जाता है - संत, सती और सूरमा, इण धरती उपजंत। लेकिन युगों बाद ऐसा घटित होता है, जब कोई सूरमा यकायक संत हो जाए। ऐसे ही राजस्थान में मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख राजऋषि संत शिरोमणि पीपाजी महाराज हुऐ, जो गढ़ गागरोण के सूर्यवंशी क्षत्रिय चक्रवर्ती चाहमान राजवंश की खीची शाखा से थे। इनका जन्म वि.सं. 1380 चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हुआ। इनकी माता का नाम लक्ष्मीवती व पिता का नाम महाराज कड़वाराव था। पीपाजी का असली नाम प्रतापसिंह था। ख्यातों के अनुसार गागरोण पर पहले डोड परमार राजपूतों का शासन था। बाद में 12 वी शताब्दी में गूंदलराव खीची (चौहान) ने जायल (नागौर) से आकर अजमेर के महाराज पृथ्वीराज द्वितीय के शासनकाल में कालीसिंध नदी पर बने प्राचीन गागरोण क्षेत्र के डोडों के बारह गढ़ों पर उनको परास्त कर अपना शासन स्थापित कर लिया। इसी खीची शाखा में देवणसी हुए, जिन्होंने बीजलदेव डोड को परास्त कर फिर से इस क्षेत्र पर अधिकार जमाया। पहले इस जल दुर्ग को डोडगढ़ या धूलरगढ़ नाम से भी जाना जाता था, पर देवणसी ने अपनी बहन गंगा के नाम से गढ़ बनाकर उसका नाम गढ़ गागरोण रखा। गागरोण नाम प्रचलित होने के पीछे एक किवदन्ती यह भी है कि श्रीकृष्ण के कुलगुरु महर्षि गर्ग की तपस्थली होने से इसका नाम गागरोण पड़ा। यह दुर्ग युनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल है। पीपाजी देवणसी खीची की 11वीं पीढ़ी में यहाँ के शासक हुए। पिता के देहांत के बाद वि.सं. 1400 में पीपाजी का गागरोण के राजा के रूप में राज्याभिषेक हुआ।
राव पीपाजी ने अपने राज्यकाल में कई युद्धों का सामना किया। टोडा युद्ध इन्होंने अपने ससुर डूंगरसी सोलंकी की सहायतार्थ लड़ा था। फिरोजशाह तुगलक़ के समय उसकी सेना ने मालवा जाते समय गढ़ गागरोण का घेरा भी डाला था, पर वह पराजित हुआ। अपने अल्प राज्यकाल में पीपाजी द्वारा फिरोजशाह तुगलक, मलिक जर्दफिरोज व लल्लन पठान जैसे योद्धाओं को पराजित कर अपनी वीरता का लोहा मनवाया। वे गागरोण राज्य के वीर साहसी एवं प्रजापालक शासक थे। पीपाजी के ये युद्ध उनकी वीर-वृति के सूचक हैं, पर अचानक एक घटना ने उन्हें सांसारिकता से विलग कर दिया। लोकाख्यानों के अनुसार पीपाजी शिकार के शौक़ीन थे और अक्सर शिकार करने जाते थे। एक दिन उनके सामने से एक हिरणी निकली, जिस पर पीपाजी ने तलवार से वार किया। हिरणी के दो टुकड़े हो गये। गर्भवती हिरणी के साथ ही उसका बच्चा भी कट गया। बस वही उनके जीवन परिवर्तन का क्षण सिद्ध हुआ। वे करुणा के आलोक से जगमगा उठे। युद्ध में रक्त की धारा बहा देने वाला वीरवर योद्धा, एक रूदन से परास्त हुआ। उन्होंने युद्धघोष छोड़, धर्मघोष की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने रक्तरंजित तलवार त्याग दी और वैराग्यवृति धारण कर ली। राजपाट उन्हें बौने और व्यर्थ लगने लगे। वे फिर राजधानी लौटे ही नहीं, वहीँ कुटिया बनाकर रहने लगे और भक्ति में लीन हो गए। ऐसी मान्यता है कि वे अपनी कुलदेवी से नित्य प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया करते थे। दैवीय प्रेरणा से पीपाजी गुरु की तलाश में काशी के संतश्रेष्ठ जगतगुरु रामानन्दाचार्य जी की शरण में गए तथा गुरु आदेश पर कुएं में कूदने को तैयार हो गए। रामानन्दाचार्यजी पीपाजी से बहुत प्रभावित हुए व उनको गागरोण जाकर प्रजा सेवा करते हुए भक्ति करने व राजसी संत जीवन व्यतित करने का आदेश दिया। एक वर्ष पश्चात रामानन्दाचार्य जी अपनी शिष्य मंडली के साथ गागरोण पधारे व पीपाजी को वि.सं. 1417 आसाढ शुक्ल पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) को दीक्षा देकर वैष्णव धर्म के प्रचार के लिये नियुक्त किया। रामानन्दाचार्यजी के 12 शिष्यों में पीपाजी भी एक बने। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जहां रामानन्दाचार्यजी के अन्य शिष्य पिछड़े व दलित समुदाय से थे, वही पीपाजी ही एकमात्र क्षत्रिय समुदाय से शिष्य थे। पीपाजी अपना सारा राजपाठ अपने भतीजे कल्याणराव को सौंप कर गुरु आज्ञा से अपनी सबसे छोटी रानी सीताजी जो टोडा के सोलंकी वंश से थी के साथ वैष्णव धर्म प्रचार यात्रा पर निकल पडे। पीपाजी का संपूर्ण जीवन चमत्कारों से भरा हुआ था। राजकाल में देवीय साक्षात्कार करने का चमत्कार प्रमुख है। उसके बाद सन्यास काल में स्वर्ण द्वारिका में 7 दिनों का प्रवास, पीपावाव में रणछोडरायजी की प्रतिमाओं को निकालना व अकालग्रस्त क्षेत्र में अन्नक्षेत्र चलाना, सिंह को अहिंसा का उपदेश देना, लाठियों को हरे बांस में बदलना, एक ही समय में पांच विभिन्न स्थानों पर उपस्थित होना, मृत तेली को जीवनदान देना, सीताजी का सिंहनी के रूप में आना आदि कई चमत्कार जनश्रुतियों व लोकाख्यानों में प्रचलित हैं। सीताजी का टोडा रायसिंह नगर में 1433 वैशाख सुदी पूर्णिमा को स्वर्गवास हो गया। इनकी छतरी बुध सागर पर टोडा में स्थित है। पीपाजी ने "चिंतावानी जोग" नामक ग्रन्थ की रचना की। पीपाजी महाराज सीताजी के स्वर्गवास होने के पश्चात 1434 में चैत्र सुदी 1 को पुनः अपने नगर गागरोण पहुंचे। नगर के समीप बहने वाली कालीसिंध और आहू नदी के पवित्र संगम के पास गुफा बनाकर रहने लगे। अंततः विक्रम संवत 1441 की चैत्र शुक्ल नवमी को सभी भक्त मंडली को पूर्व सूचना देकर संत पीपाजी ओंकार की रट लगाते हुएं अपने प्राणों को ब्रह्मांड में सदा के लिए समाधिस्थ हो गए।
गुरु नानकदेवजी ने पीपाजी के पोते अनंतदासजी के पास से पीपाजी की रचना टोडा नगर में ही प्राप्त की थी। इस बात का प्रमाण अनंतदास द्वारा लिखित 'परचई' के पच्चीसवें प्रसंग से भी मिलता है। इस रचना को बाद में गुरु अर्जुनदेवजी ने 'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल की थी। बाड़मेर के समदड़ी कस्बे में पीपाजी का विशाल मंदिर है जहाँ हर वर्ष मेला भरता है। गागरोण और मसुरिया (जोधपुर) में भी पीपाजी का मेला भरता हैं। गढ़ गागरोण में पीपाजी का मंदिर, छतरी और बाग़ है। काशी में ‘पीपाकूप’, द्वारिका के पास आरमाड़ा में ‘पीपावट’, अमरोली (गुजरात) में ‘पीपाबाव’ है। कालीसिंध और आहड़ नदियों के संगम पर एक पीपाजी का गुफामन्दिर भी स्थित है। गागरोण गढ़ में 2 शाके हुए, पहला शाका 1423 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान अलपखां गौरी (होशंगशाह) ने आक्रमण किया। गागरोण के शासक वीर अचलदास खींची ने अलप खां से युद्ध लड़ा व दुर्ग में जौहर हुआ। दूसरा शाका 1444 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने आक्रमण किया। इस समय गागरोण के शासक पल्हणसी खीची थे। वीरांगनाओं ने जौहर व वीरों ने केसरिया किया। राजस्थान की धरती पर सर्वाधिक 6 साके चाहमान वंश ने ही किये हैं। महमूद खिलजी ने गागरोण का नाम मुस्तफाबाद रख दिया था, लेकिन आज भी यह दुर्ग गागरोण नाम से ही जाना जाता है।
समाज सुधार की दृष्टि से संत पीपाजी ने निर्गुण भक्ति परम्परा का सूत्रपात किया था। बाहरी आडम्बरों, कर्मकांडो एवं रूढ़ियों की कड़ी आलोचना की तथा बताया कि ईश्वर निर्गुण व निराकार है तथा सर्वत्र व्याप्त है और करुणा उनके संदेशों का सार है। संत पीपाजी ने अपने विचारों और कृतित्व से समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। पीपाजी ने भारत में चली आ रही वर्ण व्यवस्था में नवीन वर्ग, श्रमिक वर्ग सृजित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पीपाजी के धर्मोपदेश के बाद 52 राजपूत जागीरदार/रिश्तेदार जो 36 क्षत्रिय वंश के राजा थे उन्होंने धर्म संगत शिक्षा ग्रहण की व उनके अनुयायी बने थे। उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी उन्हीं के वंशज मानने की शपथ ली। आगे चलकर इन्हीं 52 राजपूत राजाओ का क्षत्रिय समुदाय बना जो पीपावत/पीपावंशीय राजपूत कहलाये। इनके अलावा भी कई जाति धर्म के लोग संत पीपाजी को अपना आराध्य मानते हैं।
लोक भजन की यह पंक्ति पीपाजी महाराज पर सटीक बैठती है- पांच ने मार, पच्चीस वश कर ले, जद जाणूं थारी रजपूती। अर्थात् पांच इन्द्रियों का क्षमन कर, तत्संबंधी पच्चीस प्रवृत्तियों को वश कर ले, वह सच्चा क्षत्रिय है।
संत पीपाजी ने सिद्ध किया कि क्षत्रिय यदि युद्धभूमि में शत्रुओं का संहार कर सकता है, तो संन्यास मार्ग पर चलते हुए अपने मन की दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन भी। चक्रवर्ती चाहमान वंश की खीची शाखा में जन्में ऐसे महान राजऋषि संत पीपाजी महाराज ऊर्फ प्रतापसिंहजी को मेरा बारम्बार नमन।
ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।

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16/06/2026

🚩 ्षात्रधर्म ⚔️
'यतो धर्मस्ततो जयः "धर्मो रक्षति रक्षितः"
विश्व विजेता सम्राट सुधन्वा चौहान सन ५००-४७० ई. पूर्व दक्षिणी अवन्ति के शासक थे। माहिष्मती नगरी(MP का महेश्वर नामक स्थान) उनकी राजधानी थी.
सम्राट सुधन्वा चौहान को विश्व सम्राट बनाने में गुरु आदि शंकराचार्य की विशेष कृपा थी।

:::::गुरु आदि शंकराचार्य की शिक्षा
एवं
:::::सुधन्वा चौहान का शौर्य और पराक्रम

शास्त्र और शस्त्र दोनो के गठबंधन ने सनातन धर्म ध्वजा को विश्व की चारो दिशाओ में लहराकर भारत विश्व विजय का स्वर्णिम इतिहास रचा था।

अभी तक हमे केवल गुरु चाणक्य और चन्द्रगुप्त की कहानी ज्ञात थी.
परन्तु आदि शंकराचार्य एवं सुधन्वा चौहान के इतिहास से हम अनजान थे।

अमर सिंह चौहान
राजपरिवार : सांवतसर और सांचौर
#दिग्विजयी_सम्राट_सुधन्वा_चौहान #विश्व_विजेता_चाहमान_राजवंश 🚩

11/06/2026

दिल्ली विजेता चक्रवर्ती सम्राट विशल देव चौहान।।
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