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Inter-country Step-Adoption cases के संबंध में⸻📄 मुख्य बिंदु (पेज 1 के अनुसार):1. विदेश में रहने वाले दत्तक माता-पिता (P...
22/04/2026

Inter-country Step-Adoption cases के संबंध में



📄 मुख्य बिंदु (पेज 1 के अनुसार):

1. विदेश में रहने वाले दत्तक माता-पिता (PAPs)
यदि कोई सौतेला माता/पिता विदेश में रहता है, तो उसे adoption के लिए आवेदन CARA (भारत) को भेजना होगा।
यह आवेदन निम्न माध्यम से भेजा जा सकता है:
* Authorised Foreign Adoption Agencies
* Indian Diplomatic Mission
* Central Authority

2. जरूरी दस्तावेज (Pre-approval के लिए):
आवेदन के साथ ये दस्तावेज देने होंगे:
* (a) Residence proof (जैविक माता/पिता और spouse का) + विवाह का प्रमाण
* (b) Consent (सहमति) जैविक माता/पिता/स्पाउस की (Adoption Regulations के अनुसार)
* (c) Schedule XX के अनुसार आवश्यक अन्य दस्तावेज
* (d) Receiving country की अनुमति (Hague Convention Article 5 या 17 के अनुसार, यदि लागू हो)

3. Pre-approval के बाद प्रक्रिया:
* CARA से pre-approval मिलने के बाद
* PAPs को संबंधित कोर्ट में adoption application फाइल करनी होगी
* यह Schedule ###II और Regulation 52 (Adoption Regulations, 2017) के अनुसार होगा



4. Final Order के बाद:
* कोर्ट द्वारा adoption order मिलने के बाद
* CARA द्वारा NOC (No Objection Certificate) जारी किया जाएगा
* यह inter-country adoption को सपोर्ट करने के लिए होता है



निष्कर्ष:

यह सर्कुलर बताता है कि यदि कोई व्यक्ति विदेश में रहकर अपने सौतेले बच्चे को गोद लेना चाहता है, तो उसे:

* पहले CARA से अनुमति लेनी होगी
* आवश्यक दस्तावेज जमा करने होंगे
* फिर कोर्ट प्रक्रिया पूरी करनी होगी
* अंत में CARA से NOC मिलेगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसानों की जमीन के ऊपर से हाईटेंशन बिजली लाइन गुजरती है, तो किसानों को मुआवजा देना जर...
18/04/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसानों की जमीन के ऊपर से हाईटेंशन बिजली लाइन गुजरती है, तो किसानों को मुआवजा देना जरूरी है।

अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पत्नी और उसके परिवार के वे बयान, जिनमें उन्होंने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज क...
17/04/2026

अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था

कि क्या पत्नी और उसके परिवार के वे बयान, जिनमें उन्होंने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराते समयदहेज देने की बात स्वीकार की है, उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का एकमात्र आधार बन सकते हैं।

पत्नी के बयानों के आधार पर ‘दहेज देने’ के लिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी और परिवार के खिलाफFIR दर्ज करने से किया इनकार

मामले का शीर्षक: राहुल गुप्ता बनाम स्टेशन हाउस ऑफिसर और अन्य.

“अगर कोई महिला दहेज के खिलाफ शिकायत करती है
और बताती है कि उसने दहेज दिया था,
तो उसी बात के लिए उसे अपराधी नहीं बनाया जा सक

Gujarat High Court Judgment: गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नौकरी करने के दौरान हार्ट अटैक पड़ने से हुई म...
16/04/2026

Gujarat High Court Judgment: गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नौकरी करने के दौरान हार्ट अटैक पड़ने से हुई मौत को स्वतः 'Employment Injury' नहीं मान सकते, जब तक यह प्रूफ ना हो जाए कि मौत का सीधा संबंध जॉब से था। हाईकोर्ट ने एक मैकेनिक के परिवार को दी गई Compensation की राशि को रद्द कर दिया। जस्टिस जे.सी. दोशी ने ESI Act की धारा 2(8) का हवाला देकर कहा कि 'Employment Injury' उसी को माना जाएगा, जो किसी दुर्घटना या व्यावसायिक बीमारी की वजह हो, जिसका कनेक्शन सीधे नौकरी के दौरान और उससे पैदा हुईं परिस्थितियों से हो।

मृतक के परिजन नहीं पेश कर पाए ठोस सबूत
लाइव लॉ डॉट इन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात हाईकोर्ट ने अहमदाबाद के मेडिकल अफसर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का जिक्र करते हुए, जिसमें मौत की वजह 'कोरोनरी हार्ट डिजीज की वजह से कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट' बताया गया था, कहा कि मृतक के परिजनों की तरफ से कोई ऐसा साक्ष्य पेश नहीं हुआ, जिससे यह प्रूफ हो सके कि मौत का कनेक्शन नौकरी से था। ना ही ये कोई व्यावसायिक बीमारी थी।

मृतक के परिवार ने दी थी ये दलील

मृतक के परिवार की तरफ से दलील दी गई थी कि मृतक को पहले से कोई भी बीमारी नहीं थी और जॉब के दौरान मेंटल व फिजिकल टेंशन की वजह से उसे Heart Attack पड़ा। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि यह प्रूफ करना जरूरी है कि नौकरी व मौत में स्पष्ट संबंध हो।

नजीर के तौर पर SC के इन फैसलों का किया जिक्र
गुजरात हाईकोर्ट ने इसमें सुप्रीम कोर्ट के दो निर्णयों का भी हवाला दिया। पहले, 'Mackinnon Mackenzie And Company Private Limited बनाम Ibrahim Mahmmed Issak (1969)” में कहा गया था कि दावा करने वालों पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह यह प्रूफ करे कि हादसा या बीमारी जॉब से जुड़ी थी। वहीं, 'Shakuntala Chandrakant Shreshti बनाम Prabhakar Maruti Garvali (2007)' में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि दिल की बीमारी कभी-कभी लक्षण के बिना भी हो सकती है, इसलिए यह दिखाना जरूरी है कि जॉब ने मौत में योगदान दिया।

जानें मैकेनिक की मौत और मुआवजे का मामला

मामले के मुताबिक, मृतक एक कंपनी में फिटर मैकेनिक के तौर पर काम करता था। 6 सितंबर, 2004 को कंपनी में काम करते वक्त उसे सीने और पेट में दर्द हुआ था, जिसके बाद उसे हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां उसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हार्ट अटैक को उसकी मौत की वजह बताया गया।

मृतक के परिवार ने शुरुआत में ESI कॉरपोरेशन से Compensation की डिमांड की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। उन्होंने इसके बाद ESI अदालत में अपील दायर की, जहां मुआवजा दे दिया गया। इस निर्णय के खिलाफ ESI कॉरपोरेशन ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील की।

फिर गुजरात हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि केवल दिल का दौरा पड़ना 'Employment Injury' नहीं मान सकते, जब तक यह प्रूफ ना हो कि यह जॉब के कारण हुआ। चूंकि इस केस में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, इसलिए कोर्ट ने मुआवजा देने का ऑर्डर रद्द कर दिया।

क्या पिता अपनी पूरी संपत्ति किसी एक बेटे के नाम कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है राहअक्सर परिवारों में संपत्ति विव...
16/04/2026

क्या पिता अपनी पूरी संपत्ति किसी एक बेटे के नाम कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है राह
अक्सर परिवारों में संपत्ति विवाद बिखराव का कारण बनता है। सबसे पहले यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्ति किस प्रकार की है, कैसे ट्रांसफर की गई है और अन्य वारिसों के अधिकार क्या बनते हैं। यदि इस पहलू को समझ लें तो कई मामले आसानी से सुलझ सकते हैं। इस तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर राह दिखाई है।

नई दिल्ली: परिवारों में अक्सर संपत्ति विवाद का मसला ऐसे झगड़े की जड़ बन जाता है, जो अदालतों में सालों चलता रहता है। इसकी वजह से परिवार के सदस्यों में कड़वाहट भर जाती है। कई मामलों में ऐसा होता है कि पिता ने वसीयत कर के सभी वारिसों को जायदाद और संपत्ति में बराबर हिस्सा दिया। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि पिता अपने निर्णय से या किसी एक बेटे के वशीभूत होकर या उससे ज्यादा लगाव के चलते अपनी पूरी संपत्ति उसके नाम कर देता है।

ऐसे में पिता के अन्य बेटे भी संपत्ति पर अपना हक जताते हैं और फिर मामला कोर्ट पहुंचता है। सवाल यह है कि जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए कि पिता ने अपनी पूरी संपत्ति एक ही बेटे के नाम कर दी है, तो ऐसी स्थिति में कानूनी नजरिए से क्या किया जा सकता है?

क्या समाधान है इस विवाद का
सबसे पहले यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्ति किस प्रकार की है ? कैसे ट्रांसफर की गई है? अन्य वारिसों के अधिकार क्या बनते हैं? यदि इस पहलू को कोई समझ ले तो कई मामलों में संपत्ति विवाद आसानी से सुलझ सकता है। खासकर इस गाइडलाइंस तय किए हैं उसे समझने से कोई भी संपत्ति विवाद अपने शुरुआती स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है, अदालत जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

इस संवेदनशील विषय के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को समझना ज़रूरी है। सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि संपत्ति पैतृक यानि जो पिता से पहले की अर्जित की हुई है या पिता की खुद की जोड़ी गई। संपत्ति के प्रकार के आधार पर नियमों को जानने की जरुरत है।

पैतृक संपत्ति (Ancestral Property): यदि संपत्ति पैतृक है, तो पिता उसे अपनी मर्जी से केवल एक बेटे को नहीं दे सकते। यह संपत्ति पिता की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। पैतृक संपत्ति पर सभी कानूनी वारिसों मसलन, सभी बेटे, सभी बेटियाँ और कुछ मामलों में पत्नी का भी; जन्मसिद्ध अधिकार होता है। पिता इसे एक बेटे को नहीं दे सकते। यदि ऐसा करते हैं तो ऐसी स्थिति में अन्य वारिस अदालत में जाकर अपने हिस्से का दावा कर सकते हैं और किये गये संपत्ति ट्रांसफर को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
स्व-अर्जित संपत्ति (Self-Acquired Property): लेकिन यदि संपत्ति पिता की स्व-अर्जित संपत्ति है, मतलब पिता ने अपने से, अपने संसाधनों से प्रापर्टी खरीदी है, तो देश का कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि वे उसे अपनी इच्छा से किसी एक बेटे, सभी बेटे-बेटियों को या किसी और को दे सकते हैं। इसमें ध्यान देने वाली बात यह होनी चाहिए कि यह ट्रांसफर वसीयत (Will), गिफ्ट डीड (Gift Deed) या रजिस्टर्ड सेल के जरिए किया गया हो सकता है। अदालतों में ऐसे मामलों में अन्य वारिसों के पास आमतौर पर दावा करने का मजबूत कानूनी आधार नहीं होता

इस संशोधन के बाद बेटियों को सह-भागीदार बना दिया गया, जिसका अर्थ है कि अब उनके पास पुत्रों की तरह ही पैतृक संपत्ति में अधिकार मिल गए। हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम के ये नियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख परिवारों पर भी लागू होते है। यहां तक कि कोई यदि विवाहित बेटी हैं, तब भी उसके अधिकार वही रहते हैं
क्या है सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस
समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले आए जिससे पारिवारिक संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए दिशा निर्देश मिलते रहे। इनकी वजह से देश भर में संपत्ति विवाद के हजारों केसों को सुलझाने में मदद मिली। ऐसे ही कुछ खास केसों का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है।

दोराईराज बनाम दोराईसामी- 2026 के मामले में पारिवारिक संपत्ति का विवाद अदालत में पहुंचा, जहां पैतृक आय से संपत्ति खरीदी गई थी। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया कि यदि संपत्ति पैतृक आय से खरीदी गई है, तो उसे संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति माना जाएगा। न्यायालय ने कर्ता द्वारा की गई वसीयत को संदिग्ध मानकर खारिज कर दिया और उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराया।
के.सी. लक्ष्मण बनाम के.सी. चंद्रप्पा गौड़ा 2022 के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि कोई भी पिता पैतृक संपत्ति को केवल 'किसी एक बच्चे से ही प्यार और स्नेह' के वशीभूत होकर उसको उपहार में नहीं दे सकते। लेकिन धार्मिक या चैरिटी के उद्देश्यों के लिए कुछ मामलों में ये संभव है। इसे अन्य बच्चे चाहें तो पिता के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा 2020 वाले विवाद मे सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि परिवार में बेटियों का भी हक है। बेटियों का पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार है, चाहे वह 2005 के कानून संशोधन से पहले पैदा हुई हों या बाद में। ऐसे में पिता यदि अपनी पैतृक संपत्ति के बंटवारे से बेटियों को बाहर रखते हैं तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
डी.एस. लक्ष्मैया और अन्य बनाम एल. बालासुब्रमण्यम और अन्य 2003 के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्व-अर्जित संपत्ति को परिभाषित किया। यदि कोई संपत्ति किसी सदस्य द्वारा अपनी आय से खरीदी गई है तो वह उसकी स्व-अर्जित संपत्ति मानी जाती है, भले ही वह उस समय परिवार के साथ रह रहा हो। इसके लिए जरूरी है कि संपत्ति बिना संयुक्त परिवार की संपत्ति की सहायता के ली गई हो। इस स्थिति में यदि पिता अपनी संपत्ति को किसी एक बेटे को दे सकते हैं।
विवादों के निपटारे में मदद
समय समय पर आए सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले, परिवारों में संपत्ति विवादों को निपटाने में बहुत सहायक साबित हुए। सुप्रीम कोर्ट की दी गाईडलाइंस से यह तय करने में बड़ी मदद हुई कि किसी व्यक्ति की अपनी परिश्रम से अर्जित की गई संपत्ति पर गलत तरीके से पैतृक अधिकारों का दावा करके विवाद करना सही नहीं है। साथ ही किसी पैतृक संपत्ति में किसी एक बेटे को ही प्यार या स्नेह के नाम पर उपहार दे कर दूसरे बेटे - बेटियों का हक नहीं मारा जा सकता है।

साल (FIR): 2015 • फैसला: अप्रैल 2026 • मामला: ऑफिस में महिला सहकर्मी को घूरने का आरोपबॉम्बे हाई कोर्ट का अहम फैसला: ऑफिस...
15/04/2026

साल (FIR): 2015
• फैसला: अप्रैल 2026
• मामला: ऑफिस में महिला सहकर्मी को घूरने का आरोप

बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम फैसला: ऑफिस में महिला सहकर्मी के स्तन को घूरना 'ताक-झांक' का अपराध नहीं।

मुंबई, 15 अप्रैल 2026 — बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कार्यालय में महिला सहकर्मी के शरीर या सीने को घूरना नैतिक रूप से गलत और असभ्य व्यवहार तो है, लेकिन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354C के तहत ताक-झांक (voyeurism) का आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एकलपीठ ने 2015 में दर्ज एक FIR को रद्द करते हुए कहा, “आरोप केवल यह है कि आरोपी ने मीटिंग के दौरान महिला के सीने को घूरा। अनचाहा घूरना, भले ही सही माना जाए, धारा 354C के अर्थ में ताक-झांक नहीं है। कानून को उसके शाब्दिक शब्दों से आगे नहीं खींचा जा सकता।”

मामला क्या था?
यह मामला एक निजी बीमा कंपनी का है। आरोपी उस समय असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट के पद पर था। महिला शिकायतकर्ता (डिप्टी सेल्स मैनेजर) ने 2015 में बोरीवली पुलिस में FIR दर्ज कराई थी। आरोप था कि मीटिंग के दौरान आरोपी आंखों में संपर्क बनाने की बजाय महिला के सीने को घूरता था और अनुचित टिप्पणियां भी करता था।

पुलिस ने आरोपी के खिलाफ IPC धारा 354C (voyeurism) के तहत मामला दर्ज किया था। आरोपी ने हाई कोर्ट में FIR रद्द करने की याचिका दायर की।

कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बोरकर ने अपने फैसले में जोर दिया कि धारा 354C तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति महिला को निजी गतिविधि करते समय देखे या रिकॉर्ड करे, जहां महिला को निजता की उम्मीद होती है (जैसे बाथरूम, अंडरवियर या यौन संबंधी गतिविधियां)। ऑफिस की मीटिंग में घूरना इस परिभाषा में नहीं आता।

कोर्ट ने आगे कहा - "ऐसा व्यवहार अनैतिक (morally wrong), असभ्य (indecent) और मिसकंडक्ट हो सकता है। लेकिन इसे क्रिमिनल अपराध बनाने के लिए कानून को अतिरिक्त खींचना उचित नहीं।"

FIR और आगे की कार्यवाही को रद्द कर दिया गया।

POSH एक्ट के तहत अलग प्रावधान
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह voyeurism नहीं है, लेकिन ऐसे व्यवहार POSH Act 2013 (Sexual Harassment of Women at Workplace Act) के अंतर्गत यौन उत्पीड़न माना जा सकता है। POSH में staring/leering को unwelcome non-verbal conduct of sexual nature माना जाता है, जो काम के माहौल को असहज या hostile बना दे।
कंपनी को Internal Complaints Committee (ICC) के माध्यम से जांच करनी चाहिए और यदि साबित हो तो अनुशासनात्मक कार्रवाई (चेतावनी, सस्पेंशन या बर्खास्तगी) हो सकती है।

विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला कानून की सीमाओं को स्पष्ट करता है। एक वकील ने कहा, “अनचाहा घूरना निश्चित रूप से गलत है और workplace में इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन हर offensive behavior को criminal offence नहीं बनाया जा सकता। POSH जैसे सिविल और प्रशासनिक तंत्रों का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है।”

क्या कहते हैं कानून के जानकार?

धारा 354C: निजी गतिविधि में ताक-झांक या रिकॉर्डिंग — 1 से 3 साल तक की सजा।

POSH Act: workplace sexual harassment की व्यापक परिभाषा, जिसमें staring शामिल।
अन्य IPC धाराएं (354A, 509, 354) भी गंभीर मामलों में लागू हो सकती हैं, लेकिन context, repetition और intent पर निर्भर करता है।

निष्कर्ष: बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला याद दिलाता है कि नैतिकता और कानून में फर्क है। सम्मानजनक कार्यस्थल बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ कानून पर नहीं, बल्कि हर कर्मचारी और कंपनी प्रबंधन पर भी है। महिलाओं को असहज महसूस होने पर ICC या HR में शिकायत करने का अधिकार है, जबकि पुरुषों को प्रोफेशनल और सम्मानजनक व्यवहार रखना चाहिए।

(यह न्यूज आर्टिकल बॉम्बे हाई कोर्ट के हालिया फैसले पर आधारित है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स — NDTV, Times of India, Indian Express, LiveLaw आदि — से संकलित जानकारी पर लिखा गया है।)

कोर्ट ने ऐसे cases में FIR हटाई (quash की), जब:लड़का-लड़की दोनों नाबालिग थे दोनों के बीच consensual relationship था बाद ...
11/04/2026

कोर्ट ने ऐसे cases में FIR हटाई (quash की), जब:

लड़का-लड़की दोनों नाबालिग थे
दोनों के बीच consensual relationship था
बाद में दोनों साथ रहना चाहते थे / शादी कर ली
लड़की या उसके परिवार ने बाद में complaint वापस लेना चाहा

ऐसे में कोर्ट ने कहा कि case चलाना “abuse of process” हो सकता है

Relevant Judgments (Bombay High Court)

1️⃣ Sabari v. Inspector of Police (2022)

👉 Court ने कहा कि अगर relationship consensual है और दोनों करीब उम्र के हैं
➡️ तो POCSO का misuse नहीं होना चाहिए



2️⃣ XYZ v. State of Maharashtra (various orders)

👉 कई cases में court ने FIR quash की
➡️ जब लड़की ने खुद कहा कि relation consent से था



3️⃣ Girish v. State of Maharashtra

👉 Court ने कहा:
Teenage love affairs को criminalize करना हर बार सही नहीं है”

तमिलनाडु के सथानकुलम में पिता-बेटे की कस्टोडियल मौत मामले में 6 साल बाद 6 अप्रैल को मदुरै कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को दो...
09/04/2026

तमिलनाडु के सथानकुलम में पिता-बेटे की कस्टोडियल मौत मामले में 6 साल बाद 6 अप्रैल को मदुरै कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इस पूरे मामले में हेड कांस्टेबल रेवती (43) का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।

पुलिस हिरासत में पिता-बेटे की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। मामले को दबाने की कोशिशें भी हुईं, कांस्टेबल लेकिन रेवती की गवाही ने सच सामने ला दिया। रेवती दो बेटियों की मां है। उन्होंने न्यायिक मजिस्ट्रेट से कहा कि वह पूरा सच बताएंगी, लेकिन अपने बच्चों और नौकरी की सुरक्षा की गारंटी चाहती हैं।

रेवती की बहादुरी और सच्चाई के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने इस केस को मुकाम तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने कोर्ट में मिनट-दर-मिनट घटनाक्रम बताया, जिससे यह साबित हुआ कि थाने में क्या हुआ और कौन जिम्मेदार था।

साल 2020 में मोबाइल कारोबारी पिता-पुत्र की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। - Dainik Bhaskar
साल 2020 में मोबाइल कारोबारी पिता-पुत्र की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी।

पढ़िए पूरा मामला…

घटना जून 2020 की है। जब पूरी दुनिया कोविड की बंदिशों से जूझ रही थी। थूथुकुडी जिले के सथानकुलम पुलिस स्टेशन में ऐसा कुछ हुआ, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स को इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि उन्होंने मोबाइल शॉप तय समय से कुछ देर ज्यादा खुली रखी थी।

कांस्टेबल रेवती ने कोर्ट को बताया, ‘मैं रात करीब 8:50 बजे स्टेशन पहुंची। उसी समय अंदर से चीखने और रोने की आवाज आई, कोई चिल्ला रहा था ‘अम्मा, दर्द हो रहा है! जाने दो! प्लीज मुझे जाने दो! मैंने कुछ गलत नहीं किया!’

लहूलुहान होने तक पीटा, निजी अंगों पर जूतों से वार किया

रेवती ने बताया कि बीच-बीच में सब-इंस्पेक्टर बालाकृष्णन की आवाज सुनाई दे रही थी, वो कह रहे थे- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई स्टेशन के अंदर हंगामा करने की? तुम कोई बड़े आदमी हो? पुलिसकर्मियों ने जयराज और बेनिक्स को लहूलुहान होने तक पीटा।

उन्होंने दोनों पिता-पुत्र के निजी अंगों पर जूतों से वार किया। इस दौरान पुलिसवाले बीच-बीच में शराब पीने के लिए रुकते और फिर दोबारा मारपीट शुरू कर देते। जब दोनों अधमरे हो गए, तो रेवती ने सहानुभूति दिखाते हुए जयराज (पिता) को कॉफी देने की कोशिश की, जिसे अन्य पुलिसकर्मियों ने छीनकर फेंक दिया।

6 अप्रैल को कोर्ट के फैसले के बाद दोषी पुलिसकर्मी को कड़ी सुरक्षा के बीच जेल ले जाया गया। - Dainik Bhaskar
6 अप्रैल को कोर्ट के फैसले के बाद दोषी पुलिसकर्मी को कड़ी सुरक्षा के बीच जेल ले जाया गया।
पुलिसकर्मियों ने निर्वस्त्र कर पिता-बेटे के हाथ बांध दिए थे

रेवती के मुताबिक दोनों को निर्वस्त्र कर उनके हाथ बांध दिए गए। इतनी क्रूरता न देख पाने के कारण रेवती बाहर चली गईं। हिरासत में लेने के 2 दिन बाद पहले बेटे बेनिक्स और अगले दिन पिता जयराज की मौत हो गई। पूरे देश में गुस्सा था, लेकिन पुलिस विभाग में मामले को दबाने की कोशिश की जा रही थी। 9 प्रभावशाली पुलिसकर्मी आरोपी थे।

जब न्यायिक मजिस्ट्रेट एमएस भरथिदासन जांच के लिए पहुंचे, तो रेवती ने उनसे कहा- सर, मैं आपको सब कुछ बताऊंगी, हर एक बात, वह सच जिसे छिपाया जा रहा है। मैं दो बच्चियों की मां हूं। क्या आप मेरे बच्चों और मेरी नौकरी की सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं

तनाव इता बढ़ा कि मजिस्ट्रेट को सुरक्षा बढ़ानी पड़ी

साथी अधिकारियों की चेतावनी के बावजूद रेवती ने बोलने का फैसला किया। यह ऐसी फोर्स में असाधारण कदम था, जहां किसी कर्मी का साथियों के खिलाफ गवाही देना कम ही देखने को मिलता है। उन्होंने खौफ के बीच अपने साथी पुलिसकर्मियों के खिलाफ गवाही दी।

बयान दर्ज कराते वक्त बाहर जमा पुलिसकर्मी कोर्ट के स्टाफ को धमका रहे थे और रेवती पर फब्तियां कस रहे थे। तनाव इतना था कि मजिस्ट्रेट को सुरक्षा गार्ड तैनात करना पड़ा। सुरक्षा का भरोसा मिलने के बाद ही रेवती हस्ताक्षर के लिए तैयार हुईं।

सीसीटीवी फुटेज में हर आरोपी की पहचान की। उनकी मिनट-दर-मिनट की गवाही ने पुख्ता कर दिया कि उस रात थाने में कौन मौजूद था और दोनों की मौत के जिम्मेदार कौन थे। रेवती का यह साहस न्याय की नींव बना।

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यह खबर भी पढ़ें…

सुप्रीम कोर्ट बोला- हिरासत में मौतें बर्दाश्त नहीं:दैनिक भास्कर की खबर पर केंद्र-राज्य को नोटिस; थानों में CCTV पर 16 दिसंबर तक रिपोर्ट मांगी

undefined - Dainik Bhaskar
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें सिस्टम पर धब्बा है और अब देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। साथ ही कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र की ओर से थानों में CCTV को लेकर मांगी गई रिपोर्ट न सौंपने पर नाराजगी जताई। पूरी खबर पढ़ें…

Andhra Pradesh High Court ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर किसी हिंदू महिला को अपने माता-पिता से विरासत में संप...
31/03/2026

Andhra Pradesh High Court
ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर किसी हिंदू महिला को अपने माता-पिता से विरासत में संपत्ति मिली है और वह बिना वसीयत के मृत्यु को प्राप्त होती है, तो उस संपत्ति पर उसके पति या ससुराल पक्ष का कोई अधिकार नहीं होगा।

कोर्ट ने Hindu Succession Act, 1956 की धारा 15(2)(a) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में संपत्ति महिला के पिता के कानूनी वारिसों को ही मिलेगी। यह टिप्पणी एक विशेष मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें बिना संतान के मृत्यु होने पर संपत्ति के अधिकार को लेकर विवाद सामने आया था।

• माता-पिता से मिली संपत्ति पति को नहीं मिलेगी
• बिना संतान मृत्यु पर पिता के वारिस होंगे हकदार
• हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(2)(a) लागू
• कोर्ट ने पति के दावे को नहीं माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, त...
29/03/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो यह अपराध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक नैतिकता नागरिकों के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती और कानून को नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए।
यह मामला एक कपल की याचिका से जुड़ा है, जिन्हें परिवार से धमकियां मिल रही थीं। कोर्ट ने पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। साथ ही, अदालत ने कहा कि दो वयस्कों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस की जिम्मेदारी है।

सुप्रीमकोर्ट ने जबलपुर के 30 साल पुराने जमीन विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया—पैतृक संपत्ति वही है जो पिता, दा...
21/03/2026

सुप्रीमकोर्ट ने जबलपुर के 30 साल पुराने जमीन विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया—पैतृक संपत्ति वही है जो पिता, दादा या परदादा से मिले। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नानी की संपत्ति पर जन्म से कोई अधिकार नहीं होता, इसलिए पिता उसे अपनी मर्जी से बेच सकते हैं या किसी को भी दे सकते हैं।

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