21/09/2025
*🪷 पितृपक्ष एवं श्राद्घ का पुराणों मे महत्त्व [ 4 ] 🪷*
प्राय: लोग कहा करते हैं कि श्राद्ध करने से , पिंडदान करने से हमारे पितरों को भला कैसे कुछ प्राप्त हो सकता है ? यह जिज्ञासा स्वाभाविक भी है कि श्राद्ध में दी गई सामग्रियां पितरों को कैसे मिलती है ? क्योंकि सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार जीव अपने कर्मानुसार मृत्यु के बाद भिन्न-भिन्न गति को प्राप्त होता है ! कोई देवता , कोई पितर , कोई प्रेत , कोई हाथी , कोई चींटी , कोई चिनार का वृक्ष और कोई तृण आदि योनियों को प्राप्त करता है। तो मन में एक भ्रांति उत्पन्न होती है कि श्राद्ध में दिए गए छोटे से पिंड से हाथी की योनि में उत्पन्न हुए हमारे पितर का पेट कैसे भरेगा ? या यदि हमारे पितर चींटी बन गए हैं तो इतने बड़े पिंड को कैसे खा पाएंगे ? यदि देव योनि को प्राप्त हो गए हैं तो देवताओं को तो अमृत चाहिए उन्हें पिंड से तृप्ति कैसे मिलेगी ? इस प्रकार के अनेकानेक प्रश्न मनुष्य के मन मस्तिष्क में घूमा करते हैं इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमारे ग्रंथों में है जिन्हें अध्ययन करने की आवश्यकता है।
🔸️देखें :-----
"नाममन्त्रास्तथा देशा भवान्तरगतानपि !
प्राणिन: प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान् !!"
----- मार्कण्डेय पुराण
▪️अर्थात :--- नाम , गोत्र आदि के साथ किए गए संकल्प के सहारे विश्वदेव एवं अग्निष्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य - कव्य को पितरों को प्राप्त करा देते हैं।
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"देवो यदि पिता जात: शुभकर्मानुयोगत: !
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वे$प्यनुगच्छति !!
मर्त्यत्वे ह्यन्नरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् !
श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वे$प्युपतिष्ठति !!
----- वायु पुराण
▪️अर्थात :--- यदि हमारे पितर देव योनि को प्राप्त हो गए हैं तो दिया गया अन्न उन्हें अमृत होकर प्राप्त हो जाता है ! मनुष्य योनि में अन्न रूप में तथा पशु योनि में तृण रूप में उन्हें उसकी प्राप्ति हो जाती है। नागादि योनियों में वायु रूप से श्राद्ध में दी गई वस्तुएं प्राप्त हो जाती है।
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"पानं भवति यक्षत्वे नानाभोगकरं तथा"
----- श्राद्धकल्पलता
▪️अर्थात :--- पान रूप से यक्ष योनि में तथा अन्य योनियों में भी श्राद्धीय वस्तु भोगजनक तृप्तिकर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर अवश्य तृप्त करती है। फिर भी यदि किसी को संदेह हो तो ऐसे व्यक्तियों को चाहिए कि हमारे ग्रंथों का अध्ययन करें। और पूर्ण विश्वास के साथ श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध कर्म का आयोजन करें, पितरों को हमारे द्वारा किया गया श्राद्ध / पिंडदान कैसे प्राप्त होता है यह बताते हुए आगे लिखा गया है।
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यथा गोष्ठे प्रणष्टां वै वत्सो विन्देत मातरम् !
तथा तं नयते मन्त्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठति !!
नाम गोत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नं नयन्ति तम् !
अपि योनिशतं प्राप्तांस्तृप्तिस्ताननुगच्छति !!
----- वायुपुराण
🔸 ️और भी देखें 👉
"नाम गोत्रं पितृणां तु प्रापकं हवियकव्ययो: !
श्राद्धस्य मन्त्रतस्तत्त्वमुपलभ्येत् भक्तित: !!
अग्निष्वात्तादयस्तेषामाधिपत्ये व्यवस्थिता: !
नामगोत्रस्तथा देशा भवन्त्युद्भवतामपि !!
प्राणिन: प्रीणयन्त्येतदर्हणं समुपागतम् !!"
----- पद्मपुराण
▪️अर्थात :--- जैसे गौशाला में भूली माता को बछड़ा किसी न किसी प्रकार से ढूंढ ही लेता है उसी प्रकार मंत्र तत्तद् वस्तु जातको प्राणी के पास किसी न किसी प्रकार पहुंचा ही देता है। नाम , गोत्र , हृदय की श्रद्धा एवं उचित संकल्प पूर्वक दिए हुए पदार्थों को भक्ति पूर्वक उच्चारित मंत्र उनके पास पहुंचा देता है। जीव चाहे सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो तो उसके पास पहुंच ही जाती है।
ऐसा विश्वास मन में करके प्रत्येक मनुष्य को श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करना ही चाहिए जिससे कि उनका परिवार सुखी और संपन्न बना रहें।
अपने पितरों को तृप्त करने के लिए श्राद्ध कैसे किया जाय ? यह विचार मन में उठता है ! सनातन धर्म में श्राद्ध की दो प्रक्रिया बताई गई :---
1) पिंडदान और
2) ब्राह्मण भोजन
मृत्यु के बाद जो लोग देवलोक या पितृलोक में पहुंचते हैं वह मंत्रों के द्वारा बुलाए जाने पर उन - उन लोकों से तत्क्षण श्राद्धदेश में आ जाते हैं और निमंत्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन कर लेते हैं। सूक्ष्मग्राही होने से भोजन के सूक्ष्म कणों के आघ्राण से उनका भोजन हो जाता है। वे तृप्त हो जाते हैं ब्राह्मण को भोजन कराने से पितरों को प्राप्त हो जाता है इसका प्रमाण वेदों में मिलता है।
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"इममोदनं नि दधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम्"
----- अथर्ववेद
▪️(इमम् ओदनम्) अर्थात् इस ओदनोपलक्षित भोजन को (ब्राह्मणेषु नि दधे) ब्राह्मणों में स्थापित कर रहा हूँ ! भोजन के लिए ब्रह्माण ही क्यों ? इसकी पुष्टि करते हुए हमारे शास्त्र बताते हैं।
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"यस्यास्येन् सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकस: !
कव्यानि चैव पितर: किं भूतमधिकं तत: !!"
----- मनु स्मृति
▪️अर्थात :--- ब्राम्हण के मुख से देवता हव्य और पितर कव्य को खाते हैं। पितरों के लिए लिखा है कि यह अपने कर्मवश अंतरिक्ष में वायवीय शरीर धारण करके रहते और~
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"तस्य ते पितर: श्रुत्वा श्राद्धकालमुपस्थितम् !
अन्योन्यं मनसा ध्यात्वा सम्पतन्ति मनोजवा: !!
ब्राह्मणैस्ते सहाश्नन्ति पितरो ह्यान्तरिक्षगा: !
वायुभूतास्तु तिष्ठन्ति भुक्त्वा यान्ति परां गतिम् !!"
----- कूर्मपुराण
▪️अर्थात् :--- अन्तरिक्ष में रहने वाले इन पितरों को श्राद्धकाल आ गया है यह सुनकर ही तृप्ति हो जाती है ! ये मनोजव होते हैं अर्थात् इन पितरों की गति मन की गति तरह होती है ! ये स्मरण से ही श्राद्धदेश में आ जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन कर तृप्त हो जाते हैं ! इनको सब लोग इसलिए नहीं देख पाते हैं कि इनका शरीर वायवीय है।
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❗️ब्राह्मण को इस धरती का देवता कहा गया है👉
"दैवाधीना जगत्सर्व: मन्त्राधीना च देवता !
ते मन्त्रा ब्राह्मणाधीना तस्माद्ब्राह्मण देवता !"
सभी देवता एवं पितर गुप्तरूप से ब्राह्मण में निवास करते हैं ! प्राणवायु की भाँति उनके चलते समय चलते हैं और बैठते समय बैठते हैं।
"निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् !
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते !!"
----- मनुस्मृति
▪️अर्थात् :--- श्राद्धकाल में निमन्त्रित ब्राह्मणों के साथ ही प्राणरूप में या वायुरूप में पितर आते हैं और उन ब्राह्मणों के साथ ही बैठकर भोजन करते हैं ! मृत्यु के पश्चात् पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं , इसलिए उनको कोई देख नहीं पाता !
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"तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्य:"
----- शतपथ ब्राह्मण
▪️अर्थात् :--- सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण पितर मनुष्यों में छिपे होते हैं ! अतएव सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण ये जल , अग्नि तथा वायुप्रधान होते हैं , इसीलिए इनको कोई देख भी देख नहीं पाता और इन्हें लोक लोकान्तरों में आने - जाने में कोई रुकावट नहीं होती !
अपने पितरों के लिए किये गये श्राद्ध को सफल बनाने एवं पितरों तक पहुँचाने का माध्यम ब्राह्मण ही है अत: ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हुए श्राद्धकर्म करना चाहिए !
श्राद्ध करने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है ! आज की आधुनिकता की चकाचौंध में तो और भी आवश्यक है धन का होना ! परंतु धन की स्थिति सदैव सबकी एक समान नहीं होती ! कभी-कभी धन का अभाव भी हो जाता है और श्राद्ध करना भी अनिवार्य है ऐसी परिस्थिति में मनुष्य चिंतित हो जाता है कि श्राद्ध कैसे किया जाय, सनातन धर्म ने प्रत्येक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए नियम बनाए हैं इस दृष्टि से शास्त्रों ने धन के अनुपात से श्राद्ध करने की कुछ व्यवस्थाएं की हैं जैसे 👉
"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि"
▪️अर्थात :--- यदि अन्न - वस्त्र के खरीदने में धन का अभाव हो तो उस परिस्थिति में शाक आदि से श्राद्ध कर देना चाहिए। यदि शाक खरीदने के भी पैसे ना हो तो भी विशेष व्यवस्था बताई गई है।
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"तृणकाष्ठार्जनं कृत्वा प्रार्थयित्वा वराटकम् !
करोति पितृकार्याणि ततो लक्षगुणं भवेत् !!"
----- पद्मपुराण
▪️अर्थात :--- शाक खरीदने के लिए भी पैसे ना होने की स्थिति में श्राद्ध करने के लिए बतााया गया है कि तृण अर्थात् घास काष्छ अर्थात लकड़ी आदि को बेचकर पैसे इकट्ठा करें और उन पैसों से शाक खरीद कर श्राद्ध करें अधिक श्रम से यह श्राद्ध किया गया है अतः यह लाख गुना फल देने वाला होता है देश विशेष और काल विशेष के कारण कभी-कभी लकड़ियां भी नहीं मिलती ऐसी परिस्थिति में शास्त्रों ने बताया है कि घास से श्राद्ध हो सकता है। घास से भला श्राद्ध कैसे हो सकता है ? इसके विषय में बताया गया है कि श्राद्ध के दिन यदि कुछ भी ना हो तो घास काट कर गाय को खिला दे उससे उसको श्राद्ध का फल मिल जाएगा पद्मपुराण के अंतर्गत एक कथा आती है कि 👉
‼️ एक व्यक्ति धन के अभाव से अत्यंत ग्रस्त था उसके पास इतना पैसा नहीं था कि वह शाक खरीद पाए इस तरह शाक से भी श्राद्ध करने की स्थिति में वह नहीं था। आज ही श्राद्ध की तिथि थी कुतप काल भी आ पहुंचा था। इस काल के बीतने पर श्राद्ध नहीं हो सकता था। वह बेचारा घबरा कर रोने लगा कि आखिर श्राद्ध करें तो कैसे करें ? ऐसे में एक विद्वान ने उसे उचित मार्ग बताया और कहा अभी कुतप काल है शीघ्र ही घास काट कर पितरों के नाम पर गाय को खिला दो तुम को श्राद्ध का फल मिल जाएगा। वह दौड़ कर गया घास काट कर लाया और अपने पितरों के प्रति श्रद्धा पूर्वक उस घास को गाय को खिला दिया इस श्राद्ध के फलस्वरूप 👉
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"एतत् पुण्यप्रसादेन् गतौ$सौ सुरमन्दिरम् !"
----- पद्मपुपाण
▪️अर्थात :--- उसको देव लोक की प्राप्ति हुई।
कभी-कभी ऐसी परिस्थिति भी आ जाती है कि घास का मिलना भी संभव नहीं होता तब श्राद्ध कैसे करें ? शास्त्रों ने इसका समाधान भी बताया है कि यदि श्राद्धकर्ता के पास ऐसी परिस्थिति हो कि उसके पास न शाक हो , न धन हो न घास हो , न लकड़ी हो तो श्राद्धकर्ता एकांत स्थान में चला जाय और दोनों हाथ ऊपर उठाकर अपने पितरों से प्रार्थना करने लगे कि 👉
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"न मे$स्ति वित्तं न धनं च नान्यच्छ्राद्धोुयोग्यं स्वपितृन्नतो$स्मि !
तृप्यन्तु भक्त्या पितरौ मयैतौ कृतो भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य !!"
▪️अर्थात :--- हे मेरे पितृगण ! मेरे पास श्राद्ध करने के लिए ना तो धन है न धान्य ! हां , मेरे पास आपके लिए श्रद्धा एवं भक्ति है मैं इन्हीं के द्वारा आप को तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त हो जायं ! मैंने (शास्त्र की आज्ञा के अनुरूप) दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है। श्राद्ध कार्य में साधन संपन्न व्यक्ति को उसके वित्तशाठ्य अर्थात कंजूसी नहीं करनी चाहिए अपने उपलब्ध साधनों से विशेष श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
उपयुक्त विधानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक मनुष्य को किसी न किसी प्रकार से श्राद्ध को अवश्य करना चाहिए शासन ने तो स्पष्ट शब्दों में श्राद्ध का विधान दिया है और श्राद्ध न करने के लिए निषेध ही किया है। कहने का तात्पर्य है कि चाहे जिस प्रकार से हो अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
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"अतो मूलै: फलैर्वापि तथाप्युदकतर्पणै: !
पितृतृप्तिं पिरकुर्वीत् नैव श्राद्धं विवर्जयेत् !!"
----- धर्मसिन्धु
▪️अर्थात :--- धन से धन से , फल से , घास से , शाक से या अपनी श्रद्धा से श्राद्ध को अवश्य करना चाहिए पितरों को तृप्त करने का दायित्व तो सब का बनता है और अंत में कहा गया है कि श्राद्ध को किसी भी परिस्थिति में छोड़ना नहीं चाहिए।
क्रमश: शेष अगले लेख मे........