Gyan Jyoti Shiksha Samiti

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21/09/2025

*🪷 पितृपक्ष एवं श्राद्घ का पुराणों मे महत्त्व [ 4 ] 🪷*

प्राय: लोग कहा करते हैं कि श्राद्ध करने से , पिंडदान करने से हमारे पितरों को भला कैसे कुछ प्राप्त हो सकता है ? यह जिज्ञासा स्वाभाविक भी है कि श्राद्ध में दी गई सामग्रियां पितरों को कैसे मिलती है ? क्योंकि सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार जीव अपने कर्मानुसार मृत्यु के बाद भिन्न-भिन्न गति को प्राप्त होता है ! कोई देवता , कोई पितर , कोई प्रेत , कोई हाथी , कोई चींटी , कोई चिनार का वृक्ष और कोई तृण आदि योनियों को प्राप्त करता है। तो मन में एक भ्रांति उत्पन्न होती है कि श्राद्ध में दिए गए छोटे से पिंड से हाथी की योनि में उत्पन्न हुए हमारे पितर का पेट कैसे भरेगा ? या यदि हमारे पितर चींटी बन गए हैं तो इतने बड़े पिंड को कैसे खा पाएंगे ? यदि देव योनि को प्राप्त हो गए हैं तो देवताओं को तो अमृत चाहिए उन्हें पिंड से तृप्ति कैसे मिलेगी ? इस प्रकार के अनेकानेक प्रश्न मनुष्य के मन मस्तिष्क में घूमा करते हैं इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमारे ग्रंथों में है जिन्हें अध्ययन करने की आवश्यकता है।

🔸️देखें :-----

"नाममन्त्रास्तथा देशा भवान्तरगतानपि !
प्राणिन: प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान् !!"
----- मार्कण्डेय पुराण

▪️अर्थात :--- नाम , गोत्र आदि के साथ किए गए संकल्प के सहारे विश्वदेव एवं अग्निष्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य - कव्य को पितरों को प्राप्त करा देते हैं।
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"देवो यदि पिता जात: शुभकर्मानुयोगत: !
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वे$प्यनुगच्छति !!
मर्त्यत्वे ह्यन्नरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् !
श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वे$प्युपतिष्ठति !!
----- वायु पुराण

▪️अर्थात :--- यदि हमारे पितर देव योनि को प्राप्त हो गए हैं तो दिया गया अन्न उन्हें अमृत होकर प्राप्त हो जाता है ! मनुष्य योनि में अन्न रूप में तथा पशु योनि में तृण रूप में उन्हें उसकी प्राप्ति हो जाती है। नागादि योनियों में वायु रूप से श्राद्ध में दी गई वस्तुएं प्राप्त हो जाती है।
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"पानं भवति यक्षत्वे नानाभोगकरं तथा"
----- श्राद्धकल्पलता

▪️अर्थात :--- पान रूप से यक्ष योनि में तथा अन्य योनियों में भी श्राद्धीय वस्तु भोगजनक तृप्तिकर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर अवश्य तृप्त करती है। फिर भी यदि किसी को संदेह हो तो ऐसे व्यक्तियों को चाहिए कि हमारे ग्रंथों का अध्ययन करें। और पूर्ण विश्वास के साथ श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध कर्म का आयोजन करें, पितरों को हमारे द्वारा किया गया श्राद्ध / पिंडदान कैसे प्राप्त होता है यह बताते हुए आगे लिखा गया है।
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यथा गोष्ठे प्रणष्टां वै वत्सो विन्देत मातरम् !
तथा तं नयते मन्त्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठति !!
नाम गोत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नं नयन्ति तम् !
अपि योनिशतं प्राप्तांस्तृप्तिस्ताननुगच्छति !!
----- वायुपुराण

🔸 ️और भी देखें 👉

"नाम गोत्रं पितृणां तु प्रापकं हवियकव्ययो: !
श्राद्धस्य मन्त्रतस्तत्त्वमुपलभ्येत् भक्तित: !!
अग्निष्वात्तादयस्तेषामाधिपत्ये व्यवस्थिता: !
नामगोत्रस्तथा देशा भवन्त्युद्भवतामपि !!
प्राणिन: प्रीणयन्त्येतदर्हणं समुपागतम् !!"
----- पद्मपुराण

▪️अर्थात :--- जैसे गौशाला में भूली माता को बछड़ा किसी न किसी प्रकार से ढूंढ ही लेता है उसी प्रकार मंत्र तत्तद् वस्तु जातको प्राणी के पास किसी न किसी प्रकार पहुंचा ही देता है। नाम , गोत्र , हृदय की श्रद्धा एवं उचित संकल्प पूर्वक दिए हुए पदार्थों को भक्ति पूर्वक उच्चारित मंत्र उनके पास पहुंचा देता है। जीव चाहे सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो तो उसके पास पहुंच ही जाती है।

ऐसा विश्वास मन में करके प्रत्येक मनुष्य को श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करना ही चाहिए जिससे कि उनका परिवार सुखी और संपन्न बना रहें।

अपने पितरों को तृप्त करने के लिए श्राद्ध कैसे किया जाय ? यह विचार मन में उठता है ! सनातन धर्म में श्राद्ध की दो प्रक्रिया बताई गई :---

1) पिंडदान और
2) ब्राह्मण भोजन

मृत्यु के बाद जो लोग देवलोक या पितृलोक में पहुंचते हैं वह मंत्रों के द्वारा बुलाए जाने पर उन - उन लोकों से तत्क्षण श्राद्धदेश में आ जाते हैं और निमंत्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन कर लेते हैं। सूक्ष्मग्राही होने से भोजन के सूक्ष्म कणों के आघ्राण से उनका भोजन हो जाता है। वे तृप्त हो जाते हैं ब्राह्मण को भोजन कराने से पितरों को प्राप्त हो जाता है इसका प्रमाण वेदों में मिलता है।
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"इममोदनं नि दधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम्"
----- अथर्ववेद

▪️(इमम् ओदनम्) अर्थात् इस ओदनोपलक्षित भोजन को (ब्राह्मणेषु नि दधे) ब्राह्मणों में स्थापित कर रहा हूँ ! भोजन के लिए ब्रह्माण ही क्यों ? इसकी पुष्टि करते हुए हमारे शास्त्र बताते हैं।
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"यस्यास्येन् सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकस: !
कव्यानि चैव पितर: किं भूतमधिकं तत: !!"
----- मनु स्मृति

▪️अर्थात :--- ब्राम्हण के मुख से देवता हव्य और पितर कव्य को खाते हैं। पितरों के लिए लिखा है कि यह अपने कर्मवश अंतरिक्ष में वायवीय शरीर धारण करके रहते और~
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"तस्य ते पितर: श्रुत्वा श्राद्धकालमुपस्थितम् !
अन्योन्यं मनसा ध्यात्वा सम्पतन्ति मनोजवा: !!
ब्राह्मणैस्ते सहाश्नन्ति पितरो ह्यान्तरिक्षगा: !
वायुभूतास्तु तिष्ठन्ति भुक्त्वा यान्ति परां गतिम् !!"
----- कूर्मपुराण

▪️अर्थात् :--- अन्तरिक्ष में रहने वाले इन पितरों को श्राद्धकाल आ गया है यह सुनकर ही तृप्ति हो जाती है ! ये मनोजव होते हैं अर्थात् इन पितरों की गति मन की गति तरह होती है ! ये स्मरण से ही श्राद्धदेश में आ जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन कर तृप्त हो जाते हैं ! इनको सब लोग इसलिए नहीं देख पाते हैं कि इनका शरीर वायवीय है।
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❗️ब्राह्मण को इस धरती का देवता कहा गया है👉

"दैवाधीना जगत्सर्व: मन्त्राधीना च देवता !
ते मन्त्रा ब्राह्मणाधीना तस्माद्ब्राह्मण देवता !"

सभी देवता एवं पितर गुप्तरूप से ब्राह्मण में निवास करते हैं ! प्राणवायु की भाँति उनके चलते समय चलते हैं और बैठते समय बैठते हैं।

"निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् !
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते !!"
----- मनुस्मृति

▪️अर्थात् :--- श्राद्धकाल में निमन्त्रित ब्राह्मणों के साथ ही प्राणरूप में या वायुरूप में पितर आते हैं और उन ब्राह्मणों के साथ ही बैठकर भोजन करते हैं ! मृत्यु के पश्चात् पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं , इसलिए उनको कोई देख नहीं पाता !
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"तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्य:"
----- शतपथ ब्राह्मण

▪️अर्थात् :--- सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण पितर मनुष्यों में छिपे होते हैं ! अतएव सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण ये जल , अग्नि तथा वायुप्रधान होते हैं , इसीलिए इनको कोई देख भी देख नहीं पाता और इन्हें लोक लोकान्तरों में आने - जाने में कोई रुकावट नहीं होती !

अपने पितरों के लिए किये गये श्राद्ध को सफल बनाने एवं पितरों तक पहुँचाने का माध्यम ब्राह्मण ही है अत: ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखते हुए श्राद्धकर्म करना चाहिए !

श्राद्ध करने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है ! आज की आधुनिकता की चकाचौंध में तो और भी आवश्यक है धन का होना ! परंतु धन की स्थिति सदैव सबकी एक समान नहीं होती ! कभी-कभी धन का अभाव भी हो जाता है और श्राद्ध करना भी अनिवार्य है ऐसी परिस्थिति में मनुष्य चिंतित हो जाता है कि श्राद्ध कैसे किया जाय, सनातन धर्म ने प्रत्येक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए नियम बनाए हैं इस दृष्टि से शास्त्रों ने धन के अनुपात से श्राद्ध करने की कुछ व्यवस्थाएं की हैं जैसे 👉

"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि"

▪️अर्थात :--- यदि अन्न - वस्त्र के खरीदने में धन का अभाव हो तो उस परिस्थिति में शाक आदि से श्राद्ध कर देना चाहिए। यदि शाक खरीदने के भी पैसे ना हो तो भी विशेष व्यवस्था बताई गई है।
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"तृणकाष्ठार्जनं कृत्वा प्रार्थयित्वा वराटकम् !
करोति पितृकार्याणि ततो लक्षगुणं भवेत् !!"
----- पद्मपुराण

▪️अर्थात :--- शाक खरीदने के लिए भी पैसे ना होने की स्थिति में श्राद्ध करने के लिए बतााया गया है कि तृण अर्थात् घास काष्छ अर्थात लकड़ी आदि को बेचकर पैसे इकट्ठा करें और उन पैसों से शाक खरीद कर श्राद्ध करें अधिक श्रम से यह श्राद्ध किया गया है अतः यह लाख गुना फल देने वाला होता है देश विशेष और काल विशेष के कारण कभी-कभी लकड़ियां भी नहीं मिलती ऐसी परिस्थिति में शास्त्रों ने बताया है कि घास से श्राद्ध हो सकता है। घास से भला श्राद्ध कैसे हो सकता है ? इसके विषय में बताया गया है कि श्राद्ध के दिन यदि कुछ भी ना हो तो घास काट कर गाय को खिला दे उससे उसको श्राद्ध का फल मिल जाएगा पद्मपुराण के अंतर्गत एक कथा आती है कि 👉

‼️ एक व्यक्ति धन के अभाव से अत्यंत ग्रस्त था उसके पास इतना पैसा नहीं था कि वह शाक खरीद पाए इस तरह शाक से भी श्राद्ध करने की स्थिति में वह नहीं था। आज ही श्राद्ध की तिथि थी कुतप काल भी आ पहुंचा था। इस काल के बीतने पर श्राद्ध नहीं हो सकता था। वह बेचारा घबरा कर रोने लगा कि आखिर श्राद्ध करें तो कैसे करें ? ऐसे में एक विद्वान ने उसे उचित मार्ग बताया और कहा अभी कुतप काल है शीघ्र ही घास काट कर पितरों के नाम पर गाय को खिला दो तुम को श्राद्ध का फल मिल जाएगा। वह दौड़ कर गया घास काट कर लाया और अपने पितरों के प्रति श्रद्धा पूर्वक उस घास को गाय को खिला दिया इस श्राद्ध के फलस्वरूप 👉
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"एतत् पुण्यप्रसादेन् गतौ$सौ सुरमन्दिरम् !"
----- पद्मपुपाण

▪️अर्थात :--- उसको देव लोक की प्राप्ति हुई।

कभी-कभी ऐसी परिस्थिति भी आ जाती है कि घास का मिलना भी संभव नहीं होता तब श्राद्ध कैसे करें ? शास्त्रों ने इसका समाधान भी बताया है कि यदि श्राद्धकर्ता के पास ऐसी परिस्थिति हो कि उसके पास न शाक हो , न धन हो न घास हो , न लकड़ी हो तो श्राद्धकर्ता एकांत स्थान में चला जाय और दोनों हाथ ऊपर उठाकर अपने पितरों से प्रार्थना करने लगे कि 👉
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"न मे$स्ति वित्तं न धनं च नान्यच्छ्राद्धोुयोग्यं स्वपितृन्नतो$स्मि !
तृप्यन्तु भक्त्या पितरौ मयैतौ कृतो भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य !!"

▪️अर्थात :--- हे मेरे पितृगण ! मेरे पास श्राद्ध करने के लिए ना तो धन है न धान्य ! हां , मेरे पास आपके लिए श्रद्धा एवं भक्ति है मैं इन्हीं के द्वारा आप को तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त हो जायं ! मैंने (शास्त्र की आज्ञा के अनुरूप) दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है। श्राद्ध कार्य में साधन संपन्न व्यक्ति को उसके वित्तशाठ्य अर्थात कंजूसी नहीं करनी चाहिए अपने उपलब्ध साधनों से विशेष श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

उपयुक्त विधानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक मनुष्य को किसी न किसी प्रकार से श्राद्ध को अवश्य करना चाहिए शासन ने तो स्पष्ट शब्दों में श्राद्ध का विधान दिया है और श्राद्ध न करने के लिए निषेध ही किया है। कहने का तात्पर्य है कि चाहे जिस प्रकार से हो अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
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"अतो मूलै: फलैर्वापि तथाप्युदकतर्पणै: !
पितृतृप्तिं पिरकुर्वीत् नैव श्राद्धं विवर्जयेत् !!"
----- धर्मसिन्धु

▪️अर्थात :--- धन से धन से , फल से , घास से , शाक से या अपनी श्रद्धा से श्राद्ध को अवश्य करना चाहिए पितरों को तृप्त करने का दायित्व तो सब का बनता है और अंत में कहा गया है कि श्राद्ध को किसी भी परिस्थिति में छोड़ना नहीं चाहिए।

क्रमश: शेष अगले लेख मे........

21/09/2025

*🌹🙏 पितृपक्ष एवं श्राद्घ का पुराणों मे महत्त्व [ 3 ] 🙏🌹*
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श्राद्ध कर्म करते हुए मन को बहुत ही पवित्र एवं पितरों के प्रति समर्पित होना चाहिए ! कोई भार समझकर श्राद्ध कर्म कदापि न किया जाय क्योंकि श्राद्ध करते समय मन का शांत होना बहुत आवश्यक है ! यदि मन में कोई हलचल हुई तो श्राद्ध करने का फल नहीं प्राप्त होता !
जैसा कि कहा गया है 👉

यो$नेन् विधिना श्राद्धं कुर्याद् वै शान्तमानस:।
व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुन:।।
----- यमस्मृति

▪️अर्थात :--- जो प्राणी विधिपूर्वक शांत मन होकर श्राद्ध करता है वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है , तथा फिर संसार चक्र में नहीं आता। अत: प्राणी को पितृगण की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए भी शांत मन से श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इस संसार में श्राद्ध करने वाले के लिए श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणकारी उपाय नहीं है।
इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहा गया है 👉

श्राद्धात् परतरं नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन् श्राद्धं कुर्याद्विचक्षण:।।
----- कूर्मपुराण

▪️अर्थात् :--- इस संसार में श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणप्रद उपाय नहीं है ! अत: बुद्धिमान मनुष्य को यत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्धकर्म सिर्फ पितरों के लिए किया गया कर्म नहीं मानना चाहिए ! यह स्वयं के कल्याण के लिए भी करना चाहिए ! किये गये श्राद्धकर्म से जब पितर संतुष्ट होते हैं तो उनके आशीर्वाद से परिजन सुखी तो होते ही हैं साथ ही उनको आयु , बल , ऐश्वर्य भी प्राप्त होता है ! यथा:

आयु: पुत्रान् यश: स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशून सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ।।
----- गरुड़ पुराण

▪️अर्थात् :--- श्राद्ध अपने अनुष्ठाता अर्थात श्राद्ध करने वालों की आयु को बढ़ा देता है , पुत्र प्रदान कर कुल परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखता है , धन - धान्य का अंबार लगा देता है , शरीर में बल - पौरुष का संचार करता है , पुष्टि प्रदान करता है और यश का विस्तार करते हुए सभी प्रकार के सुख प्रदान करता है | इन सभी शुभ अवसरों को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को अपने पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ! इतना ही नहीं बल्कि श्राद्ध सांसारिक जीवन को तो सुखमय बनाता ही है इसके साथ ही परलोक को भी सुधार देता है और अंत में श्राद्ध करने वाले को मुक्ति भी प्रदान करता है ! जैसा कि कहा गया है👉

आयु: प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च।
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर: श्राद्धतर्पिता:।।
----- मार्कण्डेय पुराण

▪️अर्थात :--- श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु , संतति , धन , विद्या , राज्य , सुख , स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं ! इतना ही नहीं यदि सच्चे मन से अपने पितरों का श्राद्ध किया जाय तो पितरों की कृपा से मनुष्य मोक्ष से भी आगे बढ़कर परमगति को भी प्राप्त किया जा सकता है।

पुत्रो व भ्रातरो वापि दौहित्र: पौत्रकस्तथा ।
पितृकार्ये प्रसक्ता ये ते यान्ति परमां गतिम् ।।
----- अत्रिसंहिता

▪️अर्थात :--- जो पुत्र , भ्राता , पौत्र अथवा दौहित्र आदि पितृकार्य (श्राद्ध अनुष्ठान ) में संलग्न रहते हैं वे निश्चय ही परम गति को प्राप्त होते हैं ! मात्र श्राद्ध करने ही वाले ही नहीं बल्कि और किसे श्राद्ध का फल मिलता है।
यह बताते हुए कहा गया है👉

"उपदेष्टानुमन्ता च लोके तुल्यफलौ स्मृतौ"
----- बृहस्पति संहिता

▪️अर्थात :--- जो श्राद्ध करता है , जो उसके विधि-विधान को जानता है , जो श्राद्ध करने की सलाह देता है और जो श्राद्ध का अनुमोदन करता है इन सभी को श्राद्ध का पुण्य फल मिल जाता है।

🔹️ अब श्राद्ध करने से क्या फल मिलता है यह भी पढ़ें 👉

सनातन ग्रन्थों में श्राद्ध न करने से होने वाली जो हानि बताई गई है उसे सुनकर या जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अत: श्राद्धतत्व से परिचित होना तथा उसके अनुष्ठान के लिए तत्पर रहना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य बन जाता है। यह सर्वविदित है कि मृत व्यक्ति इस महायात्रा में अपना स्थूल शरीर भी साथ में नहीं ले जा सकता ! तब वह पाथेय (अन्न जल) कैसे ले जा सकता है ? उस समय उसके सगे संबंधी श्राद्ध विधि से उसे जो कुछ देते हैं वही उसे मिलता है। शास्त्र ने मरणोपरांत पिंडदान की व्यवस्था की है ! सर्वप्रथम शव यात्रा के अंतर्गत 6 पिण्ड दिए जाते हैं जिनसे भूमि की अधिष्ठातृ देवताओं की प्रसन्नता तथा भूत पिसाचों द्वारा होने वाली बाधाओं का निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं। इसके साथ ही दसगात्र में दिए जाने वाले 10 पिण्डों के द्वारा जीव को आतिवाहिक सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है ! यह मृत व्यक्ति की महायात्रा के प्रारंभ की बातें हुई ! अब आगे उसके रास्ते के भोजन अन्न जल की आवश्यकता पड़ती है जो उत्तमषोडशी में दिए जाने वाले पिंडदान से उसे प्राप्त होता है। यदि परिजनों के द्वारा उपरोक्त श्राद्धक्रिया नहीं की जाती है तो ---

लोकान्तरेषु ये तोयं लभन्ते नान्नमेव च।
दत्तं न वंशजैर्येषां ते व्यथां यान्ति दारुणम् ।।
----- कूर्मपुराण

▪️ अर्थात् :--- यदि सगे - संबंधी पुत्र - पौत्र आदि उपरोक्त कर्म नहीं करते हैं , मृतक का पिंडदान अन्न - जल से नहीं करते हैं तो आत्मा को भूख प्यास से बहुत दारुण दुख होता है।

यह तो रही मृत आत्मा की बात कि उसे कितना कष्ट होता है और अब यह जान लिया जाए कि मृतक के परिजन यदि मृत आत्मा का श्राद्ध नहीं करते हैं तो परिजनों को क्या कष्ट होता है।

श्राद्ध न करने वाले को भी पग पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है। मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे संबंधियों का रक्त चूसने लगता है ! यथा ---

"श्राद्धं न कुरुते मोहात् तस्य रक्तं पिबन्ति ते "
----- ब्रह्मपुराण

🔹️ इतना ही नहीं पितर अपने ही परिजनों को श्राप भी देते हैं। यथा ---

"पितरस्तस्य शापं दत्वा प्रयान्ति च"
----- नागरखण्ड

पितरों के श्राप से श्रापित होकर अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट ही कष्ट झेलना पड़ता है।

न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुष:।
न च श्रेयोधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धं विवर्जितम् ।।
----- हारीतस्मृति

▪️अर्थात् :--- उस परिवार में पुत्र नहीं उत्पन्न होते , कोई निरोग नहीं रहता , किसी की लंबी आयु नहीं होती ! कहने का तात्पर्य है कि किसी भी प्रकार से उस परिवार का कल्याण नहीं होता ! सिर्फ इतना ही नहीं।

"श्राद्धमेतन्न कुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते"
----- विष्णुस्मृति

▪️अर्थात् :--- पितरों का श्राद्ध न करने वाले परिजनों को नरक भी जाना पड़ता है ! इसलिए सभी को समयानुसार अपने पितरों के लिए श्राद्घकर्म करते रहना चाहिए। उपनिषद में कहा गया है।

देवपितृकार्याभ्यां न प्रमादितव्यम्"
------ तैत्तरीय उपनिषद

▪️अर्थात् :--- किसी भी मनुष्य को देवता तथा पितरों के कार्यों में प्रमाद कदापि नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रमाद से प्रत्यवाय होता है। इसलिए यह सब का कर्तव्य बनता है कि हम जिन पूर्वजों की संपत्तियों पर ऐश्वर्य भोग रहे हैं उनके लिए पितृयज्ञ अर्थात श्राद्ध कर्म अवश्य करें।

क्रमशः शेष अगले लेख मे.............

21/09/2025

*🌹पितृपक्ष एवं श्राद्ध का पुराणों में महत्त्व [ 2 ]🌹*

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में पुत्र की कामना करता है, क्योंकि हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा है :

“अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति”
अर्थात् — बिना पुत्र के सद्गति प्राप्त नहीं हो सकती।

पुत्र का क्या कार्य है? यह बताते हुए हमारे शास्त्र कहते हैं :

“पुन्नामनरकात् त्रायते इति पुत्रः”
अर्थात् — जो नरक से रक्षा करे वही पुत्र है।

सामान्यतः जीव से इस जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते रहते हैं। पुण्य का फल है — स्वर्ग और पाप का फल है — नरक। नरक में पापी को घोर यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। स्वर्ग और नरक का भोग करने के पश्चात् जीव पुनः अपने कर्मानुसार चौरासी लाख योनियों में भटकने लगता है। पुण्यात्मा मनुष्ययोनि अथवा देवयोनि को प्राप्त करते हैं और पापात्मा पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि तिर्यक् योनियों को प्राप्त करते हैं।

इसी कारण शास्त्रों के अनुसार पुत्र-पौत्रादिकों का यह कर्तव्य है कि वे अपने माता-पिता तथा पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त कर्म करें, जिससे उन मृतात्माओं को परलोक में अथवा अन्य योनियों में भी सुख की प्राप्ति हो सके।

इसीलिए भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म में पितृऋण से मुक्त होने हेतु अपने माता-पिता तथा परिवार के दिवंगत प्राणियों के लिए श्राद्धकर्म करने की अनिवार्यता बताई गई है। श्राद्धकर्म को पितृकर्म भी कहते हैं और पितृकर्म का तात्पर्य है — पितृपूजा।

🔸️पितृकार्य में शुद्धता का महत्त्व

एक बात विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है कि पितृकार्य अथवा श्राद्ध करते समय वाक्य की शुद्धता तथा क्रिया की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि —

“पितरो वाक्यमिच्छन्ति, भावमिच्छन्ति देवताः”

अर्थात् — पितृगण वाक्य और क्रिया की शुद्धता को ही स्वीकार करते हैं; जबकि देवता भाव की शुद्धता से ही प्रसन्न हो जाते हैं, भले ही क्रिया या वाक्य में कुछ त्रुटि हो जाए।
अतः पितृकार्य में देवकार्य की अपेक्षा अधिक सावधानी की आवश्यकता है। तभी श्राद्ध सफल हो सकता है।

🔸️श्राद्ध क्या है?

कुछ अनभिज्ञ लोग यह प्रश्न करते हैं कि श्राद्ध क्या है?

धर्मशास्त्र इसका उत्तर देते हैं —
“श्रद्धया पितृन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम्”

अर्थात् — पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक श्रद्धा सहित जो कर्म किए जाते हैं, वही श्राद्ध कहलाता है।

‘श्रद्धा’ शब्द से ही ‘श्राद्ध’ शब्द की उत्पत्ति हुई है।
जैसे —

“श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्” — अर्थात् श्रद्धा के लिए किया गया कर्म श्राद्ध है।

“श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम्” — अर्थात् श्रद्धा से सम्पन्न किया गया कर्म श्राद्ध है।

“श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छ्राद्धम्” — अर्थात् जो श्रद्धा से दिया जाए वही श्राद्ध है।

इस प्रकार श्रद्धया कृत कर्मविशेष को ही श्राद्ध कहा जाता है। इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं, जिसका उल्लेख मनुस्मृति एवं अन्य धर्मशास्त्रों तथा पुराणों में मिलता है।

🔸️श्राद्ध का शास्त्रीय आधार

कूर्मपुराण में कहा गया है —

“देशे काले च पात्रे च विधिना हविषा च यत् ।
तिलैर्दर्भैश्च मन्त्रैश्च श्राद्धं स्याच्छ्राद्धया युतम् ॥”

अर्थात् — देश, काल और पात्र के अनुसार, तिल, दर्भ तथा मन्त्रों के द्वारा विधिपूर्वक श्रद्धा सहित किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है।

इसी प्रकार —

“संस्कृतं व्यञ्जनाद्यं च पयोमधुघृतान्वितम्।
श्रद्धया दीयते यद्वाच्छ्राद्धं तेन निगद्यते ॥”
~ कूर्मपुराण

अर्थात् — दुग्ध, घृत, मधु से युक्त उत्तम व्यञ्जन, जिसे सुसंस्कृत करके श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणादि को पितृगण के उद्देश्य से दिया जाए, वही श्राद्ध है।

ब्रह्मपुराण में भी कहा गया है —

“देशे काले च पात्रे श्रद्धया विधिना च यत् ।
पितृनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ॥”

अर्थात् — देश, काल और पात्र के अनुसार विधिपूर्वक श्रद्धा से पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मण को प्रदान किया जाए, उसे श्राद्ध कहा गया है।

क्रमशः — शेष अगले भाग में...

21/09/2025

🍁पितृपक्ष एवं श्राद्ध का पुराणों में महत्त्व [ 1]
✍️ .............❗️

सनातन धर्म में सबको स्थान देते हुए, सबके लिए कुछ काल विशेष निर्धारित किया गया है। इसी क्रम में आश्विन कृष्णपक्ष को पितृपक्ष मानकर पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का परम मंगल अवसर माना गया है। इस पखवाड़े में पितरों के निमित्त श्राद्धादि कर्म किया जाता है।

प्रायः लोग देवपूजन अथवा देवकार्य तो अत्यन्त श्रद्धा से करते हैं, किन्तु पितृपक्ष में पितरों की उपेक्षा कर बैठते हैं; जबकि हमारे शास्त्रों में स्पष्टतः कहा गया है—

देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।
देवताभ्यो हि पूर्वं पितृणामाप्यायनं वरम्।।
(हेमाद्रि)

अर्थात् : देवकार्य की अपेक्षा पितृकार्य की विशेषता मानी गयी है। अतः देवकार्य करने से पूर्व पितरों को तृप्त करने का यत्न करना चाहिए। जो मनुष्य पितृपक्ष में पितरों की उपेक्षा करता है, उसके द्वारा किया गया कोई भी देवपूजन कभी सफल और फलदायी नहीं होता।

पितृकार्य में सबसे सरल तथा सर्वाधिक उपयोगी विधान श्राद्ध है। अपने पितरों को संतुष्ट व प्रसन्न रखने के लिए श्राद्ध से श्रेष्ठ कोई उपाय नहीं है। जैसा कि कहा गया है—

श्राद्धात् परतरं नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद् विचक्षणः।।
(हेमाद्रि)

अर्थात् : श्राद्ध से बढ़कर कल्याणकारी अन्य कोई कर्म नहीं है। अतः प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक पितरों का श्राद्ध करते रहना चाहिए।

जो मनुष्य पितृपक्ष में तर्पण एवं श्राद्ध नहीं करता, वह पितृदोष का भागी होकर अनेक प्रकार की आधि-व्याधियों का शिकार बनता है तथा जीवनभर कष्ट भोगता है। श्राद्ध-कर्म देखने में भले साधारण प्रतीत हो, किन्तु उसका फल अत्यन्त व्यापक होता है।

एवं विधानतः श्राद्धं कुर्यात् स्वविभवोचितम्।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत् प्रीणाति मानवः।।
(ब्रह्मपुराण)

अर्थात् : श्राद्ध से केवल अपने तथा अपने पितरों की ही तृप्ति नहीं होती, अपितु जो मनुष्य विधिपूर्वक, अपनी सामर्थ्यानुसार श्राद्ध करता है, वह ब्रह्मा से लेकर तृण (घास) पर्यन्त समस्त प्राणियों को संतुष्ट कर देता है।

श्राद्ध को भार समझकर कदापि नहीं करना चाहिए, अपितु यह श्रद्धा का विषय है। पूर्ण श्रद्धा से, पितरों के प्रति समर्पण भाव रखकर, शांत मन से किया गया श्राद्ध सर्वथा मंगलकारी होता है।

योनेन विधिना श्राद्धं कुर्याद् वै शान्तमानसः।
व्यपेतकल्मषो नित्यं याति नावर्तते पुनः।।
(कूर्मपुराण)

अर्थात् : जो व्यक्ति शांतचित्त होकर विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह पापरहित होकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्राद्ध का विधान मनुष्य के अनेक पातकों का नाश कर देता है। पितरों की तृप्ति से वे धन-धान्य एवं समृद्धि प्रदान करते हैं।

यह सर्वविदित है कि मृत्यु से कोई भी जीव बच नहीं सकता। जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु ही है—इस ध्रुव तथ्य को सभी स्वीकार करते हैं और प्रत्यक्ष भी देखते हैं।

जीवात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होता है; जब वह शरीर से निकलता है, तब कोई भी मनुष्य उसे अपनी आंखों से नहीं देख सकता। वही जीवात्मा अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने के लिए अंगुष्ठपरिमाण का आतिवाहिक सूक्ष्म (अतीन्द्रिय) शरीर धारण करता है, जैसा कि कहा गया है—

तत्क्षणात् सोऽथ गृह्णाति शारीरं चातिवाहिकम्।
अंगुष्ठपर्वमात्रं तु स्वप्राणैरेव निर्मितम्।।
(स्कन्दपुराण)

इसी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से जीवात्मा अपने धर्म और अधर्मानुसार सुख-दुःख का अनुभव करता है। पापकर्मी मनुष्य यमलोक की यातनाएँ भोगते हुए यमराज के समीप जाते हैं तथा पुण्यात्मा लोग प्रसन्नता सहित धर्मराज के लोक में गमन करते हैं।

मनुष्य इस लोक से प्रस्थान के पश्चात् अपने पारलौकिक जीवन को सुख, समृद्धि एवं शांति से युक्त किस प्रकार बनाएगा, तथा मृत्यु के उपरान्त परिजनों द्वारा उसके उद्धारार्थ क्या किया जाएगा—यह अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है।

परिजनों द्वारा किया जाने वाला यह कर्तव्य ही श्राद्धकर्म कहलाता है। अतः यह प्रत्येक प्राणी का परम धर्म है कि वह समय-समय पर अपने पितरों के निमित्त श्राद्धकर्म करता रहे।

(क्रमशः — शेष अगले लेख में...)

20/09/2025
17/09/2025

।। श्री विश्वकर्मा जयंती के पावन अवसर पर ।।

नमोस्तु विश्वरूपाय विश्वरूपाय ते नमः।
नमो विश्वात्माभूताय विश्वकर्मा नमोस्तुते।।
अर्थ - विश्व जिसका रूप है तथा विश्व जिसकी आत्मा है , उन विश्वकर्मा जी को मैं नमन करता हूं।

ऋग्वेद के दशम मंडल में सूक्त ८१ एवं सूक्त ८२ के १४ मंत्रों को विश्वकर्मा सूक्त कहते हैं ।
विश्वकर्मा जयंती कन्या संक्रांति को मनाई जाती है।
भारतीय मजदूर संघ विश्वकर्मा जयंती को राष्ट्रीय श्रम दिवस के रूप में पालन करता है।

संस्कृत साहित्य में विश्वकर्मा शब्द के कई अर्थ हैं।
विश्वकर्मा का प्रथम अर्थ उस विराट शक्ति का बोधक है , जिसने सृष्टि की रचना की।
" यो विश्व जगत् करोत्यत: स: विश्वकर्मा। "
अर्थात् जो संसार की रचना करता है , वह विश्वकर्मा है।
वेदों में वर्णित है -
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा
सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।
अर्थ - सभी मनुष्यों के हृदय में सदा बसे हुए अंतर्यामी परमात्मा - यही देव विश्वकर्मा हैं।
इस दृष्टि से सृष्टिकर्ता , परमात्मा आदि अर्थ विश्वकर्मा के होते हैं ।

दूसरा अर्थ अंगिरा वंश में उत्पन्न विश्वकर्मा नामक एक विभूति से जुड़ा हुआ है , जो विश्व के आदि शिल्पाचार्य का द्योतक है। इनके पिता आठवें वसु प्रभास और माता देवगुरु बृहस्पति की भगिनी वरस्त्री थी। इनका विवाह भक्त प्रहलाद की पुत्री " रचना " से हुआ था।

" विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र " ग्रंथ के रचयिता विश्वकर्मा जी माने जाते हैं। जगत का यह सर्वप्रथम ग्रंथ वास्तुकला को शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करता है।
सौर शक्ति का उपयोग करके विश्वकर्मा जी ने विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र , शिव के लिए त्रिशूल और देवराज इंद्र के लिए विजय नामक रथ बनाया था।
विश्वकर्मा जी ने इंद्र के लिए इंद्रलोक और सुतल नामक पाताल तथा दानवों के लिए लंका का निर्माण किया था।
भगवान श्रीकृष्ण के लिए द्वारिका और वृंदावन का तथा पांडवों के लिए हस्तिनापुर का निर्माण किया था।

प्रसिद्ध पुष्पक विमान इन्होंने ही बनाए थे। इस विमान की विशेषता यह थी कि वह भूतल पर , जल में तथा व्योम (आकाश) - तीनों से भ्रमण कर सकता था। " क्वचित भूमौ , क्वचित व्योम्नि , गिरिश्रृंगे जलेक्वचित् " - ऐसा वर्णन मिलता है इस विमान का।

भगवान श्री राम के लिए सेतु निर्माण का नेतृत्व करनेवाले वानरराज नल इन्हीं के अंश से उत्पन्न हुए थे। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में सागर ने प्रभु श्री राम से नल का परिचय " तनयो विश्वकर्मण: " कहकर कराया था।

तीसरा अर्थ है - ' विश्वकर्मा ' उपाधि अर्थात् विशिष्ट कार्यों में दक्ष होने के कारण अनेक व्यक्तियों को विश्वकर्मा उपाधि प्रदान की गई थी। आज भी भारत के स्वर्णकार (सोनार ) , लौहकार (लोहार) , कुंभकार (कुम्हार) आदि स्वयं को विश्वकर्मा के वंशज मानते हैं और गौरव का अनुभव करते हैं। कई लोगों की उपाधि (टाइटल) आज भी विश्वकर्मा है।

पुराणों में उल्लेख है -
ज्ञानेनवयसा वृद्धो दर्शनीय किशोरवत्।
चतुर्भुजी विश्वकर्मा शिल्पना च गुरु गुरु।।
अर्थ - विश्वकर्मा जी ज्ञान में वृद्धसम (अनुभवी) हैं , किंतु देखने में किशोर जैसे हैं। चतुर्भुज धारी विश्वकर्मा जी शिल्पकर्म करने वाले गुरुओं के भी गुरु हैं।
इसलिए बंगाल में वृद्ध विश्वकर्मा जी की प्रतिमा नहीं बनाई जाती।

।। आद्य - शिल्पाचार्य भगवान विश्वकर्मा की जय ।।

10/09/2025

#नारायणी_बलि_और_त्रिपिंडी_श्राद्ध_क्या_होता_हैं?

भारतीय संस्कृति में पितृकर्म और श्राद्ध संस्कारों का विशेष महत्व होता है. इन कर्मों का उल्लेख ऋग्वेद, गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, स्मृति ग्रंथ और भविष्य पुराण में देखने को मिलता है. श्राद्ध की दो प्रमुख विधियां हैं, नारायणी बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध. दोनों विधियां पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए है. लेकिन दोनों का उद्देश्य और प्रक्रिया एक दूसरे से काफी भिन्न है.

नारायण बलि क्या होती है?
पितृ पक्ष से जुड़ा एक धार्मिक अनुष्ठान जो पितृदोष निवारण और अकाल मृत्यु के कारण मरे हुए लोगों के लिए किया जाता है. अगर किसी की मृत्यु अकाल स्थिति, दुर्घटना, आत्महत्या, गर्भपात, हिंसक या असामान्य तरीके से होती है, तब आत्मा की शांति के लिए नारायण बलि अनुष्ठान को किया जाता है.

यह अनुष्ठान तीन दिनों का होता है, जिसमें गेहूं के आटे से बने कृत्रिम शरीर का प्रयोग कर अंतिम संस्कार किया जाता है. साथ ही मंत्रों के जरिए आत्माओं की अधूरी इच्छा को पूरा करके उन्हें शांति मिलती है.

नारायण बलि श्राद्ध कर्म मुख्य रूप से त्र्यंबकेश्वर (नासिक), सिद्धपुर (गुजरात), गया (बिहार) आदि तीर्थों पर किया जाता है. नारायण बलि का जिक्र गरुड़ पुराण के पूर्व खंड, प्रेत कल्प और धर्मसिंधु में उल्लेख किया गया है. इसके बिना पितृ दोष की निवृत्ति नहीं मानी जाती है.

त्रिपिंडी श्राद्ध क्या है?
त्रिपिंडी श्राद्ध का मतलब पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का पिंडदान करना. त्रिपिंडी श्राद्ध में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतीकात्मक मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके विधिवत पूजन किया जाता है. माना जाता है कि पूर्वज की आत्मा असंतुष्ट होती है तो वो अपने आने वाली पीढ़ियों को परेशान करती है. ऐसे में इन आत्माओं को शांत करने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है.

महाभारत के अनुशासन पर्व और गया महात्मय में त्रिपिंडी श्राद्ध का महत्व बताया गया है. इस कर्म को न करने पर पितर नाराज हो सकते हैं.

नारायण बलि और त्रिपिंडि श्राद्ध में मुख्य अंतर

नारायण बलि- अकाल या असामान्य मौत और पितृदोष शांति के लिए कराया जाता है.
त्रिपिंडि श्राद्ध- सामान्य पितरों की तृप्ति और मोक्ष के लिए किया जाता है.
नारायण बलि- खास तीर्थ स्थान और प्रायश्चित विधि पर आधारित होती है.
त्रिपिंडि श्राद्ध- नियमित श्राद्ध परंपरा का हिस्सा है.
नारायण बलि- जीवत वंशजों की समस्याओं को खत्म करने का उपाय है.
त्रिपिंडि श्राद्ध- पितरों के लिए आवश्यक कर्म माना गया है.

01/09/2025

*🕉हिन्दू संस्कार🕉*
कैसे मिलता है पितरों को भोजन, साथ में जानिए श्राद्ध करने से मिलते हैं कौन से लाभ?????

प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिंड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कंद पुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है।


एक बार राजा करंधम ने महायोगी महाकाल से पूछा, 'मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिंडदान किया जाता है तो वह जल, पिंड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?'

भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियंता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरूप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गईं स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। 5 तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति- इन 9 तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर 10वें तत्व के रूप में साक्षात भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं इसलिए देवता और पितर गंध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्द तत्व से तृप्त रहते हैं और स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वे वर देते हैं।

पितरों का आहार है अन्न-जल का सारतत्व- जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सारतत्व (गंध और रस) है। अत: वे अन्न व जल का सारतत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।


किस रूप में पहुंचता है पितरों को आहार?

नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है, विश्वदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं। यदि पितर देव योनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां दिया गया अन्न उन्हें 'अमृत' होकर प्राप्त होता है। यदि गंधर्व बन गए हैं, तो वह अन्न उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है। यदि पशु योनि में हैं, तो वह अन्न तृण के रूप में प्राप्त होता है। नाग योनि में वायु रूप से, यक्ष योनि में पान रूप से, राक्षस योनि में आमिष रूप में, दानव योनि में मांस रूप में, प्रेत योनि में रुधिर रूप में और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य तृप्तिकारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता है।

जिस प्रकार बछड़ा झुंड में अपनी मां को ढूंढ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मंत्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं। जीव चाहें सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।

श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मण पितरों के प्रतिनिधि रूप होते हैं। एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गईं। ब्राह्मण भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं-

'मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे मैं आपको बताती हूं। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारण कर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छाया रूप में सटकर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघन कर वहां कैसे खड़ी रहती? इसलिए मैं ओट में हो गई।'

तुलसी से पिंडार्चन किए जाने पर पितरगण प्रलयपर्यंत तृप्त रहते हैं। तुलसी की गंध से प्रसन्न होकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक चले जाते हैं।

पितर प्रसन्न तो सभी देवता प्रसन्न- श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है।

आयु: पुत्रान् यश: स्वर्ग कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।। (यमस्मृति, श्राद्धप्रकाश)

यमराजजी का कहना है कि श्राद्ध करने से मिलते हैं ये 6 पवित्र लाभ-

* श्राद्ध कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।

* पितरगण मनुष्य को पुत्र प्रदान कर वंश का विस्तार करते हैं।

* परिवार में धन-धान्य का अंबार लगा देते हैं।

* श्राद्ध कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।

* पितरगण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।

* श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाले के परिवार में कोई क्लेश नहीं रहता, वरन वह समस्त जगत को तृप्त कर देता है।

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