28/06/2026
गीत: "अब जाग मुसाफिर, भोर भई"
अब जाग मुसाफिर, भोर भई,
तू क्यूँ रातों में खोया है?
जो सोया है, वो खोया है,
जो जागा है, वो पाया है।
उठ, देख जरा उस सूरज को,
जो अंधियारों से जीता है,
तू भी तो अंश उसी का है,
फिर क्यूँ हिम्मत को खोया है?
बाधाएँ तो केवल पत्थर हैं,
तेरे रस्ते की धूल हैं ये,
तू ठान ले तो ये मिट जाएँ,
वरना तो शूल ही शूल हैं ये।
तेरे बाजुओं में वो ताकत है,
जो पर्वत को भी झुका दे,
तू अपनी राह खुद बना,
जहाँ कदम पड़े, इतिहास बना।
अब जाग मुसाफिर, भोर भई...
मत सोच कि साथी कौन तेरा,
मत देख कि मंज़िल कितनी दूर,
तेरा हौसला ही है मीत तेरा,
तेरा बढ़ना ही है सच्चा नूर।
गिरना तो एक शुरुआत है,
गिरकर ही उठना सीखा है,
जिसने भी इतिहास रचा,
उसने ही तूफ़ां को जीता है।
अब जाग मुसाफिर, भोर भई...
चले चल, रुकना तेरा काम नहीं,
झुकना तो तेरा नाम नहीं,
जब तक न मिले मंज़िल अपनी,
तब तक तो कोई आराम नहीं।
अब जाग मुसाफिर, भोर भई,
#स्वरचित