26/01/2015
सभी दोस्तों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं| एक ऐसा जीवन-जागृत समूह बनाना चाहते है जो किसी नियमों, कानूनों और सिद्धान्तों से बंधा हआ न हो। जिसमें बंधने का कोई आग्रह न हो, जिसका कोई विधान न हो, जिससे एकरूपता की भी चिंता न हो बल्कि मित्रों के प्रति सम्मान, उनके भिन्न विचारों के प्रति भी, जिससे स्वतंत्र चिंतन पैदा हों | हम ऐसे विचारों और संदेशों को लोगों तक पहॅुचायें जिससे उनका मंगल हो। इसलिये हमें संगठन नहीं बनाना मित्रों का समूह बनाना है। यह मेरा ही नहीं सभी मित्रों का कर्तव्य होगा जो इसे संगठन बनाने से रोक सके। बुद्ध और महावीर ने अपनी बात उस जमाने में जहॉ साधन सीमित थे। इतने लोगों तक पहॅुचायी तो आज साधन सम्पन्न युग में हम अच्छे विचारों की गंगा प्रवाहित कर मानव जीवन को शुद्ध सत्य में परिचित करा सकते है। ''लेकिन यह मेरे अकेले के वश की बात नहीं है। उसके लिये बहुत मित्रों की जरूरत है, बहुत प्रकार के मित्रों की जरूरत है। कोई कुछ कर सकता है, कोई बुद्धि से विचार कर सकता है, कोई और तरह से.................। जो जिसकी समझ में आये, जो जिसका व्यक्तित्व है वह उसी तरह से सहयोगी हो सकता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि मित्रों का वर्ग जितना बड़ा हो उतना ही अच्छा है, क्योंकि जितने ही भिन्न तरह के लोग आयेंगे उतनी ही भिन्न तरह भी सेवायें मिलेंगी और ज्यादा बड़ा समूह बना सकेंगे। अक्सर यह होता है कि मित्रों की सीमायें तय हो जाती है। अपरिचित लोगों से मन से एक भय रहता है। इसी भय के कारण हर समूह सीमित हो जाता है। यदि इस आग को विराट और व्यापक बनाना है तो इस तरह का भय छोड़ना होगा। हमें इतना समरस होना है, हमारा ह्रदय इतना विस्तीर्ण हो हमे अपनी भुजायें इतनी दूरतक फैलानी है कि विपरीत से विपरीत व्यक्ति को भी हम समायुक्त कर लेंे। छोड़ेे हम एक को भी नहीं। जो हमसे विल्कुल भिन्न है उसकी भी हम अपने भीतर जगह बना लें, उसकी उपयोगिता भी खोज लेंे कि वह हमारे किस काम आ सके। यदि कोई सोचे कि भिन्न मत के, भिन्न दृ-िष्ट के, मिन्न व्यक्तित्व के लोग भीतर न आये तो फिर बड़ा काम नहीं हो सकता। कोई छोटी सी नदी छोटी ही रह जायेगी। अगर वह यह सोचे कि हर दूर से आने वाला नाला और नदी मुझसे न मिले, पता नहीं किस कीचड़ को ले आये। यदि ऐसा कोई नदी सोचे तो वह नाली रह जायेगी फिर वह महानदी नहीं बन सकती, गंगा नहीं बन सकती। यदि गंगा बनना हो तो सबको समाविष्ट करना ही होगा। आज समाज को क्षेत्र वाद, जाति वाद और जाने कितने के विक़्रत द्रष्टिकोनो के जरिये बोट बॅंक की राजनीति कर उसे अनेक संगठनों में विभाजित कर दिया है जिनका उद्देश्य केवल शक्ति प्रदर्शन और मीडिया मंे अपना महिमामण्डन कराना है। ये संगठन समाज को वि-िभन्न गुटों मंे विभाजित करने का काम कर रहे है और राजनैतिक रोटियां सेक रहे है। ऐसे लोग अपने किया कलापों से अपने आपको प्रति-िष्ठत सावित करने का प्रदर्शन कर रहे है। हमें बहुत व्यापक समूह बनाना है। संगठन कभी व्यापक नहीं होते इस समूह में बंधने कीं कोई जोर जवरदस्ती नहीं, उसमें भिन्नता के लिये स्वीकृति हो, सबके लिये मुक्ति हो, बंधन न हों कोई भी भीतर आये या वाहर जाये कोई फर्क नहीं पड़े। मित्रों का एक व्यापक दल बन सके। जिससे बड़े पैमाने पर देsh में आध्यात्मिक क्रान्ति की जा सके और वह जरूरी भी है। यदि हम उसके लिए रास्त भी साफ कर सकें जिस पर वह क्रान्ति गुजर जाये तो ही काफी है।