PAPA NGO - Progressive Association of Parents Awareness

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Parents & Students Rights | RTE Guidance | प्राइवेट स्कूलों की मनमानी, फीस विवाद और एडमिशन समस्याओं में सहायता | अभिभावक जागरूकता एवं लीगल सपोर्ट | PAPA NGO, Agra (80G)

आगरा कॉलेज आगरा में बड़ा मामला #शिक्षा संस्थानों में भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं, छात्रों के भविष्य से विश्वासघात ...
14/05/2026

आगरा कॉलेज आगरा में बड़ा मामला

#शिक्षा संस्थानों में भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं, छात्रों के भविष्य से विश्वासघात है

के एक प्रतिष्ठित कॉलेज के पांच पूर्व प्राचार्यों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज होना शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है. खबर के अनुसार मामला संविदा भर्ती और बिना अनुमोदन नियुक्तियों से जुड़ा है, जिसमें जांच के बाद विजिलेंस ने कार्रवाई की है. आरोप है कि नियमों की अनदेखी कर शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्तियां की गईं तथा बाद में सेवा विस्तार भी दिया गया.

शिक्षा संस्थानों को समाज में पारदर्शिता, नैतिकता और जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है. जब इन्हीं संस्थानों में नियुक्तियों, प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय प्रक्रियाओं में अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान छात्रों और योग्य अभ्यर्थियों को होता है. भ्रष्टाचार के कारण योग्य उम्मीदवार अवसरों से वंचित हो जाते हैं और शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमजोर पड़ता है.

यह मामला केवल एक कॉलेज तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए. देशभर में कई शिक्षण संस्थानों में संविदा नियुक्तियों, मानकों की अनदेखी और प्रशासनिक अपारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. आवश्यकता इस बात की है कि सभी सरकारी और सहायता प्राप्त संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और सार्वजनिक निगरानी के दायरे में लाई जाए. नियुक्तियों से संबंधित सभी दस्तावेज और अनुमोदन प्रक्रिया ऑनलाइन उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि भविष्य में किसी प्रकार की मनमानी की गुंजाइश न रहे.

यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वर्षों तक ऐसी अनियमितताएं बिना जवाबदेही के कैसे चलती रहीं. केवल निचले स्तर पर कार्रवाई कर देने से समस्या समाप्त नहीं होगी. प्रशासनिक निगरानी और ऑडिट व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि शिक्षा संस्थानों में भ्रष्टाचार समाज और छात्रों दोनों के भविष्य के साथ अन्याय है. नियुक्तियों और प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करना सरकार और शिक्षा विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, ताकि शिक्षा व्यवस्था पर जनता का विश्वास बना रहे.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

 #कागज़ों  में नहीं, विद्यालयों में दिखनी चाहिए शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई  में विद्यालय निरीक्षण के दौरान पांच स्कूल बंद...
14/05/2026

#कागज़ों में नहीं, विद्यालयों में दिखनी चाहिए शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई

में विद्यालय निरीक्षण के दौरान पांच स्कूल बंद मिलना और बड़ी संख्या में शिक्षकों का अनुपस्थित पाया जाना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करता है. खबर के अनुसार निरीक्षण में 83 शिक्षकों के सापेक्ष केवल 43 शिक्षक उपस्थित मिले, जबकि कुछ विद्यालयों में एक भी शिक्षक मौजूद नहीं था. यह स्थिति उन लाखों बच्चों के भविष्य पर सीधा असर डालती है जो सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं.

विद्यालय केवल भवन नहीं होते, वे बच्चों के सपनों और समाज के भविष्य की आधारशिला होते हैं. जब शिक्षक समय पर विद्यालय नहीं पहुंचते, स्कूल बंद मिलते हैं या शिक्षण सामग्री का उपयोग ही नहीं होता, तब सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चों को होता है जिनके पास निजी शिक्षा का विकल्प नहीं है.

निरीक्षण के दौरान पाठ्य पुस्तकों, कार्यपुस्तिकाओं और शिक्षण-अधिगम सामग्री के वितरण में अनियमितताएं भी सामने आईं. यह दर्शाता है कि कई स्थानों पर योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित हैं. शिक्षा विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय किए बिना केवल निलंबन और नोटिस जारी कर देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा. जरूरत इस बात की है कि नियमित मॉनिटरिंग, पारदर्शी उपस्थिति प्रणाली और सामुदायिक निगरानी को मजबूत किया जाए.

यह भी चिंाजनक है कि कई बार निरीक्षण की सूचना पहले से पहुंच जाती है, जिससे वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती. यदि सरकार वास्तव में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना चाहती है तो उसे केवल आंकड़ों और पोर्टल आधारित रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर कक्षा-कक्ष की वास्तविक स्थिति पर ध्यान देना होगा. बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तभी मिलेगी जब विद्यालयों में शिक्षक नियमित रूप से उपस्थित हों, पढ़ाई प्रभावी ढंग से हो और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाए.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि सरकारी विद्यालयों में अनुपस्थिति और लापरवाही के मामलों पर सख्त कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन इसके साथ ही शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और निरंतर निगरानी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए. बच्चों का भविष्य किसी भी प्रकार की प्रशासनिक उदासीनता की कीमत पर दांव पर नहीं लगाया जा सकता.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है आप क्या कहते हैं..? #मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार बच्चों की समझ और आत्मविश्वास से जुड़ा प्रश...
14/05/2026

सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है आप क्या कहते हैं..?

#मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार बच्चों की समझ और आत्मविश्वास से जुड़ा प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि शिक्षा उसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे बच्चा अच्छी तरह समझ सके. अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति और जानकारी प्राप्त करने के अधिकार से भी जोड़ा है. राजस्थान सरकार को राजस्थानी भाषा को स्कूल शिक्षा में मान्यता देने के निर्देश के साथ यह संदेश भी स्पष्ट हुआ है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि बच्चे तक ज्ञान को सहज और प्रभावी रूप से पहुंचाना है.

देश में लंबे समय से अंग्रेज़ी माध्यम को प्रतिष्ठा और बेहतर भविष्य से जोड़कर देखा जाता रहा है. इसके कारण बड़ी संख्या में बच्चे ऐसी भाषा में पढ़ाई करने को मजबूर हो जाते हैं जिसे वे पूरी तरह समझ ही नहीं पाते. परिणामस्वरूप बच्चे रटने की संस्कृति में फंस जाते हैं, उनकी रचनात्मकता प्रभावित होती है और शुरुआती कक्षाओं में ही पढ़ाई से दूरी बढ़ने लगती है. मातृभाषा में शिक्षा बच्चों को आत्मविश्वास देती है, अवधारणाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है और सीखने की प्रक्रिया को स्वाभाविक बनाती है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा पर जोर दिया गया था, लेकिन ज़मीनी स्तर पर अभी भी अधिकांश राज्यों में संसाधनों, प्रशिक्षित शिक्षकों और गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है. केवल घोषणा करने से बदलाव नहीं आएगा. क्षेत्रीय भाषाओं में आधुनिक विषयों की किताबें, डिजिटल सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है.

यह भी समझना होगा कि मातृभाषा में शिक्षा और अंग्रेज़ी सीखना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. बच्चों को उनकी भाषा में मजबूत आधार देने के साथ-साथ उन्हें अन्य भाषाओं का ज्ञान देना अधिक प्रभावी मॉडल हो सकता है. शिक्षा का उद्देश्य भाषा के आधार पर हीनता या श्रेष्ठता का भाव पैदा करना नहीं, बल्कि हर बच्चे को उसकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ाना होना चाहिए.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के मौलिक सीखने के अधिकार से जुड़ा विषय है. जिस भाषा में बच्चा सोचता और समझता है, उसी भाषा में शिक्षा मिलने से उसकी बौद्धिक क्षमता, आत्मविश्वास और रचनात्मक विकास बेहतर होता है. सरकारों को क्षेत्रीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संसाधन उपलब्ध कराने और सरकारी स्कूलों को मजबूत बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

  आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए अवसर बन सकते हैं  #एनसीईआरटी के फ्री ऑनलाइन कोर्सदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं ...
14/05/2026

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए अवसर बन सकते हैं #एनसीईआरटी के फ्री ऑनलाइन कोर्स

देश में प्रतियोगी परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षा की तैयारी का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. बड़े शहरों के कोचिंग संस्थानों की भारी फीस के कारण लाखों छात्र गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री और मार्गदर्शन से दूर रह जाते हैं. ऐसे समय में एनसीईआरटी द्वारा शुरू किए गए फ्री ऑनलाइन कोर्स शिक्षा में समान अवसर की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माने जा सकते हैं.

खबर के अनुसार ये कोर्स विशेष रूप से कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के लिए तैयार किए गए हैं. इनमें अकाउंटेंसी, बायोलॉजी, बिजनेस स्टडीज, केमिस्ट्री, इकोनॉमिक्स, इंग्लिश, जियोग्राफी, मैथ्स, फिजिक्स और सोशियोलॉजी जैसे विषय शामिल हैं. ऑनलाइन माध्यम से वीडियो लेक्चर, अध्ययन सामग्री, सेल्फ-असेसमेंट टेस्ट और डिस्कशन फोरम जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे ग्रामीण और छोटे शहरों के छात्रों को भी बेहतर तैयारी का अवसर मिल सकता है.

सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि शिक्षा को केवल महंगे कोचिंग मॉडल तक सीमित रखने के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सभी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. यदि इन कोर्सों का प्रभावी प्रचार और तकनीकी पहुंच सुनिश्चित की जाए तो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों के लिए यह बहुत बड़ा सहारा बन सकता है.

हालांकि केवल कोर्स शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा. ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल साक्षरता की कमी आज भी बड़ी चुनौती है. लाखों छात्र ऐसे हैं जिनके पास नियमित ऑनलाइन अध्ययन की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. इसलिए सरकार और शिक्षा विभाग को डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने, सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास और इंटरनेट सुविधा बढ़ाने तथा विद्यार्थियों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, न कि केवल आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग की सुविधा. एनसीईआरटी के मुफ्त ऑनलाइन कोर्स शिक्षा में समान अवसर की दिशा में सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब गांव और छोटे कस्बों तक डिजिटल संसाधनों की पहुंच सुनिश्चित की जाएगी.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

  आरटीई प्रवेश में नियमों की अनदेखी से बढ़ रहे विवाद, बच्चों का भविष्य अधर मेंAgra में शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत होन...
14/05/2026

आरटीई प्रवेश में नियमों की अनदेखी से बढ़ रहे विवाद, बच्चों का भविष्य अधर में

Agra में शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत होने वाले प्रवेश अब कई स्कूलों में विवाद का कारण बनते दिखाई दे रहे हैं. खबर के अनुसार बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा कई मामलों में वार्ड और एक किलोमीटर दूरी के नियमों को नजरअंदाज कर बच्चों के दाखिले करा दिए गए, जिसके चलते अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन के बीच टकराव की स्थिति बन रही है.

आरटीई का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि प्रवेश प्रक्रिया ही नियमों और पारदर्शिता से दूर हो जाए तो इसका नुकसान सीधे बच्चों को उठाना पड़ता है. कई अभिभावकों ने शिकायत की है कि उन्होंने नजदीकी स्कूलों के आधार पर आवेदन भरे थे, लेकिन विभागीय लापरवाही के कारण बच्चों का प्रवेश दूसरे वार्ड या दूर के स्कूलों में कर दिया गया. इससे स्कूलों में विवाद और बच्चों के प्रवेश पर संकट पैदा हो रहा है.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अधिकारी “समाधान” के नाम पर बाद में बच्चों को दूसरे स्कूलों में शिफ्ट करने की बात कर रहे हैं. शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय में यह प्रयोगात्मक रवैया बच्चों के मानसिक और शैक्षणिक भविष्य को प्रभावित करता है. छोटे बच्चों को बार-बार स्कूल बदलने की स्थिति में डालना शिक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है.

आरटीई केवल दाखिले का आंकड़ा बढ़ाने की योजना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का अधिकार है. यदि नियमों का पालन नहीं होगा, डेटा सत्यापन मजबूत नहीं होगा और विभागीय जवाबदेही तय नहीं होगी तो इस योजना का उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा. अभिभावकों का भरोसा भी तभी बना रहेगा जब प्रक्रिया निष्पक्ष, स्पष्ट और त्रुटिरहित हो.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि आरटीई प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, डिजिटल सत्यापन आधारित और जवाबदेही से युक्त होनी चाहिए. विभागीय लापरवाही का खामियाजा बच्चों और अभिभावकों को नहीं भुगतना चाहिए. शिक्षा विभाग को ऐसे मामलों की जिम्मेदारी तय करते हुए समयबद्ध समाधान और भविष्य में त्रुटि रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनानी चाहिए.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

   छात्र सुरक्षा से खिलवाड़ पर स्कूल पर हो सकती है कड़ी कार्रवाईNewDelhi के जनकपुरी स्थित एक निजी स्कूल में नर्सरी छात्र...
14/05/2026

छात्र सुरक्षा से खिलवाड़ पर स्कूल पर हो सकती है कड़ी कार्रवाई

NewDelhi के जनकपुरी स्थित एक निजी स्कूल में नर्सरी छात्रा से कथित छेड़छाड़ के मामले ने शिक्षा व्यवस्था और स्कूल सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. शिक्षा निदेशालय ने मामले को गंभीर मानते हुए स्कूल को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और जांच के लिए आवश्यक दस्तावेज, सीसीटीवी फुटेज तथा सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी जानकारी तलब की है.

प्रारंभिक जांच में सामने आया कि स्कूल परिसर में पर्याप्त निगरानी व्यवस्था नहीं थी. कई संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे और सुरक्षा मानकों का सही तरीके से पालन भी नहीं किया गया. रिपोर्ट के अनुसार नर्सरी और प्री-प्राइमरी कक्षाएं मुख्य स्कूल से दूर निजी जमीन पर संचालित की जा रही थीं, जिसके लिए आवश्यक अनुमति भी नहीं ली गई थी. यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि छोटे बच्चों की सुरक्षा के प्रति गंभीर असंवेदनशीलता का मामला है.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अभिभावक अपने बच्चों को सुरक्षित वातावरण की उम्मीद में स्कूल भेजते हैं, लेकिन यदि विद्यालय ही सुरक्षा मानकों का पालन न करें तो समाज का विश्वास टूटता है. शिक्षा संस्थानों की पहली जिम्मेदारी केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि बच्चों की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है.

यदि जांच में लापरवाही सिद्ध होती है तो स्कूल की मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई की बात कही गई है. यह आवश्यक भी है, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा के मामलों में किसी प्रकार की ढिलाई या समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता. ऐसे मामलों में केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने वाली कठोर व्यवस्था जरूरी है.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि हर स्कूल में बाल सुरक्षा नीति, सीसीटीवी निगरानी, प्रशिक्षित स्टाफ और नियमित सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए. बच्चों की सुरक्षा पर लापरवाही करने वाले संस्थानों के खिलाफ सख्त और उदाहरणात्मक कार्रवाई ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक सकती है. शिक्षा संस्थानों को व्यवसाय नहीं, बल्कि बच्चों के विश्वास और भविष्य की जिम्मेदारी समझना होगा.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

  तीन महीने निजी बिल्डिंग में चलता है सरकारी स्कूल, बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा दोनों संकट मेंAgra के एक प्राथमिक विद्याल...
14/05/2026

तीन महीने निजी बिल्डिंग में चलता है सरकारी स्कूल, बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा दोनों संकट में

Agra के एक प्राथमिक विद्यालय की स्थिति शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करती है. खबर के अनुसार विद्यालय की भवन स्थिति इतनी जर्जर हो चुकी है कि हर साल लगभग तीन महीने तक बच्चों की कक्षाएं निजी बिल्डिंग और खुले परिसर में संचालित करनी पड़ती हैं. छत का प्लास्टर गिरने और बारिश में पानी टपकने जैसी समस्याओं के कारण बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा बना हुआ है.

विद्यालय की शिक्षिकाओं का कहना है कि वे लंबे समय से ग्राम प्रधान, खंड शिक्षा अधिकारी, बीएसए और अन्य अधिकारियों को लगातार पत्र लिखकर भवन मरम्मत की मांग कर रही हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ. मजबूरी में बच्चों को खुले में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है. यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करती है.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन बच्चों की बात हो रही है, वे आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग से आते हैं. यदि ऐसे बच्चों का सरकारी स्कूल भी सुरक्षित और व्यवस्थित नहीं रहेगा तो शिक्षा से उनका भरोसा और जुड़ाव दोनों कमजोर होंगे. “सब पढ़ें, सब बढ़ें” जैसे नारे तब खोखले लगने लगते हैं जब बच्चे टूटी छतों और खुले मैदानों में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हों.

यह मामला बताता है कि केवल योजनाएं घोषित कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की ईमानदार निगरानी भी जरूरी है. ऑपरेशन कायाकल्प और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच यदि स्कूलों की यह हालत है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. शिक्षा विभाग को ऐसे विद्यालयों की सूची सार्वजनिक कर समयबद्ध सुधार कार्य सुनिश्चित करना चाहिए.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि हर बच्चे को सुरक्षित, सम्मानजनक और बुनियादी सुविधाओं से युक्त विद्यालय मिलना उसका अधिकार है, कोई एहसान नहीं. जर्जर भवनों में पढ़ाई केवल शिक्षा नहीं, बल्कि बच्चों की जिंदगी को जोखिम में डालना है. सरकार और प्रशासन को तत्काल ऐसे विद्यालयों की मरम्मत, वैकल्पिक सुरक्षित व्यवस्था और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि गरीब बच्चों का भविष्य उपेक्षा की भेंट न चढ़े.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

   कक्षा 9-10 तक सीमित रहेंगे एलटी ग्रेड शिक्षक, हाईकोर्ट आदेश के बाद आयोग का संशोधनउत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ( ) ने इल...
14/05/2026

कक्षा 9-10 तक सीमित रहेंगे एलटी ग्रेड शिक्षक, हाईकोर्ट आदेश के बाद आयोग का संशोधन

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ( ) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद एलटी ग्रेड शिक्षक भर्ती-2025 को लेकर महत्वपूर्ण संशोधन जारी किया है. अब माध्यमिक शिक्षा विभाग के तहत चयनित सहायक अध्यापक केवल कक्षा 9 और 10 के विद्यार्थियों को ही पढ़ाएंगे. आयोग ने स्पष्ट किया है कि इन शिक्षकों की नियुक्ति उच्च प्राथमिक स्तर के लिए नहीं मानी जाएगी.

यह मामला तब उठा जब कुछ अभ्यर्थियों ने भर्ती विज्ञापन को लेकर अदालत में याचिका दायर की थी. आरोप था कि भर्ती प्रक्रिया में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि चयनित शिक्षक किन कक्षाओं को पढ़ाएंगे. साथ ही यह भी प्रश्न उठा कि यदि शिक्षक कक्षा 6 से 8 तक पढ़ाएंगे तो उच्च प्राथमिक स्तर के लिए आवश्यक शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) का उल्लेख क्यों नहीं किया गया. हाईकोर्ट ने इस पर स्पष्टता लाने के निर्देश दिए, जिसके बाद आयोग को संशोधित अधिसूचना जारी करनी पड़ी.

यह निर्णय शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया की स्पष्टता के महत्व को दर्शाता है. कई बार अस्पष्ट विज्ञापन और नियमों की अधूरी जानकारी अभ्यर्थियों को भ्रम में डाल देती है, जिससे वर्षों तक कानूनी विवाद चलते रहते हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान छात्रों और बेरोजगार युवाओं दोनों को उठाना पड़ता है. भर्ती प्रक्रिया जितनी स्पष्ट और नियम आधारित होगी, शिक्षा व्यवस्था उतनी ही स्थिर और भरोसेमंद बनेगी.

सवाल यह भी है कि शिक्षा विभाग और आयोग प्रारंभिक स्तर पर ऐसी स्पष्टता क्यों नहीं सुनिश्चित कर पाते. जब लाखों युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं, तब भर्ती से जुड़ी हर शर्त और पात्रता पूरी पारदर्शिता से पहले ही सामने आनी चाहिए. अदालतों को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े, यह किसी भी व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि शिक्षक भर्ती केवल रोजगार का विषय नहीं, बल्कि छात्रों की शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा प्रश्न है. नियुक्ति प्रक्रिया में अस्पष्टता और कानूनी विवाद शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करते हैं. सरकार और आयोग को चाहिए कि सभी भर्तियों में पात्रता, कार्यक्षेत्र और नियमों को पहले से स्पष्ट और सरल भाषा में जारी किया जाए, ताकि युवाओं का समय, धन और भविष्य अनिश्चितता में न फंसे.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

  फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों पर शिकंजा, 11 पर होगी FIRउत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता ...
14/05/2026

फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों पर शिकंजा, 11 पर होगी FIR

उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है. प्राथमिक जांच में खुलासा हुआ है कि फर्जी शैक्षिक अभिलेखों और डबल आईडी के माध्यम से कई लोगों ने शिक्षक पद पर नौकरी हासिल कर ली. से जारी जानकारी के अनुसार आगरा, गाजीपुर, सुलतानपुर, वाराणसी समेत कई जिलों में ऐसे 11 शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी की जा रही है.

मानव संपदा पोर्टल की जांच में यह सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही अंकपत्र और प्रमाणपत्र के आधार पर अलग-अलग लोग शिक्षक के रूप में कार्यरत पाए गए. कहीं डबल आईडी सक्रिय मिली तो कहीं सेवा रिकॉर्ड और जन्मतिथि में गंभीर विसंगतियां सामने आईं. यह केवल दस्तावेजी धोखाधड़ी नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य और सरकारी शिक्षा व्यवस्था के साथ विश्वासघात है.

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भर्ती प्रक्रिया, सत्यापन और नियुक्ति के दौरान ऐसी गड़बड़ियां वर्षों तक पकड़ में क्यों नहीं आईं. यदि प्रारंभिक स्तर पर दस्तावेजों की कठोर जांच होती, डिजिटल सत्यापन मजबूत होता और जवाबदेही तय होती तो शायद ऐसे लोग शिक्षा व्यवस्था में प्रवेश ही नहीं कर पाते. एक फर्जी शिक्षक केवल एक पद नहीं घेरता, बल्कि किसी योग्य और मेहनती अभ्यर्थी का अवसर भी छीनता है.

यह मामला बताता है कि केवल भर्ती निकालना पर्याप्त नहीं, बल्कि भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी भी उतनी ही जरूरी है. शिक्षा विभाग को अब केवल एफआईआर तक सीमित न रहकर यह भी जांच करनी चाहिए कि इन नियुक्तियों को संरक्षण किस स्तर पर मिला और क्या किसी प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत की भूमिका रही.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में फर्जीवाड़ा केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है. स्कूलों और शिक्षकों पर अभिभावकों का भरोसा तभी मजबूत रहेगा जब भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त हो. योग्य युवाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए दोषियों पर कठोर कार्रवाई और भर्ती तंत्र में व्यापक सुधार समय की आवश्यकता है.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

 , विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों की बढ़ती रुचि, एक साथ 50 पाठ्यक्रमों में आवेदन की सुविधा शुरूडॉ. भीमराव आंबेडकर वि...
14/05/2026

, विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों की बढ़ती रुचि, एक साथ 50 पाठ्यक्रमों में आवेदन की सुविधा शुरू

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, Agra ने सत्र 2026-27 के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू करते हुए एक नई व्यवस्था लागू की है, जिसके तहत छात्र अब एक साथ 50 अलग-अलग पाठ्यक्रमों में आवेदन कर सकेंगे. विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध 572 महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया के साथ यह दावा भी किया गया है कि नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और अफ्रीकी देशों से विदेशी छात्र भी प्रवेश के लिए आवेदन कर रहे हैं.

यह बदलाव केवल प्रवेश प्रक्रिया का तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में प्रतिस्पर्धा और विकल्पों की नई दिशा भी है. एक छात्र को अनेक पाठ्यक्रमों में आवेदन की सुविधा मिलने से समय और धन दोनों की बचत होगी. इससे उन विद्यार्थियों को राहत मिलेगी जो अलग-अलग कॉलेजों और विषयों के बीच असमंजस में रहते हैं. हालांकि यह भी आवश्यक है कि इतनी बड़ी ऑनलाइन प्रक्रिया के बीच पारदर्शिता, सर्वर क्षमता और हेल्पलाइन व्यवस्था मजबूत रहे, ताकि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को परेशानी न हो.

विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोजगारपरक छह नए पाठ्यक्रम शुरू करने की बात भी कही है. यह सकारात्मक संकेत है, क्योंकि आज का छात्र केवल डिग्री नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल आधारित शिक्षा चाहता है. लेकिन वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब इन पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षित शिक्षक, प्रयोगशालाएं, इंटर्नशिप और उद्योगों से जुड़ाव भी सुनिश्चित किया जाए. केवल नए कोर्स शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होता.

विदेशी छात्रों की बढ़ती रुचि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा के लिए अच्छा संकेत है, लेकिन इसके साथ विश्वविद्यालय परिसर में अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं, सुरक्षा, छात्रावास और शैक्षणिक वातावरण भी उतना ही जरूरी है. भारत के विश्वविद्यालय तभी वैश्विक पहचान बना पाएंगे जब यहां की शिक्षा केवल प्रवेश संख्या तक सीमित न रहकर गुणवत्ता, शोध और कौशल आधारित परिणामों में भी दिखाई दे.

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को केवल दाखिला केंद्र नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण का मजबूत मंच बनना चाहिए. डिजिटल प्रवेश व्यवस्था तभी सफल मानी जाएगी जब हर वर्ग का छात्र बिना दलाल, भ्रम और तकनीकी बाधाओं के समान अवसर प्राप्त कर सके. शिक्षा का उद्देश्य संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि सक्षम और आत्मनिर्भर युवा तैयार करना होना चाहिए.

दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)

12/05/2026

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