30/10/2025
बिरली होती है ऐसी शख़्सियत जिनसे संयोग से हुई मुलाक़ात इंसानियत पर से उखड़ रहे भरोसे को मरहम लगा कर फिर से बैठा देती हैं ।
इस मुलाक़ात का कारक है उत्तर प्रदेश के एक दूर दराज के गाँव में रह रहे एक मेधावी छात्र जिनकी त्रुटिहीन अंग्रेज़ी में लिखी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की मेंटरशिप के आवेदन ने हमारा ध्यान आकर्षित किया। ड्राफ्टिंग की बहुत छोटी छोटी गलतियों ने ये बता दिया कि चैट जीपीटी या ग्रामरली की कोई मदद नहीं ली गई थी ।
मेल में रिकेट नाम की अवस्था का जिक्र किया गया था लेकिन गूगल ने बता दिया कि लाइलाज बीमारी नहीं होती, सामयिक रूप से लिए गए सप्लीमेंट जीवन को सामान्य रखते हैं ।
टेलीफोनिक बातचीत के बाद घर पर विजिट के लिए गए व्यक्ति ने जो वीडियो भेजा उस से स्पष्ट हुआ की बालक व्हील चेयर पर है और उस के हाथ और पैर वक्रता लिए हुए हैं ।
चंद और वार्ताओं से पता चला कि चार सर्जरी भी हुई हैं और डायबिटीज भी है ।लेटेस्ट पैथोलॉजिकल रिपोर्ट के स्कैन को चैट जीपीटी को दिखाने से पता चल गया की रिकेट की असामान्य अवस्था है और तत्काल मेडिकल अटेंशन की आवश्यकता है । बालक की बातों से ऐसा लगा नहीं था कि कुछ ऐसा है क्यूँकि वो विटमिन डी तथा अन्य सप्लीमेंट्स पर पहले ही चल रहे था ।
साफ़ था की कहीं कुछ ठीक नहीं हैं ।परिवार के डॉक्टर बच्चों ने भी यही सलाह दी कि लोकल एक्सपर्ट ही सही राय दे सकते हैं और इस काम के लिए लखनऊ ही उचित संस्थान लगा ।
KGMU परिसर में बालक से पहली बार रूबरू मिले. पहली बार जब नज़र मिली तो अपनी ही आँखों में नमी महसूस हुई । बुद्धिमत्ता दर्शाती हुई तीक्ष्ण पारदर्शी निगाहें एक छोटे से शरीर में सीमित थी जिसकी हथेलियाँ बताती थीं की अगर सामान्य वृद्धि पाता तो निश्चित ही छह फुट का जवान होता ।
केजीएमसी में निर्णय स्पष्ट था कि प्रॉक्सिमल रीनल ट्यूबुलर एसिडोसिस का बिगड़ा हुआ केस है ।इलाज़ के लिए किसी एंडोक्रिनोलॉजिस्ट के पास जाना होगा।
इस विषम परिस्थिति में सबसे बड़ी जरूरत सच की थी क्यूँकि इस बालक के भविष्य को किस दिशा में जाना है इसका पूर्वानुमान हमारे उस क्षण की ज़िम्मेदारी थी । ऐसी परिस्थिति में किसी पुरानी स्मृति ने PGI लखनऊ के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के अध्यक्ष की याद दिलायी जिसने किसी भी वीआईपी सिंड्रोम को धता बता कर कभी बड़ी बेबाकी से मेडिकल साइंस की सीमा बता दी थी। नाम याद रह गया था 🙏🏽 डॉ ईश भाटिया ।
बात पुरानी थी तो उनका सेवानिवृत्त हो जाना पक्का था। इंटरनेट ने फिर सहयोग किया और पता चल गया की वो अभी अपोलो हॉस्पिटल से संबद्ध हैं । दो बातें दिमाग़ में कौंधी, एक – कॉर्पोरेट मेडिकल वर्ल्ड और प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन सदा के पर्यायवाची रहे हैं, और दो – समय तथा स्थान के साथ हर व्यक्तित्व बदलता है। फिर भी अतीत की अनुभूति का प्रभाव भारी पड़ा ।
ऑनलाइन अपॉइंटमेंट की प्रोसेस शुरू करने पर पता लगा कि डॉ ईश भाटिया हर किसी के लिए उपलब्ध नहीं हैं । तीसरी लेयर पर जाकर अपॉइंटमेंट मिला और उस दिन भारी बारिश के बावजूद समय से पहले बालक और उसके परिवार के साथ अपॉइंटमेंट डेस्क पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी।इसके बाद जो हुआ वो ईश्वरीय महिमा से कम नहीं था ।
डॉ भाटिया के केबिन से आए आदेश के अनुसार मुलाक़ात समय से पहले तय कर दी गई । जाहिर सी बात है कि उनके टीम के सदस्य हर मरीज़ की हालत उनको रिपोर्ट कर रहे थे । अंदर जाकर बस ऐसा लगा कि अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध डॉ भाटिया सच में समय स्थान के प्रभाव से मुक्त व्यक्तित्व हैं ।
पल भर भी नहीं लगा उन्हें बालक और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति को आंकने में और उसकी शारीरिक अवस्था को देख कर उसकी मेडिकल कंडीशन को समझने में ।
उनके पास ये जानने का कारण नहीं था कि हमारी बालक से मुलाक़ात बस अभी हुई है ।क्षणिक आवेग में आकर उद्गार यही निकला मैडम अब लेकर आई हैं आप और यहाँ ??? आवेश का कारण सामने था – समय से इलाज ना हो पाने के कारण केस बिगड़ चुका था और कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में इलाज परिवार की क्षमता से निश्चित रूप से बाहर था । लेकिन उनकी पारदर्शी निगाहों को ये सच भी जानने में समय नहीं लगा कि किसका, क्या, कहाँ और कितना रोल है ।
ग्रामीण परिवेश में रखे गए केस रिकॉर्ड अस्त व्यस्त से थे । लेकिन उनका भी पूरा अध्ययन किया। बालक की मेधा के वो भी क़ायल हुए और अपने प्रश्न उस पर केंद्रित कर दिए । फिजिकल परीक्षण भी किया ।टेलीफोन पर हुई बातों के आधार पर बनाई गई एक क्रोनोलॉजिकल इवेंट लिस्ट तैयार की थी हमने वो भी पढ़ी उन्होंने। इसके बाद वो इस निर्णय पर पहुँचे की ट्रीटमेंट संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में ही सही तरीके से और कम खर्च में हो जाएगा और हमसे मुखातिब हो पूछ बैठे कि कब एडमिट हो सकते हैं ??? हम इस सवाल का जवाब देने के लिए ना हक रखते थे, ना ही कोई तैयारी किए थे ।
डॉ भाटिया बात समझ गए थे । उनके केबिन में करीब १ घंटा बीत चुका था । उनके टीम वालों ने आकर इशारा किया तो हमारी तरफ़ मुड़े और बोले की आप लोग बाहर जाकर तय करिए और १० मिनट बाद फिर आकर मिलिए ।
बाहर आकर बालक और उसके परिवार वालों से बात हुई । बमुश्किल वो लोग गांव से आए थे । बार बार इतने साधन भी नहीं जुट पाते ।बहुत सोच विचार और गाँव में पिता से बात करके बोले की अगर कल भर्ती हो जाएँ तो हमारे लिए सब बहुत आसान हो जाएगा ….. लेकिन शायद उन्हें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि पीजीआई में दूसरे दिन की भर्ती के लिए भी वृहत सिफ़ारिशी आयोजन की आवश्यकता होती है । इसी कश्मकश में थे कि स्टाफ ने आकर चेताया कि डॉ साहब बुला रहे हैं ।
सुना था अपनी मंशा बता देनी चाहिए अगर ईश्वर की मर्जी उसमे शामिल है तो पूरी होती है, सो बता बैठे कि सर, पेशेंट तो कल एडमिट होने को तैयार है । ईश्वर की मर्जी को कभी ऐसे शामिल होते देखा नहीं था इसलिए जो हुआ वो दूर से दिख रहा स्लो मोशन शॉर्ट मूवी लगा । डॉ भाटिया ने फ़ोन उठाया और सीधे PGI एंडोक्रिनोलॉजी के विभागाध्यक्ष को तलब किया। मात्र कुछ मिनट में ही अपना असेसमेंट बताया ( रीनल ट्यूबुलर एसिडोसिस ), सुपरवाइजिंग डॉक्टर का चयन किया, सारी बातें तय की, आँखों से ही हमारी सहमति पूछी, पाकर बालक की तरफ़ मुड़े ।
एक छोटे से सफेद काग़ज़ के टुकड़े पर कुछ लिख कर अपने हस्ताक्षर किए फिर पीजीआई गेट से नवीन OPD बिल्डिंग तक पहुँचने का रास्ता समझाया । वहाँ पहुँच कर क्या करना है इसके बारे में विस्तार से बताया । ये भी बताया कि कोई परेशानी हो तो इनको फ़ोन करना, ये ना मिलें तो उनको और उनका फ़ोन ना मिले तो सीधे हमारे टीम को । अपना स्टाफ हेड जो सामने खड़े थे, से परिचय कराकर उनका नंबर दिलाया । प्रिस्क्रिप्शन लिखा और स्टाफ हेड से बोले इनकी फीस वापस करवा दो ।
डेढ़ घंटे हो चुके थे । सारे काग़ज़ संभाल कर बालक और उसके परिवार को संभाला । आभार बस आँखों में ही झलका । शब्द तो बहुत पहले किनारा कर चुके थे की भैया अब तुम ही निपटो, बात हमारी औक़ात से ऊपर जा चुकी है ।डॉ हमारे मन के हाल समझ चुके थे । एक स्नेहिल सी मुस्कान ने आशीर्वाद से बरसा दिए । मौन में ही हाथ नमस्कार में जुड़े ।
दूसरे दिन सुबह ही बालक PGI में भर्ती पा गए ।डॉ भाटिया के उस छोटे से काग़ज़ के टुकड़े ने हर बाधा के पार ले जाने वाले पासवर्ड के रूप में काम किया था । पाँच दिन तक चले इंटेंसिव इन्वेस्टीगेशन के बाद ट्रीटमेंट की शुरुआत हुई और विगत माह ३० तारीख़ को रिव्यू के दौरान हुए पैथोलॉजिकल टेस्ट में लाभ परिलक्षित था।
इस घटना ने हृदय पर छाप छोड़ी कि सारे संत हिमालय नहीं चले जाते या नीरव कुटिया में जीवन नहीं बिताते । डॉ ईश भाटिया जैसे कुछ सफेद कोट पहन कर निस्सहाय मरीजों को स्वास्थ्य का वरदान देते मिलते हैं…… कभी कभी कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में