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आर्यसमाज पुस्तकालय सरस्वती नगर में आयी नई पुस्तके इस प्रकार है
07/04/2026

आर्यसमाज पुस्तकालय सरस्वती नगर में आयी नई पुस्तके इस प्रकार है

07/04/2026

इस्लाम को समझने के लिए उपयोगी पुस्तकें। -

1- इस्लाम के दीपक - ₹300
2- चौदहवीं का चाँद - ₹300
मंगवाने के लिए 094855 99275 पर वट्सएप द्वारा सम्पर्क करें।
दोनों पुस्तकें ₹600 (डाक खर्च सहित)

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इस्लाम के दीपक

आज से 140 साल पहले सत्यार्थ प्रकाश में कुरआन की निष्पक्ष समीक्षा की गई थी। यह पहला प्रयास था जिससे हिंदुओं को इस्लाम के विषय मे पता चला।
इसी तरह आज से 50 साल पहले वैदिक विद्वान गंगा प्रसाद उपाध्याय जी ने अपनी पुस्तक इस्लाम के दीपक में कुरआन और हदीसों के द्वारा कोमल भाषा में इस्लाम की आधारशिला को दिखाया। लेखक अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे। सरल भाषा मे लिखी पुस्तक आपको इस विषय का मर्मज्ञ बनाने के लिए अत्यधिक प्रभावी हैं।
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चौदहवीं का चाँद -

हमारे देश में मुसलमानों के में शासन स्थापना के बाद उन्होंने यहाँ की सभ्यता, संस्कृति एवं धर्म पर निरन्तर प्रहार किये। महर्षि दयानन्द ने सत्य का प्रतिपादन करने के लिए सत्यार्थप्रकाश की रचना की। इसके 14वें समुल्लास में कुरान की आयतों के मुसलमान विद्वानों द्वारा किये गये अर्थों की समालोचना की। इससे रुष्ट होकर मुस्लिम विद्वानों ने समय-समय पर सत्यार्थप्रकाश के विरुद्ध कई पुस्तकें लिखीं, इनमें मौलवी सनाउल्ला खाँ की पुस्तक ‘हक प्रकाश’ भी शामिल है। इसमें महर्षि के दृष्टिकोण को न समझकर दुराग्रहों से ग्रसित होकर सत्यार्थप्रकाश पर अनर्गल आक्षेप किये गये।उसी के जवाब में वैदिक विद्वान् श्री चमूपतिजी एम० ए० ने ‘चौदहवीं का चाँद’ नामक पुस्तक लिखी। इसमें मौलवी सनाउल्ला खाँ साहब के सभी आक्षेपों के उत्तर दिये और साथ-साथ यह भी दर्शाया कि सत्यार्थप्रकाश में जो भी लिखा गया है वह यथार्थ है।

इसी पुस्तक को आडियो रूप में सुनने के लिए निम्न लिंक पर जाएं।
https://youtube.com/playlist?list=PL4A27w21ncIAAvwPeCxQ7l11F8Eoz4N1-&si=0to73Sws8EGNnvlh

05/04/2026
वीरता और बुद्धिमत्तामें सर्वोपरि  *श्री हनुमानजी* अर्थात् *वज्र-अंग-बली =बजरंगबली जी* के *जन्मोत्सव*  की अनन्त शुभकामनाओ...
02/04/2026

वीरता और बुद्धिमत्ता
में सर्वोपरि
*श्री हनुमानजी* अर्थात्
*वज्र-अंग-बली =बजरंगबली जी* के *जन्मोत्सव* की अनन्त शुभकामनाओं के साथ

सभी सनानतन धर्म प्रेमियो से विशेष आग्रह कि श्री हनुमानजी का महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में जीवन अवश्य पढ़ें और कुछ प्रश्नों पर विचार कर निर्णय करें -
१. कि क्या कोई बन्दर कभी मानव भाषा आज तक बोल सका ?
२. क्या किसी बन्दर का आज तक यज्ञोपवीत(जनेऊ) संस्कार हुआ है?
३. क्या आज तक कोई बन्दर संस्कृत व्याकरण का ज्ञाता हो सका है या हो सकता है?
४.क्या कोई बन्दर कभी वेद-ज्ञान तो छोड़ो मानव सुलभ सामान्य ज्ञान भी रखता है ?
५.क्या कोई बन्दर कभी किसी मनुष्य का का विश्वसनीय परामर्शदाता हो सकता है?
६.क्या कभी कोई बन्दर किसी का संकटमोचक कभी बन सकता है ?
७. क्या कोई बन्दर राजदूत बनने की योग्यता रखता है ?
८. क्या कभी कोई बन्दर कभी ईश्वर भक्त हो सकता है ?
९. क्या कभी कोई बन्दर ब्रह्मचर्य का पालन करता है?

उक्त प्रश्नों को ध्यान से विचार कर बुद्धिमानी द्वारा विवेचना करके देखें। इनका उत्तर सदैव "नहीं" में ही मिलेगा।
इसलिए आप सभी से करबद्ध प्रार्थना है कि
महानतम् वीरता ,और सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमत्ता ,सर्वश्रेष्ठ राजदूत कर्म और सर्वश्रेष्ठ भक्ति, अखण्ड ब्रह्मचर्य , सर्वस्व समर्पण के
एकमात्र रिकॉर्डधारी
श्री हनुमानजी को बन्दर कहना और
पूँछ लगाकर दिखाना बन्द करें।
अपने महापुरुषों का उपहास और अपमान बन्द करें।
उनकी जयन्ती पर यही बड़ा उपकार होगा।

डॉ. अमित

भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों की नींव उनके परिवार और आर्य समाज के गहरे प्रभाव के बीच रची-बसी थी। उनका परिवार न केवल दे...
23/03/2026

भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों की नींव उनके परिवार और आर्य समाज के गहरे प्रभाव के बीच रची-बसी थी। उनका परिवार न केवल देशभक्त था, बल्कि सामाजिक सुधार के आंदोलनों से भी गहराई से जुड़ा था।

परिवार और आर्य समाज का नाता

भगत सिंह के दादा, सरदार अर्जुन सिंह, आर्य समाज के एक कट्टर अनुयायी और प्रचारक थे। यह वह समय था जब पंजाब में आर्य समाज अंधविश्वासों के खिलाफ और शिक्षा के प्रसार के लिए एक बड़ी लहर चला रहा था।

• संस्कारों का प्रभाव: अर्जुन सिंह ने अपने बेटों—किशन सिंह (भगत सिंह के पिता), अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह—को आर्य समाज के सिद्धांतों के अनुसार पाला। उन्होंने अपने पोतों (भगत सिंह और उनके भाइयों) का जनेऊ संस्कार भी आर्य समाजी रीति-रिवाजों से करवाया था।

• क्रांतिकारी पृष्ठभूमि: उनके चाचा अजीत सिंह एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 'पगड़ी संभाल जट्टा' आंदोलन का नेतृत्व किया था। परिवार में देशभक्ति और आर्य समाज के 'स्वदेशी' और 'स्वराज' के विचार आपस में घुले-मिले थे।

शिक्षा और दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) स्कूल
भगत सिंह की प्रारंभिक शिक्षा लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) स्कूल में हुई थी।

• उस समय के सरकारी स्कूलों के विपरीत, स्कूल राष्ट्रवादी शिक्षा और आर्य समाज के सुधारवादी विचारों के केंद्र थे।

• यहाँ उन्हें वैदिक साहित्य के साथ-साथ आधुनिक विषयों और राष्ट्रीय अस्मिता की शिक्षा मिली।

वैचारिक विकास: समाज सुधार से क्रांति तक आर्य समाज ने भगत सिंह को शुरुआत में दो प्रमुख चीजें दीं:

1. तर्क और प्रश्न करने की शक्ति: आर्य समाज ने मूर्तिपूजा और पाखंड का विरोध कर उन्हें हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसना सिखाया।

2. निर्भयता: ऋषि दयानंद सरस्वती के 'स्वराज' के विचार ने उन्हें ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ निडर होकर खड़े होने की प्रेरणा दी।
Arya veerdal Rajasthan

काले धागे / ताबीज का कलंकहम मनुष्य है. परेशान होने पर हम सभी का मनोबल टूटता है. आवश्यकता है कि इस कठिन समय में मनोबल बना...
21/03/2026

काले धागे / ताबीज का कलंक
हम मनुष्य है. परेशान होने पर हम सभी का मनोबल टूटता है. आवश्यकता है कि इस कठिन समय में मनोबल बनाए रखें. यदि एक भी बेटी यह पढ़ कर सावधान हो जाती है तो मेरा लिखना सार्थक हो जाएगा।

अनेक बार उन नव युवतियों को समझाने का मौका मिला है जो लव जेहाद के चक्कर मे थी। इसी क्रम में उनकी परिवारिक पृष्ठभूमि भी पता चली। लगभग सभी युवतियों के गले, पैर या कलाई में काला धागा / ताबीज बंधा हुआ था। यह धागा या ताबीज उनकी माँ, दादी, मौसी या बुआ आदि ने नजदीकी मौलवी से लाकर दिया था। इस धागे को बुरी नजर से बचाने के लिए बांधा गया था। परन्तु सच्चाई यह है कि इसी धागे के कारण वह उस लड़के के लव जेहाद में फंसी। वास्तव में यह धागा कमजोर मनोबल व अंध श्रद्धा का प्रतीक है। इससे पता चल जाता है कि लड़की का आसानी से मानसिक दोहन किया जा सकता है।

घर मे नवयुवती (नव विवाहिता बहू या बेटी) के मानसिक रोग का इलाज इसी काले धागे से मिया जी करते हैं। इसी काले धागे के बहाने मियाँ जी घर तक पहुंच जाते हैं और उसी के साथ घर से नकदी और गहने गायब होने का सिलसिला शुरू होता है। उस नवयुवती के अजीब व्यवहार का कारण सैयद या पीर नहीं दबी हुई इच्छा या मनोरोग है. इसका इलाज काला धागा, झाड फूंक या ताबीज नहीं मनोचिकित्सक है. इस धागे के कारण शोषण का रास्ता खुल जाता है.

विचार करिए- यदि कलमा पढ़े हुए और फूंक मारे हुए धागे में कोई शक्ति होती तो बड़े अपराधी, राजनेता, अधिकारी और उद्योगपतियों के शरीर पर सैंकड़ों धागे बंधे होते। बुरी नजर, ओपरी पराई, जिन्न, भूत, सैयद, चुड़ैल और पीर आदि केवल मानसिक भ्रम हैं। आजप्रत्येक शहर में हजारों CCTV लगे हुए हैं। यदि कोई जिन्न या पीर होता तो इनमे अवश्य दिखाई देता।

क्या आपके गले या हाथ में भी कोई ताबीज, नीला, लाल या काला धागा बांधा हुआ है?
क्या आप भी बुरी नजर से बचने के लिए, ऊपरी बला से बचने के लिए, शारीरिक रोग के लिए, धन की कमी के लिए, भूत प्रेत से बचने के लिए, परिवारिक सदस्य को वश में करने के लिए पहनते हैं?
मैंने एक मौलवी को देखा है जो मधुमेह के लिए गले में बांधने का धागा देता था। अनेको पढ़े लिखे मूर्ख उससे यह धागा लेकर आते थे और मानते थे कि इससे सचमुच मधुमेह ठीक हो जाएगा।

क्या गले आदि में ताबीज बांधने से कोई लाभ होता है?
नहीं, इससे कोई लाभ नही होता और न ही हो सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य होता है। यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो बिना ताबीज भी हो सकता है स्वयं का मनोबल बढ़ाने से।
मैंने जीवन मे अनेक बार मौलवी और पुजारियों के ताबीजों को खोल कर पढा है। सभी मे रेखाओं से कुछ रेखांकित किया होता है, अस्पष्ट शब्द और अंक होते हैं।
मैं अपने जीवन मे अनेक बार श्मशान और कब्रिस्तान आदि में भूत खोजने के लिए गया हूँ। परन्तु मुझे कभी नही मिला। ये कहना महामूर्खता है क्योकि वे रात को निकलते हैं इसलिए दिखाई नही दिए होंगे। अनेक बार उन घटनाओं की भी खोज की है जिन्हें भूत से सम्बंधित बताया गया। परन्तु पता करने पर उनके पीछे मानसिक रोगी या स्वार्थी लोग ही मिले।

पूरे लेख का उद्देश्य यही है कि गले/हाथ मे किसी भी तरह धागा, लॉकेट, ताबीज और नजर रक्षा यन्त्र बांधना, अष्टधातु की अंगूठी पहनना आदि केवल मानसिक और बौद्धिक अज्ञानता है। इनसे कोई लाभ नही होता। आज ही इन्हें फेंक दें। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार केवल सोने चांदी आदि के आभूषण पहने। परन्तु छोटे बच्चों को सोने चांदी आदि के आभूषण भी न पहनाए। यह ताबीज, अष्टधातु की अंगूठी आदि सब मानसिक कमजोरी की निशानी हैं। इन्हें फेंके और कभी किसी को भी इन्हें पहनने की सलाह न दें।

20/03/2026

गधे की मजार

(वीरवार के दिन कब्रों पर जाने वाले हिन्दुओं को जागृत करने के लिए विशेष रूप से प्रचारित)

एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था गधे के साथ। अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था। और गधा बड़ा स्‍वामीभक्‍त था।

लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी, और कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा। उस राहगीर ने सोचा कि जरूर किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी है। तो वह भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे, उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी ठीक मालुम न पडा। और उसे यह भी समझ में आ गया कि यह बड़ा उपयोगी व्‍यवसाय है।

फिर उसी कब्र के पास बैठकर रोता, यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी। और गधे की कब्र किसी पहूंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी। ऐसे वर्ष बीते, वह बंजारा बहुत धनी हो गया।

फिर एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, "एक महान आत्‍मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना।"

वह गया देखा उसने इस बंजारे को बैठा, तो उसने कहा, "किसकी कब्र है यहा, और तू यहां बैठा क्‍यों रो रहा है ?"

उस बंजारे ने कहां, "अब आप से क्‍या छिपाना, जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्‍यादा साथ दे रहा है।"

सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसाने लगा। उस बंजारे ने पूछा - "आप हंसे क्‍यों ?"

फकीर ने कहां - "तुम्‍हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहूंचे हएं महात्‍मा की कब्र है। उसी से तो मेरा काम चलता है।"

बंजारे ने पूछा - "वह किस महात्‍मा की कब्र है ?"

फकीर ने जवाब दिया- "वह इसी गधे की मां की।

शिक्षा- जो लोग यह कहते हैं कि केवल आस्था से ही ईश्वर की भक्ति संभव हैं उन्हें यह नहीं मालूम की बिना ज्ञान के आस्था अन्धविश्वास कहलाती हैं।हमारे देश में मशरुम के समान उग रही कब्रें पर सबसे अधिक हिन्दू समाज सर पटकने के लिए जाता है। उनकी मति मारी गई है।

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