Hindu Muslim Ekta Munch Machhali Shahar

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इंतक़ाल पुर-मलालइन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन​ये ख़बर निहायत ही अफ़सोस और रंज-ओ-ग़म के साथ दी जा रही है कि मोहल्ला...
07/30/2026

इंतक़ाल पुर-मलाल
इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन

ये ख़बर निहायत ही अफ़सोस और रंज-ओ-ग़म के साथ दी जा रही है कि मोहल्ला पुराक़ाज़ी में डॉक्टर एजाज़ सलमानी साहब का इंतक़ाल हो गया है।

अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और घर वालों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए। आमीन।
انتقال پر ملال
اِنَّا لِلّٰہِ وَاِنَّا اِلَیْہِ رَاجِعُوْن

یہ خبر نہایت ہی افسوس اور رنج و غم کے ساتھ دی جا رہی ہے کہ محلہ پورہ قاضی میں ڈاکٹر اعجاز سلمانی صاحب کا انتقال ہو گیا ہے۔

اللہ تعالیٰ مرحوم کی مغفرت فرمائے، جنت الفردوس میں اعلیٰ مقام عطا فرمائے اور اہل خانہ کو صبر جمیل عطا فرمائے۔ آمین۔

07/24/2026
मछलीशहर के ज़मींदार, विद्वान और बड़े लोग: फिर भी कस्बा पीछे क्यों रह गया ?हमारा कस्बा "मछलीशहर" अपने इतिहास, प्रतिभाओं औ...
07/24/2026

मछलीशहर के ज़मींदार, विद्वान और बड़े लोग: फिर भी कस्बा पीछे क्यों रह गया ?

हमारा कस्बा "मछलीशहर" अपने इतिहास, प्रतिभाओं और प्रभावशाली व्यक्तित्वों के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है, अलग-अलग दौर में यहाँ बड़े ज़मींदार चाहे सैयदवाड़ा, कजियाना या कस्बे के किसी मोहल्ले के जमींदार हो प्रसिद्ध साहित्यकार, विद्वान, शिक्षक, राजनेता तक पहुँचने वाले अनेक लोग इसी मिट्टी से निकले..इसी धरती ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित व्यक्तित्व भी दिए और यहाँ कभी लगभग 25,000 पुस्तकों वाली एक समृद्ध लाइब्रेरी भी रही... लेकिन जब हम इस गौरवशाली इतिहास के साथ आज के मछलीशहर को देखते हैं, तो एक प्रश्न बार-बार सामने आता है कि इतनी क्षमता, इतना प्रभाव और इतने योग्य लोगों के बावजूद हमारा कस्बा एक शिक्षित, संगठित और विकसित कस्बे के रूप में क्यों नहीं उभर सका? तथा इस कस्बे का "सामूहिक विकास" उस स्तर तक क्यों नहीं पहुँच सका?

ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि यहाँ "कृषि" थी, "व्यापार" था, "मेहनतकश लोग" थे, "शिक्षा" की शुरुआती व्यवस्था भी थी और "प्रतिभाओं" की भी कोई कमी नहीं थी, फिर भी शिक्षा, उच्च शिक्षण संस्थानों, पुस्तकालयों, कौशल विकास, रोज़गार और अन्य "सार्वजनिक सुविधाओं" के क्षेत्र में वैसी दूरगामी पहल तथा कोई बड़ा प्रयास दिखाई "नहीं" देता जिसने पूरे कस्बे के भविष्य की दिशा बदल दी हो....अक्सर यह तर्क भी दिया जाता है कि "स्कूल" तो थे, किसी को पढ़ने से रोका नहीं गया, यह बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन, केवल स्कूल का होना ही शिक्षा का प्रमाण नहीं होता, शिक्षा का वातावरण भी बनाना पड़ता है, लोगों को प्रेरित करना, आगे की पढ़ाई के अवसर बढ़ाना, योग्य विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करना और समाज में शिक्षा को एक आंदोलन बनाना भी उतना ही आवश्यक होता है....यदि उस समय के "प्रभावशाली लोग" चाहते, तो अपने प्रभाव, संसाधनों और पहचान का उपयोग केवल "अपने परिवारों" तक सीमित रखने के बजाय पूरे समाज के लिए भी एक मज़बूत सार्वजनिक पहल कर सकते थे, शायद तब मछलीशहर की पहचान कुछ और होती...इतिहास का यही पक्ष सबसे अधिक सोचने पर मजबूर करता है कि क्या उस समय के सक्षम और प्रभावशाली लोगों ने इस दिशा में अपनी भूमिका उतनी निभाई, जितनी निभाई जा सकती थी?

हालांकि, यह कहना उचित "नहीं" होगा कि किसी ने कुछ भी नहीं किया, लेकिन, यह अवश्य कहा जा सकता है कि जितनी "क्षमता" और "अवसर" उपलब्ध थे, उनके अनुरूप हमारे मछलीशहर का "सामूहिक विकास" नहीं हो सका, इसका सबसे अधिक असर उन "सामान्य परिवारों" पर पड़ा, जिनके पास आगे बढ़ने के अवसर पहले से ही सीमित थे....यह प्रश्न इस क्षेत्र के केवल पुराने "ज़मींदार घरानों", "रसूखदार लोगों" और "नीति-निर्धारकों" तक सीमित नहीं है, आज़ादी के बाद भी मछलीशहर से अनेक साधारण और आम परिवारों से निकलने वाले लोगों ने शिक्षा, साहित्य, राजनीति, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में बड़ी सफलताएँ प्राप्त की तथा ऊँचे स्थानों तक पहुँचे, उन्होंने अपने जीवन में "सम्मान" और "पहचान" भी हासिल किया, लेकिन, पूरे कस्बे के विकास को देखकर आज भी यह प्रश्न बना रहता है कि "क्या उनकी सफलता का लाभ उनकी जन्मभूमि और इसकी मिट्टी तक उतना पहुँचा, जहाँ से उनकी यात्रा शुरू हुई थी?" क्या सफलता के ऊंचे मुकाम पर पहुँचकर ये लोग भी कस्बे के प्रति अपनी "सामाजिक ज़िम्मेदारी" को पूरी तरह भूल कर सिर्फ अपनी व्यक्तिगत तरक्की तक ही सीमित रह गए? यदि किसी समाज से बार-बार प्रतिभाएँ निकलें, बड़े पदों तक पहुँचें और फिर भी उस समाज की मूल स्थिति में अपेक्षित "परिवर्तन" दिखाई न दे, तो यह केवल संयोग नहीं, बल्कि इतिहास के "गंभीर अध्ययन" का विषय बन जाता है....

DISCLAIMER - यह लेख किसी व्यक्ति, परिवार या वर्ग पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के सामने एक ईमानदार प्रश्न रखने और उससे सीख लेने का प्रयास है। अतीत बदला नहीं जा सकता, लेकिन भविष्य अवश्य बदला जा सकता है...इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न अतीत से नहीं, हम सबसे है। यदि हम भी केवल इतिहास की कमियों पर चर्चा करते रहे और अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई, तो क्या आने वाली पीढ़ियाँ भी हमारे बारे में यही लिखेंगी कि मछलीशहर ने प्रतिभाएँ तो बहुत पैदा कीं, लेकिन उन्होंने अपने कस्बे के लिए कुछ नहीं किया?

✍🏻 शाज़िल फ़राज़

*एक नजर जनाबे रहमत पर**मरहूम डॉ० रहमतुल्लाह कुरैशी साहब*  _(रहमत मछली शहरी)_डॉ साहब का तार्रुफ कराना दरअसल सूरज को दिया ...
07/10/2026

*एक नजर जनाबे रहमत पर*

*मरहूम डॉ० रहमतुल्लाह कुरैशी साहब*
_(रहमत मछली शहरी)_

डॉ साहब का तार्रुफ कराना दरअसल सूरज को दिया दिखाने के मिस्ल है। आपकी शख्सियत किसी तार्रुफ की मोहताज नहीं थी।

आप क़स्बा मछलीशहर के वो अनमोल नगीना थे जिन्होंने अदब की अंगूठी को हमेशा रौशन रखा।

*तालीम-ए-सुखन का सफर*
आपने इब्तिदाई दौर में उस्ताद-ए-शो'रा _शरोश मछली शहरी_ से फन-ए-सुखन सीखना शुरू किया। मगर ये साथ बहुत मुख्तसर रहा, क्योंकि शरोश साहब जल्द ही दुनिया से रुख्सत फरमा गए।
इसके बाद आपने मऊ के उस्ताद शायर _चचा मियां गाजीपुर_ से शऊर-ए-सुखन हासिल करने की कोशिश की, लेकिन शहरों के बीच की दूरी इस सिलसिले में रुकावट बन गई।

फिर आपने अपनी जिद्दो-जहद और खुद-इख्तियारी से उरूज की मंजिलें तय कीं। आपकी मेहनत का आलम ये था कि बड़े-बड़े शो'रा भी गाहे-बगाहे आपसे फैज़ उठाने लगे।

*अदबी कमाल*

आपके पास अल्फाज़ का ऐसा खजाना था कि अहले-दानिश आपको "चलता-फिरता लोगत" कहा करते थे। इसकी सबसे बड़ी दलील ये है कि आपने हिंदुस्तान में वाहिद शायर होकर कई _बिन-नुक्ता कलाम_ कहे।
आपने कुरआन-ए-करीम के तकरीबन पंद्रह पारों का तर्जुमानी अंदाज़ में कलाम कहना शुरू किया था, लेकिन तबियत के अलील हो जाने की वजह से ये काम अधूरा ही रह गया।

*रहमत से डॉ० रहमत तक*

एक बार साथ के किसी शायर ने तंज़न कहा "कितने भी काबिल हो, कोई डिग्री भी है?" इस जुमले ने आपके दिल पर ऐसा असर किया कि आपने दादा की उम्र में पहुंच कर डॉक्ट्रेट मुकम्मल की। और "रहमत" से "डॉ० रहमत" हो गए।
यहां भी आपने कमाल कर दिखाया। जिस यूनिवर्सिटी से आपको सर्टिफिकेट मिला, उसके निगरां खुद आपसे अपने कलाम की इस्लाह लेने लगे और आपको अपना उस्ताद तस्लीम कर लिया।

आपको कई बड़े अवार्ड्स के लिए चुना गया, लेकिन आपने कभी चकाचौंध वाली महफिलों में शिरकत नहीं की। सादगी ही आपकी पहचान थी।

*किरदार*

आप निडर, बेबाक और हमेशा हक के साथ खड़े रहने वाले इंसान थे हालांकि मिजाज़ में थोड़ी सख्ती जरूर थी लेकिन दिल से बहुत ही नर्म थे

*पहलवानी का कारनामा*

आप सिर्फ अज़ीम अदीब और शायर ही नहीं, एक बहुत बड़े पहलवान भी थे। कुश्ती को अलविदा कहे हुए दस-बारह साल गुज़र चुके थे। इसी बीच मछलीशहर में एक बड़ा दंगल हुआ। पंजाब के एक नामी पहलवान ने ऐलान किया "क्या जौनपुर ज़िले में कोई मां का लाल है जो मुझसे लड़ सके?"
कस्बे की आबरू दांव पर थी। आपने रब-ए-काबा पर भरोसा कर मैदान में कदम रखा। ऐसा खेल दिखाया कि सामने वाले को संभलने का मौका ही न मिला। बहुत शान से कुश्ती जीत कर पूरे ज़िले का सर फख्र से ऊंचा कर दिया।

*रुख्सत*

आखिरकार तबियत की नासाज़ी बढ़ती गई। आप बिस्तर पर आ गए और इसी हालत में इस दुनियाए फानी से रुख्सत हो गए। कुरआन-ए-करीम का तर्जुमानी कलाम भी आधे पर ही रह गया।

अल्लाह तआला आपको जन्नत-उल-फिरदौस में आला मकाम अता फरमाए। आमीन।

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06/23/2026

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*इंतक़ाल पुर मलाल* *इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन*                                          *ये ख़बर नेहायत ही अफ़...
06/23/2026

*इंतक़ाल पुर मलाल*
*इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन* *ये ख़बर नेहायत ही अफ़सोस व* *रंज-ओ-ग़म* के *साथ दी जा रही है कि*
*मोहल्ला– महतवाना में*

*अब्दुल कैय्यूम अंसारी उर्फ़*
*(मुज़्तर मछली शहरी साहब) का इंतकाल हो गया है,*

*इनकी मिट्टी इंशाअल्लाह बाद नमाज़ असर शेरगढ़ क़ब्रिस्तान में दी जाएगी,*

*आप तमामी हज़रात से इल्तिमास है कि ज़्यादा से* *ज़्यादा तायदाद में शिरकत फरमा कर मरहूम के लिए दुआए मग़फिरत करें।*

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06/20/2026

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