Bhumihar(भूमिहार)

Bhumihar(भूमिहार) ।। ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम: ।। Bhumihar(भूमिहार)................
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About Bhumihar

History of Bhumihar Brahamin

ब्राह्मणो के उस वर्ग ने, जो अपने ब्रह्मर्षि अवतार पुरूष भगवान परशुराम का वंशज मानता रहा है, कृषि को अपने जीवकोपार्जन का मुख्य ध्न्ध बनाया। बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिहार ब्राह्मण के नाम से जाना जाता है।

भूमिहार ब्राह्मण बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण जाति है। मुगल काल से इस क्षेत्रा में भूमिहार ब्राह्मणों का प्रभुत्

व रहा है। भूमिहार ब्राह्मण वर्ग के लोग बुद्वि, विद्या, पुरूषार्थ, ध्र्म तथा अर्थ के क्षेत्रा में अग्रणी रहे है। कृषि प्रशासन तथा सैनिक वृत्ति इनका मुख्य व्यवसाय रहा है। गुण, कर्म, संस्कार तथा ध्र्मावरण के दृष्टिकोण सेे समाज में इनका स्थान बहुत ही ऊँचा रहा है। भूमिहार ब्राह्मण, विद्या, सदाचार तथा लोकहिताकारी कार्यो के लिए प्रसिद्व हुए।

भूमिहार ब्राह्मणों के भूमिपति होने के बहुत से कारक है। भगवान परशुराम ने क्षत्रिय का विनाश कर उनकी भूमि कश्यप आदि ब्राह्मणों को दी थी, यह सर्वविदित है। कुछ ब्राह्मणों को लोकहितकारी सेवाओं के कारण राजवंशो से भूमि अग्रहार के रूप में प्राप्त हुई। प्राचीन काल में कुछ राजवंश ब्राह्मणों के थे। जैसे- शुंग, कण्व, सातवाहन, गुप्त इत्यादि। आज के भूमिहार ब्राह्मणों में से कुछ उन्हीं प्राचीन राजवंशो की परम्परा में है। भूमिहार ब्राह्मणों में चनकिया, सुंगनिया और कण्वायन इन्हीं प्राचीन राजवंशो के अवशेष है। चनकिया चाणक्यवंशी ब्राह्मण हैं, सुंगनिया और कण्वायन का सम्बन्ध् शुंगवंश तथा कण्ववंश से है। ;शंुगवंश में पुष्यमित्रा सबसे प्रसिद्व राजा हुए हैद्ध। इस वर्ग में कुछ ऐसे ध्र्माचार्यो के वंशज भी सम्मिलित हैं जो शिक्षण संस्थाओं के संचालन हेतु भूमि ले लेते थे। प्राचीन राजवंशी के उच्च पदाध्किारी, प्रशासक तथा सेनापति भी इस वर्ग में सम्मिलित हुए है। भूमिहार ब्राह्मणों को शताब्दियों की इस ऐसतिहासिक प्रक्रिया से भूमि प्राप्त हुई है। इस वर्ग के अध्किांश लोगो ने अपने बाहुबल और पुरूषार्थ से भुमि अर्जित की है।

First meeting of Bhumihar Brahmin:

भूमिहार ब्राह्मण शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है। सन 1885 में बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने बिहार एवं उत्तर प्रदेश के जमीनदार ब्राह्मणों की सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय संगठन होनी चाहिए। संगठन बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे। परन्तु संगठन का नाम क्या हो इस प्रश्न पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया। मगध् के बाभनों ने जिनके नेता स्वर्गीय कालीचरण सिंह थे, संगठन का नामकरण ‘बाभन सभा’ करने का प्रस्ताव रखा। स्वयं बनारस महाराज ईश्वरीय प्रसाद सिंह ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ नाम के पक्ष में थे। बैठक में नाम के संबंध् में आम राय नही बन पाई। अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति की अनुशंसा पर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द को स्वीकृत किया गया और इस शब्द का प्रचार-प्रसार करने का निर्णय लिया गया। इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्वर्गीय लंगट सिंह के सहयोग से मुजफ्रपफरपुर में भूमिहार काॅलेज खोला गया। बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. काॅलेज के नाम से पुकारा गया। आज वही जी.बी.बी. काॅलेज लंगट सिंह काॅलेज के नाम से प्रसिद्व है।

Bhumihar Brahmin in all over India :

भूमिहार ब्राह्मण एवं इसके समरूप आयाचक ब्राह्मण पूरे भारत में विभिन्न नामों से जाने जाते है। जिसका प्रचार-प्रसार होने से एक-दूसरे में शादी सम्बन्ध् शुरू हो रहा है। पूरे देश के विभिन्न प्रान्तों में अयाचक ब्राह्मण निम्नलिखित नामों से जाने जाते है।

1. बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में- भूमिहार
2. पंजाब एवं हरियाणा में – मोहयाल
3. जम्मू कश्मीर में – पंडित, सप्रू, कौल, नेहरू, दार, काटजू
4. मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश ;आगरा के निकटद्ध-गालव
5. उत्तर प्रदेश में – त्यागी एवं भूमिहार।
6. गुजरात में – अनाविल ;देसाई जोशी, मेहताद्ध
7. महाराष्ट्र में – चितपावन
8. कर्नाटक में – चितपावन
9. पश्चिमी बंगाल – भादुड़ी, चक्रवर्ती, गंागुली, मैत्रा, सान्याल आदि।
10. उड़ीसा में – दास, मिश्र
11. तमिलनाडू में – अÕयर, आयंगर
12. केरल में – नंबूदरीपाद
13. राजस्थान में – बांगर, पुष्कर्ण, पुरोहिती, रंग एवं रूद्र, बागड़ा
14. आन्ध््रप्रदेश में – राव और नियोगी।

ब्रह्मर्षि वंश की ये प्रजातियाँ भले ही देश के विभिन्न प्रान्तो में जा बसी हो लेकिन उनकी संास्कृतिक परम्परा, रीति-रिवाज एवं जन्मजात प्रकृति की दृष्टि में इनमें परस्पर आश्चर्यजनक समानता है, जैसे- त्यााग, बलिदान, निष्ठा, सेवाभाव, देश-प्रेम, कत्र्तव्यप्रियता, शूरता, मेधविता आदि गुण एवं विशेषता समान रूप में व्याप्त है। यही कारण है कि ब्रह्मर्षि वंश की ख्याति देश एवं दुनिया में व्याप्त है।

इन विशेषताओं के अतिरिक्त ब्रह्मर्षियों में मूलभूत समानतायें है, जिसमें दान का परित्याग, कृषि कार्य एवं अन्य व्यवसाय जीविका के आधर, गोत्रों की समानता, परशुराम की उपासकता, प्रशासनिक, शैक्षणिक एवं सैन्य क्षेत्रों में दक्षता तथा शारीरिक संरचना की दृष्टि से भी भूमिहार, त्यागी, मोहयाल, चितापावन एवं दक्षिण भारत सहित सभी अयाचक ब्राह्मणों में आश्चर्यजनक समानता है।
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भगवान परशुराम -----एक समाज सुधारक क्रान्तिकारी

हमारे धर्म ग्रंथ और कथावाचक ब्राहमण भारत के प्राचीन पराक्रमी नायकों की संहार से परिपूर्ण हिंसक घटनाओं के आख्यान तो खूब सुनाते हैं, लेकिन उनके समाज सुधार से जुड़े जो क्रांतिकारी सरोकार थे, उन्हें लगभग नजरअंदाज कर जाते हैं। विष्णु के दशावतारों में से एक माने जाने वाले भगवान परशुराम के साथ भी कमोबेश यही हुआ। उनके आक्रोश और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय
विहीन करने की घटना को खूब प्रचारित करके वैमस्यता फैलाने का उपक्रम किया जाता है। पिता की आज्ञा पर मां रेणुका का सिर धड़ से अलग करने की घटना को भी एक आज्ञाकारी पुत्र के रुप में एक प्रेरक आख्यान बनाकर सुनाया जाता है। किंतु यहां यह सवाल खड़ा होता है कि क्या व्यकित केवल चरम हिंसा के बूते जन-नायक के रुप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता हैं ? क्या हैहय वंश के प्रतापी महिष्मति नरेश कार्तवीर्य अजरून के वंश का समूल नाश करने के बावजूद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाइ ? रामायण और महाभारत काल में संपूर्ण पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं के राज्य हैं। वे ही उनके अधिपति हैं। इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आशीर्वाद देने वाले, कौरव नरेश धृतराष्ट को पाण्डवों से संधि करने की सलाह देने वाले और सूत-पुत्र कर्ण को ब्रहमशास्त्र की दीक्षा देने वाले परशुराम ही थे। ये सब क्षत्रिय थे। अर्थात परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं शुभचिंतक थे। परशुराम केवल आतातायी क्षत्रियों के प्रबल विरोधी थे।


भगवान परशुराम का समय इतना प्राचीन है कि उस समय का एकाएक आकलन करना नामुमकिन है। जमदग्नि परशुराम का जन्म हरिशचन्द्रकालीन विश्वामित्र से एक-दो पीढ़ी बाद का माना जाता है। यह समय प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘अष्टादश परिवर्तन युग के नाम से जाना गया है। अर्थात यह 7500 वि.पू. का समय ऐसे संक्रमण काल के रुप में दर्ज है, जिसे बदलाव का युग माना गया। इसी समय क्षत्रियों की शाखाएं दो कुलों में विभाजित हुइं। एक सूर्यवंश और दूसरा चंद्रवंश। चंद्रवंशी पूरे भारतवर्ष में छाए हुए थे और उनके प्रताप की तूती बोलती थी। हैहय अजरून वंश चंद्रवंशी था। इन्हें यादवों के नाम से भी जाना जाता था। महिष्मती नरेश कार्तवीर्य अजरून इसी यादवी कुल के वंशज थे। भृगु ऋषि इस वंद्रवंश के राजगूरु थे। जमदगिन राजगुरु परंपरा का निर्वाह कार्तवीर्य अजरून के दरबार में कर रहे थे। किंतु अनीतियों का विरोध करने के कारण कार्तवीर्य अजरून और जमदगिन में मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरुप जमदगिन महिष्मति राज्य छोड़ कर चले गए। इस गतिविधि से रुष्ठ होकर सहस्त्रबाहू कार्तवीर्य अजरून आखेट का बहाना करके अनायास जमदगिन के आश्रम में सेना सहित पहुंच गया। ऋषि जमदगिन और उनकी पत्नी रेणुका ने अतिथि सत्कार किया। लेकिन स्वेच्छाचारी अजरून युद्ध के उन्माद में था। इसलिए उसने प्रतिहिंसा स्वरुप जमदगिन की हत्या कर दी। आश्रम उजाड़ा और ऋषि की प्रिय कामधेनु गाय को बछड़े सहित बलात छीनकर ले गया। अनेक ब्राहम्णों ने कान्यकुब्ज के राजा गाधि राज्य में शरण ली। परशुराम जब यात्रा से लौटे तो रेणुका ने आपबीती सुनार्इ। इस घटना से कुपित व क्रोधित होकर परशुराम ने हैहय वंश के विनाश का संकल्प लिया। इस हेतु एक पूरी सामरिक रणनीति को अंजाम दिया। दो वर्ष तक लगातार परशुराम ने ऐसे सूर्यवंशी और यादववंशी राज्यों की यात्राएं की जो हैहय वंद्रवंशीयों के विरोधी थे। वाकचातुर्थ और नेतृत्व दक्षता के बूते परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंशीयों ने समर्थन दिया। अपनी सेनाएं और हथियार परशुराम की अगुवाइ में छोड़ दिए। तब कहीं जाकर महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुइ।

इसमें परशुराम कोअवंतिका के यादव, विदर्भ के शर्यात यादव, पंचनद के द्रुह यादव, कान्यकुब्ज ;कन्नौज के गाधिचंद्रवंशी, आर्यवर्त सम्राट सुदास सूर्यवंशी, गांगेय प्रदेश के काशीराज, गांधार नरेश मान्धता, अविस्थान -अफगानिस्तान, मुजावत -हिन्दुकुश, मेरु -पामिर, श्री -सीरिया परशुपुर-पारस,वर्तमानफारस सुसतर् -पंजक्षीर उत्तर कुरु -चीनी सुतुर्किस्तान- वल्क, आर्याण -र्इरान देवलोक-षप्तसिंधु और अंग-बंग -बिहार के संथाल परगना से बंगाल तथा असम तक के राजाओं ने परशुराम का नेतृत्व स्वीकारते हुए इस महायुद्ध में भागीदारी की। जबकि शेष रह गर्इ क्षत्रिय जातियां चेदि -चंदेरी नरेश, कौशिक यादव, रेवत तुर्वसु, अनूप, रोचमान कार्तवीर्य अजरून की ओर से लड़ीं। इस भीषण युद्ध में अंतत: कार्तवीर्य अजरून और उसके कुल के लोग तो मारे ही गए। युद्ध में अर्जुन का साथ देने वाली जातियों के वंशजों का भी लगभग समूल नाश हुआ। भरतखण्ड में यह इतना बड़ा महायुद्ध था कि परशुराम ने अंहकारी व उन्मत्त क्षत्रिय राजाओं को, युद्ध में मार गिराते हुए अंत में लोहित क्षेत्र, अरुणाचल में पहुंचकर ब्रहम्पुत्र नदी में अपना फरसा धोया था। बाद में यहां पांच कुण्ड बनवाए गए जिन्हें समंतपंचका रुधिर कुण्ड कहा गया है। ये कुण्ड आज भीअस्तित्व में हैं। इन्हीं कुण्डों में भृगृकुलभूषण परशुराम ने युद्ध में हताहत हुए भृगु व सूर्यवंशीयों का तर्पण किया। इस विश्वयुद्ध का समय 7200 विक्रमसंवत पूर्व माना जाता है। जिसे उन्नीसवां युग कहा गया है।

इस युद्ध के बाद परशुराम ने समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए। केरल,कोंकण मलबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी। इस समय कश्यप ऋषि और इन्द्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे। अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इन्द्र का जल-देवता इसीलिए माना जाता है। परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। परशुराम द्वारा अक्षयतृतीया के दिन सामूहिक विवाह किए जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूर्त के शुभ मुहूर्त माना जाता है। दक्षिण का यही वह क्षेत्र हैं जहां परशुराम के सबसे ज्यादा मंदिर मिलते हैं और उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रुप में पूजते हैं।

जमदग्नि पुत्राय ,भगवान परसुराम नमस्तुते

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Bhumihars हमेशा भूमि control.Bhumihars के लिए द्योतक आइकन जाति बिहार में कृषि भूमि का 45% से अधिक है और देश भर में सभी ब्राह्मणों के रूप में पूर्व मंडल बिहार की राजनीति में एक महान राजनीतिक शक्ति wielded नियंत्रण था. एक समय में इस जाति के बाहर बिहार में कुल 54 लोकसभा सीटों में से 19 सांसदों का योगदान दिया. यह एक तथ्य यह है कि भूमिहार ब्राह्मण भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और बिहार में दलित के उत्थान के लिए योगदान बिहार में किसी भी अन्य समुदाय से बेजोड़ है. कई लोग सोचते हैं कि बिहार Dr.Sri कृष्णा सिंह, जो एक भूमिहार ब्राह्मण और अपने कार्यकाल के अंतर्गत राज्य अपने विकास के सबसे केवल देखा था के कार्यकाल में भारत में सबसे अच्छा प्रशासित राज्य था. इस जाति को अपमानित किया जाता है, भले ही स्वामी सहजानंद सरस्वती और समुदायों द्वारा जमींदारी के खिलाफ भारत में पहले किसान संघर्ष शुरू करने के लिए सबसे अधिक लाभ से यह यादव, कुर्मी, और Koeri (पिछड़ी जातियों) थे जो भूमिहार ब्राह्मण जमींदार की लागत में भूमि स्वामित्व मिला . वह अभी भी किसानों के सबसे सम्मानित नेताओं में से एक है. बिहार में 1990 के दशक में राजनीति में ऊंची जातियों, और अधिक विशेष रूप से भूमिहार ब्राह्मणों को निशाना बनाने का एकमात्र आधार के साथ किया गया था. फीसदी बिहार में Bhumihars की जनसंख्या भी एक नीच 2.9% से 4.6% की वृद्धि हुई है के बाद झारखंड से अलग किया गया था, उन्हें राजनैतिक महत्वपूर्ण बना. उल्लेखनीय भूमिहार ब्राह्मणों आजादी से पूर्व की सूची • स्वामी सहजानंद सरस्वती: उत्तर प्रदेश (गांव: देवा, गाजीपुर) में जन्मे सामाजिक कार्यकर्ता, संत, पिछली सदी के किसानों के अग्रणी नेता थे. अंतर्राष्ट्रीय उसे एक दस पिछली सदी के भारत के सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक के रूप में कार्यकाल पत्रकारों. हमारे भारतीय पत्रकार काफी हद तक उसे भुला है पर और एक जाति के नेता के रूप में उसे नजरअंदाज कर दिया जब तथ्य यह है कि वह सभी चाहे उनकी जाति के किसानों के लिए काम किया. यह यादव किसानों के इशारे पर किया गया था कि वह किसान सभा का गठन किया है जो भारत की सबसे बड़ी विरोधी जमींदारी किसान आंदोलन बन गया. जमींदारों और बड़े जमींदार दोनों सम्मान और उसे डर था. अन्य ब्राह्मण कौन bhumihars, chitpawans tyagis, और anavails की तरह इन मेहनती ब्राह्मण के दान रहते थे उन्हें उनकी सामाजिक स्थिति के बराबर पर विचार नहीं किया था और उन्हें नीचे उन्हें सामाजिक पदानुक्रम में विचार. स्वामी सहजानंद इन मेहनती ब्राह्मण के लिए बराबर का दर्जा के लिए काम किया. • Basawon सिंह (सिन्हा): महान राष्ट्रवादी, व्यापार संघी और बिहार में विपक्ष के नेता पहले, पहले HSRA (हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) और बाद में joinedCongress समाजवादी पार्टी के साथ सक्रिय है. वह अठारह बिताया था और ब्रिटिश भारत में एक जेल में आधे साल भारत की आजादी के लिए लड़ रहे हैं. वह अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में एक क्रांतिकारी है, लेकिन बाद में डेमोक्रेटिक समाजवाद करने के लिए बदल गया था. वह भारत में अग्रणी डेमोक्रेटिक समाजवाद की समर्थकों के बीच किया गया था. • पंडित Karyanand शर्मा: महान राष्ट्रवादी और किसान नेता योगेंद्र शुक्ला: सबसे बड़ी राष्ट्रवादियों के अलावा देश का उत्पादन किया गया है और जो भी बीच सेल्युलर जेल, अंडमान (कालापानी), में सेवा HSRA (हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) योगेन्द्र शुक्ला (1896-1966) के रूप में के रूप में अच्छी तरह से अपने भतीजे Baikunth शुक्ला (1907-1934) के संस्थापकों में मुजफ्फरपुर में गांव Jalalpur (अब वैशाली), बिहार के जिले से स्वागत और क्रांतिकारी की मशाल पदाधिकारियों थे स्वतंत्रता संग्राम की भावना. युवा योगेन्द्र 1930 और 1942 के बीच भारतीय स्वतंत्रता के कारण उसका सबसे बड़ा योगदान दिया और बिहार में क्रांतिकारी आंदोलन के नेताओं में से एक के रूप में "अपने कई कारनामों के लिए लगभग एक महान व्यक्ति बनने". वह भगत सिंह और Batukeshwar दत्ता के एक निकट सहयोगी था. वह अपने क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए कुल सोलह से अधिक की एक और एक आधे साल के लिए जेल शर्तों की सेवा करने के लिए किया था. भारत की विभिन्न जेलों में कैद के दौरान, वह चरम यातना है, जो अपने लोहे के संविधान जीर्णशीर्ण अधीन था • Baikuntha शुक्ला: महान राष्ट्रवादी जो जो एक सरकारी गवाह बन गया था जो भगत सिंह, सुखदेव की फांसी और नेतृत्व Phanindrananth घोष की हत्या के लिए फांसी पर लटका दिया गया था. राजगुरु. वह योगेंद्र शुक्ला का भतीजा था. Baikunth शुक्ला भी एक युवा उम्र में 1930 के 'नमक सत्याग्रह' में सक्रिय भाग लेने स्वतंत्रता संघर्ष में शुरू किया गया था. वह theHindustan सेवादल और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे क्रांतिकारी संगठनों के साथ जुड़े थे. 'लाहौर षड्यंत्र मामले में अपने परीक्षण के परिणाम के रूप में 1931 में महान भारतीय क्रांतिकारियों भगत सिंह राजगुरु, और सुखदेव के निष्पादन एक घटना है कि पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. फणिंद्र नाथ घोष, रिवोल्यूशनरी पार्टी के एक प्रमुख सदस्य अब तक कोई अनुमोदक मोड़ से विश्वासघात था कारण धोखा दिया, सबूत है, जो निष्पादन करने के लिए नेतृत्व देने. Baikunth जिसमें उन्होंने 9 नवम्बर 1932 पर सफलतापूर्वक किए गए वैचारिक प्रतिशोध के एक अधिनियम के रूप में घोष के निष्पादन की योजना के लिए कमीशन किया गया था. उन्होंने गिरफ्तार किया गया था और हत्या के लिए कोशिश की. Baikunth दोषी ठहराया और 14 मई 1934 को गया सेंट्रल जेल में फांसी पर लटका दिया. वह केवल 28 साल का था. • चंद्रमा सिंह: एक और राष्ट्रवादी जो वैचारिक प्रतिशोध लिए Phanindranath घोष की हत्या में Baikuntha शुक्ल के साथ एक साथी होने के लिए जीवन अवधि कारावास दिया गया था. : • सर गणेश दत्त सिंह बिहार के 1923 से प्रांत में केवल मंत्री 1937 और महान परोपकारी जो वेल्स मेडिकल कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय, दरभंगा मेडिकल स्कूल आदि के विश्व प्रसिद्ध राजकुमार शुरू की • श्री कृष्ण सिंह: प्रख्यात राष्ट्रवादी और पहले बिहार के मुख्यमंत्री के. वह बिहार के शेखपुरा जिले के मौर गांव से हुई थी. • राम दयालु सिंह: बिहार विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष. वह मुजफ्फरपुर के Gangawa गांव और 1937 विधानसभा चुनाव (1) में बिहार प्रांत के प्रधानमंत्री श्री बाबू उम्मीदवारी के मजबूत अधिवक्ता से हुई थी. मुजफ्फरपुर में एक प्रसिद्ध कॉलेज है जो उसके नाम पर है. • राम बिनोद सिंह: महान राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी जो स्वतंत्रता संग्राम में आचार्य Jivatram भगवानदास कृपलानी द्वारा लाया गया था जब वह Muzzafarpur में Langet सिंह कॉलेज में सिखाने के लिए प्रयोग किया जाता है. वास्तव में, Acaryaji भी अपनी आत्मकथा "मेरा समय" में उसके बारे में उल्लेख किया है. • राम नंदन मिश्रा: राष्ट्रवादी और समाजवादी नेता जो ब्रिटिश भारत में जेल में साल बिताए. लोकनायक जयप्रकाश नारायण के एक करीबी सहयोगी. Ramnandan मिश्रा प्रसिद्धि में गोली मार दी जब वह जेपी के साथ, theQuit भारत आंदोलन के दौरान हजारीबाग केंद्रीय जेल की दीवारों पर पहुंचा अंग्रेजों के खिलाफ भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व. आजादी के बाद वह संत बन जाते हैं. राम मनोहर लोहिया हमेशा उसे अपने गुरु के रूप में माना जाता है. • पंडित राज कुमार शुक्ला: दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी ने अपने सत्याग्रह के द्वारा बिहार के चंपारण जिले में राज कुमार शुक्ला के अनुरोध पर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन शुरू कर दिया खिलाफ ब्रिटिश, जो स्थानीय किसानों संयंत्र नील जो बहुत स्थानीय मिट्टी के लिए हानिकारक था करने के लिए मजबूर कर रहे थे. भारत की आजादी के लिए संघर्ष में "चंपारण सत्याग्रह", एक बहुत ही महत्वपूर्ण चरण के निशान. राज कुमार शुक्ला, जो सिर्फ दक्षिण अफ्रीका से लौटा था एक दमनकारी यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा स्थापित प्रणाली के तहत पीड़ित किसानों की दुर्दशा के लिए महात्मा गांधी की ओर ध्यान आकर्षित किया. अन्य ज्यादतियों के अलावा वे अपने आयोजन की 20/3 भाग पर नील की खेती के लिए और यह प्लांटर्स द्वारा तय कीमतों पर प्लांटर्स को बेचने के लिए मजबूर किया गया. इस स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में गांधीजी के प्रवेश के रूप में चिह्नित है. मोतिहारी में उनके आगमन पर, जिला मुख्यालयों, राज कुमार शुक्ला के साथ गांधीजी अगले उपलब्ध ट्रेन है जो वह करने से इनकार कर दिया और गिरफ्तार किया गया छोड़ने का आदेश दिया गया था. उन्होंने जारी किया गया था और प्रतिबंध आदेश एक, "सत्याग्रह" खतरा के चेहरे में वापस ले लिया गया. गांधीजी किसान शिकायतों में एक खुली जांच का आयोजन किया. सरकार के लिए गांधी जी के साथ एक सदस्य के रूप में एक जांच समिति गठित करने के लिए किया था. इस प्रणाली के उन्मूलन के लिए नेतृत्व किया. राज कुमार शुक्ला अपने "Atmakatha" में किया गया है एक आदमी जिसका दुख उसे शक्ति दी बाधाओं के खिलाफ वृद्धि के रूप में गांधी जी द्वारा वर्णित है. गांधी जी को अपने पत्र में उन्होंने "आदरणीय महात्मा, आप हर रोज दूसरों की कहानियाँ सुना है कि आज मेरी कहानी सुनो. ..... मैं लखनऊ कांग्रेस में आपके द्वारा किए गए वादे के लिए आपका ध्यान आकर्षित करना है कि आप के लिए आ जाएगा चंपारण चाहते लिखा है समय के लिए आप अपने वादे को पूरा करने के लिए आ गया है 19 लाख चंपारण के लोगों के पीड़ित करने के लिए आप को देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं. " गांधीजी ने 10 अप्रैल, 1917 को पटना पहुंचे और वह 16 अप्रैल को पहुँच मोतिहारी राज कुमार शुक्ला के साथ. गांधीजी के नेतृत्व के तहत ऐतिहासिक "चंपारण सत्याग्रह" शुरू किया. राज कुमार शुक्ला योगदान, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी और ज़ाहिर है, महात्मा गांधी के लेखन में परिलक्षित होता है. राज कुमार शुक्ला एक डायरी है जिसमें वह इंडिगो प्लांटर्स, तो movingly में "नील दर्पण" दीन बंधु मित्रा, एक खेल है कि माइकल मधुसूदन दत्त द्वारा अनुवाद किया गया था द्वारा दर्शाया अत्याचारों के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष के एक खाते दिया है बनाए रखा. महात्मा गांधी द्वारा इस आंदोलन में लोगों के एक क्रॉस सेक्शन के सहज समर्थन प्राप्त है, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जो अंततः भारत के पहले राष्ट्रपति बन गए सहित • महावीर त्यागी, प्रख्यात राष्ट्रवादी और सांसद • पंडित यमुना Karjee: पंडित यमुना Karjee पैदा हुआ था. 1898 में बिहार के दरभंगा जिले में एक छोटे से गाँव पूसा के पास नाम Deopar में. उनके पिता अनु Karjee एक सीमांत किसान है जो मर गया जब जमुना Karjee सिर्फ 6 महीने पुरानी थी. अपने स्कूल के दिनों से ही वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम और किसान आंदोलन और स्वामी Sehganandji सरस्वती के नेतृत्व में किसान आंदोलन की ओर खींचा था. उच्च अध्ययन के लिए वह प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता के पास गया, और भी कानून में एक डिग्री प्राप्त की है. कलकत्ता में वह डा. बी.सी. राय, डा. श्री कृष्ण सिन्हा, राहुल Sankritayan जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों और कांग्रेस नेताओं के साथ संपर्क में आया आदि कई सरकारी नौकरियों के प्रस्ताव spurning, वह ख्याति की एक हिन्दी पत्रकार बन गया. वह कलकत्ता में प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक भारत Mirtra संपादकीय विंग में शामिल हो गए. उन्होंने यह भी 1920-21 से गांधीजी के गैर सहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और 1929-30 में सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए जेल में बंद किया गया था. उन्होंने 1937 में कांग्रेस के एक उम्मीदवार के रूप में बिहार और उड़ीसा विधानसभा के लिए पहली बार चुनाव जीता. वह एक स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार में किसान आंदोलन के मजबूत स्तंभों में से एक था. वह राहुल Sankritayan और अन्य हिंदी literaries के साथ साथ बिहार से एक हिंदी साप्ताहिक Hunkar प्रकाशन 1940 में शुरू कर दिया. Hunkar बाद किसान और बिहार में कृषि आंदोलन आंदोलन के मुखपत्र बन गया. उन्होंने 1947-48 में राष्ट्रपति बिहार पत्रकार संघ के पद के लिए चुना गया. वह अक्टूबर 1953 में कैंसर के 55 के एक कम उम्र में मृत्यु हो गई. उनके असामयिक निधन के बाद बिहार में किसान आंदोलन गति खो दिया और सिद्धांतविहीन बन गया. उसका नाम भी स्वतंत्रता लिए Bipan चंद्रा की उत्कृष्ट कृति भारत के संघर्ष में प्रकट होता है यह भी देखें: people.indiatimes.com/articleshow/813210 • शील भद्र (1906-1996) Yajee: बिहार से उग्र स्वतंत्रता सेनानी अहिंसक और के साथ जुड़े थे. स्वतंत्रता संग्राम के हिंसक रूप. स्वतंत्रता आंदोलन में Yajee की भागीदारी 1928 में शुरू हुआ, जब एक छात्र के रूप में है, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया. वह चार साल बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और किसान आंदोलन में शामिल हो गया. बाद में, उन्होंने सुभाष चंद्र बोस, के रूप में के रूप में अच्छी तरह से महात्मा गांधी के साथ निकट संपर्क में आया था. उन्होंने 1939 में सुभाष चंद्र बोस को शामिल करने के लिए ऑल इंडिया फार्वर्ड ब्लॉक पाया. वह सक्रिय रूप से आईएनए आंदोलन के साथ जुड़े थे. Yajee जाति पूर्वाग्रहों और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई. वह किसानों, मजदूरों और समाज के परिवर्तन के लिए संघर्ष में मध्यम वर्ग की सक्रिय भागीदारी में एक दृढ़ विश्वास था. उन्होंने 'भारतीय श्रम आंदोलन की एक झलक' की तरह, 'फॉरवर्ड ब्लॉक और उसके खड़े' कई पुस्तकों के लेखक ', और' एकाधिकार अमेरिकी लोकतंत्र का असली चेहरा 'समाजवाद भारत के लिए एक आवश्यकता है' भारत सरकार एक स्मारक डाक टिकट जारी किए हैं. उस पर 28/01/2001 पर • गंगा शरण सिंह: साहित्यकार और राष्ट्रवादी. वह 1956 से 1974 तक राज्य सभा के एक सदस्य था. वह ऊपरी सदन के लिए निर्वाचित किया गया था बहुत बाद में. उन्होंने यह भी 1956-59 से PSP के अध्यक्ष था. वह जयप्रकाश नारायण के रूप में के रूप में अच्छी तरह से प्रकाश श्रीमती इंदिरा गांधी के करीब था. वह अपने सबसे अच्छा करने के लिए इन दोनों एक दूसरे के करीब नेताओं की कोशिश की, लेकिन दोनों ने संदेह किया गया था. Pupul Jaykar एक पुस्तक 'इंदिरा गांधी' में उसके बारे में लिखा था. पं. •. शर्मा Jadunandan: प्रख्यात राष्ट्रवादी और किसान नेता • किशोरी Prassana सिन्हा (सिंह): राष्ट्रवादी • मिथिलेश नारायण सिंह: राष्ट्रवादी • राय जगन्नाथ सिंह: राय हृदय नारायण सिंह, एक ब्रिटिश प्रशासन के करीब परोपकारी के महान पोता. वह एक स्वतंत्रता सेनानी थे. ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए अपने धन को जब्त किया गया था. • वीर Keshwar सिंह: Parihans - गया प्रख्यात राष्ट्रवादी और किसान नेता. बुद्धिजीवी • Mahapandit राहुल: संकृत्यायन राहुल संकृत्यायन (1893-1963) एक सबसे था व्यापक रूप से भारत के विद्वानों, जो यात्रा और घर से दूर पर अपने जीवन के चालीस पांच साल बिताए कूच. वह एक बौद्ध भिक्षु (Bauddh भिक्खु) बन गए और अंततः मार्क्सवादी समाजवाद की ओर आकर्षित किया. वह Mahapandit (महान विद्वान) के शीर्षक दिया गया था • रामधारी सिंह 'दिनकर' : हिन्दी का सबसे बड़ा कवि और Rastra कवि के रूप में जाना जाता है. वह बिहार के बेगूसराय जिले के Simariya गांव से हुई थी. उन्होंने कहा कि भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार के कुलपति थे. उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू के करीबी मित्र थे. वह अपने प्रसिद्ध कविता उर्वशी और अपनी पुस्तक संस्कृति के चार Adhyaya के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए prestious ज्ञानपीठ पुरस्कार पुरस्कार मिला. वह तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया. उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों 'कुरुक्षेत्र, नील कुसुम, Rashmirathi, हमारी सांस्कृतिक एकता, दिनकर की डेयरी और सूची अंतहीन है. • राम Briksh Benipuri: मुजफ्फरपुर, बिहार के Benipur गांव से प्रख्यात हिन्दी भाषा लेखक. वह एक महान राष्ट्रवादी jouranlist और राष्ट्रीय समाचार पत्र 'जनता' के संपादक था, वह एक महान स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक जय प्रकाश नारायण के निकट सहयोगी था. वह महान हिन्दी नाटक 'Ambapali' जिस पर एक हिंदी फिल्म 'आम्रपाली' Rajkapoor द्वारा किया गया था के लेखक थे. • गोपाल "नेपाली" सिंह: . के बाद Chhayavaad अवधि के प्रख्यात कवि और बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध गीतकार • राम शरण शर्मा: उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर एमेरिटस है. वह पहले दिल्ली (1973-85) और टोरंटो विश्वविद्यालय में पढ़ाया जाता है. उन्होंने यह भी भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के संस्थापक अध्यक्ष थे. उन्होंने भारत के प्राचीन इतिहास में सबसे प्रसिद्ध विशेषज्ञता इतिहासकारों के बीच किया गया है. वह बिहार के बेगूसराय जिले के बरौनी झंडा गांव के अंतर्गत आता है. अपने काम करता है शामिल हैं: भारत के प्राचीन अतीत (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) प्राचीन भारत में राजनीतिक विचारों और संस्थाओं के पहलुओं (मोतीलाल 8120808983 BanarsidassISBN), अर्ली भारत के सामाजिक और आर्थिक इतिहास में परिप्रेक्ष्य (8121506727 ISBN), भारत ग में शहरी क्षय. 300-ग. 1000 (+८१२१५००४५१ ISBN) प्राचीन भारत में, Sudras: लोअर नीचे लगभग 600 ई. आदेश (8120808738 ISBN), उच्च शिक्षा (8171693202 ISBN), आर्यों के लिए खोज रहे हैं (8125006311 ISBN) का एक सामाजिक इतिहास, भारतीय सामंतवाद 'और कई अन्य रूपवादी काम करता है. • प्रकाश कुमार: वह इतिहास के कोलोराडो राज्य विश्वविद्यालय जहां वह आधुनिक दक्षिण एशिया, साम्राज्य और सुधार अध्ययन में सहायक प्रोफेसर, और औपनिवेशिक विज्ञान है. मूल रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित किया है, वह अपने पीएच.डी. प्राप्त के जॉर्जिया प्रौद्योगिकी संस्थान से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इतिहास में. दक्षिण एशिया में कृषि के इतिहास पर उनके काम के विज्ञान के इतिहास और भारतीय आर्थिक और सामाजिक इतिहास की समीक्षा के लिए ब्रिटिश जर्नल में छपी है, अन्य दुकानों के बीच • वी.एस. नायपॉल: साहित्य, जिसका भूमिहार ब्राह्मण था से माइग्रेट पूर्वजों के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता त्रिनिदाद और टोबैगो के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्वी भागों में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गोरखपुर. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से अनुबंधित श्रमिकों के रूप में गरीब के अलावा धार्मिक कार्यों से कृषि के रूप में कृषि और 'धर्मनिरपेक्ष पेशे में धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मणों के कई मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम और त्रिनिदाद जहां उनकी कड़ी मेहनत और बुद्धि के सहारे की वजह से कर रहे हैं के लिए चला गया अब इन क्षेत्रों में सबसे प्रभावशाली, शक्तिशाली और बौद्धिक समूह के बीच. कुछ रखा है उनके अलग ब्राह्मण पहचान जिंदा जबकि कई अन्य लोगों के साथ ग्रहण कर लेता है मिल गया है. • प्रो जीआर शर्मा: Kosambi उत्खनन गाजीपुर और पुरातत्त्ववेत्ता के मूल निवासी है. वह प्रोफेसर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रमुख प्रो RNRai (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय): वह बहुत अच्छा काम किया है भारतीय अंग्रेजी साहित्य पोषण • डॉ. मधुसूदन मिश्रा: वह एक विश्व प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान जो है सिंधु घाटी सभ्यता स्क्रिप्ट deciphered और अपने क्रेडिट करने के लिए के बारे में 20 + प्रकाशनों है. उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बीए और एमए में स्वर्ण पदक विजेता है. वह कुछ समय के साथ निर्देशक के रूप में उप निदेशक (अकादमिक) के रूप में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से भी सेवानिवृत्त. • प्रो देवेंद्र नाथ शर्मा: प्रख्यात हिन्दी आलोचक और भाषा Vaigyanic. वह पटना और भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य किया. • प्रो विजेन्द्र नारायण सिंह: Renowoned हिन्दी आलोचक. वह प्रोफेसर और केंद्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद के हिंदी विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया. उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें उर्वशी हैं, में uplabdhi और sima'and मोनोग्राफ रामधारी सिंह Dinker पर [साहित्य अकादमी] वह समस्तीपुर District'Bihar Vibhutipur गांव की निवासी है. • प्रो कैलाश राय: इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफेसर प्रख्यात. उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में कानून पर अधिक से अधिक दो दर्जन पुस्तकें लिखी है और अपनी पुस्तकों में से 13 पर राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया है जो भारत और अनुबंध के संवैधानिक कानून पर अपनी पुस्तकें शामिल किया गया है. उनके कैरियर में कानून के क्षेत्र में सेवा के 35 साल से अधिक spans है और अभी भी जारी है. गाजीपुर में एक Reotipur की एक बहुत ही साधारण परिवार से संबंधित वह विशाल साहित्यिक योगदान के साथ कानून के क्षेत्र में इस स्तर पर पहुंच गया. : • डॉ. गिरिजा नंदन सिंह प्रो. और भूगोल, मुंगेर, बिहार के सिर विभाग. कई देशों का दौरा किया है और शोध पत्र प्रस्तुत. वह Tekari, गया, बिहार से अंतर्गत आता है. • प्रो राम दास राय: (संस्कृत के प्रोफेसर रास कॉलेज, मुजफ्फरपुर, बिहार), मूल रूप से पूर्वी जिला गाज़ीपुर गांव उत्तर प्रदेश: Suhawal. अनुवादित कालिदास हिन्दी, कविता संस्करण है, जो कॉलेज पाठ्य पुस्तकों के रूप में विभिन्न कॉलेजों में इस्तेमाल किया गया में खेलता है. उसकी बहन ग्रंथ राज प्रकाशकों के मालिक के परिवार में शादी की थी. • डा. राम सूरत (1921 - 1991) ठाकुर: Samastipurdistrict से प्रख्यात शिक्षाविद् और विद्वान. बिहार में पहले प्राप्त करने के लिए अपने पीएच.डी. और डी. लिट. eductational pschycology. उन्होंने सरकार के Pricipal के रूप में सेवानिवृत्त. टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, समस्तीपुर. उन्होंने यह भी शिक्षा reseach और प्रशिक्षण के बिहार राज्य परिषद, पटना में रीडर के रूप में कार्य किया. • प्रोफेसर दिग्विजय नारायण सिन्हा: प्रसिद्ध शिक्षाविद • कुबेर नाथ राय (26,1933 मार्च 5,1996 - जून): जन्मस्थान (Matsa, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश, भारत). शिक्षा: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और कोलकाता विश्वविद्यालय. नलबाड़ी कॉलेज, असम में 1958 से 1986 के लिए अंग्रेजी विभाग में Lecturar के रूप में. 1986 से स्वामी Sahjanand पीजी कॉलेज, गाजीपुर, 1995 में एक प्रधानाचार्य के रूप में. पुस्तकें: प्रिया Neelkanthi, रास Aakehtak, Meghmaadan, निषाद बांसुरी, Vishad योग, Pardmukut, महाकवि की तर्जनी, Patr Madiputul के नाम, Maanwachan की Nauka, कीरत nadi में Chandramukh, दृष्टि Abhisaar, त्रेता का vrihat SAAM Kaamdhenu, Maraal. पुरस्कार: (भारती ज्ञानपीठ) Murtidevi AMD उत्तर प्रदेश और असम सरकार से कई पुरस्कार. डॉक्टरों • डॉ. शीतल प्रसाद सिंह: बहुत पहले भूमिहार ब्राह्मण से दवा विशेषज्ञ के. उसका नाम सबसे बिहार मेडिकल सोसायटी में सम्मान है. • डॉ. विजय नारायण सिंह: बिहार में सबसे अच्छा सर्जन में. वह सबसे लंबे समय तक सेवारत विभागाध्यक्ष, PMCH सर्जरी था और सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पटना में कृष्णकांत बाबू जो नालंदा मेडिकल कॉलेज के रूप में जाना जाता है के साथ एक मेडिकल कॉलेज शुरू कर दिया. • डॉ. AKN सिन्हा: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन में सबसे बड़ा आंकड़ा और भी अध्यक्ष ofCommonwealth मेडिकल एसोसिएशन और सबसे लंबे समय तक सबसे शक्तिशाली शरीर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के अध्यक्ष सेवा भारत में सभी मेडिकल कालेजों के शासी निकाय है. उन्होंने यह भी एक प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ • डॉ. जीपी शर्मा: वह पश्चिम पटना (Nadawan) के प्रसिद्ध रोगविज्ञानी देशी था. उनकी शुरू कर दिया प्रयोगशाला डॉ. जीपी शर्मा प्रयोगशाला राजेंद्र नगर, पटना में एक प्रमुख पैथोलॉजी लैब है. इन दिनों अपने एक बेटे की इस प्रयोगशाला चलाता है. • डॉ. जेपी सिन्हा: 1948 PMCH से स्नातक पास एमबीबीएस और ब्रिटेन रेडियोलॉजी में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए और जीवन बन गया है लंबे समय से रेडियोलॉजी, PMCH छाबड़ी और 1980 में presitious PMCH के प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त करने के लिए चला गया. उनकी राजेंद्र नगर में शुरू एक्स रे संस्थान सभी आधुनिक रेडियोलॉजी उपकरणों के साथ सबसे अच्छा लैब में एक बार किया गया था. उनके पौत्र भी ब्रिटेन में एक रेडियोलाजिस्ट वर्तमान. Ratti लालगंज, वैशाली के पास, डॉ. सिन्हा भगवानपुर के मूल निवासी है. यह कहा जाता है कि वह भारत में बहुत पहले रेडियोलॉजी विशेषज्ञ है. • डॉ. आर.के. सिंह और डॉ. अमित कुमार: डॉ. राज किशोरी सिंह बिहार में सबसे प्रसिद्ध डॉक्टरों के प्रसूति और स्त्री रोग में विशेषज्ञता में से एक है. उसके बेटे डॉ. अमित कुमार को भी एक प्रसिद्घ बिहार में बांझपन विशेषज्ञ है. • डॉ. संयुक्त राष्ट्र शाही: एक और दुर्लभ सर्जन बिहार कभी का उत्पादन किया गया है. वह शाही Meenapur, मुजफ्फरपुर का निवासी था. उनके पुत्र श्री पुष्कर शाही पटना में एक प्रसिद्ध वकील है. • डॉ. प्रियम्वदा तिवारी: वह आईएमएस बीएचयू के निदेशक के रूप में कुछ साल पहले सेवानिवृत्त. वह वाराणसी में एक प्रसिद्ध चिकित्सक है. सेवानिवृत्ति के बाद वह Luxa रोड में उनके निवास के पास उसके ही अस्पताल खोला : • डॉ. धन पति राय बक्सर की मूल निवासी है जो 1939 में दरभंगा मेडिकल कॉलेज से अपनी चिकित्सा की डिग्री हो गया और समाज की सेवा के लिए उनके पैतृक स्थान में बसे. उनके पुत्र डॉ. बी.बी. राय भी 1962 DMCH पूर्व छात्र और एचईसी रांची में हड्डी रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया. डॉ. बी.बी. राय के पुत्र श्री संजीव कुमार रॉय सिंगापुर में बसे है और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के एशिया प्रशांत क्षेत्र के क्षेत्रीय श्रेणी प्रबंधक की क्षमता में शीर्षक. जबकि एक अन्य पुत्र श्री राजीव कुमार राय एक सिविल सेवक था, लेकिन अब कनाडा में बसे. • डॉ. बी.पी. मिश्र: डॉ. शीतल प्रसाद सिंह के कानून में बेटा जो मुजफ्फरपुर में एस मेडिकल कॉलेज के पहले प्रिंसिपल बन गया. उनके छोटे भाई, डॉ. बी एन मिश्रा भी दरभंगा में एक प्रख्यात फिजिशियन है. डॉ. बी.पी. मिश्र अपनी पैथोलॉजी मुजफ्फरपुर में आधुनिक डायग्नोस्टिक लैब नामक क्लिनिक चलाता है. उनके पुत्र भी एक पैथोलॉजी विशेषज्ञ, डॉ. रंजन मिश्रा whlile अपने भतीजे डॉ. के.के. मिश्रा Maniyari महंत पोती डॉ. रंजना मिश्रा से शादी कर ली और अपने खुद के पैथोलॉजी क्लिनिक मानक निदान लैब चलाता है. • डॉ. आर.पी.एन. सिन्हा: वह देवरिया, पूर्वी से Salemgarh संपत्ति का निवासी था उत्तर प्रदेश में वह खुद को उत्तर भारत में सबसे अच्छा मनोचिकित्सकों के बीच के रूप में स्थापित है. • डॉ. केके सिन्हा रांची के एक न्यूरोसर्जन, एक पूर्व की चिकित्सा पेशे में प्रमुख हस्तियों में से एक है झारखण्ड और बिहार की विशेष रूप से भारत, • डॉ. Anmola सिन्हा: एक दुर्लभ बुद्धिमान चिकित्सक, देशी शाही (मुजफ्फरपुर) Meenapur जो GYN और OBS के क्षेत्र में उत्कृष्ट है. यह कहा जाता है वह हमेशा शिक्षा में छात्रवृत्ति मिली और वह अपनी शिक्षा के लिए उसके पिता का श्रेय है. उनकी बड़ी बेटी एमबीबीएस करने के लिए अखिल भारतीय स्तर में उच्चतम अंक प्राप्त करने के लिए परीक्षा में एक रिकॉर्ड धारक है. जबकि एक अन्य डॉक्टर बेटी विकिरण विज्ञानी डॉ. जेपी सिन्हा के पोते से शादी की है. • डॉ. NKN सिन्हा: पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से एक दवा के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं. उन्होंने चिकित्सकों (FRCP) के रॉयल कॉलेज के एक साथी है और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में एक प्रकाशग्रह है. एक नोट के रूप में के रूप में अच्छी तरह से एक उत्कृष्ट चिकित्सा शिक्षक सर्जन: डॉ. राजेश्वर ठाकुर. वह Kamargama, कल्याणपुर, समस्तीपुर के मूल निवासी है. पटना शहर क्षेत्र में उनके नर्सिंग होम में प्रसिद्ध है. चिकित्सा शिक्षक वह सर गणेश दत्त सेवा संस्थान, PMCH पुराने लड़कों एसोसिएशन सहित विभिन्न सामाजिक संगठन की ओर बढ़ रहा है के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद. यह कहा जाता है कि वह एक बहुत कुछ चिकित्सा शिक्षकों को जो सुबह में तेज अस्पतालों 09:00 रिपोर्ट किया था. IRTS अधिकारी अपने बेटों में से एक है और डॉ. रामेंद्र नारायण सिंह की बड़ी बेटी, जो भी केंद्रीय सरकार में एक वरिष्ठ अधिकारी को शादी कर ली. डॉ. कालिका शरण सिंह: एक विख्यात और Nawalpur, महाराजगंज, सिवान से हृदय रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की. वह एक Badramia भूमिहार ब्राह्मण है और उसकी हाय-Tec प्रयोगशालाओं प्राइवेट के साथ एक व्यापार के व्यवसायी बन. लिमिटेड अपने देश के व्यापक विपणन नेटवर्क के साथ नई दिल्ली में स्थित है. • डॉ. रामेंद्र नारायण सिंह: एक सच्चे नीले खून पराशर गोत्र Eksaria Mool भूमिहार ब्राह्मण जो परोपकारी और राजनीतिक नेता श्री कृष्ण कांत सिंह की जीन किया जाता है. डॉ. सिंह भव्य पिता नारायण बाबू Goreakothi पाला और 1916 में एक हाई स्कूल की स्थापना की. डॉ. सिंह ने एक प्रसिद्ध सेंट जेवियर हाई स्कूल से मैट्रिक पास और PMCH से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. वह सर्जरी में डबल स्नातकोत्तर डिग्री रखती है और ब्रिटेन में 10 से अधिक वर्षों के लिए किया गया था. ब्रिटेन से वापस पटना रिटर्निंग वह चिकित्सा शिक्षा में शामिल हो गए और 1986 में प्रसिद्ध तारा हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर शुरू कर दिया. डॉ. सिंह Rahimpur (खगरिया, पुरानी मुंगेर / बेगूसराय) के एक और गांव में शादी की है. डॉ. सिंह के छोटे भाई, डॉ. जीएन सिंह ने एक प्रख्यात चिकित्सा के रूप में के रूप में अच्छी तरह से शिक्षक एक आधुनिक रेडियोलॉजी पहले विशेषज्ञों की है. • डॉ. आरबी शर्मा और डॉ. उषा शर्मा: डॉ. आरबी शर्मा न्यूरो सर्जरी के दायर में सबसे प्रसिद्ध सर्जन है और में सेवा की ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका में कई वर्षों. वह Jihuli गांव के देशी और डॉ. उषा शर्मा जो पुरानी गया प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और परोपकारी Khaderan बाबू की पोती है शादी है. डॉ. उषा शर्मा ने राजनीतिक हितों होने से एक अनुभवी GYN और OBS के अलावा विशेषज्ञ है. वह लोक जनशक्ति पार्टी के उपाध्यक्ष के रूप में सेवा की है. • डॉ. शांति रॉय और डॉ. अनीता सिंह: डॉ. शांति रॉय एक सबसे प्रसिद्ध बिहार में GYN OBS और डॉक्टर के एक है. वह Goreakothi के लिए है और गोपालगंज में शादी है. उसके बेटे डॉ. हिमांशु राय भी एक प्रसिद्घ बिहार में बांझपन विशेषज्ञ है. डॉ. शांति रॉय छोटी बहन डॉ. अनीता सिंह भी एक प्रख्यात GYN OBS विशेषज्ञ है. डॉ. अनीता सिंह एक और चिकित्सक डॉ., पश्चिम पटना जिले के देशी से शादी की है : • डा. वीरेन्द्र प्रसाद सिन्हा पटना में पटना मेडिकल कॉलेज में शिक्षक और कार्डियोलॉजी बिहार में 2 डीएम के रूप में हृदय रोग विशेषज्ञ अभ्यास सिविल सेवकों आईसीएस और आईएएस • टी.पी. सिंह (जूनियर): एक आईसीएस अधिकारी जो Ghataro, वैशाली के बहुत ही साधारण परिवार से पुकारा. • बी.पी. सिंह: पूर्व संस्कृति और केंद्र में राजग शासन के दौरान भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय गृह सचिव • Aparmita प्रसाद सिंह: एक 1964 उत्तर प्रदेश कैडर के बैच के अधिकारी विनोद राय: प्रमुख सचिव, वित्त, भारत सरकार (ग्रामीण Parasa, गाजीपुर). • सुधीर शर्मा: मणिपुर और त्रिपुरा काडर के 1975 बैच कार्यालय (गांव Nagasar, गाजीपुर) • श्री जेपी राय: जिला गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के एक गांव Lauwadih से मूल निवासी है. महिला और बाल कल्याण विभाग में उप निदेशक के 1980 बैच के बिहार काडर के अधिकारी: • राज्यवर्धन शर्मा. वह पटना जिले के तहत एक छोटा सा गांव दहिया की निवासी है. • भारत प्रसाद सिंह: बिहार के शेखपुरा जिले से उत्तर प्रदेश संवर्ग आईपीएस. वह डीआईजी इलाहाबाद, गोरखपुर और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के रूप में सेवा की UP.His बड़े बेटे मुकेश पी. सिंह, आईएएस (प्रधान निदेशक लेखापरीक्षा और लेखा, उत्तर पूर्व रेलवे, गोरखपुर) और उनके छोटे बेटे कर्नाटक के आईएएस संवर्ग है. • : विभूति नारायण राय उत्तर प्रदेश संवर्ग के आईपीएस अधिकारी और आजमगढ़ के Jokahara गांव, जहां वह एक रामानंद Pustakalaya नाम पुस्तकालय स्थापित लघु पत्रिका के महान संग्रह होने से प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यासकार.

माननीय संजय झा जी ने भरत तिवारी शहादत प्रकरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस संवेदनशील मामले में केवल संबंधित...
20/06/2026

माननीय संजय झा जी ने भरत तिवारी शहादत प्रकरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस संवेदनशील मामले में केवल संबंधित दोषियों को निलंबित किया जाना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे घटनाक्रम की त्वरित, पारदर्शी और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए, ताकि कानून का शासन कायम रहे और वास्तविक दोषियों के विरुद्ध जल्द कार्रवाई की जा सके। 🙏

अपने समाज के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति तुमने जो हाल किया वो घृणा के पात्र है।

भरत तिवारी अमर रहें।🙏

Bhumihar भूमिहार
#भूमिहार Bhumihar(भूमिहार)

कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने विचारों से अमर होते हैं। भरत तिवारी जी ने सत्य, न्याय और जनसेवा के लिए अपना जीवन समर्पित किया...
20/06/2026

कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने विचारों से अमर होते हैं। भरत तिवारी जी ने सत्य, न्याय और जनसेवा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

विनम्र श्रद्धांजलि।🙏

आज़ाद भारत का भगत सिंह भरत तिवारी को श्रद्धांजलि।🙏

Bhumihar भूमिहार
#भूमिहार Bhumihar(भूमिहार)

शहीद भरत तिवारी जी के लिए न्याय मार्च आरा में .. वीर शहीद भरत तिवारी अमर रहे।🙏🙏🙏🙏🙏Bhumihar भूमिहार    #भूमिहार Bhumihar(...
20/06/2026

शहीद भरत तिवारी जी के लिए न्याय मार्च आरा में .. वीर शहीद भरत तिवारी अमर रहे।

🙏🙏🙏🙏🙏

Bhumihar भूमिहार
#भूमिहार Bhumihar(भूमिहार)

20/06/2026

आरा एनकाउंटर पर अश्विनी चौबे की मांग!
दोषी पुलिसकर्मियों को मिले मृत्युदंड।

19/06/2026

जिस राज्य का मुखिया अशिक्षित होगा उस राज्य के रखवाले भक्षक ही होंगे न।😡
किसी से जोड़िएगा मत नहीं तो ठुल्ले घर से लेजाएंगे और शवासन पर लिटा देंगे।

भरत तिवारी के साथ हुई घटना अत्यंत दुःखद है लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला लोमहर्षक घटना से व्यथित हूं।– अश्विनी चौबे, कें...
19/06/2026

भरत तिवारी के साथ हुई घटना अत्यंत दुःखद है लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला लोमहर्षक घटना से व्यथित हूं।

– अश्विनी चौबे, केंद्रीय मंत्री

Bhumihar भूमिहार
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💔 एक लाचार पिता का दर्द: "हमको थाने में बिठाया, उधर मेरे बेटा को मार दिया..." शहीद भरत भूषण तिवारी जी के पिता के इन शब्द...
19/06/2026

💔 एक लाचार पिता का दर्द: "हमको थाने में बिठाया, उधर मेरे बेटा को मार दिया..." शहीद भरत भूषण तिवारी जी के पिता के इन शब्दों को सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। क्या रक्षक ही भक्षक बन गए हैं?

इस बेबस पिता को न्याय कब मिलेगा?

Bhumihar भूमिहार
#भूमिहार Bhumihar(भूमिहार)

19/06/2026

भाजपा प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल का कहना है कि भरत तिवारी का एन/का/उंटर सही हुआ और आगे भी ऐसा ही होगा, तब तो पार्टी की बिदाई भी तय है।😡

आज़ाद भारत के क्रांतिकारी शहीद भरत तिवारी को सादर नमन! इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाते-उठाते, आखिरकार उन्होंने अ...
19/06/2026

आज़ाद भारत के क्रांतिकारी शहीद भरत तिवारी को सादर नमन! इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाते-उठाते, आखिरकार उन्होंने अपनी शहादत दे दी। समाज सेवा करने वाला एक युवक इस कदर मजबूर हुआ—इसके पीछे कई गहरी वजहें हैं, जिन पर गहराई से सोचने की ज़रूरत है।

​जब आप दिल से समाज के लिए कोई अच्छा काम कर रहे हों और कोई जानबूझकर उसमें अड़चनें पैदा करे, तो आक्रोश आना स्वाभाविक है; और यही उनके साथ भी हुआ। आज गाँव बदहाल हैं, व्यवस्था मौन है, इसी हताशा और अन्याय के खिलाफ उन्होंने क्रांति का रास्ता चुना। ऐसे वीर को कोटि-कोटि नमन!

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