13/10/2024
भृगुवल्ली: ब्रह्म के विविध स्वरूपों की खोज
महाभारत के अनुशासनपर्व में वर्णित भृगुवल्ली, तैत्तिरीय उपनिषद का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस उपनिषद में ऋषि भृगु और उनके पिता वरुण के बीच ब्रह्म के ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।
वरुण ने भृगु को बताया कि ब्रह्म वह है, जिससे सभी जीव उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं और अंत में जिसमें समा जाते हैं। उन्होंने कहा, "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयंत्यभिसांविशंति। तद्विजिज्ञासस्व। तद ब्रह्मेति।" (जिससे ये सभी जीव उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं और जिसमें समा जाते हैं, उसे जानो, वही ब्रह्म है।)
वरुण ने भृगु को ब्रह्म को जानने के लिए अन्न, प्राण, नेत्र, कर्ण, मन और वाणी का उपयोग करने का निर्देश दिया। "अन्नम प्राण: चक्षु: श्रोतम मनोवाचमिति।" (अन्न, प्राण, नेत्र, कर्ण, मन और वाणी ये ब्रह्म को जानने के माध्यम हैं।)
भृगु ने इन माध्यमों का उपयोग करते हुए ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव किया। उन्होंने पाया कि:
अन्न (वनस्पति) ब्रह्म है।
प्राण (जीव चेतना) ब्रह्म है।
मन (उच्च चेतना) ब्रह्म है।
विज्ञान अर्थात सत्य ब्रह्म है।
आनन्द ब्रह्म है।
इस ज्ञान के बाद, भृगु ने ब्रह्म के आचरण के बारे में भी सीखा। उन्होंने पाया कि:
अन्न की निन्दा न करें।
अन्न जल का त्याग न करें।
अन्न की वृद्धि करें।
अतिथि का सम्मानपूर्वक अन्न द्वारा सत्कार करें।
शरीर उपासना - शरीर के हाथ पैर मुख वाणी गुदा आदि कर्म और गति के माध्यम हैं। इनका ध्यान रखें।
प्रकृति उपासना - वर्षा, विद्युत, पशु, नक्षत्र, प्रजा, आकाश आदि रूप में देव या प्रकृति उपासना।
भृगु ने इन सभी स्तरों का अनुभव किया और अंततः परम आनंद प्राप्त किया। ब्रह्मवल्ली में परम आनंद का गणितीय सूत्र भी दिया गया है, जिसका गुणन फल अनन्त है।
भृगुवल्ली में कई महत्वपूर्ण मंत्र भी शामिल हैं, जो ब्रह्म के ज्ञान और आचरण के मार्ग को बताते हैं। इनमें से कुछ मंत्र हैं:
"ॐ तत् सतिति तिरोऽध्यात्मं च विद्यात्। तदेव ब्रह्मेति संप्रजानीतम्।" (ॐ तत् सतिति, यह आत्मा है, इसे जानना चाहिए। यह ही ब्रह्म है, इसे समझना चाहिए।)
"ॐ अग्निर्देवता। अग्निर्ज्योतिर्देवता। अग्निर्दृष्टिर्देवता। अग्निर्हृदयं देवता। अग्निर्वाक्देवता। अग्निर्प्राणदेवता। अग्निर्मनोदेवता। अग्निर्विज्ञानं देवता। अग्निरानन्दो देवता।" (ॐ अग्नि देवता है, अग्नि प्रकाश देवता है, अग्नि दृष्टि देवता है, अग्नि हृदय देवता है, अग्नि वाणी देवता है, अग्नि प्राण देवता है, अग्नि मन देवता है, अग्नि विज्ञान देवता है, अग्नि आनंद देवता है।)
"ॐ प्राणो देवता। प्राणो ज्योतिर्देवता। प्राणो दृष्टिर्देवता। प्राणो हृदयं देवता। प्राणो वाक्देवता। प्राणो प्राणदेवता। प्राणो मनोदेवता। प्राणो विज्ञानं देवता। प्राणोऽऽनन्दो देवता।" (ॐ प्राण देवता है, प्राण प्रकाश देवता है, प्राण दृष्टि देवता है, प्राण हृदय देवता है, प्राण वाणी देवता है, प्राण प्राण देवता है, प्राण मन देवता है, प्राण विज्ञान देवता है, प्राण आनंद देवता है।)
ये मंत्र ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों और उनके गुणों का वर्णन करते हैं। इन मंत्रों का जाप और मनन करने से ब्रह्म के ज्ञान की प्राप्ति होती है।
ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्न, प्राण, नेत्र, कर्ण, मन और वाणी का उपयोग करें। ब्रह्म के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव करें और उनके आचरण का पालन करें। ऐसा करने से परम आनंद प्राप्त होगा।
भृगुवल्ली एक महान उपनिषद है, ब्रह्म के ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बताती है। इस उपनिषद का अध्ययन और मनन करने से व्यक्ति ब्रह्म के साथ एकात्मता प्राप्त कर सकता है।
Shivbodh Avikalp