Dr Ram Murti Prasad Mishra Gita Foundation

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कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाई दूज का त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन यम...
01/11/2024

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाई दूज का त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन यमुना ने अपने भाई यम को आदर सत्कार के साथ भोजन कराया था। यमराज के वरदान अनुसार जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके, यम का पूजन करेगा, मृत्यु के पश्चात उसे यमलोक में नहीं जाना पड़ेगा।
दिवाली के बाद भैया दूजा का त्योहार मनाया जाता है. यह भाई दूज का त्योहार भाई-बहन के बीच प्यार के बंधन का प्रतीक है. इस दिन बहने अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है और उनकी समृद्धि और दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं. आइए जानते हैं कि कैसे हुई भैया दूज मनाने की शुरुआत.
दिवाली के बाद भैया दूज का त्योहार मनाया जाता है. रक्षाबंधन की तरह भैया दूज भी बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है. यह त्योहार साल में दो बार मनाया जाता है. जिसमें साल का पहला भैया दूज चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है. भाई दूज का पर्व भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक लगाती हैं और बदले में भाई उन्हें उपहार देते हैं. इस त्योहार को देशभर में भाई फोटा, भाऊ बीज, भाई बिज, भाऊ बीज, भ्रातृ द्वितीय, यम द्वितीया, भतृ दित्य, भाई तिहार और भाई टिक्का के नाम से भी जाना जाता है. हर साल यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है.
पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया की दो संताना थी एक यमराज और दूसरी यमुना. यमराज अपनी बहन यमुना को बहुत प्रेम करते थे. यमुना अपने भाई से बार-बार अपने घर आने को कहती थी. एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को उन्होंने अपने भाई से घर पर आने का वचन ले लिया. भाई दूज के दिन ही यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए. तब यमुना ने अपने भाई यमराज का भव्य स्वागत किया. इसके बाद यमराज को तिलक लगाकर भोजन कराया. यमुना का अपने भाई के प्रति इतना प्रेम और आदर देख यमराज प्रसन्न हुए और यमुना से वरदान मागनें को कहा. जिसके बाद वरदान में यमुना ने अपने भाई से कहा कि हर साल आप इस दिन मेरे घर आना. इसके बाद से ही भाई दूज या यम द्वितीया की परंपरा शुरु हुई.
Dr Ram Mahavidyalay
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दिवाली का पर्व कार्तिक मास के अमावस्या तिथि को मनाया जाता है. इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की उपासना की जाती है. कह...
30/10/2024

दिवाली का पर्व कार्तिक मास के अमावस्या तिथि को मनाया जाता है. इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की उपासना की जाती है. कहते हैं कि इस दिन भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त करके अयोध्या वापिस लौटे थे, जिसकी खुशी में सभी नगरवासियों ने दीपक जलाए थे. दिवाली के दिन लोग अपने घरों को दीए, रंगोली आदि चीजों से सजाते हैं.
पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में दीपावली का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि ये ग्रन्थ पहली सहस्त्राब्दी के दूसरे भाग में किन्हीं केंद्रीय पाठ को विस्तृत कर लिखे गए थे। दीये (दीपक) को स्कन्द पुराण में सूर्य के हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है, सूर्य जो जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा का लौकिक दाता है और जो हिन्दू कैलंडर अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्तिथि बदलता है।
दिपावली का इतिहास रामायण से भी जुड़ा हुआ है, ऐसा माना जाता है कि श्री राम चन्द्र जी ने माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाया तथा उनकी अग्नि परीक्षा के उपरान्त, 14 वर्ष का वनवास व्यतीत कर अयोध्या वापस लोटे थे। अयोध्या वासियों ने श्री राम चन्द्र जी, माता सीता, तथा अनुज लक्षमण के स्वागत हेतु सम्पूर्ण अयोध्या को दीप जलाकर रोशन किया था, तभी से दीपावली अर्थात दीपों का त्यौहार मनाया जाता है। अयोध्या में केवल 2 वर्ष ही दिपावली मनायी गई थी।
रामायण के मुताबिक, भगवान श्रीराम जब लंकापति रावण का वध करके माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटे तो उस दिन पूरी अयोध्या नगरी दीपों से सजी कहते हैं कि भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर दिवाली मनाई जाती है. हर नगर हर गांव में दीपक जलाए गए थे. तब से दिवाली का यह पर्व अंधकार पर विजय का पर्व बन गया.
डॉ राम महाविद्यालय
बड़ागांव वाराणसी।
केंद्रीय संस्कृत महाविद्यालय नई दिल्ली द्वारा मान्यता प्राप्त
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नवरात्रि भारतीय हिन्दू संस्कृति के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार नौ दिनों तक मनाया जाता है और मां दुर्गा...
03/10/2024

नवरात्रि भारतीय हिन्दू संस्कृति के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार नौ दिनों तक मनाया जाता है और मां दुर्गा की पूजा का आयोजन किया जाता है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में देवी दुर्गा की आराधना और उनके नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस अवसर पर लोग व्रत रखते हैं और धार्मिक गीत और भजन गाते हैं।
हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण- तीनों प्रकार के गुण व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है। इन 9 दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व है ।

माँ की आराधना
दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती ये तीन रूप में माँ की आराधना करते है| माँ सिर्फ आसमान में कहीं स्थित नही हैं, ऐसा कहा जाता है कि

"या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयते" - "सभी जीव जंतुओं में चेतना के रूप में ही माँ / देवी तुम स्थित हो"

नवरात्रि माँ के अलग अलग रूपों को निहारने और उत्सव मानाने का त्यौहार है। जैसे कोई शिशु अपनी माँ के गर्भ में 9 महीने रहता हे, वैसे ही हम अपने आप में परा प्रकृति में रहकर - ध्यान में मग्न होने का इन 9 दिन का महत्व है। वहाँ से फिर बाहर निकलते है तो सृजनात्मकता का प्रस्सपुरण जीवन में आने लगता है।
आखिरी दिन फिर विजयोत्सव मनाते हैं क्योंकि हम तीनो गुणों के परे त्रिगुणातीत अवस्था में आ जाते हैं। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि जितने भी राक्षशी प्रवृति हैं उसका हनन करके विजय का उत्सव मनाते है। रोजमर्रा की जिंदगी में जो मन फँसा रहता हे उसमें से मन को हटा करके जीवन के जो उद्देश्य व आदर्श हैं उसको निखार ने के लिए यह उत्सव मनाया जाता है। एक तरह से समझ लीजिये की हम अपनी बैटरी को रिचार्ज कर लेते है। हर एक व्यक्ति जीवनभर या साल भर में जो भी काम करते-करते थक जाते हे तो इससे मुक्त होने के लिए इन 9 दिनों में शरीर की शुद्धि, मन की शुद्धि और बुद्धि में शुद्धि आ जाए, सत्व शुद्धि हो जाए >

इस तरह का शुद्धिकरण करने का, पवित्र होने का त्यौहार नवरात्रि है।

पिशाच मोचन कुंड की कहानी काशी खंड के मुताबिक, पहले इस कुंड को विमल तीर्थ या विमलोदक तीर्थ कहा जाता था. एक बार पाशुपत ऋषि...
20/09/2024

पिशाच मोचन कुंड की कहानी

काशी खंड के मुताबिक, पहले इस कुंड को विमल तीर्थ या विमलोदक तीर्थ कहा जाता था.
एक बार पाशुपत ऋषि यहां तपस्या कर रहे थे, तभी एक पिशाच आया. वह ब्राह्मण था, लेकिन पूर्वजन्म के कर्मों के कारण पिशाच योनि में चला गया था.
ऋषि वाल्मीकि ने उसे तालाब में स्नान करने और भगवान कपर्दीश्वर की पूजा करने के लिए कहा.
इस तरह पिशाच को पिशाच योनि से मुक्ति मिली और तीर्थ का नाम पिशाच मोचन पड़ा.
मान्यता है कि पिशाच मोचन कुंड गंगा के पृथ्वी पर आने से पहले का है.
इस कुंड के बारे में गरुड़ पुराण, स्कंद पुराण, और शिव पुराण में कथाएं मिलती हैं.
इस कुंड के पास एक पीपल का पेड़ है, जिस पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है.
मान्यता है कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है.
त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन तरह के देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, और महेश की पूजा की जाती है.
त्रिपिंडी श्राद्ध में एक साथ 44 आत्माओं की मुक्ति होती है.
पितृ पक्ष में यहां प्रेतों का मेला लगता है.
इस कुंड पर अश्वदान की परंपरा भी है.
काशी को मोक्ष की नगरी कही जाती है। ऐसी मान्यता है कि यहीं से भगवान शिव ने सृष्टि रचना का प्रारम्भ किया था । कहते हैं यहां जो इंसान अंतिम सांस लेता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है इसीलिए कई लोग अपने अंतिम समय में काशी में ही आकर बस जाते हैं। मोक्ष नगरी काशी में चेतगंज थाने के पास पिशाच मोचन कुंड है। ऐसी मान्यता है कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिये पितृ पक्ष के दिनों पिशाच मोचन कुंड पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्राद्ध की इस विधि और पिशाच मोचन तीर्थस्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी मिलता है।

1) जाने इस कुंड के बारे में खास बातें

भारत में सिर्फ पिशाच मोचन कुंड पर ही त्रिपिंडी श्राद्ध होता है, जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु की बाधाओं से मुक्ति दिलाता है।

इस कुंड के बारे में गरुड़ पुराण में भी बताया गया है। काशी खंड की मान्यता के अनुसार पिशाच मोचन मोक्ष तीर्थ स्थल की उत्पत्ति गंगा के धरती पर आने से भी पहले से है।
वाराणसी के पिशाच मोचन कुंड में ये मान्यता है कि हजार साल पुराने इस कुंड किनारे बैठ कर अपने पितरों जिनकी आत्माए असंतुष्ट हैं उनके लिए यहा पितृ पक्ष में आकर कर्म कांडी ब्राम्हण से पूजा करवाने से मृतक को प्रेत योनियों से मुक्ति मिल जाती है।

मान्यता के अनुसार यहां कुंड़ के पास एक पीपल का पेड़ है जिसको लेकर मान्यता है कि इस पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है।

इसके लिए पेड़ पर सिक्का रखवाया जाता है ताकि पितरों का सभी उधार चुकता हो जाए और पितर सभी बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकें और यजमान भी पितृ ऋण से मुक्ति पा सके।
प्रेत बधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं।

इसको भगवान शंकर, ब्रह्म और कृष्ण के ताप्‍तिक रूप में मानकर तर्पण और श्राद का कार्य किया जाता है।
प्रधान तीर्थ पुरोहित के अनुसार, पितरों के लिए 15 दिन स्वर्ग का दरवाजा खोल दिया जाता है। उन्होंने बताया कि यहां के पूजा-पाठ और पिंड दान करने के बाद ही लोग गया के लिए जाते हैं। उन्‍होंने बताया कि जो कुंड वहां है वो अनादि काल से है भूत-प्रेत सभी से मुक्ति मिल जाती है।

18/09/2024
21/08/2024
CRE On 28 29 30 March 2024, organised by Career Success Special Children School, run by  Dr Ram Murti Prasad Mishra Gita...
23/04/2024

CRE On 28 29 30 March 2024, organised by Career Success Special Children School, run by Dr Ram Murti Prasad Mishra Gita Foundation
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