12/07/2026
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काशी के जल स्रोत अर्थात तालाब, कुण्ड, पोखरा केवल जल स्रोत नहीं है बल्कि यह काशी की सांस्कृतिक स्मृति, धार्मिक परम्परा एवं ऐतिहासिक धरोहर के जीवंत प्रतीक है। इनका संरक्षण केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है।
पर्यावरणीय दृष्टि से देखे तो तालाब प्राचीन काल के हार्वेस्टिंग सिस्टम है जो बरसाती पानी संरक्षित कर भूगर्भ में भेजता है। जिससे जलस्तर में वृद्धि होती है। तथा आस पास के वातावरण को शीतलता प्रदान करता है। अनेकों पक्षी तालाब के पास के पेड़ों पर घोंसले बनाते हैं। तथा विभिन्न जीव-जंतुओं को आश्रय मिलता है।
तालाबों, कुण्डों, पोखरों के किनारे काशी में मेला लगने का प्रचलन बहुत पुराना है।
शंकुलधारा पोखरा पर लगभग 12-13वीं शताब्दी से कष्टहरिया मेला लगता है। जिसका वर्तमान स्वरूप कटहरिया मेलें ने ले लिया है। विश्व में शंकुलधारा पोखरा एक मात्र स्थान है जहां कटहरिया मेला लगता है। इस मेले में आने वाले लोग कटहल के कौआ को खरीद कर भगवान को चढ़ाते हैं, उसके उपरांत प्रसाद के रूप में खाते है और घर ले जाते हैं।
लोलार्क कुण्ड पर संतान प्राप्ति हेतु विशेष स्नान मेलें के रूप में लगता है। जिसमें लाखों से भी अधिक भीड़ होती है। यह भीड़ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वालों लोगों की होती है। आधुनिकता के दौर में भी यह परम्परा चल रही है।
सोनिया तालाब से भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नमक सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत हुई थी। जहां सम्पूर्ण काशी के लोग एकत्रित होकर नमक सत्याग्रह में सम्मिलित हुए थे।
रामकुण्ड के किनारे राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों के बैठक का विशेष स्थान हुआ करता था।
इसलिए इन जल स्रोतों को बचाने की संरक्षित करने की आवश्यकता है नही तो हम काशी की सांस्कृतिक विरासत एवं स्मृति को भूल जायेंगे।
आइये जल का एवं जल स्रोत का संरक्षण करें क्योंकि जल है तो कल है जल स्रोत है तो जल है।