06/10/2026
कुछ बातें आज दिल से कहने का मन हुआ…
पता नहीं आज मन इतना उदास क्यों है…
शायद इसलिए कि अपनी समाज और अपने लोगो के लिए दिल से कुछ करने की कोशिश की, उसी समाज में आज अपने ही लोगों को एक-दूसरे की टांग खींचते देखकर मन कहीं अंदर से टूट जाता है।
मैंने समाज के लिए जो भी किया, अपनी क्षमता के अनुसार किया।
समय दिया, मेहनत दी, घर का सब कुछ लगाया, अपनी परेशानियों को पीछे रखा… सिर्फ इसलिए कि अपना समाज आगे बढ़े, संगठन मजबूत हो और जरूरत के समय अपने लोगों के काम आ सकूँ।
लेकिन कभी-कभी मन में सवाल आता है—
आखिर इस सब का मेरा स्वार्थ क्या है?
कभी कभी लगता है संगठन पद छोड़ कर घर बैठे जाऊँ मुझे बिल्कुल भी संकोच नहीं होगा अपना पद छोड़ने मैं अगर बात समाज की आयेगी तो सबसे पहले त्याग पत्र दूँगा
न मेरा कोई व्यक्तिगत फायदा,
बल्कि कई बार अपने परिवार से मिलने वाला समय भी कम हो जाता है।
फिर भी मन कहता है—
अगर अपने लोगों के लिए कुछ अच्छा कर सकता हूँ, तो इससे बड़ी बात मेरे लिए क्या होगी?
लेकिन जब देखता हूँ अपने ही कुछ लोग सोशल मीडिया पर एक दूसरे के लिए लिखने मैं नहीं चूकते सोशल मीडिया का ज़माना है घर बैठे बैठे सोशल मीडिया पर लिखने का काम आज कल करते है और बिना सोचे कुछ भी लिख देते है
लेकिन जब अपने ही लोग एक-दूसरे को गलत साबित करने में लग जाते हैं, अपने ही लोगों की बुराई करते हैं और छोटी-छोटी बातों को लेकर एक-दूसरे से दूर होते जाते हैं, तब मन पूछता है—
हम आखिर जा कहाँ रहे हैं?
क्या हम समाज को आगे ले जा रहे हैं या एक-दूसरे को पीछे खींच रहे हैं?
कई बार लगता है कि सब छोड़ दूँ…
घर बैठूँ, अपने परिवार को समय दूँ, अपने लिए काम करूँ और चैन से जिंदगी जियूँ।
क्योंकि मेरे घरवाले भी तो इंसान हैं…
उन्हें भी मेरी चिंता होती है।
जब मैं घर से निकलता हूँ तो उनके मन में यही रहता है कि बेटा खाना खाया होगा या नहीं, सुरक्षित होगा या नहीं, किसी से विवाद तो नहीं हुआ, कोई परेशानी तो नहीं आई।
और वे भी शायद यही सोचकर खुद को समझा लेते हैं कि बेटा समाज के लिए कुछ कर रहा है, देश के लिए कुछ कर रहा है।
यही सोचकर मैं भी फिर रुक जाता हूँ।
मैंने कभी समाज सेवा को किसी दूसरे समाज से नफरत करना नहीं माना।
मेरे लिए अपनी समाज के लिए खड़ा होना और हर समाज के व्यक्ति का सम्मान करना—दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं।
मुझे किसी से शिकायत नहीं है।
बस कभी-कभी इंसान मजबूत होते-होते थक जाता है।
हर बार सभी के लिए लड़ते-लड़ते एक दिन खुद से सवाल होने लगता है—
“मेरे लिए कौन खड़ा होगा?”
शायद इसका जवाब भी मुझे खुद ही ढूँढना होगा।
आज बस इतना ही…
मन में बहुत कुछ है, लेकिन शब्द शायद उतना कह नहीं पाए।
आपका सेवक
श्री आसाराम रजक (जिला अध्यक्ष रजक समाज टीकमगढ़)