26/01/2026
बस्तर की धरती के सेवाव्रती
डॉ रामचंद्र और सुनीता ताई गोडबोले
छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी सघन वनराशि, विशिष्ट जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से आत्मीय संबंध के लिए जाना जाता है। किंतु बीते कई दशकों से यह क्षेत्र नक्सल हिंसा, सशस्त्र संघर्ष, भय और अविश्वास के वातावरण से भी जूझता रहा है। ऐसे कठिन हालात में यदि कोई व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन निःस्वार्थ भाव से जनजाति समाज की सेवा में अर्पित कर दे, तो वह केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संवाहक बन जाता है। ऐसे ही एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी सहधर्मचारिणी श्रीमती सुनीता ताई- जिन्होंने बस्तर को ही अपना कर्मक्षेत्र और घर बना लिया।
महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे डॉ. गोडबोले ने आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था में ही उनके मन में समाज-सेवा का बीज अंकुरित हो गया था। लगभग 18–19 वर्ष की आयु में उन्होंने अल्बर्ट श्वाइत्ज़र के जीवन पर आधारित एक पुस्तक पढ़ी, जिसने उनके सोचने की दिशा ही बदल दी। श्वाइत्ज़र—एक महान समाजसेवी और चिकित्सक—ने अफ्रीका के वंचित समाज के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया और 1952 में नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त किया। उसी क्षण डॉ. गोडबोले ने तय कर लिया कि चिकित्सा उनके लिए आजीविका नहीं, बल्कि साधना होगी।
पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वनवासी कल्याण आश्रम इस अखिल भारतीय संगठन के कार्य से जुड़े और महाराष्ट्र के नासिक जिले के कनाशी स्थान पर निवास करने वाले भील जनजाति समाज के बीच स्वास्थ्य सेवा का कार्य प्रारंभ किया। कुछ वर्षों बाद, मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्हें छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर गांव भेजा गया, जहां एक स्वास्थ्य केंद्र लंबे समय से बंद पड़ा था। यही स्थान उनके जीवन की स्थायी कर्मभूमि बन गया।
आश्रम ने उन्हें अकेले न जाने की सलाह दी और पहले विवाह करने का सुझाव दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात पुणे की सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता पुराणिक से हुई, जो महिला सशक्तिकरण और साक्षरता अभियानों में सक्रिय थीं। सुनीता ताई भी वनवासी कल्याण आश्रम के रायगढ़ जिले में स्थित जांभिवली केंद्र पर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रही थी। दोनों की विचारधारा और सेवा-भावना में समानता थी। विवाह के मात्र दो सप्ताह बाद ही दोनों सुदूर क्षेत्र बस्तर पहुंच गए और जनजाति समाज के साथ जीवन को आत्मसात कर लिया।
आज डॉ. गोडबोले और उनकी पत्नी बारसूर गांव में एक साधारण दो-कमरे के मकान में रहते हैं—ईंट की दीवारें, टीन की छत और चारों ओर फैला घना जंगल। उनके घर से कुछ दूरी पर खड़ी एम्बुलेंस उनकी सेवा-प्रतिबद्धता का प्रतीक है। डॉ. गोडबोले कहते हैं,
“यहां के लोगों के पास दवाइयों के पैसे भी मुश्किल से होते हैं, परिवहन की व्यवस्था तो लगभग नहीं के बराबर है। इसलिए यह जिम्मेदारी हमें स्वयं उठानी पड़ी।”
शुरुआती वर्षों में जनजाति समाज में आधुनिक चिकित्सा के प्रति गहरा संदेह था। बीमार होने पर पहले मांत्रिकों और ओझा-गुनियों से उपचार कराया जाता था। जब वे असफल होते, तब डॉक्टर को बुलाया जाता। वह भी सीधे क्लिनिक आने की परंपरा नहीं थी—जंगल में आग जलाकर धुआं किया जाता, ताकि डॉक्टर उस संकेत को देखकर मरीज तक पहुंचे। बाहरी दुनिया का भय इतना गहरा था कि एक बार डॉ. गोडबोले जब एक मरीज को इलाज के लिए जगदलपुर ले गए, तो वह फिर कभी गांव नहीं लौटा। बाद में पता चला कि शहर उनके लिए किसी अनजान देश जैसा था—भाषा, कागजी प्रक्रिया और पैसों की कमी उन्हें डरा देती थी।
इन्हीं अनुभवों से डॉ. गोडबोले इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्वास्थ्य सेवा गांव में ही, सरल और न्यूनतम खर्च पर उपलब्ध कराना ही एकमात्र व्यवहारिक समाधान है। उन्होंने स्थानीय हलबी भाषा सीखी, लोगों के साथ समय बिताया और धैर्यपूर्वक विश्वास अर्जित किया। धीरे-धीरे उनके क्लिनिक में नियमित मरीज आने लगे। इसी दौरान सुनीता गोडबोले ने जनजाति महिलाओं का एक समूह गठित किया, जो महुआ, इमली, कच्चे आम जैसे वनोपज को उचित मूल्य पर बेचने में सहायक बना।
2002 में पारिवारिक कारणों से उन्हें कुछ वर्षों के लिए सतारा लौटना पड़ा। कुछ साल दोनों ने महाराष्ट्र के पालघर जिला स्थित विक्रमगढ़ क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं प्रदान की। लेकिन बस्तर से जुड़े उनके भावात्मक संबंध उनको फिर से बस्तर की ओर खींच रहे थे। 2010 में जब वे पुनः बस्तर लौटे, तब सरकारी स्तर पर 108 एम्बुलेंस और टेली-परामर्श जैसी योजनाएं शुरू हो चुकी थीं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह थी कि आज भी मीलों तक वे ही एकमात्र डॉक्टर थे।
2012 में उन्होंने एक अभिनव पहल की। स्थायी क्लिनिक बंद कर उन्होंने चलित चिकित्सा शिविरों की शुरुआत की—हर महीने तीन बार, एक दिन एक गांव, सुबह 11 बजे से तब तक, जब तक अंतिम व्यक्ति का उपचार न हो जाए। साथ ही उन्होंने आरोग्य मित्र मंडल’ की स्थापना की, जिसके अंतर्गत गांव के युवाओं को प्राथमिक उपचार, रोग-निवारण और उपचार समन्वय का प्रशिक्षण दिया गया। अब तक लगभग 65 जनजातीय युवक-युवतियां इस अभियान से जुड़ चुके हैं। सुनीता ताई ने भी 'अपने शरीर को जानो' इस अनोखे प्रयोग के माध्यम से बस्तर क्षेत्र के सैकड़ो स्कूलों में बालक बालिकाओं में एक नया जागरण का कार्य आरंभ किया है। लगभग तीन दशकों से अधिक वह महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कार्य कर रही है। उनके किए गए कार्य के माध्यम से सैकड़ो महिलाएं आत्मनिर्भर होकर विकास की राह पर चल रही है
पिछले कुछ वर्षों से हैदराबाद के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मुकुंद करमलकर भी इन चिकित्सा शिविरों में सहयोग कर रहे हैं। डॉ. गोडबोले जी का सपना है कि बस्तर क्षेत्र को मलेरिया, टीबी और एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों से मुक्त किया जाए। वे स्वीकार करते हैं कि यह लक्ष्य बड़ा है, पर असंभव नहीं।
जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्होंने कभी हार मानने के बारे में सोचा, तो वे सहज मुस्कान के साथ कहते हैं—
“मुझे अपना काम प्रेम से करना आता है। जब तक स्थानीय जनजाति युवा स्वयं आगे नहीं आते, तब तक मैं पूरी निष्ठा से यह कार्य करता रहूंगा। मेरे लिए यह सेवा ही ईश्वर-पूजा है।”
तीन दशक की सेवा-यात्रा के बाद डॉ. रामचंद्र और सुनाया ताई गोडबोले आज गर्व से कहते हैं— "यह स्थान अब हमारा घर है।”
उनका जीवन इस सत्य का जीवंत उदाहरण है कि सच्ची सेवा सीमाओं, भय और भौतिक सुविधाओं से परे होती है, और जब संकल्प दृढ़ हो, तो बस्तर भी साधना-स्थली बन जाता है। लगभग तीन दशक से अधिक डॉक्टर रामचंद्र और सुनीता ताई बस्तर के वनवासियों के साथ घुल मिल गए हैं। प्रचार और प्रसिद्धि से वह इतने मिलो दूर है कि उनके कार्य के बारे में जानने के लिए काफी प्रयास करने पड़ेंगे। लेकिन बस्तर के वनवासियों ने उन्हें 30 साल पहले ही अपने हृदय में स्थान दिया है।
भारत सरकार द्वारा आज इन दोनों को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वनवासी कल्याण आश्रम की ओर से दोनों का बहुत-बहुत अभिनंदन एवं शुभकामनाएं।