23/03/2026
क़ुरआन की तिलावत – हमारी रूह की सुकून 🌹
क़ुरआन करीम सिर्फ़ नमाज़ में पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि नमाज़ के बाहर भी उसकी तिलावत करना बहुत बड़ा इबादत है। यह किताब अल्लाह की रहमत और हिदायत का सबसे बड़ा ज़रिया है।
📖 सहीह हदीस के हवाले:
• सहीह बुख़ारी: “सबसे अच्छा इंसान वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए।” (हदीस नं. 5027)
• तिर्मिज़ी: “जो शख़्स मेरी याद और दुआ से इसलिए महरूम हो जाए कि वह क़ुरआन की तिलावत में मशग़ूल है, तो मैं उसे उन सब से ज़्यादा अता करूँगा जो मुझसे दुआ करते हैं।” (हदीस नं. 2911)
• अबू दाऊद: “क़ुरआन की हर हरफ़ पर दस नेकियाँ मिलती हैं।” (हदीस नं. 1464)
• मुस्लिम: रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि जो अल-फ़ातिहा नहीं जानता, वह नमाज़ में जो आसान हो वह पढ़े। (हदीस नं. 396b)
🕌 सहाबा का अमल:
• हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान (रज़ि.) नमाज़ के अलावा भी अक्सर क़ुरआन की तिलावत करते थे।
• हज़रत अब्दुल्लाह इब्न मसऊद (रज़ि.) तिलावत और याद करने में मशग़ूल रहते थे।
• सहाबा-ए-सुफ्फ़ा का ज़्यादातर वक़्त क़ुरआन की तिलावत और सीखने-सिखाने में गुजरता था।
✨ आइए हम भी अपनी ज़िंदगी में क़ुरआन को सिर्फ़ नमाज़ तक सीमित न रखें, बल्कि हर रोज़ उसकी तिलावत करें, उसे याद करें और उस पर अमल करें। यही हमारी दुनिया और आख़िरत की कामयाबी का रास्ता है।