जमा देसी Jmaa Desi

जमा देसी  Jmaa Desi jmaa desi

गेहूं में ग्लुटीन नामक जहर होता है । इमारे पूर्वजों को इस बात का तो पता ना था लेकिन ये पता था कि इसमें जौं , जई और चणे  ...
20/10/2025

गेहूं में ग्लुटीन नामक जहर होता है । इमारे पूर्वजों को इस बात का तो पता ना था लेकिन ये पता था कि इसमें जौं , जई और चणे मिलाने जरूरी हैं । ताकि गेहूं का ग़लत प्रभाव कम हो जाए । इसलिए केवल बहुत थोड़ा गेहूं बोया जाता था और उसमें भी चणे भी मिला कर बो देते थे । हम आपकी तरह ब्यापारी खेती करते ही नहीं थे । ये रिवाज तो 1980 के बाद शुरू हुई , इसी दौर में किसान बुरी तरह कर्जदार होने लगा , और 1990--95 के दौर में कर्जदारी बुरी तरह बढ़ गई । इसी समय किसान ने आत्महत्या शुरू की और अब तो किसान ने दुनिया का सबसे बड़ा किसान आंदौलन ही कर डाला ।

मेरे बचपन में हमको गेहूं की रोटी तब मिलती थी जब या तो कोई त्यौहार हो या बटेऊ आया हो ।

दूसरा , आटे में बरसात में तो बहुत जल्दी कीड़े पड़ जाते हैं लेकिन जाड़े और गर्मी में भी 25--30 दिन में कीड़े पड जाते हैं । थैलियों में preservative डाला जाता है । कितना डाला जाता है ये पता नहीं । ये बहुत बारीक आटा होता है और मैदे जैसे होता । इसे हमारी आंत पूरी तरह हज्म नहीं कर सकती । और सबके पेट बढ़ जाते हैं , औरत के कब्जे झौटे जैसे हो जाते हैं । चल सकती नहीं 100 गज भी । आदमी की छोड़ो उनके कुतरू भी 30 साल के अंदर अंदर शूगर के शिकार हो गये ।

मैं शहर में ही रहता हूं लेकिन हम दो घरां ने साझे की बिजली की एक छोटी सी चाक्की लगा रखी है । और 20-22 साल हो गये लेकिन हमारे पडोसीयों को भी इस बात का नहीं पता कि ये चाक्की सांझे की है ।
स्वर्गीय Krishan Chander Dahiya की डायरी से

18/10/2025
18/10/2025

हमारे मुंह की रोटी कोई हमारी थाली से ही छीन रहा हो तो उसके हलक में उंगली डालकर निकालना ही हमारा 'धर्म' हो जाता है। "यही धर्म है" ... "बाकी तो सम्प्रदाय हैं" जिनमें उलझाया है रोटी छीनने वाले ने ही, ताकि हम धर्म को समझ ही ना पाएं।
(2020-21 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन में हमने रोटी छीनने वालों के हलक में हाथ डालके सब उल्टा निकलवा लिया था, उसी धर्म को समझने की जरूरत है।)
#धर्म #प्रकृति

बगड़ में सब एक दादा की औलाद थेपूरी गली में पाँच घरों का कुणबाएक गली में छाज पिछोड़ती दादियांएक खेत में चने झाड़तीएक कुएं...
18/09/2025

बगड़ में सब एक दादा की औलाद थे
पूरी गली में पाँच घरों का कुणबा
एक गली में छाज पिछोड़ती दादियां
एक खेत में चने झाड़ती
एक कुएं से पानी खींचती
एक हांडी में दो पेट हुए
फिर भी एक आँगन सोते थे बच्चे।

परिवार पाँच से पचास हुए
दीवार थी
फिर भी झरोखा था
झरोखे से लेन देन
लस्सी की डोली लटकती
रोटी के लिए हाथ पसरता
साग के लिए कटोरी
कोई मेहमान आता तो दूध उतारती थी दीवारें
बेटियाँ जाती तो तान-मान
सिर पर हाथ सब धरते थे।

ब्याह में चूल्हा न्योत थी
और दुख में घुटने से घुटना मिला परिवार
तेरह दिन तक किसने रोटी बनाई
किसने रिश्तेदार संभाले
कहने भर की जरूरत न थी
छह माही तक परसता था शोक
सब वार-त्योहार, देवता, मढ़ी बिसार दिए जाते
बूढ़े जवान की बात न थी
बात आण की
बात कुणबे की थी।

अभी परिवार इतना बढ़ चुका
उन्नीस साल की जवान मौत पर भी
छःमाही से पहले सती धोक पूड़े खा लेता है
तेईस की मौत पर आण- काण भूल शुभ कामों की कड़ाही चढ़ती है
और घर में जवान बहु के जाने पर भी
तीज के गुलगुले बनते हैं
जो स्त्रियां कहती थी
बार-त्योहार तो सदा मने
बरस दिन का त्योहार फिर आएगा
आदमी एक बार जाता है,
वही कहने लगी हैं
बाळकां का मुंह क्यों पोंछा
साल भर का त्योहार है।

ये चलते चलते किस युग में आ गए हम
कि जवान मृत्यु के भी शोक नहीं रहे
मरना भी सामान्य जाने जैसा हो गया
अपना घर, अपने दुख, अपने बोझ
उठाते रहो, रोते रहो।

@सुनीता करोथवाल जी की कलम से।

आजकल के पैरेंट्स की एक शिकायत आम है कि बच्चों का अब घर से अटैचमेंट नहीं हैं। ये शिकायत सही भी है लेकिन सोचिए हमने घर को ...
07/09/2025

आजकल के पैरेंट्स की एक शिकायत आम है कि बच्चों का अब घर से अटैचमेंट नहीं हैं। ये शिकायत सही भी है लेकिन सोचिए हमने घर को घर छोडा है क्या? घर और होटल के कमरेां में फर्क है कोई?

घर तो हमने देखे हैं। एक दरवाजा होता था, फिर आंगन होता था, वहीं पर एक रसोई थी, फिर शॉल और अंदर सोपे होते थे। अनाज रखने की कोठरी होती थी। घर में चिमटे से लेकर कस्सी तक के लिए जगह फिक्स थी। किसी का अपना कोई पर्सनल कमरा नहीं था। हां, चौबारे जरूर थे। शाम होते ही दादी दीया जलाती थी और चुचकारा करते थे रोशनी को। बिजली के लिए बल्ब और डग डग करके चलने वाले पंखें लेकिन नींद कमाल आती थी हमें।

रसोई में बर्तन सजे होते थे। हर घर में ऐसी कोई जगह थी जहां बच्चे अपना गुप्त सामान छिपाकर रखते थे और मौसी बुआ के लडकों के साथ छुप्पमन छिपाई भी कर लेते थे। सोने के लिए शानदार खाट थी और बिजली की बाट में खूब बात थी। हारे पर खीर बनती थी और चूल्हे पर मालपुडे, वहीं पसारा मारकर खा लेते थे।

आजकल घर हैं या होटल फर्क मालूम नहीं किया जा सकता। लिफ्ट तक लगा ली है हमने अपने घरों में, इटालियन मार्बल है टाइल्स हैं जहां हजारों बुजुर्ग अपनी कुल्ली तुडवाकर जान देते हैं। रसोई का सारा सामान अंदर चला गया है। सबके अपने कमरे हैं और बातचीत बंद हैं।

हां अब कुते बिल्लियां जरूर आ गई हैं घरों में लेकिन समय उनके लिए भी नहीं है हमारे पास। कुत्ते की बैल्ट पकडकर घुमाने ले जाते कई अंकल देखे हैं मैने खुद मोबाइल में धसे रहते हैं। कुत्ते हमने भी पाले हैं लेकिन सबके सांझे होते थे, गली के कुत्ते होते थे सबके सांझे, कुत्तियां ब्याई तो हम मलमोटा भी मांगते थे और गर्मियों में नींद खराब करते तो लठ भी जमाते थे।

समय बदल गया है भाई, घर होटलों जैसे बनाओगे तो घर से मोह कहां पाओगे? हमारी वो पीढी है जिसने वो घर भी देखे हैं और अब ये होटलनुमा घर भी देखे हैं। हम वो पुराना मोह नहीं छोड पा रहे है और इस जमाने की होड भी में लगे हैं। समय सबका इलाज है, इस वक्त को याद करने वाले ये हमारी अंतिम पीढी होगी।

सुझाव है कि और कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम दो वक्त का खाना परिवार के साथ बैठ के जरूर खाएं। घर घर लगेगा.
लेख - dharmender kanwari
चित्र साभार- ओमप्रकाश कादियान जी
हमारी शामें ये होती थी.... #गोधूलि

एक सौ चालीस करोड़ जनता के देश में इतनी साँठी नहीं होती है कि हरेक के बाटे में सीजन में दो चार बार  परांठे और पकौड़े आ जा...
07/08/2025

एक सौ चालीस करोड़ जनता के देश में इतनी साँठी नहीं होती है कि हरेक के बाटे में सीजन में दो चार बार परांठे और पकौड़े आ जाएं।

लेकिन भस्मासुर के अंडे खेतों में इतना जहर जरूर डलवा देते हैं कि आधे जगत को रोग हो जाएं।

मैने शोध यात्रा में UP के कुछ किसान देखे थे जो अपने खेत में भैंसे चरा के सांठी को दूध में बदल लेते थे।

वो और उनके जीव इतने हट्टे कट्टे थे कि उन्हें देख कर मन भरता था।

इधर सब जगह भस्मासुरों के रिश्ते नाते वालों ने टारगेट सेट किए हुए हैं इनके इनाम भी ऐसे है जिन्हें बताने में ही मेरी रेप्यूटेशन डाउन होने लगती है।

फिर भी कमजोर लीवर वालों फैटी लीवर वालों पहचान लो इस बूटी को किसी साफ सुथरी जगह से तोड़ लाना और देवी अन्नपूर्णा के सुपुर्द कर देना वो रगड़ पीट के अमृत बना देगी और थम परांठे पाड़ लेना दो दो चार।

सेधेंगे नहीं।

सुकून और मेहनत की ऐसी   जिंदगी भी अपने आप में बहुत कुछ है ❤️किसान की जिन्दगी की सादगी का अदभुत चित्र । पेड़ के तने पर टं...
26/06/2025

सुकून और मेहनत की ऐसी जिंदगी भी अपने आप में बहुत कुछ है ❤️
किसान की जिन्दगी की सादगी का अदभुत चित्र । पेड़ के तने पर टंगे चाय पानी की कौन कौन चीजों के नाम आप बता पाएंगे ।

ये तो तय है कि गर्न्थो वाली कहानियों में जो मुकुट वाले हैं हम उनमें से नहीं है क्योंकि हम पग्गड़ (पगड़ी) वाले हैं हमारे पु...
10/06/2025

ये तो तय है कि गर्न्थो वाली कहानियों में जो मुकुट वाले हैं हम उनमें से नहीं है क्योंकि हम पग्गड़ (पगड़ी) वाले हैं हमारे पुरखों ने भी मुकुट नहीं पगड़ी बांधी। आज के ईरान क्षेत्र से लेकर इराक अफगानिस्तान होते हुए उत्तर महाराष्ट्र बिहार तक तक लगभग कौमो का पहनावा ना मुकुट है ना टोपी। ..तो ये मुकुट टोपी प्रोपगैंडा है जो धर्म ने फैलाया।
वैसे मुकुट वाले थाईलैंड इंडोनेशिया के सांस्कृतिक इतिहास में जरूर हैं।
मतलब बारत(भारत) मे धार्मिक पाखण्ड पूर्व वालों का है जबकि जाट समेत लगभग कोमें रहन-सहन-संस्क्रति-भाषा अनुसार) पश्चिम से ताल्लुकात रखती हैं । तो साफ है चंद मुट्ठी भर पूर्व एशिया वाले हमारे ऊपर अपना धार्मिक एजेंडा लादे हुए है, हम बावले ख़ामख़ा बोझ मर रहे।

एक बात और ढोंगी समाज जो नारी को पूजने की वस्तु और भोगने की वस्तु समझता था उसके उलट जाट समाज(लगभग सभी किसान कौमो) में नारी प्रधान समाज था । ये जानकर हर्ष होता है कि हम उस समाज से हैं जहां नारी ही चौधरी रही है।

#जाटो_का_सांसकर्तिक_इतिहास

गांव मोडाखेड़ा (हिसार) हरियाणा  में 25 वर्षों से लगातार जल सेवा कर रहे श्री राजकुमार  #चमार जी , जो यहां पर ठेके पर खेती...
03/06/2025

गांव मोडाखेड़ा (हिसार) हरियाणा में 25 वर्षों से लगातार जल सेवा कर रहे श्री राजकुमार #चमार जी , जो यहां पर ठेके पर खेती करते हैं लेकिन गर्मी के दो महीने सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक जल सेवा करते हैं. राजकुमार जी की मेहनत को दिल से सैल्यूट

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