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स्मृतियों को झकझोर देने वाली यह तस्वीर की सवाल खड़ी करती है। यह तस्वीर सिमडेगा जिले के संतोषी की मां की है, जो 27 सितंबर...
30/05/2026

स्मृतियों को झकझोर देने वाली यह तस्वीर की सवाल खड़ी करती है। यह तस्वीर सिमडेगा जिले के संतोषी की मां की है, जो 27 सितंबर, 2017 को भात-भात रटते मर गई थी। पीयूसीएल की टीम सच्चाई को सामने लाने पीड़ित परिवार के पास गई थी। बातचीत के दरम्यान उसूल के पक्के और खोजी पत्रकारिता के पर्याय संजय वर्मा जी ने यह तस्वीर ली थी। लेकिन प्रशासन अपने पुराने नुस्खे पर अड़ी थी।
नागार्जुन ने बहुत पहले इसे अपनी कविता में दर्ज किया था।अंदर से धिक्कार उठेगी, बाहर से हुंकार
मंत्री लेकिन सुना करेंगे अपनी जय-जयकार
सौ का खाना खाएंगे, पर लेंगे नहीं डकार
मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार
लिखवा लेगा घरवालों से- ‘वह तो था बीमार’“

– नागार्जुन की “वह तो था बीमार”

19/08/2025

सूर्या हांसदा की मुठभेड़ में कथित मौत को लेकर झारखंड की सियासत गर्म है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने संज्ञान लेकर रिपोर्ट तलब की है। भाजपा की जांच टीम भी घटना स्थल व सूर्या के घर गई थी। सरकार सीआईडी जांच का आदेश दी है। मामले की गंभीरता व मौजूदा माहौल को देखते हुए क्या न्याय की उम्मीद की जा सकती है? बड़ा सवाल है।
क्या सीआईडी से निष्पक्ष जांच की उम्मीद है? अपवाद को छोड़कर। 2017 के 9 जून को डोलकटा, पीरटांड़ के मोतीलाल बास्के की मुठभेड़ में हुई मौत के परिणाम पर गौर कीजिए। छोटा सा होटल चलाने वाला और बोली मजदूर मोतीलाल की हत्या मुठभेड़ के नाम पर हुई थी। पुलिस नक्सली घोषित की थी। भाजपा का शासन था और रघुवर दास जी मुख्यमंत्री थे। हेमंत सोरेन विपक्ष में थे। बहुत शोर मचाये थे, हेमंत भी। न्याय की लड़ाई में शामिल थे। आज हेमंत सोरेन का शासन है और भाजपा विपक्ष में। सवाल है कि मोतीलाल बास्के के परिजनों को न्याय मिला? इसी तरह याद कीजिए, बकोरिया मुठभेड़ को। 2015 में 12 लोग मुठभेड़ के नाम पर मारे गए थे, इनमें पांच नाबालिग आदिवासी थे। इन अबोधों को मालूम भी नहीं था कि नक्सली किस चिड़िया का नाम है लेकिन साथ रहने के कारण मारे गए। अनुराग को छोड़कर नक्सली होने का इतिहास या कहीं प्राथमिकी कहीं नहीं थी। लेकिन हुआ क्या? न्याय सुलभ हुआ? सीआईडी को छोड़िए, सीबीआई जांच का हश्र सामने है। मृतक नीरज यादव के पिता जवाहर यादव भी चुप हैं और दूसरे प्रभावित परिवारों की हैसियत, समझ या कहें मजबूरी कि भूल गए हैं, घटना को।
सत्ता बड़ी चालाक और क्रूर होती है और इसके कमान सम्हालने वाले भी।
सूर्या अतीत जो रहा हो, वर्तमान की भूमिका सेवा और न्याय के लिए संघर्ष की थी। अपराधी को भी निहित प्रक्रिया के पालन किए बिना नहीं मार सकते। मुठभेड़ को लेकर सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिशा निर्देश जारी किए हैं लेकिन परवाह किसे है? कहावत सुनी है आपने - सैया भइले कोतवाल फिर डर काहे के। न कानून का डर न कारवाई की फ़िक्र। पुलिस तो पुलिस, अब भीड़ ही मौत की निंद सुला दे रही है। कानून, प्रशासन व प्रावधान सब जेब में।

सूर्या हांसदा की मौत मुठभेड़ में हुई या जानबूझकर हत्या की गई? यह सवाल हर न्याय प्रिय व कानून के राज़ के पक्षधरों के ज़ेह...
14/08/2025

सूर्या हांसदा की मौत मुठभेड़ में हुई या जानबूझकर हत्या की गई? यह सवाल हर न्याय प्रिय व कानून के राज़ के पक्षधरों के ज़ेहन में तैर रहा है। पुलिस ही बता रही है कि उसे देवघर में गिरफ्तार किया गया फिर 100 किलोमीटर दूर रात में पहाड़ -जंगल में ले जाना की सवाल खड़ा कर रहा है। झारखंड में भी मुठभेड़ के नाम पर हत्या जारी है।

सरकार निजीकरण की नीति के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सब निजी हाथों में सौंपने को उतारू हैं। चाहे किसी भी राजनीतिक दल क...
06/08/2025

सरकार निजीकरण की नीति के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सब निजी हाथों में सौंपने को उतारू हैं। चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, इस पर सबमें सहमति है। इससे भी आगे बढ़कर इस काम को अमली जामा पहनाने में एक दूसरे को पीछे छोड़ते दिखते हैं। लेकिन निजी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों व अस्पतालों की स्थिति पर गौर कीजिए, क्या सरकारी व्यवस्था से ये बेहतर सेवा दे रहे हैं या सिर्फ अपनी कमाई को प्राथमिकता दें रहे हैं।
अब तो मृत्यु के बाद भी वेंटिलेटर पर रखना आम प्रचलन हो गया है। पढ़िए, इससे ही जुड़ी खबर।

पीयूसीएल, झारखंड द्वारा आयोजित चौथा स्टेन स्मृति व्याख्यान, एस.डी.सी. , रांची में। मानवाधिकार की लड़ाइयों में आगे रहने व...
18/07/2025

पीयूसीएल, झारखंड द्वारा आयोजित चौथा स्टेन स्मृति व्याख्यान, एस.डी.सी. , रांची में। मानवाधिकार की लड़ाइयों में आगे रहने वाले, मुम्बई उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई द्वारा व्याख्यान।

रजत जयंती समारोह के ऐतिहासिक क्षण के गवाह बन रहे, बिरसा की इस धरती पर, यहां उपस्थित सभी महानुभावों को जोहार, नमस्कार। पी...
18/07/2025

रजत जयंती समारोह के ऐतिहासिक क्षण के गवाह बन रहे, बिरसा की इस धरती पर, यहां उपस्थित सभी महानुभावों को जोहार, नमस्कार।
पीयूसीएल, झारखंड की ओर से मैं अशोक झा, आप सबों का हार्दिक स्वागत करता हूं। विशेष रूप से, देश के विभिन्न राज्यों से आए उन साथियों का, जो अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद रजत जयंती समारोह में उपस्थित हैं। स्वागत है, पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव व महासचिव डॉ. वी. सुरेश, अन्य पदाधिकारियों समेत सभी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों का जिनकी उपस्थिति मात्र से हमारा उत्साह चरम पर है।
यह सुखद संयोग है कि पीयूसीएल, झारखंड का रजत जयंती समारोह व राष्ट्रीय कन्वेंशन एक साथ आयोजित है। 16 सालों के अंतराल पर आप सब प्राकृतिक सौंदर्य से अटे-पटे, रत्न गर्भा धरती पर सामूहिक रूप से उपस्थित हैं। प्राकृतिक सौंदर्य, खनिज सम्पदा की प्रचुरता एवं प्रतिरोध के लिए दुनिया भर में मशहूर झारखंड में पीयूसीएल को अपनी विशिष्टताओं के साथ बरकरार रखना चुनौती थी। लेकिन हमें खुशी है कि विभिन्न झंझावातों को पार करते हुए, हम 25 साल का सफर पूरा कर लिए हैं। इस सफर में कुछ मिठे तो कुछ कड़वे अनुभव रहे हैं। उन अनुभवों को साझा करने का अवसर यह रजत जयंती समारोह हमें दिया है। यह समारोह हमें संदेश दे रहा है कि 25 सालों की यात्रा पर विहंगम दृष्टि डालते हुए, उपलब्धियों के साथ अपनी कमियों व टुकड़ों -टुकड़ों में आए चुनौतियों से हम सिखते हुए आगे की यात्रा के लिए तैयार हों। रजत जयंती के इस अवसर पर झारखंड के उन सभी साथियों का भी स्वागत है, जिनकी सहभागिता व सक्रियता से हम यहां तक पहुंच पाए हैं। हमारे जेहन में वे सब साथी हैं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन यह सफर उनके प्रयास, समर्पण व मार्गदर्शन से ही संभव हुआ है। पुरखों की पांत में शामिल हो गए, दिवंगत सभी साथियों को हम भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी कर्तव्यनिष्ठा, नागरिक स्वतन्त्रता के लिए समर्पण व पीयूसीएल को एक अलग पहचान देने में जो भूमिका रही है, उसे हम कतई विस्मृत नहीं कर सकते।
कार्यक्रम आगे बढ़े, अपने अनुभव हम साझा कर सके, इसलिए मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहता। झारखंड जो अपनी सामूहिकता, सामुदायिकता, विशिष्ट संस्कृति व स्वतंत्रता का पर्याय है, इस विरासत को बरकरार रखने की अपेक्षा के साथ एकबार फिर से आप सभी का स्वागत है।

पीयूसीएल, झारखंड अपना 25 साथ पूरा कर लिया है। इन सालों के दौरान कई उतार -चढ़ाव व चुनौतियों से गुज़रा है। इस अवसर पर आयोज...
14/07/2025

पीयूसीएल, झारखंड अपना 25 साथ पूरा कर लिया है। इन सालों के दौरान कई उतार -चढ़ाव व चुनौतियों से गुज़रा है। इस अवसर पर आयोजित रजत जयंती समारोह में इसके अतीत व वर्तमान को जानने -समझने 18 जुलाई,25 को एस.डी.सी. पुरुलिया रोड, रांची के हाॅल में आइए। उसी दिन मानवाधिकार के मुखर आवाज स्टेन की स्मृति व मुद्दों को जिंदा रखने के लिए चौथा व्याख्यान भी आयोजित है। इसके साथ ही पीयूसीएल का राष्ट्रीय अधिवेशन भी आयोजित है।

नागरिक स्वतन्त्रता की रक्षा व प्रोत्साहन के लिए समर्पित पीयूसीएल का राष्ट्रीय अधिवेशन, रजत जयंती समारोह व चौथा स्टेन स्मृति व्याख्यान में आप सादर आमंत्रित हैं। 18 जुलाई, 25 को 11 बजे पूर्वाह्न से रजत जयंती समारोह, अपराह्न 3 बजे से स्टेन स्मृति व्याख्यान एवं 19 जुलाई, 25 को सुबह 9 से राष्ट्रीय अधिवेशन के मुख्य सत्र में ज़रूर आएं। सभी कार्यक्रम फादर कामिल बुल्के (पुरुलिया रोड रांची) स्थित एस.डी.सी. समाज विकास केन्द्र में आयोजित है।

नागरिक स्वतन्त्रता की रक्षा व प्रोत्साहन के लिए समर्पित पीयूसीएल का राष्ट्रीय अधिवेशन, रजत जयंती समारोह व चौथा स्टेन स्म...
14/07/2025

नागरिक स्वतन्त्रता की रक्षा व प्रोत्साहन के लिए समर्पित पीयूसीएल का राष्ट्रीय अधिवेशन, रजत जयंती समारोह व चौथा स्टेन स्मृति व्याख्यान में आप सादर आमंत्रित हैं। 18 जुलाई, 25 को 11 बजे पूर्वाह्न से रजत जयंती समारोह, अपराह्न 3 बजे से स्टेन स्मृति व्याख्यान एवं 19 जुलाई, 25 को सुबह 9 से राष्ट्रीय अधिवेशन के मुख्य सत्र में ज़रूर आएं। सभी कार्यक्रम फादर कामिल बुल्के (पुरुलिया रोड रांची) स्थित एस.डी.सी. समाज विकास केन्द्र में आयोजित है।

पुलिस ज्यादती के शिकार अनिल सिंह को मुआवजा तो मिला लेकिन दोषियों को अपराध की सजा नहीं मिली। उच्च न्यायालय ने ज़रूर यह रा...
18/04/2025

पुलिस ज्यादती के शिकार अनिल सिंह को मुआवजा तो मिला लेकिन दोषियों को अपराध की सजा नहीं मिली। उच्च न्यायालय ने ज़रूर यह राशि दोषियों से वसूलने की बात कही है पर न्याय अधुरा है।

झारखंड में क्षमता से अधिक क़ैदी रहने को मजबूर हैं, जेलों में। हालांकि, जेलों की संख्या और क्षमता के लिहाज से कुल कैदी क्...
08/04/2025

झारखंड में क्षमता से अधिक क़ैदी रहने को मजबूर हैं, जेलों में। हालांकि, जेलों की संख्या और क्षमता के लिहाज से कुल कैदी क्षमता से अधिक नहीं हैं लेकिन 16 जेलों में क्षमता से अधिक क़ैदी रह रहे हैं। इसका मूल कारण विचाराधीन कैदियों की संख्या है। हालांकि, जेलों में बंद कैदियों की संख्या कम करने को लेकर केन्द्र सरकार के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार दिशा निर्देश जारी किया है। लेकिन, संख्या कम नहीं हुई है।
इसी विषय पर पढ़िए, एक समाचार।

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