10/09/2026
आचार्य गुणधर शांत भाव से जिनालय के प्रांगण में विराजमान थे। शाम ढल रही थी और दूर पहाड़ों के पीछे से सूर्यास्त की लालिमा बिखर रही थी। नगर के कोलाहल से दूर यहाँ अद्भुत शांति थी। भव्य, जो कई वर्षों से आचार्य के सानिध्य में तत्त्व-ज्ञान प्राप्त कर रहा था, आज कुछ अशांत लग रहा था।
नमोऽस्तु करने के बाद भव्य ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत की, "गुरुदेव! एक दुविधा मन को मथ रही है। हम दिन-रात शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, इन्द्रियों से जगत को जानते-समझते हैं, फिर भी जैन दर्शन इन ज्ञानों को 'पूर्ण' या 'प्रत्यक्ष' नहीं मानता। आज ही मैंने पढ़ा कि 'मतिज्ञान और श्रुतज्ञान' परोक्ष हैं। जो हम अपनी आँखों से देख रहे हैं, उसे 'परोक्ष' (अप्रत्यक्ष) कहना कुछ समझ नहीं आया।"
आचार्य ने मंद मुस्कान के साथ भव्य की ओर देखा। उन्होंने सामने रखी एक पुरानी, धूल से भरी पुस्तक उठाई और भव्य को देते हुए पूछा, "भव्य, यह क्या है?"
भव्य ने कहा, "गुरुदेव, यह एक शास्त्र है।"
"तुम्हें कैसे पता कि यह शास्त्र है?" आचार्य ने प्रतिप्रश्न किया।
भव्य थोड़ा झिझका, फिर बोला, "गुरुदेव! मेरी आँखों ने इसका आकार-प्रकार देखा, हाथों ने स्पर्श किया और मेरे मन ने पूर्व में सीखे गए ज्ञान के आधार पर निर्णय किया कि यह एक पुस्तक या शास्त्र है। इन्द्रियों और मन के सहयोग से ही मुझे यह ज्ञान हुआ।"
आचार्य ने सिर हिलाया और गंभीर स्वर में कहा, "यही तो 'मतिज्ञान' है, भव्य। तुमने स्वयं कहा कि आँखों ने 'देखा', हाथों ने 'स्पर्श' किया और मन ने 'निर्णय' किया। यानी तुम्हारा यह ज्ञान पूरी तरह से इन्द्रियों और मन जैसे 'बाह्य साधनों' पर निर्भर है। चूँकि यह ज्ञान आत्मा का स्वयं का, स्वतंत्र ज्ञान नहीं है, बल्कि 'पर' (दूसरे) के निमित्त से पैदा हुआ है, इसलिए इसे 'परोक्ष' कहा जाता है।"
तभी दूर पहाड़ी के ऊपर से धुएँ का एक काला गुबार उठता हुआ दिखाई दिया। भव्य चौंककर बोला, "गुरुदेव, देखिए! पहाड़ी पर आग लगी है।"
"तुम्हें आग दिख रही है क्या?" आचार्य ने पूछा।
"नहीं गुरुदेव! आग तो नहीं दिख रही, केवल धुआँ दिख रहा है," भव्य ने उत्तर दिया।
"फिर तुमने कैसे कहा कि आग लगी है?"
भव्य ने उत्साह से कहा, "गुरुदेव! यह तो बहुत सरल है। मैंने जीवन में कई बार देखा है कि जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य होती है। यह मेरा पूर्व अनुभव और स्मृति है। धुएँ और आग के इस परस्पर संबंध को याद करके मैंने धुएँ (निमित्त) के माध्यम से आग का अनुमान लगा लिया।"
आचार्य के चेहरे पर संतोष का भाव आ गया। उन्होंने भव्य की पीठ थपथपाते हुए कहा, "बिल्कुल सही! जैसा कि गाथा में कहा गया है—'वाणुमाणं व'—जैसे धुएँ को देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है, ठीक वैसे ही हमारा मतिज्ञान और श्रुतज्ञान काम करता है।
तुमने धुएँ को देखा (मतिज्ञान), फिर पूर्व स्मृति और संबंध के आधार पर आग का अनुमान किया। यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं था, बल्कि धुएँ के निमित्त से उत्पन्न हुआ था। इसी प्रकार, जब तुम शास्त्रों को पढ़ते हो या गुरु के उपदेश सुनते हो (श्रुतज्ञान), तब भी तुम 'शब्दों', 'शास्त्रों' या 'उपदेश' (बाह्य साधनों) पर निर्भर रहते हो।
चूँकि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोनों ही आत्मा के स्वतंत्र, विशुद्ध ज्ञान नहीं हैं, बल्कि वे इन्द्रियों, मन, शब्दों या संकेतों जैसे 'पर' निमित्तों पर आश्रित रहते हैं, और इनमें पूर्व अनुभव तथा स्मृति का महत्त्व होता है, इसलिए इन्हें 'परोक्ष ज्ञान' कहा गया है।"
भव्य की आँखों के आगे अज्ञान का कुहासा छँट गया। उसे समझ आ गया कि जिस ज्ञान को वह अब तक सब कुछ मान रहा था, वह तो केवल एक माध्यम था, एक अनुमान था। सच्चा और प्रत्यक्ष ज्ञान तो वह है जो आत्मा से सीधे प्रकट होता है, बिना किसी इन्द्रिय या मन के सहारे।
उसने आचार्य के चरणों में नतमस्तक होकर कहा, "गुरुदेव! आज आपने धुएँ और आग के उदाहरण से 'परोक्ष ज्ञान' की सीमा और आत्मा के 'प्रत्यक्ष ज्ञान' की महिमा समझा दी।" जिनालय का प्रांगण अब पूर्णतः शांत था, और भव्य के मन में धुएँ से परे की आग—आत्मा के विशुद्ध ज्ञान की लौ—प्रज्वलित हो उठी थी।
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**समन सूक्तम जी**
मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोनों परोक्ष ज्ञान हैं, क्योंकि वे बाह्य साधनों और माध्यमों पर निर्भर रहते हैं। मतिज्ञान इन्द्रियों और मन के सहयोग से उत्पन्न होता है, जबकि श्रुतज्ञान शब्द, उपदेश या शास्त्र के माध्यम से प्राप्त होता है। इन दोनों में पूर्व अनुभव, स्मृति तथा वस्तुओं के परस्पर संबंध का भी महत्त्व होता है। जैसे धुएँ को देखकर पूर्व अनुभव के आधार पर अग्नि का अनुमान किया जाता है, उसी प्रकार यह ज्ञान भी प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि परनिमित्त से उत्पन्न होने वाला परोक्ष ज्ञान है.
Mati Jñāna (sensory knowledge) and Śruta Jñāna (scriptural knowledge) are classified as indirect knowledge (Parokṣa) because they depend upon external means. Mati Jñāna arises through the senses and the mind, while Śruta Jñāna depends upon words, teachings, or scriptures. Both also rely upon prior experience, memory, and the recognition of relationships between objects. Just as fire is inferred from smoke on the basis of previous knowledge, these forms of cognition arise through mediating factors rather than by immediate direct perception, and are therefore regarded as indirect knowledge. (688)