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ये पेज जैन धरोहरों की जानकारियों के संकलन हेतु है।

धर्म - जैन ।। भाषा - प्राकृत ।। लिपि - ब्राह्मी
शासन नायक - तीर्थंकर महावीर
प्रमुख सिद्धांत - अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद
मूल मंत्र - नमोकार मंत्र

नाथ हमारे नेमि....
18/09/2026

नाथ हमारे नेमि....

सम्राट जहाँगीर का पयुर्षण पर्व में जीव-वध रोकने का फ़रमान — 1610 ई.जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत केवल धार्मिक उपदेश नहीं र...
15/09/2026

सम्राट जहाँगीर का पयुर्षण पर्व में जीव-वध रोकने का फ़रमान — 1610 ई.

जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत केवल धार्मिक उपदेश नहीं रहा, बल्कि भारतीय इतिहास में उसने सामाजिक और राजनीतिक जीवन को भी प्रभावित किया है।

मुगलकाल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण सम्राट नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर (शासनकाल 1605–1627 ई.) से जुड़ा है।

ऐतिहासिक जैन स्रोतों के अनुसार, 1610 ई. में आगरा में जैन समुदाय के प्रतिनिधियों ने जहाँगीर से भेंट की और पयुर्षण पर्व के पवित्र दिनों में पशु-वध रोकने का अनुरोध किया।

रमणलाल एन. मेहता के शोध-लेख के अनुसार, लगभग 90 जैन प्रतिनिधियों का संघ आगरा में जहाँगीर के दरबार पहुँचा था। उनके अनुरोध पर पयुर्षण के दौरान पशु-वध रोकने का शाही आदेश जारी किया गया।

एक अन्य ऐतिहासिक विवरण में विवेकहर्ष, परमानंद, महानंद और उदयहर्ष जैसे जैन साधु/विद्वानों द्वारा किए गए अनुरोध तथा 1610 ई. में जारी फ़रमान का उल्लेख मिलता है।

उपलब्ध शोध के अनुसार, जहाँगीर के फ़रमान में उसके शासनाधीन क्षेत्रों में जैन पयुर्षण के 12 दिनों के दौरान पशुओं के वध पर रोक लगाने का आदेश था।

एक शोध-स्रोत इस फ़रमान को इस प्रकार दर्ज करता है कि शाही अधिकारियों को पयुर्षण के बारह दिनों में पशु-वध रोकने का निर्देश दिया गया था और उस अवधि में वध की तैयारी तक न करने का आदेश था।

यह फ़रमान 1610 ई. का है और इसका ऐतिहासिक दस्तावेज़ गुजरात के श्री महावीर जैन आराधना केंद्र, कोबा स्थित संग्रह से संबद्ध बताया गया है।

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इस घटना का महत्व केवल लिखित फ़रमान तक सीमित नहीं है।

1610 ई. का प्रसिद्ध आगरा विज्ञप्तिपत्र (Vijnaptipatra) इस घटना को चित्रों के माध्यम से भी प्रस्तुत करता है। इसे चित्रकार उस्ताद शालीवाहन से जोड़ा जाता है।

इसमें जहाँगीर के दरबार का दृश्य और जैन प्रतिनिधियों द्वारा पशु-वध रोकने के अनुरोध का प्रसंग चित्रित है।

यह अद्भुत जैन चित्र-पत्र आज लालभाई दलपतभाई इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, अहमदाबाद के संग्रह से जुड़ा हुआ है। आधुनिक कला-इतिहास के अध्ययनों में इसे 1610 के आगरा विज्ञप्तिपत्र के रूप में दर्ज किया गया है।

अर्थात् हमारे पास इस घटना की स्मृति केवल धार्मिक परंपरा में ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज़ और चित्रित पांडुलिपि परंपरा में भी मिलती है।

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यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।

सम्राट अकबर के शासनकाल में भी जैन आचार्यों और मुगल दरबार के बीच संवाद हुआ था तथा पशु-वध पर रोक से संबंधित कई शाही आदेश जारी हुए थे।

एक ऐतिहासिक अध्ययन में 6 जून 1584 के अकबर के फ़रमान का उल्लेख है, जिसमें जैन पयुर्षण के 12 दिनों के दौरान उन स्थानों पर पशु-वध रोकने का आदेश दिया गया था जहाँ जैन समुदाय निवास करता था।

अन्य स्रोत अकबर के शासनकाल में पयुर्षण के अवसर पर पशु-वध रोकने से संबंधित आगे के आदेशों का भी उल्लेख करते हैं।

इसलिए 1610 का जहाँगीर फ़रमान एक लंबे जैन–मुगल संवाद और अहिंसा की ऐतिहासिक प्रभावशीलता की कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।

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हर जीव जीना चाहता है।
हर जीव पीड़ा से बचना चाहता है।
और अहिंसा केवल विचार नहीं—आचरण है।

🙏 “जियो और जीने दो”

📚 प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ

• R. N. Mehta — Jahangir and Non-Violence
• Hiranand Sastri — Ancient Vijnaptipatras (1942), विशेषतः pp. 24–26 के संदर्भ
• Bhanuchandragani Charit — जहाँ 1610 के फ़रमान का उल्लेख मिलता है
• Jain history studies में 1610 Agra Vijnaptipatra और Jahangir’s farman का संदर्भ
• Lalbhai Dalpatbhai Institute of Indology, Ahmedabad — 1610 Agra Vijnaptipatra से संबंधित संग्रह/अध्ययन

#पयुर्षण #पर्यूषण #जैनधर्म #अहिंसा #जियोऔरजीनेदो #जैनइतिहास #जहाँगीर #मुगलइतिहास

13/09/2026
12/09/2026

हमारे प्रभु🙏🏻

कुंदकुंदाचार्य देव जिन्हें आचार्य तिरुवल्लुवर के रूप में जाना जाता है, उनके द्वारा रचित महान तमिल ग्रन्थ कुरल काव्य को द...
11/09/2026

कुंदकुंदाचार्य देव जिन्हें आचार्य तिरुवल्लुवर के रूप में जाना जाता है, उनके द्वारा रचित महान तमिल ग्रन्थ कुरल काव्य को देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आज ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत पहुंचे रशियन प्रेसिडेंट श्री पुतिन को भेंट किया।

10/09/2026

जंगल वाले बाबा के रूप में प्रसिद्ध पूज्य चिन्मय सागर जी समाधिस्थ हो चुके हैं, मगर उनके साथ पावन सागर जी भी जंगल में कई चातुर्मास कर चुके हैं। इस वर्ष पावन सागर जी महाराज का चातुर्मास दिल्ली के जंगल में हैं। दिल्ली की सक्षम समाज ऐसे महान तपस्वी साधक की चर्चा को निर्विघ्न संपन्न कराने में सहयोगी बनें। वहाँ आ रही समस्याओं का दिल्ली समाज संज्ञान लेवे।

महावीर का युग और 16 महाजनपद: भूगोल, साधना और चेतक नरेश का परिवारलगभग 2600 वर्ष पूर्व भारत की धरा पर एक युगप्रवर्तक क्रां...
10/09/2026

महावीर का युग और 16 महाजनपद: भूगोल, साधना और चेतक नरेश का परिवार
लगभग 2600 वर्ष पूर्व भारत की धरा पर एक युगप्रवर्तक क्रांति घटित हो रही थी। यह काल 16 महाजनपदों के उदय का था, जहां उत्तर भारत विभिन्न राजतंत्रों और वज्जि जैसे सशक्त गणराज्यों में विभक्त था। इसी दौर में तीर्थंकर 1008 भगवान महावीर स्वामी ने अपनी अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत की देशना से तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को एक नई दिशा दी।
१. भगवान महावीर के पंचकल्याणक क्षेत्र
मूल जैन आगमों के अनुसार भगवान महावीर के पावन जीवन पड़ाव इस प्रकार हैं:
* गर्भ एवं जन्म कल्याणक — कुण्डलपुर (नालंदा, बिहार):
महाराजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के आंगन में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को त्रिलोकनाथ का जन्म हुआ। (प्राचीन मगध/वज्जि क्षेत्र की सीमा)।
* दीक्षा कल्याणक — मनोहर उद्यान (कुण्डलपुर, बिहार):
तीस वर्ष की अल्पायु में संपूर्ण राजसी वैभव त्यागकर भगवान ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण की।
* केवलज्ञान कल्याणक — जृम्भिका ग्राम (ऋजुकूला नदी तट):
बारह वर्षों की कठोर मौन तपस्या और साधना के उपरांत प्रभु को वैशाख शुक्ल दशमी को केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई।
* प्रथम देशना — विपुलाचल पर्वत (राजगृह):
मगध की पावन राजधानी राजगृह के विपुलाचल पर्वत पर श्रावण वदी एकम को दिव्यध्वनि खिरी और इंद्रभूति गौतम को प्रथम गणधर पद प्राप्त हुआ।
* मोक्ष कल्याणक — पावापुरी (नालंदा, बिहार):
कार्तिक कृष्णा अमावस्या की अंतिम वेला में योग निरोध कर प्रभु ने पावापुरी के सरोवर मध्य से सिद्धपद (मोक्ष) प्राप्त किया।
२. प्रमुख चातुर्मास स्थल (विहार पथ)
केवलज्ञान प्राप्ति के उपरांत प्रभु ने 30 वर्षों तक आर्यावर्त के विभिन्न जनपदों में निरंतर धर्मोपदेश दिया। कुल 42 चातुर्मासों में प्रमुख विहार क्षेत्र निम्नलिखित रहे:
* राजगृह एवं नालंदा (मगध) — सर्वाधिक चातुर्मास
* वैशाली और वाणिज्यग्राम (वज्जि गणराज्य)
* चंपा और पृष्ठचंपा (अंग महाजनपद)
* मिथिला
* कौशाम्बी (वत्स महाजनपद)
* अंतिम चातुर्मास — अपापापुरी (पावापुरी)
३. तत्कालीन राजनीति और राजा चेतक का संबंध (मौसियों का विवाह)
वैशाली के लिच्छवी गणराज्य के अधिपति महाराजा चेतक भगवान महावीर की माता महारानी त्रिशला (प्रियकारिणी) के भाई थे। इस प्रकार राजा चेतक भगवान महावीर के मामा थे और उनकी पुत्रियां प्रभु की मौसियां थीं।
महाराजा चेतक ने अपनी पुत्रियों के संबंध तत्कालीन प्रमुख महाजनपदों के शीर्ष राजवंशों में किए, जिससे जिनधर्म का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में सुदृढ़ हुआ:
* प्रभावती — इनका विवाह सिन्धु-सौवीर देश (रोरुक नगर) के राजा उदयन के साथ हुआ।
* पद्मावती — इनका विवाह चंपा (अंग महाजनपद) के राजा दधिवाहन के साथ हुआ (इनकी पुत्री चंदना/ज्येष्ठा हुईं)।
* मृगावती — इनका विवाह कौशाम्बी (वत्स महाजनपद) के राजा शतानीक के साथ हुआ।
* शिवा — इनका विवाह उज्जयिनी (अवन्ति महाजनपद) के राजा चंडप्रद्योत के साथ हुआ।
* ज्येष्ठा — इन्होंने संसार की असारता को समझकर संयम अंगीकार किया और आर्यिका दीक्षा ली।
* सुप्रभा — इनका विवाह दशार्ण (ऐरण/मध्य भारत) के राजा के साथ हुआ।
* चेलना (छलना) — इनका विवाह मगध के सम्राट श्रेणिक (बिम्बिसार) के साथ हुआ। महारानी चेलना के प्रभाव से मगध साम्राज्य में अहिंसा धर्म को सर्वोच्च स्थान मिला और राजा श्रेणिक भगवान महावीर के प्रमुख श्रोता व अनन्य भक्त बने।
प्राचीन भारत के 16 महाजनपद केवल राजनीतिक शक्ति के केंद्र नहीं थे, बल्कि तीर्थंकर महावीर के पावन चरण-कमलों, दिव्य देशना और इन राजपरिवारों के संबंधों के माध्यम से आपस में आध्यात्मिक सूत्र में पिरोए हुए थे।
जय जिनेन्द्र!

आचार्य गुणधर शांत भाव से जिनालय के प्रांगण में विराजमान थे। शाम ढल रही थी और दूर पहाड़ों के पीछे से सूर्यास्त की लालिमा ...
10/09/2026

आचार्य गुणधर शांत भाव से जिनालय के प्रांगण में विराजमान थे। शाम ढल रही थी और दूर पहाड़ों के पीछे से सूर्यास्त की लालिमा बिखर रही थी। नगर के कोलाहल से दूर यहाँ अद्भुत शांति थी। भव्य, जो कई वर्षों से आचार्य के सानिध्य में तत्त्व-ज्ञान प्राप्त कर रहा था, आज कुछ अशांत लग रहा था।
नमोऽस्तु करने के बाद भव्य ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत की, "गुरुदेव! एक दुविधा मन को मथ रही है। हम दिन-रात शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, इन्द्रियों से जगत को जानते-समझते हैं, फिर भी जैन दर्शन इन ज्ञानों को 'पूर्ण' या 'प्रत्यक्ष' नहीं मानता। आज ही मैंने पढ़ा कि 'मतिज्ञान और श्रुतज्ञान' परोक्ष हैं। जो हम अपनी आँखों से देख रहे हैं, उसे 'परोक्ष' (अप्रत्यक्ष) कहना कुछ समझ नहीं आया।"
आचार्य ने मंद मुस्कान के साथ भव्य की ओर देखा। उन्होंने सामने रखी एक पुरानी, धूल से भरी पुस्तक उठाई और भव्य को देते हुए पूछा, "भव्य, यह क्या है?"
भव्य ने कहा, "गुरुदेव, यह एक शास्त्र है।"
"तुम्हें कैसे पता कि यह शास्त्र है?" आचार्य ने प्रतिप्रश्न किया।
भव्य थोड़ा झिझका, फिर बोला, "गुरुदेव! मेरी आँखों ने इसका आकार-प्रकार देखा, हाथों ने स्पर्श किया और मेरे मन ने पूर्व में सीखे गए ज्ञान के आधार पर निर्णय किया कि यह एक पुस्तक या शास्त्र है। इन्द्रियों और मन के सहयोग से ही मुझे यह ज्ञान हुआ।"
आचार्य ने सिर हिलाया और गंभीर स्वर में कहा, "यही तो 'मतिज्ञान' है, भव्य। तुमने स्वयं कहा कि आँखों ने 'देखा', हाथों ने 'स्पर्श' किया और मन ने 'निर्णय' किया। यानी तुम्हारा यह ज्ञान पूरी तरह से इन्द्रियों और मन जैसे 'बाह्य साधनों' पर निर्भर है। चूँकि यह ज्ञान आत्मा का स्वयं का, स्वतंत्र ज्ञान नहीं है, बल्कि 'पर' (दूसरे) के निमित्त से पैदा हुआ है, इसलिए इसे 'परोक्ष' कहा जाता है।"
तभी दूर पहाड़ी के ऊपर से धुएँ का एक काला गुबार उठता हुआ दिखाई दिया। भव्य चौंककर बोला, "गुरुदेव, देखिए! पहाड़ी पर आग लगी है।"
"तुम्हें आग दिख रही है क्या?" आचार्य ने पूछा।
"नहीं गुरुदेव! आग तो नहीं दिख रही, केवल धुआँ दिख रहा है," भव्य ने उत्तर दिया।
"फिर तुमने कैसे कहा कि आग लगी है?"
भव्य ने उत्साह से कहा, "गुरुदेव! यह तो बहुत सरल है। मैंने जीवन में कई बार देखा है कि जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य होती है। यह मेरा पूर्व अनुभव और स्मृति है। धुएँ और आग के इस परस्पर संबंध को याद करके मैंने धुएँ (निमित्त) के माध्यम से आग का अनुमान लगा लिया।"
आचार्य के चेहरे पर संतोष का भाव आ गया। उन्होंने भव्य की पीठ थपथपाते हुए कहा, "बिल्कुल सही! जैसा कि गाथा में कहा गया है—'वाणुमाणं व'—जैसे धुएँ को देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है, ठीक वैसे ही हमारा मतिज्ञान और श्रुतज्ञान काम करता है।
तुमने धुएँ को देखा (मतिज्ञान), फिर पूर्व स्मृति और संबंध के आधार पर आग का अनुमान किया। यह ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं था, बल्कि धुएँ के निमित्त से उत्पन्न हुआ था। इसी प्रकार, जब तुम शास्त्रों को पढ़ते हो या गुरु के उपदेश सुनते हो (श्रुतज्ञान), तब भी तुम 'शब्दों', 'शास्त्रों' या 'उपदेश' (बाह्य साधनों) पर निर्भर रहते हो।
चूँकि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोनों ही आत्मा के स्वतंत्र, विशुद्ध ज्ञान नहीं हैं, बल्कि वे इन्द्रियों, मन, शब्दों या संकेतों जैसे 'पर' निमित्तों पर आश्रित रहते हैं, और इनमें पूर्व अनुभव तथा स्मृति का महत्त्व होता है, इसलिए इन्हें 'परोक्ष ज्ञान' कहा गया है।"
भव्य की आँखों के आगे अज्ञान का कुहासा छँट गया। उसे समझ आ गया कि जिस ज्ञान को वह अब तक सब कुछ मान रहा था, वह तो केवल एक माध्यम था, एक अनुमान था। सच्चा और प्रत्यक्ष ज्ञान तो वह है जो आत्मा से सीधे प्रकट होता है, बिना किसी इन्द्रिय या मन के सहारे।
उसने आचार्य के चरणों में नतमस्तक होकर कहा, "गुरुदेव! आज आपने धुएँ और आग के उदाहरण से 'परोक्ष ज्ञान' की सीमा और आत्मा के 'प्रत्यक्ष ज्ञान' की महिमा समझा दी।" जिनालय का प्रांगण अब पूर्णतः शांत था, और भव्य के मन में धुएँ से परे की आग—आत्मा के विशुद्ध ज्ञान की लौ—प्रज्वलित हो उठी थी।

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**समन सूक्तम जी**

मतिज्ञान और श्रुतज्ञान दोनों परोक्ष ज्ञान हैं, क्योंकि वे बाह्य साधनों और माध्यमों पर निर्भर रहते हैं। मतिज्ञान इन्द्रियों और मन के सहयोग से उत्पन्न होता है, जबकि श्रुतज्ञान शब्द, उपदेश या शास्त्र के माध्यम से प्राप्त होता है। इन दोनों में पूर्व अनुभव, स्मृति तथा वस्तुओं के परस्पर संबंध का भी महत्त्व होता है। जैसे धुएँ को देखकर पूर्व अनुभव के आधार पर अग्नि का अनुमान किया जाता है, उसी प्रकार यह ज्ञान भी प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि परनिमित्त से उत्पन्न होने वाला परोक्ष ज्ञान है.

Mati Jñāna (sensory knowledge) and Śruta Jñāna (scriptural knowledge) are classified as indirect knowledge (Parokṣa) because they depend upon external means. Mati Jñāna arises through the senses and the mind, while Śruta Jñāna depends upon words, teachings, or scriptures. Both also rely upon prior experience, memory, and the recognition of relationships between objects. Just as fire is inferred from smoke on the basis of previous knowledge, these forms of cognition arise through mediating factors rather than by immediate direct perception, and are therefore regarded as indirect knowledge. (688)

झरि पार्श्वनाथ कुंडल, महाराष्ट्र।
09/09/2026

झरि पार्श्वनाथ कुंडल, महाराष्ट्र।

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