Nationalist Human Rights Education Council

Nationalist Human Rights Education Council education

No matter how many lectures we give or listen, until we work like what is talked we should not expect our goal to be achieved even by mistake. – Dr. Keshav Baliram Hedgewar (Founder of RSS)

09/09/2020

Become part of Human Rights Education as teacher promoter and executives in home state , Salary , emoluments and statuary benifits as per Government (State /Central ) rules & regulations

09/09/2020

Nationalist. Human rights education council
(N/Govt Organization)
Vacancy
Pan India (Home location available)
1) District organiser (DO)
Qualifications-
Post graduate /LLBmust
Salary as per state Govt scale)

2) Educatonist /teacher/faculty
Qualification- Graduation +B.ed must
Salary as per scale
3) Assistant master
Qualifications-
12th must
Salary as per scale (state)
For girls and boys best approach for all
# Working process
Registration◆Documents
summit ◆ Interviews
◆Selection Letter
Training & Joining
Registered off Noida
Permanent job
govt pay scale,
Retirement 58 years

मानव अधिकारों के संरक्षण की चर्चा आरंभ करने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह मानवाधिकार क्या हैं और इसके बाद यह जाने...
09/09/2020

मानव अधिकारों के संरक्षण की चर्चा आरंभ करने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह मानवाधिकार क्या हैं और इसके बाद यह जानेंगे कि भारतीय मीडिया का इनके विकास में क्या योगदान रहा है। वस्तुतः मानव अधिकारों से अभिप्राय ‘‘मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी मानव प्राणी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार।‘‘1 विकिपीडिया भाग।
मानवाधिकारों के इतिहास और इसकी चिंताओं को देखें तो सर्वप्रथम इसके बारे में हमें भारतीय वांग्मय में व्यापक तौर पर सामग्री मिलती है। दुनिया कि आदि ग्रंथ कहे जाने वाले सबसे प्राचीन ग्रंथों के रूप में मान्य वेदों में यह सर्वप्रथम दिखाई देते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद से लेकर अथर्ववेद में अनेक ऋचाएं हैं, जो इस बात पर चिंता व्यक्त करती हैं कि व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार के साथ उसके बोलने की आजादी का संपूर्ण रूप से ख्याल रखा जाए। राज्य के स्तर पर या स्थानीय निकाय में प्रत्येक नागरिक कानूनी समानता, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के स्तर पर एक समान हो। भारत में इन वैदिक ग्रंथों के बाद अन्य पौराणिक ग्रंथों, जातक कथाओं, अपने समय के कानूनी दस्तावेजों सहित धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों में ऐसी अनेक अवधारणाएं, नियम, सिद्धांत मिलते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि भारत में मानवाधिकार की चिंता शुरू से की जाती रही है।वर्तमान संदर्भों में इसकी बात करें तो ‘‘आधुनिक मानवाधिकार कानून तथा मानवाधिकार की अधिकांश अपेक्षाकृत व्यवस्थाएं समसामयिक इतिहास से संबंध हैं। द ट्वेल्व आर्टिकल्स ऑफ द ब्लैक फॉरेस्ट (1525) को यूरोप में मानवाधिकारों का सर्वप्रथम दस्तावेज माना जाता है। यह जर्मनी के किसान- विद्रोह (Peasants’ War) स्वाबियन संघ के समक्ष उठाई गई किसानों की मांग का ही एक हिस्सा है। ब्रिटिश बिल ऑफ राइट्स ने युनाइटेड किंगडम में सिलसिलेवार तरीके से सरकारी दमनकारी कार्रवाइयों को अवैध करार दिया। दूसरी ओर 1776 में संयुक्त राज्य में और 1789 में फ्रांस में 18 वीं शताब्दी के दौरान दो प्रमुख क्रांतियां घटीं, जिसके फलस्वरूप क्रमशः संयुक्त राज्य की स्वतंत्रता की घोषणा एवं फ्रांसीसी मनुष्य की मानव तथा नागरिकों के अधिकारों की घोषणा का अभिग्रहण हुआ। इन दोनों क्रांतियों ने ही कुछ निश्चित कानूनी अधिकारों की स्थापना की।2 वही
इसके बाद युरोप के देशों समेत दुनिया के तमाम देशों में किसी न किसी रूप में मानव के अधिकारों और उनके संरक्षण की बातें उठने लगीं। राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा अंगीकार की। जिसमें यह बात साफतौर पर लिखी गई कि संयुक्त राष्ट्र के लोग यह विश्वास करते हैं कि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते, मानव की गरिमा है और स्त्री-पुरुष के समान अधिकार हैं। इस घोषणा के परिणामस्वरूप विश्व के कई राष्ट्रों ने इन अधिकारों को अपने संविधान में शामिल करना आरंभ कर दिया।भारत के राज्यों में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21 में राज्य में मानवाधिकार आयोग गठन का प्रावधान है और राज्यों में इसके गठन की प्रक्रिया तेजी से बढ़ रही है। इन आयोगों के वित्तीेय भार का वहन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। संबंधित राज्य का राज्यंपाल, अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है। आयोग का मुख्यालय राज्य में कहीं भी हो सकता है। ‘‘सन 1993 की धारा 21 (5) के तहत राज्य मानव अधिकार के हनन से संबंधित उन सभी मामलों की जांच कर सकता है, जिनका उल्लेख भारतीय संविधान की सूची में किया गया, वहीं धारा 36 (9) के अनुसार आयोग ऐसे किसी भी विषय की जांच नहीं करेगा, जो किसी राज्य आयोग अथवा अन्य आयोग के समक्ष विचाराधीन है।”3.डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, हिन्दी विभाग डी.वी.(पी.जी.) कालेज उरई, जालौन उ.प्र.।
मानवाधिकार की इस चर्चा के बाद अब हम बात करते हैं, मीडिया या पत्रकारिता की। वास्तव में मीडिया है क्या, सबसे पहले यह सोचा जाना चाहिए। मीडिया शब्द देखा जाए तो मीडिएटर शब्द से बना है, जिसका आशय है दो लोगों के बीच परस्पर संवाद बनाने का माध्यम। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जन सूमह तक सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने का एक माध्यम है। यह संचार का सरल और सक्षम साधन है, जो अर्थव्यवस्था के समग्र विकास में मुख्य भूमिका निभाता है। अब जैसा कि हमारा विषय है, मानव अधिकारों का संरक्षण और भारतीय मीडिया तो यहां समझना होगा कि मीडिया एक संवाद सेतु है, जोकि अपने संवाद माध्यम सेतु होने का अहसास सभी को करा रहा है। वास्तव में मीडिया का मुख्य कार्य भी यही है कि वह जितनी जल्दी हो सके एक सूचना को दूसरे स्थान तक ले जाए, जिनसे कि वह जुड़ी हुई है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मीडिया जितना सक्रिय होगा, मानवों के अधिकारों का संरक्षण, उनका विकास उतनी ही तेजी से होगा। दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि मीडिया की अधिकतम सक्रियता के चलते समाज में व्याप्त विसंगतियों और मानवों अधिकारों का हो रहा क्षरण भी द्रुत गति से रोका जा सकता है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में संचार माध्यमों को अपनी ताकत का अंदाजा स्वाधीनता आंदोलन से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं व स्वयंसेवी संगठनों का आपस में गहरा रिश्ता रहा जो आगे सतत बढ़ता रहा है, इसे लेकर यह भी कह सकते हैं कि यही रिश्ता समय के साथ मानव अधिकारों के संदर्भ में और अधिक सबल हुआ है। वास्तव में देखें तो भारत में मीडिया की भूमिका शुरू से ही सकारात्मक, उपदेशात्मक और उदाहरणात्मक रही है। जो लोग मीडिया पर कई बार बिना जाने यह आरोप लगा देते हैं कि मीडिया अपना धर्म सही से नहीं निभा रहा है, उनको यह जरूर समझना चाहिए कि यदि मीडिया होता ही नहीं तो क्या होता ? आज जितने भी विकासात्मक संवाद चल रहे हैं, सूचनाओं के स्तोर पर घटनाओं की जानकारी और मानवाधिकारों के हनन के मुद्दे जिस तेजी से प्रसारित हो रहे हैं, क्या वे इतनी तत्परता से सभी तक पहुंच पाते, वह भी बिना देरी बगैर ? स्वाभाविक है, ऐसा नहीं होता। यानि कि यह पूरी तरह मान लिया जाए कि दुनिया में जितना भी विकास हुआ है और जितने भी विवादास्पद मुद्दें हैं उन सभी को प्रमुखता से आगे बढ़ाने का कार्य हो या अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने तथा जन-जन का मार्गदर्शन करने का कार्य, सभी में आज मीडिया की प्रभावी भूमिका है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि आगे भी मानव के अधिकारों के प्रति सतत् जागरूकरता तभी तक बनी रह सकती है जब तक कि मीडिया अपनी भूमिका सार्थक ढंग से निभाता रहेगा।
मानवाधिकारों के रक्षण में मीडिया की तरह ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसके समानांतर अपनी भूमिका निभा रहा है। जब कभी भी आयोग में कोई शिकायत पहुंचती है तो इस संस्थान की भरसक कोशिश यही रहती है कि शिकायतकर्ता की गरिमा को ठेस पहुंचाने का जो कुत्सित प्रयास हुआ है, उसे राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अपने अनिवार्य हस्तक्षेप से दूर करने में सफल रहा है। अभी तक हजारों मामले देश में मानवाधिकार हनन के ऐसे उजागर हुए हैं जो मीडिया की सक्रियता के कारण सभी के समक्ष आ सके और जिन्हें स्वतः संज्ञान में लेकर उन पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी ओर से कड़ी कार्रवाही की है।एक उदाहरण यहां दृष्टव्य है, नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की अपनी एक पुस्तक में चीन और भारत को लेकर की गई तुलना का जिक्र किया जा सकता है। इन दोनों देशों के बीच स्वतंत्र होने में सिर्फ दो वर्षों का फांसला है। एक ओर चीन ने कई क्षेत्रों में तेजी से सामाजिक और आार्थिक विकास किया लेकिन वह एक क्षेत्र में भारत से बुरी तरह पिछड़ गया, वह था सूखे पर विजय पाना। चूंकि भोजन का अधिकार एक मानवाधिकार है। अगर लोग भूखे रहते हैं तो वह मानवाधिकार का हनन है। इस दृष्टि से इसे देखें तो भारत अपने यहां सूखे से इसलिए तेजी से निपट पाया क्योंकि यहां स्वतंत्र मीडिया है। स्वतंत्र मीडिया ने सूखे के संकट को खूब उजागर किया। जिससे सरकार को इस पर पर्याप्त ध्यान देना पड़ा। इस तरह कह सकते हैं कि मानवाधिकार के सतत विकास तथा संरक्षण में मीडिया अपना श्रेष्ठ योगदान दे रहा है।
मानव अधिकारों को लेकर मीडियाकर्मी कितने संवेदनशील हैं। उसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि जब किसी राज्य में किसी के साथ अन्याय होता है तो इस उत्पीड़न की खबर तमाम अखबारों में प्रकाशित होती है, इसके प्रकाशित होने के बाद राज्य विधानसभा और लोकसभा-राज्यसभा के सदनों पर लम्बी बहस होती है, देश में आंदोलन, धरना-प्रदर्शन का दौर शुरू हो जाता है, परिणाम स्वरूप सरकार भरसक प्रयत्न करके दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रयास करती है। इस संदर्भ में दिल्ली घटित निर्भया काण्ड से लेकर अनगिनत उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। यहां अन्य उदाहरणों की बात की जाए तो किसी के साथ हुए अत्याचार, बलात्कार, सरकारी उदासीनता, न्यायालयीन प्रकरणों में देरी इत्यादि कई प्रमुख विषयों को मीडिया लगातार उजागर कर रही है। जिसका परिणाम यह है कि आज देश की जनता कई मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर चुकी है। समाज एक स्वर में अन्याय के प्रतिकार के लिए खड़ा होकर बोलने लगा है, उनके पक्ष में जिनसे कि सीधे और अप्रत्यीक्ष लोगों का कोई संबंध तक नहीं होता है। इसके कारण केंद्र और राज्य सरकारों को अपने नियमों में लगातार फेर बदल तक करने पड़ रहे हैं।स्वतंत्रता के बाद से यदि प्रमुख घटनाओं और मीडिया की भूमिका को एक नजर देखें तो यह मीडिया की लगातार मांग और सक्रियता का ही यह परिणाम था कि सन् 1950 आते-आते यह सुनिश्चित हो गया कि भारत का अपना संविधान लागू हो रहा है। जिसमें कि भारत के संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के साथ संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की। संविधान के खण्ड 3 में उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकारों का विधेयक अन्तर्भूत है। यह शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से पूर्ववर्ती वंचित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान भी करता है। इसके अलावा 1952 में आपराधिक जनजाति अधिनियम को पूर्ववर्ती आपराधिक जनजातियों को अनधिसूचित के रूप में सरकार द्वारा वर्गीकृत किया गया तथा आभ्यासिक अपराधियों का अधिनियम (1952) पारित हुआ। 1955 में हिन्दुओं से संबंधित परिवार के कानून में सुधार ने हिन्दू महिलाओं को अधिक अधिकार प्रदान किए। सन् 1958 में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 सरकार लेकर आई। इसके बाद भी जब देखा गया कि मानवाधिकार हनन के मामले कम नहीं हो रहे हैं तो सन् 1973 में भारत का उच्चतम न्यायालय केशवानन्द भारती के मामले में यह कानून लागू करता है कि संविधान की मौलिक संरचना (कई मौलिक अधिकारों सहित संवैधानिक संशोधन के द्वारा अपरिवर्तनीय है। जिसके बाद 1975-77 में भारत में आपातकाल की स्थिति-अधिकारों के व्यापक उल्लंघन की घटनाएं घटीं। संपूर्ण देश में इसका विरोध हुआ। भारत सहित दुनिया का शायद ही कोई देश होगा जहां इसका विरोध न हुआ हो। सभी ओर व्यापक स्तर पर इस कालखण्ड को कव्हरेज मिला।
सन् 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कानून लागू किया कि आपात-स्थिति में भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन (जीने) के अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है। इसी समय जम्मू और कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 प्रकाश में आया। इसके पांच साल बाद 1984 के वर्ष में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके तत्काल बाद देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या किए जाने से सिख विरोधी दंगे चहुंओर भड़क उठे थे। इस समय मीडिया ने अपना संवेदनात्मरक कव्हरेज किया और कई सिख परिवारों को बचाने, उनके मानवाधिकार सुरक्षित रख पाने में अपना भरसक योगदान दिया।देश में सन् 1985 में शाहबानो मामला सामने आया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने तलाक-शुदा मुस्लिम महिला के अधिकार को मान्यता प्रदान की थी ने मौलानाओं में विरोध की चिंगारी भड़का दी। उच्चतम न्यायालय के फैसले को अमान्य करार करने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिमा (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित किया। हालांकि इससे मुस्लिम महिलाओं के मानवाधिकारों का हनन हुआ है, किंतु यह निर्णय देश की चुनी हुई सरकार का था। भले ही इस निर्णय के आ जाने के बाद मुस्लिम उलेमाओं में खुशी का माहौल है और जो अब तक बना हुआ है। लेकिन मीडिया ने समान आचार सहिंता का मुद्दा जोर-शोर के साथ उठाया हुआ है और यह भी कि जब हिन्दू महिलाओं को संवैधानिक स्तर से अपार अधिकार दिए जा सकते हैं तो मुस्लिम महिलाओं को यह अधिकार क्यों नहीं मिलने चाहिए ? तब से लेकर अब तक यह बात लगातार मीडिया अपने स्तर पर उठा रहा है।
1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया गया। जब 1989 में कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का नस्ली तौर पर सफाया किया जा रहा था, हिन्दू मंदिर नष्ट-भ्रष्ट किए जा रहे थे, इस्लाम को मानने वाले जब कश्मीर में हिन्दुओं और सिखों की हत्या तथा विदेशी पर्यटकों और सरकारी कार्यकर्ताओं का अपहरण कर रहे थे, तब भी मीडिया ने इन सभी विषयों को प्रमुखता से देश की आम जनता के सामने रखा था। 1992 के दौरान संविधानिक संशोधन ने स्थानीय स्व-शासन (पंचायती राज) की स्थापना तीसरे तले (दर्जे) के शासन के ग्रामीण स्तर पर की, जिसमें महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित की गईं। साथ ही साथ अनुसूचित जातियों के लिए प्रावधान किए गए। यह सब भी इसलिए हुआ क्योंकि मीडिया लगातार इस बात की मांग कर रहा था। देश में एक बड़ी घटना 1992 में घटी, बाबरी ढाचा ध्वस्त कर दिया गया, परिणामस्वरूप देश भर में दंगे हुए। मानवाधिकारों का जितना उल्लंघन हो सकता था, इस समय में हुआ। मीडिया ने हर परिस्थिति पर अपनी नजर रखी और व्यापक कव्हरेंज के द्वारा शासन-प्रशासन को जमीनी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ आम जनता के बीच आपसी शांति स्थापित करने की दिशा में कार्य किया। उसके बाद देश की राष्ट्रीय सरकार ने 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की।यह मीडिया के द्वारा मानवाधिकार से जुड़ा प्रश्न ही था कि वर्ष 2001 में उच्चतम न्यायालय ने भोजन का अधिकार लागू करने के लिए व्यापक आदेश जारी किए। 2002 के दौरान जब गोधरा कांड हुआ और निरीह हिन्दू रामभक्त कारसेवकों को ट्रेन में आग लगाकर मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा जलाकर मार दिया गया था और जिसके परिणाम स्वरूप गुजरात में चहुंओर हिंसा ने अपना ताण्डव शुरू कर दिया था, तब मीडिया उन सभी के जीवन में किसी रोशनी से कम नहीं था जो चारो ओर से दंगाइयों से घिरे हुए थे। मीडिया की त्वरित सूचनाओं के कारण राज्य-प्रशासन कई लोगों की जान बचाने और उन्हें फिर से मुख्यधारा में लाने में सफल रहा। आम तौर पर देखा गया है कि सांप्रदायिक दंगों के बाद प्रभावितों की चिंता करने वाला कोई नहीं रहता है। भारतीय मीडिया ऐसे सभी लोगों की आज आवाज बना हुआ है। शासन भी लगातार इस प्रकार की दिखाई जाने वाली घटनाओं के बाद जागता है और प्रभावितों की मदद के लिए भरसक प्रयत्न करने आगे आता है।
मीडिया ने लोकहित में यह बात भी लगातार उठाई कि क्यों नहीं सरकारी जानकारियां आम होना चाहिए। जब सभी कुछ सरकार जनता के लिए करती है तो यह जानना भी जनता का हक है कि आखिर उसकी सरकार कर क्या रही है और यदि कोई कार्य समय पर पूरा नहीं होता या उसमें भ्रष्टाचार हुआ है तो सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलने वाला कि यह गोपनीय है। इस दौरान यदि किसी के मानवाधिकारों का भी हनन हुआ है तो वह भी सामने आना चाहिए और भविष्य में ऐसा न हो, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लगातार की यह मीडिया की उठाई मांग एवं विभिन्न सरकारी विभाग की कार्यप्रणाली दिखाने का परिणाम था कि 2005 में देश में एक सशक्त सूचना का अधिकार अधिनियम पारित हुआ, जिससे कि सार्वजनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में संघटित सूचना तक आम नागरिक की पहुंच हो गई। इसी साल दूसरा बड़ा निर्णय देशवासियों के हक में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआरईजीए) का आना है जो रोजगार की सार्वभौमिक गारंटी प्रदान करता है। इसी प्रकार मीडिया लगातार पुलिस की नौकरी कर रहे लोगों के जीवन में भारी दवाब के केस उठाता रहा है, जिसके बाद इस बात को संज्ञान में लेकर वर्ष 2006 में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय पुलिस की मानवाधिकारों के प्रति अपर्याप्त व्यवस्थाओं को रेखांकित करते हुए प्रतिक्रिया स्वरूप पुलिस सुधार के आदेश जारी किए। इस निर्णय के आने के बाद से पुलिस की सेवा में कार्यरत लोगों को बहुत कुछ राहत मिल सकी है। मानवाधिकारों के हनन को लेकर दुनिया के तमाम देशों की तरह ही भारत में मानव तस्करी का लगभग 12 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अवैध व्यापार है। हर साल अनुमानतः 10,000 नेपाली महिलाएं वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए भारत लायी जाती हैं। प्रति वर्ष औसतन 20 हजार से 25 हजार महिलाओं और बच्चों की बांग्लादेश से अवैध तस्करी हो रही है। मीडिया लगातार इनके मानवाधिकारों के लिए आवाज उठा रहा है।ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लोगों के साथ भारत में लगातार भेदभाव, बहिष्कार, एवं सांप्रदायिक हिंसा के कृत्य हो रहे हैं। भारतीय सरकार द्वारा अपनाए गए कानून और नीतियां सुरक्षा के मजबूत आधार प्रदान करती हैं, लेकिन स्थानीय अधिकारियों द्वारा ईमानदारी से कार्यान्वित नहीं हो रही है। मीडिया आज इनकी भी एक मुखर आवाज है और इन सभी के मानवाधिकारों के हनन को रोकने में अपनी कारगर भूमिका अदा कर रहा है।
वस्तुतः 1990 में आरम्भ हुए उदारीकरण के कारण मीडिया पर निजी नियंत्रण फलने-फूलने के साथ-साथ स्वतंत्रता बढ़ गई और सरकार की अधिक से अधिक तहकीकात करने की गुंजाइश हो गई। इसके अलावा, हाल के वर्षों में प्रसार भारती के अधिनियम जैसे पारित कानूनों ने सरकार द्वारा प्रेस पर नियंत्रण को कम करने में उल्लेखनीय योगदान किया है। जिसके बाद से मीडिया पहले से ओर मुखर हुआ है तथा जनता के मानवाधिकारों की चिंता व्यापक स्तर पर खोजपरकता के साथ कर रहा है।

बाल अधिकार दिवसभारत में बाल अधिकार दिवसभारत में सभी बच्चों के लिये वास्तविक मानव अधिकार के पुनर्विचार के लिये 20 नवंबर क...
09/09/2020

बाल अधिकार दिवस
भारत में बाल अधिकार दिवस
भारत में सभी बच्चों के लिये वास्तविक मानव अधिकार के पुनर्विचार के लिये 20 नवंबर को हर वर्ष बाल अधिकार दिवस मनाया जाता है। अपने बच्चों के सभी अधिकारों के बारे में लोगों को जागरुक बनाने के लिये बाल अधिकार की सुरक्षा के लिये राष्ट्रीय कमीशन के द्वारा 20 नवंबर को सालाना एक राष्ट्रीय सभा आयोजित की जाती है। 20 नवंबर को पूरे विश्व में वैश्विक बाल दिवस (अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस) के रुप में भी मनाया जाता है।
बाल अधिकारों के पुनर्मूल्यांकन के लिये विभिन्न कार्यक्रमों को आयोजित करने के द्वारा इस दिन को पूरे विश्व भर में भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सदस्य मनाते है। बाल अधिकारों के अनुसार बचपन अर्थात् उनके शारीरिक और मानसिक अपरिपक्वता के दौरान बच्चों की कानूनी सुरक्षा, देख-भाल और संरक्षण करना बहुत जरुरी है।
बाल अधिकार दिवस 2019
बाल अधिकार दिवस 2019, 20 नवंबर बुधवार को मनाया जायेगा।
बाल अधिकार क्या है?
1959 में बाल अधिकारों की घोषणा को 20 नवंबर 2007 को स्वीकार किया गया। बाल अधिकार के तहत जीवन का अधिकार, पहचान, भोजन, पोषण और स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा और मनोरंजन, नाम और राष्ट्रीयता, परिवार और पारिवारिक पर्यावरण, उपेक्षा से सुरक्षा, बदसलूकी, दुर्व्यवहार, बच्चों का गैर-कानूनी व्यापार आदि शामिल है। भारत में बच्चों की देखभाल और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिये 2007 के मार्च महीने में राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा के लिये एक कमीशन या संवैधानिक संस्था का निर्माण भारत की सरकार ने किया है। बाल अधिकारों के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये संगठन, सरकारी विभाग, नागरिक समाज समूह, एनजीओ आदि के द्वारा कई सारे कार्यक्रम आयोजित किये जाते है।
बाल अधिकार दिवस
बाल अधिकार बाल श्रम और बाल दुर्व्यवहार की खिलाफत करता है जिससे वो अपने बचपन, जीवन और विकास के अधिकार को प्राप्त कर सकें। दुर्व्यवहार, गैर-व्यापार और हिंसा के पीड़ित बनने के बजाय बच्चों की सुरक्षा और देखभाल होनी चाहिये। उन्हें एक अच्छी शिक्षा, मनोरंजन, खुशी और सीख मिलनी चाहिये।
बाल अधिकार दिवस कैसे मनाया जाता है
इस अवसर पर बच्चों के लिये स्कूलों के द्वारा एक कला प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच बाल अधिकार की जागरुकता को प्रचारित और बढ़ावा देने के लिये विद्यार्थियों के द्वारा बाल अधिकार से संबंधित कार्यक्रम और कई प्रकार की कविता, गायन, नृत्य आदि की प्रस्तुति दी जाती है।
उनकी जरुरतों को आँकना और एक व्यक्ति के रुप में बच्चे को समझने के लिये एक कार्यक्रम को भी रखा जाता है। इस कार्यक्रम के प्रतिभागी कुछ प्रश्न पूछते हैं। एक व्यक्ति या इंसान के रुप में बच्चों की जरुर एक पहचान होनी चाहिये। खुशी और अच्छे बचपन को प्राप्त करने के लिये उन्हें अच्छी छत, सुरक्षा, भोजन, शिक्षा, कला, खेल, देख-रेख, स्वस्थ परिवार, कपड़े, मनोरंजन, मेडिकल क्लीनिक, परामर्श केन्द्र, परिवहन, भविष्य योजना, नई तकनीक आदि तक आसान पहुँच होनी चाहिये।
कर्तव्य का वहन करने वाले की कमी और बच्चों के अधिकारों के महत्व के बारे लोगों को जागरुक करने के लिये अधिकार धारक और कर्तव्य धारक के रिश्तों को प्रदर्शित करने लिये एक कला प्रदर्शनी रखी जाती है। बाल अधिकार के शुरुआत के बाद भी लगातार जारी मुद्दों को समझने के लिये बाल अधिकार आधारित मार्ग पर पहुँचने के लिये सेमिनार और बहस रखी जाती है। बच्चों के वास्तविक अधिकार को प्राप्त करने के लिये बाल श्रम की समस्या से मुक्ति पानी होगी।
बाल अधिकार दिवस मनाने का उद्देश्य
> भारत में हर साल बाल अधिकार दिवस बच्चों के अधिकार और सम्मान को सुनिश्चित करने के लिये मनाया जाता है।
> हमें उनको पूरा विकास और सुरक्षा का आनन्द लेने का मौका देना चाहिये।
> इस बात को सुनिश्चित करें कि बाल अधिकार के कानून, नियम, और लक्ष्य का पालन हो।
> बाल अधिकारों को मजबूत करने के लिये समाज को लगातार इस पर कार्य करना होगा।
> पूरे देश में बाल अधिकार योजना को फैलाना, प्रचारित और प्रसारित करना है।
> देश के हर भाग में बच्चों के रहने की स्थिति को गहराई से निगरानी करें।
> बढ़ते बच्चों के विकास में उनके अभिवावक की मदद करना। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की जिम्मेदारी के लिये उनके माता-पिता को जागरुक करना।
> कमजोर वर्ग के बच्चों के लिये नई बाल अधिकार नीति को बनाना और लागू करना।
> बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा, दुर्व्यवहार को रोकना, उनके अच्छे भविष्य के लिये उनके सामाजिक और कानूनी अधिकारों को प्रचारित करना।
> देश में बाल अधिकार नीतियों को लागू करने की अच्छाई और बुराई का विश्लेषण करना।
> देश में बच्चों के व्यापार के साथ ही शारीरिक शोषण के खिलाफ कार्य और विश्लेषण करना।
बाल अधिकार दिवस की आवश्यकता
यह सवाल हम सबके मन में उठता है कि आखिर बाल अधिकार दिवस की क्या आवश्यकता है पर ऐसा नही है इसकी आवश्यकता का अपना ही महत्व है। इस दिन का गठन ही बाल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हुआ था। जैसा कि हम जानते आज के समय में बच्चों के जीवन में उपेक्षा, दुर्व्यवहार की घटनाएं काफी बढ़ गयी है। लोग अपने स्वार्थ के कारण बाल मजदूरी, बाल तस्करी जैसे अपराधों को करने में भी संकोच नही कर रहे है।
ऐसे में यह काफी आवश्यक है कि बच्चे अपने अधिकारों के विषय में जाने ताकि अपने साथ किसी तरह के भेदभाव या अत्याचार होने पर वह इसके खिलाफ आवाज उठा सके। इसके साथ ही बाल अधिकार दिवस के इस खास दिन बच्चों में आत्मविश्वास जगाने के लिए विद्यालयों, गैर सरकारी संस्थाओ और संस्थानों द्वारा कई तरह के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते है जैसे कि भाषण प्रतियोगिता, कला प्रदर्शनी आदि। जो कि इस पूरे दिन को और भी खास बनाने का कार्य करने के साथ ही बच्चों के बौद्धिक विकास में भी सहायक होते है।

संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारभारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े तथ्‍य इस प्रकार हैं-1. इसे संयुक्त राज्य...
09/09/2020

संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकार
भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े तथ्‍य इस प्रकार हैं-
1. इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
2. इसका वर्णन संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) है।
3. इसमें संशोधन हो सकता है और राष्ट्रीय आपात के दौरान (अनुच्छेद 352) जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है।
4. मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1979 ई.) के द्वारा संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31 से अनुच्छेद 19 f) को मौलिक अधिकार की सूची से हटाकर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 (a) के अंतर्गत कानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है।
भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित मूल अधिकार प्राप्त हैं-
1. समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18)
2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
6. संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 32)

09/09/2020

NGOs offering Human Rights Jobs in India
Human Rights Law Network
The Human Rights Law Network, a project of the Socio-Legal Information Centre (SLIC), is a collective of lawyers and social activists using the legal system to advance human rights, struggle against violations, and ensure access to justice for all. HRLN consists of a nationwide network of more than 200 lawyers, paralegals, and activists across India serving those with limited access to the justice system, conducting litigation in public interest, engaging in advocacy, running helplines, conducting legal awareness programs, and more.
HRLN offers a variety of job opportunities for human rights professionals as support staff. They run multiple initiatives focusing on a wide range of legal and human rights issues, for which they hire directors and supportive staff. In addition to lawyers and related staff, they use specialists for fundraising, web and media coordination, internship coordination, and more. They also offer internships for those looking to gain experience.
Amnesty International India
Amnesty International in India works on various human rights issues throughout the country, including communal violence, access to justice, individuals at risk, gender-based violence, human rights education, business and human rights, and reducing excessive pretrial detention. They are also running several campaigns to raise awareness about and promote the progress of human rights issues, as well as to empower and praise current human rights defenders in the country.
Amnesty has over 200 staff throughout 6 cities in India working to protect justice, promote truth, and prevent human rights abuses. They offer a wide range of positions, including technical support jobs, fundraising specialists, development and media specialists, program officers, and more. They also have apprenticeships and internships available throughout the year. Amnesty encourages anyone to submit their CV to be considered for current and future job openings.
Child Rights and You
Child Rights and You (CRY) is a human rights organization that works throughout India specifically to protect and promote children’s rights. They partner with local organizations in the form of grant-making, capacity building, community mobilization, network and alliance building, influencing child-friendly policies, resource organizations, and nodal agencies that allow for greater outreach on a smaller scale. They intervene in situations of children’s rights through direct action, community mobilization, and monitoring/planning/evaluation of finances and programs.
CRY offers positions in a variety of areas, including information technology, program development and oversight, policy and research, and resource development, including corporate partnerships and other development initiatives. Position experience ranges from entry-level to senior management.
Save the Children
Save the Children is a global non-profit that is currently the leading child rights organization in India. Specifically, they target the areas of child protection, health and nutrition, education, disaster risk reduction, humanitarian response, and child poverty. They work throughout the country to promote child protection and human rights, improving healthcare and education and fighting against child marriage, child labor, child pregnancies, abuse, and emergency situations. Save the Children also works to influence and change policy and advocate on behalf of children and their rights.
Save the Children India offers jobs throughout the country in program coordination, finance, development/fundraising/corporate sponsorship, field work, policy and advocacy and more. Experience and position levels range from entry level to senior management. Those interested in applying can create a profile on the job portal to be notified about relevant job postings and openings.
National Human Rights Commission India
The National Human Rights Commission (NHRC) is an autonomous public body established through the Human Rights Act of 1993. They do a variety of activities relating to protection of and promotion of human rights in India, including investigation into violations of the government, intervention in related court proceedings, recommendations on policies, review and study of conventions and laws regarding human rights, research in the field of human rights, education on human rights, and other various tasks.
Many of NHRC’s staff/members are appointed based on their positions as judges and chief justices, but other positions are necessary on an ongoing or temporary basis. Those with research and law backgrounds will be well-suited for many of these jobs. In addition to various consultant positions, they also have positions available for research officers, law presenting officers, and more.

ह्यूमन राइट्स' में है करियर की अपार संभावनाएंमन राइट्स आज सिर्फ समाज सेवा नही रह गया है, बल्कि आज ह्यूमन राइट्स ने एक बे...
09/09/2020

ह्यूमन राइट्स' में है करियर की अपार संभावनाएं
मन राइट्स आज सिर्फ समाज सेवा नही रह गया है, बल्कि आज ह्यूमन राइट्स ने एक बेहतरीन करियर ऑप्शन का रूप ले लिया है। आज इस क्षेत्र में युवाओं के लिए कई अवसर उपलब्ध है। दरअसल हमारे जन्म के साथ ही प्रकृति ने हमें कुछ मूलभुत अधिकार प्रदान किए है जिनमें सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, समानता का अधिकार और सामाजिक न्याय का अधिकार आते है। लेकिन इन्ही अधिकारों का हनन करके लोगों का शोषण किया जा रहा है। हालांकि मानवता के विकास के साथ ही मानव अधिकारों में भी विकास हुआ है।
आज हर इंसान को अपने अधिकारों को जानना जरूरी है। आज मानवाधिकार को एक करियर विकल्प के रूप में खासी अहमियत मिली हुई है हर साल कई युवा इस क्षेत्र में अपना करियर बना रहे है। दुनिया के हर नागरिक को अपने अधिकार मिले है लेकिन फिर भी लोगों के अधिकारों का हनन होता रहता है। लेकिन लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए दुनिया में कई सरकारी और गैर सरकारी संगठन काम कर रहे है। जिससे इस क्षेत्र में प्रोफेशनल्स के लिए कई अवसर उपलब्ध हुए है। लोगों के मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों को 'मानवाधिकार कार्यकर्ता' कहा जाता है। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता का काम न सिर्फ आपके अधिकारों की रक्षा करना होता है बल्कि जिन अधिकारों का हनन हुआ है उसके लिए कानूनी रूप से आपको इंसाफ दिलवाना भी है। अगर आप भी लोगों के अधिकारों की रक्षा करना चाहते है तो आपके लिए ये एक बेहतरीन करियर विकल्प हो सकता है।
प्रमुख कोर्सेज- -डिप्लोमा इन ह्यूमन राइट्स -
पीजी डिप्लोमा इन ह्यूमन राइट्स -
मास्टर्स इन ह्यूमन राइट्स -
बैचलर डिग्री इन ह्यूमन राइट्स
जॉब प्रोफाइल-
एक मानवाधिकार कार्यकर्ता को कई काम करने होते है जैसे सोशल जस्टिस, जेंडर जस्टिस, चाइल्ड जस्टिस जैसे क्षेत्रों से डाटा कलेक्ट करना, उनके बारे में रिसर्च करना, रिपोर्ट तैयार करना और उस केस से जुड़े लोगों से मिलना। इसके अलावा अगर किसी के अधिकारों का हनन हो रहा है तो उसके लिए काम करना और जरूरत पड़ने पर कानून की मदद लेना जैसे काम करना होता है।

मानवाधिकार का अर्थमानवाधिकारमानव अधिकारों से अभिप्राय "मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी मानव प्राणी हकदार ह...
09/09/2020

मानवाधिकार का अर्थ
मानवाधिकार
मानव अधिकारों से अभिप्राय "मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी मानव प्राणी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन जीने और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार .

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