Rehtom Foundation

Rehtom Foundation Rehtom Foundations dedicated to Old-age Citizen of India specially unprivileged Old-age Woman, we belief her as Mothers of Society.

Rehtom is a way to find mother in common woman… you can read reverse of Rehtom and find a Mother in every street of society, it’s an small effort of reciprocate our adorable, devoted, love, care, affection and purest feel of this Universe. Our Moral and ethics toward our Natural Creator “Woman” can craft a civic Society, Country or this World; without humbleness, sympathy, humanity this whole worl

d look like a world of wild animal

Let’s join the "Rehtom Foundations” and express feeling toward
your loving mother & caring MotheR

This is a group of Civilized Citizen operating "Rehtom Foundations" with integrity and transparency, No Government aid, No begging for donations... simple dignified system and proud membership for helping aged people.

स्त्री का आत्मसम्मान और उत्तरदायित्व: भारतीय समाज में नई सोच की आवश्यकता– सशक्त बेटी सुंदर समाज की ओर सेभारत, जो स्त्रिय...
20/11/2024

स्त्री का आत्मसम्मान और उत्तरदायित्व: भारतीय समाज में नई सोच की आवश्यकता
– सशक्त बेटी सुंदर समाज की ओर से

भारत, जो स्त्रियों को लक्ष्मी का प्रतीक मानता है और उनके सम्मान को अपनी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा समझता है, उसी भारत के ग्रामीण परिवेश में एक नवविवाहिता का बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, या सार्वजनिक स्थानों पर घूँघट में बैठे रहना और अपने परिवार के पुरुषों के साथ ‘सामान’ की तरह प्रस्तुत होना, एक गहरी विडंबना को दर्शाता है।

यह दृश्य केवल एक परंपरा या प्रथा का पालन नहीं है, बल्कि यह उस घर की बहू के प्रति परिवार की जिम्मेदारी के अभाव और उसकी स्वयं की गरिमा को लेकर असंवेदनशील दृष्टिकोण को उजागर करता है। सम्मान देना और पाना, दोनों का संबंध आत्मसम्मान और समझदारी से है, लेकिन जब यह सम्मान हीनता या दबाव का रूप ले लेता है, तो यह न केवल व्यक्ति के व्यक्तित्व को बल्कि समाज की मूलभूत संरचना को भी क्षति पहुँचाता है।

यह प्रथा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की कमी है

घूँघट या झुकाव को अक्सर ग्रामीण समाज में सम्मान का प्रतीक माना जाता है, लेकिन वास्तव में यह सम्मान से अधिक असमंजस और जिम्मेदारी की कमी को दर्शाता है। परिवार के बड़े सदस्यों द्वारा नवविवाहिता को एक स्वतंत्र और गरिमामय व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार न करना, और उस बहू का इसे सम्मान की बजाय हीनता और चुप्पी के माध्यम से व्यक्त करना, दोनों ही गलत हैं।
• बड़ों का कर्तव्य: अपने घर की लक्ष्मी को आत्मसम्मान के साथ खड़ा करना। उसे बोलने, अपनी जरूरतें व्यक्त करने और जीवन को सहजता से जीने का अवसर देना।
• नवविवाहिता का अधिकार: सम्मान का अर्थ यह नहीं है कि वह अपने व्यक्तित्व को मिटा दे। सम्मान देने का सही तरीका यह है कि वह आत्मसम्मान बनाए रखते हुए अपनी बात रखे।

आत्मसम्मान और सम्मान का सामंजस्य

भारतीय समाज में, सम्मान को अक्सर त्याग और चुप्पी से जोड़ा जाता है। लेकिन आत्मसम्मान के बिना सम्मान का कोई मूल्य नहीं है।
• सम्मान का सही रूप: परिवार के भीतर सम्मान का अर्थ है समानता, संवाद, और जिम्मेदारी।
• आत्मसम्मान का महत्व: यदि कोई व्यक्ति अपने आत्मसम्मान से समझौता करके दूसरों को सम्मान देता है, तो यह सम्मान नहीं बल्कि आत्महीनता है।

“सशक्त होना केवल अधिकार की बात नहीं है, बल्कि अपनी गरिमा और दूसरों के प्रति समझदारी के साथ जिम्मेदारी निभाने का संतुलन है।”

समाज को बदलने के लिए जिम्मेदारी जरूरी है

1. परिवार की भूमिका: परिवार के बड़े सदस्यों को यह समझना चाहिए कि एक नवविवाहिता केवल एक बहू नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और गरिमामय व्यक्तित्व है। उसकी जरूरतें, भावनाएँ, और अधिकारों को समझना और उनका सम्मान करना परिवार का कर्तव्य है।
2. सशक्त बेटी का दृष्टिकोण: महिलाओं को यह समझने की जरूरत है कि सम्मान केवल झुकने और चुप रहने से नहीं मिलता। आत्मसम्मान के साथ अपने विचार रखना और अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहना ही सच्चे सम्मान की ओर पहला कदम है।
3. संवाद और सहानुभूति: परिवार के सभी सदस्यों को खुलकर बात करने और एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की आदत डालनी चाहिए। संवाद के अभाव में ही गलतफहमियाँ और दबाव पैदा होते हैं।
4. प्रथा और जिम्मेदारी में अंतर: यह स्पष्ट करना जरूरी है कि घूँघट या झुकाव सम्मान की निशानी नहीं है, बल्कि यह परिवार की जिम्मेदारी और स्त्री के आत्मसम्मान के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

भारतीय संस्कृति का सही मार्गदर्शन

भारतीय संस्कृति का मर्म यह है कि व्यक्ति का सम्मान उसकी गरिमा और स्वतंत्रता में निहित है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है:
“स्वयं को जानना ही सबसे बड़ा ज्ञान है।” – उपनिषद
स्त्रियों के लिए यह सीख जरूरी है कि वे अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए दूसरों को सम्मान दें। परिवार को भी यह समझना चाहिए कि आत्मसम्मान के साथ दी गई स्वतंत्रता ही सच्चे सम्मान का आधार है।

समाज को दिशा देने का संदेश

• “घर की लक्ष्मी वह होती है जो परिवार को अपनी गरिमा और समझदारी से संभाले, लेकिन परिवार का भी कर्तव्य है कि वह उसे आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीने का अवसर दे।”
• “सम्मान और आत्मसम्मान का मेल ही एक सुंदर समाज का निर्माण करता है।”

एक सशक्त दृष्टिकोण की ओर

सशक्त बेटी सुंदर समाज का यह संदेश है कि हर बेटी, बहू, और स्त्री को सम्मान देने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी आवाज दबा दी जाए। उसे परिवार के भीतर अपनी गरिमा, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए। समाज तभी सुंदर बनेगा, जब हर स्त्री खुद को केवल किसी की बहू, पत्नी, या बेटी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और सशक्त व्यक्तित्व के रूप में देखेगी।

“स्त्री का सम्मान उसकी गरिमा और आत्मसम्मान में है, और यही सशक्त समाज का आधार है।”
- सशक्त बेटी, सुंदर समाज

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*सशक्त बेटी - सुन्दर समाज*

जब घनघोर अँधेरा छाया हो, उम्मीद की कोई किरण न दिखे तब रौशनी का एक छोटा सा कतरा भी उम्मीद की राह बन जाता है, मैंने देखा है नयी पीढ़ी के सीने में कुछ कर गुजरने की चाह लिए तूफानों को, उम्मीद के समंदर की गर्जना को महसूस किया है और दम तोड़ती उम्मीदों को तड़पते देखा है।

सशक्त बेटी सुन्दर समाज ने, क्षेत्र के भविष्य जैसे युवा बालक - बालिकाओं के मन-मस्तिष्क में झाँकने का मौका दिया, हमने वो जज्बा देखा है, इन बच्चों के मन में है, जो मुश्किल को मुक़द्दर में बदलने के की काबिलियत रखते हैं। इनका हौसला हिमालय सा और इरादे आसमान से ऊँचे हैं; मगर मानसिक अवरोध के कारण अधिकांश को बेबस और मज़बूर सा पाया तो मन द्रवित होता है, ये दुःखद संयोग ही है कि इतनी ऊर्जा व्यर्थ जा रही है।

बदलते समय के साथ, कालखंड के इस दौर में बेतहाशा बढ़ता दिखावा, गरीब को बेबस - लाचार बनाए रखने वाली षड्यंत्र जैसी व्यवस्था ने जन-सामान्य के लिए रोटी, कपड़ा, मकान और सम्मान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का अकाल है, सामान्य आदमी के लिए अवसर और ना कोई सुनहरा मौका जो हताश मनोदशा और मन-मस्तिष्क में कुंठा जैसे घनघोर अँधेरे में, सशक्त बेटी सुंदर समाज की परिकल्पना से आत्मविश्वास, स्वाभिमान के साथ उत्तरदायित्व के विचार आशा की एक लौ बनकर ग्रामीण युवाओं के सर्वांगीण उन्नति की दिशा दिखाने का प्रयास है।

आज के अवसरवादी मानसिक दृष्टिकोण से सशक्त बेटी - सुन्दर समाज के पुनीत उद्देश्य को नहीं समझा जा सकता, ईश्वरीय कृपा या आशीर्वाद को जैसे अंतर्मन, अंतःकरण में अनुभव किया जा सकता है शब्द नहीं कह सकते ठीक वैसे ही सशक्त बेटी - सुन्दर समाज की पूरी परिकल्पना, उद्देश्य को समग्र रूप से समझकर भाग लेने वाली प्रतिभागी, उनके परिवार, समाज और पूरे क्षेत्र में आत्मविश्वास, उत्तरदायित्व और जीवन के भव्य स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं और एक बार जीवन के उद्देश्य और आत्मविश्वास का साक्षात्कार करने वाला व्यक्तित्व पूरे समाज और राष्ट्र के लिए अनमोल निधि बन जाता है। चिन्तन, मनन और आचरण से उपजे विचारों की होगी जीत सशक्त बेटी सुंदर समाज का मात्र वाक्य नहीं - अपने अस्तित्व से साक्षात्कार का मार्ग है।

आओ मिलकर एक बार फिर चिन्तन, मनन और आचरण से उपजे विचारों के पवित्र यज्ञ का आयोजन करते हैं, एक बार हृदय की गहराइयों से अपने समाज की सुंदर कल्पना को आकार देने में भागीदारी को अपना कर्तव्य मानकर अपनाते हैं। जिनका सपना अपने क्षेत्र और समाज को सुन्दर, आदर्श और उन्नत बनाने का है, आप सभी का स्वागत है।

सशक्त बेटी - सुन्दर समाज विशुद्ध रूप से सामाजिक आयोजन है, किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, गरीब, अमीर, आयु या राजनैतिक दृष्टिकोण से प्रेरित नहीं है, जो अपने क्षेत्र और समाज के सभी वर्गों की उन्नति से सुन्दर समाज की परिकल्पना में विश्वास रखते हैं, ऐसे सभी नागरिक आमंत्रित हैं।

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