Geeta Param Rahasyam

Geeta Param Rahasyam गीता परमरहस्यम् आध्यात्मिक मार्गदर्शन का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ 🙏🕉️

15/12/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 35

श्री कृष्ण कहते हैं कि जब साधक सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तब वह समझ पाता है कि आत्मा ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। यह ब्रह्म ज्ञान सभी द्वैतों और भ्रामक धारणाओं को मिटा देता है। आत्मा के इस सत्य का अनुभव होने पर व्यक्ति को यह बोध होता है कि संसार की हर वस्तु और हर क्रिया आत्मा में ही समाहित हैं और उसी से प्रकट हुई हैं।

12/12/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 34
श्री कृष्ण सच्चे शिष्य की विशेषताएं बताते हैं। सच्चा शिष्य वह है जो विनम्र, श्रद्धावान और जिज्ञासु हो। उसे सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु की सेवा करनी चाहिए और उनके मार्गदर्शन को पूर्ण आस्था के साथ स्वीकार करना चाहिए।

गीता जयंती
11/12/2024

गीता जयंती

09/12/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 33
श्री कृष्ण कहते हैं कि द्रव्य (सामग्री) से किए गए यज्ञ की तुलना में ज्ञान यज्ञ अधिक श्रेष्ठ है। द्रव्यमय यज्ञ बाहरी साधनों पर आधारित होते हैं, जबकि ज्ञान यज्ञ आंतरिक चेतना और विवेक का विषय है।

04/12/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 31-32
श्री कृष्ण समझाते हैं कि यज्ञ का पालन करने वाले ही वास्तविक मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यज्ञ केवल बाहरी क्रिया नहीं है; यह आंतरिक त्याग और आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। जो व्यक्ति यज्ञ के महत्व को समझकर इसे श्रद्धा और भक्ति से करता है, वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। यज्ञ रहित जीवन में न तो सुख है और न ही आध्यात्मिक शांति। यज्ञ से प्रेरित कर्म ही जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की ओर अग्रसर करते हैं।

01/12/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 27-30

श्री कृष्ण बताते हैं कि त्याग ही यज्ञ का मूल है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों, मन, और प्राण को संयमित करते हुए ईश्वर को समर्पित करता है, तो उसका हर कर्म यज्ञ बन जाता है। यह त्याग आत्मा को शुद्ध करता है और जीवन के बंधनों से मुक्ति दिलाता है।

27/11/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 26

श्री कृष्ण बताते हैं कि योगी अपनी इंद्रियों और उनकी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके यज्ञ रूप में अर्पित करते हैं। यह यज्ञ प्रकृति के भोगों से विमुख होकर आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ने का साधन है। इंद्रियों के विषयों का त्याग और आत्मा की शुद्धि का यह प्रयास योगी को प्रकृति के बंधनों से मुक्त करता है। इस दृष्टिकोण से, योगी प्रकृति के भोगों का परित्याग कर अपने कर्म और चेतना को आत्मा और ब्रह्म की ओर समर्पित करते हैं, जिससे वे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

24/11/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 24-25

श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब व्यक्ति हर कर्म को ब्रह्म रूप में देखता है, तो उसके सभी कार्य ब्रह्म में ही लीन हो जाते हैं। यज्ञ की प्रक्रिया में आहुति, अग्नि, और यज्ञकर्ता—सब ब्रह्ममय हो जाते हैं। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को कर्मफल की इच्छा से मुक्त करता है।

20/11/2024

श्रीकृष्ण शरीर, मन और आत्मा के संबंध को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने कर्मों को केवल आत्मा के स्वरूप में स्थिर होकर, मन को नियंत्रित करके और शरीर को माध्यम मानकर करता है, वह मुक्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्यों को बिना किसी स्वार्थ या फल की कामना के पूर्ण करता है और कर्म के बंधन से बच जाता है।

17/11/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 22

श्रीकृष्ण कर्मयोग का महत्व बताते हुए समझाते हैं कि जो व्यक्ति सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (असफलता) में सम रहता है, वही सच्चा कर्मयोगी है। ऐसा व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में समान भाव रखता है और फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करता है। ऐसे संतुलित और समभाव वाले व्यक्ति का जीवन हमेशा शांति और संतोष से भरा रहता है, और वह परमात्मा के समीप पहुंचता है।

13/11/2024

पाप को प्राप्त नहीं होते इस प्रकार के मनुष्य | गीता अध्याय 4 श्लोक 21

श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो मनुष्य सभी कर्मों को बिना किसी स्वार्थ, मोह, और फल की इच्छा के करता है, वह पाप को प्राप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्ति का मन और इंद्रियाँ नियंत्रित होती हैं, और वह केवल कर्तव्यपालन में लगा रहता है। श्रीकृष्ण के अनुसार, जो व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता है, उसके कार्य उसे पाप के बंधन में नहीं बांधते, बल्कि उसे पवित्र और शुद्ध बनाए रखते हैं। इस प्रकार का कर्म जीवन में सच्ची मुक्ति और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।

10/11/2024

गीता अध्याय 4 श्लोक 19-20

श्रीकृष्ण पंडित अर्थात सच्चे ज्ञानी की विशेषताएं बताते हैं। वे कहते हैं कि पंडित वही है जिसके सभी कर्म कामना-रहित और ज्ञान की ज्योति से प्रकाशित होते हैं। ऐसा व्यक्ति बिना किसी इच्छाओं के कर्म करता है, जिसके परिणामस्वरूप उसे कर्म के बंधन नहीं बांधते। सच्चे पंडित का हर कार्य निष्काम होता है, वह केवल अपने कर्तव्य का पालन करता है, न कि फल प्राप्ति की इच्छा से। उसकी दृष्टि में सभी कर्म भगवान को समर्पित होते हैं, जिससे वह संसार में रहते हुए भी मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।

Address

Param Dham WZ 8EB, School Road, Uttam Nagar
New Delhi
110059

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Geeta Param Rahasyam posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Geeta Param Rahasyam:

Share