30/09/2026
*दस शीश, एक संकल्प*
*रावण की दस मुखी प्रतिभा और संस्था की दस आकांक्षाएँ*
- मानकचंद राठौड़
परंपरा में रावण को महापंडित, शिवभक्त, वीणावादक, कुशल शासक और अद्भुत विद्वान के रूप में भी स्मरण किया गया है। उनके *दस शीश* को अनेक विद्वान चार वेदों और छह शास्त्रों के ज्ञान का प्रतीक मानते हैं। यानी दस मुख, पर एक देह और एक व्यक्तित्व।
संस्था भी ऐसी ही एक देह है। उसके भीतर दस अलग आकांक्षाओं वाले सदस्य जुड़ते हैं, और हर आकांक्षा संस्था का एक "मुख" है। जब दसों मुख एक ही हृदय से जुड़ते हैं, तो संस्था दशानन जैसी सामर्थ्यवान हो जाती है।
*दस मुख, दस प्रतिभाएँ*
*1. दिशा देने की आकांक्षा - लंका के निर्माता का मुख।* रावण कुशल शासक और नगर-निर्माता माने गए हैं। दिशा देने वाला सदस्य भी बिखरे हाथों को एक ढाँचे में पिरोता है, संस्था की रीढ़ बनकर।
*2. दायित्व का बोध - तपस्वी का मुख।* रावण की तपस्या और संकल्प की दृढ़ता प्रसिद्ध है। कर्तव्यनिष्ठ सदस्य भी बिना अपेक्षा वर्षों तक निष्ठा से जुड़ा रहता है।
*3. सम्मान की आकांक्षा - महापंडित का मुख।* रावण की ख्याति उनकी विद्वत्ता की देन थी। सम्मान चाहने वाला सदस्य भी श्रेष्ठ कर्म से पहचान अर्जित करता है, जो दूसरों को प्रेरित करती है।
*4. विरासत की आकांक्षा - रचनाकार का मुख।* शिव तांडव स्तोत्र आज भी श्रद्धा से गाया जाता है। विरासत गढ़ने वाला सदस्य भी ऐसा कुछ रचना चाहता है जो उसके बाद भी बोलता रहे, कोई छात्रवृत्ति, कोई ट्रस्ट।
*5. समृद्धि की आकांक्षा - स्वर्ण-लंका का मुख।* समृद्धि चाहने वाला सदस्य यह स्वप्न लेकर आता है कि उसकी प्रगति अनेक के लिए अवसर बने।
*6. अपनेपन की आकांक्षा - कुटुंब-केंद्र का मुख।* अपनेपन की चाह रखने वाला सदस्य संस्था में वही कुटुंब खोजता है, जहाँ उसकी उपस्थिति मायने रखे।
*7. रिश्तों की आकांक्षा - संतान को गढ़ने वाले पिता का मुख।* माता-पिता इसी भावना से जुड़ते हैं कि संतान को सही संगति और सही जीवनसाथी मिले।
*8. सीखने की आकांक्षा - वेद-शास्त्रों के अध्येता का मुख।* सीखने की चाह वाला युवा संस्था को पाठशाला मानता है, जहाँ अनुभव उसे वह देता है जो किताबें नहीं दे सकतीं।
*9. संस्कार और धर्म से जुड़ाव - शिवभक्त का मुख।* संस्कार-प्रेमी सदस्य पर्व, तीर्थ और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का व्रत लेकर चलता है।
*10. सेवा की आकांक्षा - लोकहित के ज्ञान का मुख।* सेवा-साधक का कर्म चुपचाप पहुँचता है, किसी विद्यार्थी की फीस, किसी रोगी की दवा बनकर। *"परस्परोपग्रहो जीवानाम्"* का सूत्र वह जीता है।
*दस मुख, एक हृदय*
दशानन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता थी, दस प्रतिभाएँ, एक व्यक्तित्व। कोई सदस्य केवल एक मुख लेकर नहीं आता, एक ही व्यक्ति में कई आकांक्षाएँ साथ जल सकती हैं। जैन दर्शन का *अनेकांतवाद* यही सिखाता है कि सत्य के अनेक पक्ष होते हैं, और हर पक्ष अपनी जगह पूर्ण है। संस्था का सौंदर्य एकरूपता में नहीं, *विविधता के समन्वय* में है।
जैन ग्रंथों में रावण का उल्लेख शलाका पुरुषों की परंपरा में भी मिलता है, यह स्मरण कराता है कि हर व्यक्तित्व में अनंत संभावनाएँ छिपी होती हैं।
ये दस मुख समय के साथ बदलते भी हैं। युवावस्था में व्यक्ति सीखने और पहचान की खोज में जुड़ता है, मध्य आयु में दायित्व सँभालता है, और उत्तरार्ध में विरासत व सेवा की ओर बढ़ता है। जैन चिंतन इसे *"स्व" से "सर्व"* की यात्रा कहता है।
*संस्था कब लक्ष्य तक पहुँचती है, कब भटकती है*
रावण की कथा एक गहरा पाठ देती है: जब तक दस प्रतिभाएँ *एक साझा विवेक* से जुड़ी रहीं, वे महापंडित और कुशल शासक कहलाए। जिस क्षण एक मुख शेष नौ पर हावी हुआ, संतुलन बिगड़ गया। *शक्ति तभी तक शोभा देती है जब तक वह विवेक के अधीन रहे*, यह नियम हर संस्था पर समान रूप से लागू होता है।
*संस्था तब लक्ष्य तक पहुँचती है, जब* दसों आकांक्षाएँ एक साझा उद्देश्य के नीचे संतुलित रहती हैं, नेतृत्व उत्तरदायित्व के रूप में जिया जाता है, सम्मान कर्म का स्वाभाविक परिणाम बनता है, और हर सदस्य यह स्मरण रखता है कि वह *साधन* है, समाज-कल्याण *साध्य* है।
*चुनौती तब आती है, जब* कोई एक आकांक्षा शेष नौ से अधिक महत्व पा जाए, साधन अनजाने में साध्य जैसा प्रतीत होने लगे, या व्यक्तिगत दृष्टिकोण सामूहिक उद्देश्य पर भारी पड़ने लगे। यह किसी दुर्भावना से नहीं आता, यह मानव-स्वभाव की एक सहज सीमा है जिसके प्रति सजग रहना पड़ता है। रावण की कथा भी यही सिखाती है: दस उपलब्धियों के बीच भी सजगता की एक चूक संतुलन को डिगा सकती है।
*संतुलन बनाए रखने का मार्ग सरल है:* हर निर्णय से पहले पूछा जाए, *"यह कदम किस मुख को सशक्त कर रहा है, और क्या शेष नौ मुख इससे सहज हैं?"*
दस शीश तभी शोभा पाते हैं जब वे एक ही देह और एक ही संकल्प से जुड़े हों। संस्था के दस मुख भी तब पूर्ण होते हैं जब उनका गंतव्य एक हो: *समाज का उत्थान।*
हर सदस्य स्वयं से पूछे: *"मेरा मुख किस प्रतिभा का प्रतीक है, और क्या उसकी वाणी से किसी और का मार्ग भी उजला हो रहा है?"*
जिस दिन यह प्रश्न हर हृदय में गूँजेगा, उस दिन दस मुख एक स्वर में बोलेंगे, और संस्था बनेगी **एक जीवंत परिवार, एक साझा साधना, एक चलता-फिरता तीर्थ।**
- मानकचंद राठौड़