Bhartiya Jain Samaj

Bhartiya Jain Samaj page for social reform thinker. Highlighting issues faced by our community.

If any of my article or quote inspire you, please forward in your groups for social awareness and empowerment of jain community.

08/10/2026

*दिखावा या दूरदर्शिता? जैन समाज के लिए आईना*
बैंगलोर से मुंबई तक एक बेचैन करने वाली आवाज़ सुनाई दे रही है: *"जैनों का वैभव हमें चुभता है।"* इस आवाज़ को सिर्फ़ "दूसरों की नफ़रत" कहकर टाल देना आसान है। पर सच यह भी है कि जब करोड़ों की प्रतिष्ठाएँ, भव्य चौमासे, बैंड-बाजे और शोभायात्राएँ आम लोगों की रोज़ की तंगी के सामने खड़ी होती हैं, तो असंतोष जन्म लेता है।

*धर्म त्याग सिखाता है, तमाशा नहीं।* जिस समाज की पहचान अपरिग्रह और अहिंसा है, उसकी पहचान आज महँगे आयोजनों की होड़ से बनने लगी है। हर "ज़्यादा भव्य" आयोजन अगले को और भव्य बनने के लिए मजबूर करता है। इस होड़ की क़ीमत वह साधारण जैन परिवार चुकाता है जो चुपचाप चंदा भी देता है और डर भी झेलता है।

*हमें क्या करना होगा:*
- आयोजन श्रद्धा से हों, प्रदर्शन से नहीं
- बैंड-बाजे, जुलूस और शोर में पड़ोसियों की शांति का ध्यान रखें
- शादियों और उत्सवों में सादगी को सम्मान दें
- धर्म के नाम पर होने वाले ख़र्च का एक हिस्सा स्थानीय शिक्षा, स्वास्थ्य और ज़रूरतमंदों की सेवा में लगाएँ
- आसपास के समाज से दूरी नहीं, अपनापन बनाएँ

जब हमारा वैभव दूसरों की सेवा में दिखेगा, तब वह ईर्ष्या नहीं, सम्मान जगाएगा। *सादगी हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा है, और समय रहते चेत जाना सबसे बड़ी समझदारी।*

- मानकचंद राठौड़

08/10/2026
Established in 1981, Dhalop Chemicals Private Limited is a one-stop house of specialty chemicals, based in Mumbai. We ar...
06/10/2026

Established in 1981, Dhalop Chemicals Private Limited is a one-stop house of specialty chemicals, based in Mumbai. We are a Star Export House recognised by the Government of India, with offices in Mumbai and Dubai. With high-quality raw materials, cutting-edge technology, and four decades of technical expertise, we deliver cost-effective solutions to our customers.

*Our Products*

We specialise in Amines, Blends, Chlorinated Solvents, Glycol Ethers & Acetates, and Monomers, which are essential to textiles, paints and coatings, agrochemicals, pharmaceuticals, and adhesives. Our range includes Perchloroethylene, Propylene Glycol, Methyl Methacrylate, Nonyl Phenol, Isophorone Diamine, Butyl Cellosolve, and Methoxypropyl Acetate.

*Dhalop Blends*

Our proprietary blends offer cost-effective solutions that help customers save significantly, and they guarantee supply stability to avoid delays and interruptions. We also serve cleaning, oil field, resin, and water treatment industries.

*Our Philosophy*

Under the leadership of Founder & Chairman Manakchand Rathod, we have never looked at a customer as a transaction. Every relationship is built for the long term, and most of our clients are repeat buyers.

*Contact:* C-208/213, Morya House, Off New Link Road, Andheri (West), Mumbai 400053
Tel: +91 22 26744281/82/83/84 | Mobile/WhatsApp: +91 9820034078 | [email protected] | www.dhalop.com

05/10/2026

*मुखौटे के पीछे का चेहरा: जब अपना बनकर कोई नुकसान पहुँचाए*
खतरा अक्सर वहां नहीं होता जो चिल्लाए या आपकी कमियां बताए। असली नुकसान अक्सर उनसे होता है जो मुस्कुराकर मिलते हैं और खुद को हमारा सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं। गुस्सैल या टोकने वाले की नीयत सामने दिखती है, मुखौटे वाले की नीयत नुकसान के बाद।

*इन संकेतों को पहचानिए*

*1. मीठे शब्दों का जाल*
नया कारोबारी परिचित पहली ही मुलाक़ात में कहता है, "भाईसाहब, आप जैसा ईमानदार आदमी आज मिलना मुश्किल है। मैं आपके साथ पार्टनरशिप करना चाहता हूँ।" तीसरी मुलाक़ात में वही "बस थोड़ा निवेश" माँगता है। जिस तारीफ़ के पीछे माँग छिपी हो, वह भरोसा जीतने का औज़ार है।

*2. शब्दों से नहीं, व्यवहार से परखिए*
वह हर बार कहता है, "कोई भी ज़रूरत हो, आधी रात को फ़ोन कर देना।" पर जिस दिन आपके पिताजी अस्पताल में थे, उसका फ़ोन बंद था। वादे सस्ते होते हैं, साथ निभाना महँगा। उसके कहे को नहीं, उसके किए को गिनिए।

*3. धीरे-धीरे निर्भरता*
"तुम्हारे रिश्तेदार तुम्हें समझते ही नहीं।" "उस पुराने दोस्त से क्या मिलेगा, वह तो जलता है।" ऐसे वाक्य एक-एक करके आपके सहारे काटते हैं। जिस दिन आप अकेले पड़ जाएँ, उसकी पकड़ पूरी हो जाती है।

*4. नियंत्रण और छोटे-छोटे झूठ*
पहले "मैंने ऐसा कहा ही नहीं था।" फिर "तुम्हें गलतफ़हमी हुई है।" फिर "तुम्हारी याददाश्त ही कमज़ोर है।" अगर आप बार-बार सोचने लगें कि "शायद मेरी ही गलती है", तो रुककर देखिए कि गलती किसके व्यवहार में है।

*5. ख़ामोशी और ज़िम्मेदारी से बचना*
सौदा डूबा तो फ़ोन नहीं उठता, "व्यस्त था" का संदेश आता है। सौदा चला तो सबसे पहले मंच पर वही, "यह तो मेरी योजना थी।" ऐसे लोग श्रेय लेते हैं, जवाबदेही नहीं।

*6. आपकी दरियादिली का इस्तेमाल*
पहले बीमार माँ की कहानी, फिर "बस इस महीने की मदद", फिर हर महीने वही कहानी। आपकी अच्छाई उसके लिए सुविधा बन चुकी है। जो कभी लौटाने की बात ही न करे, उस पर ध्यान दीजिए।

*बचाव के सरल उपाय*

- भरोसा समय से बनने दीजिए। दो साल पुराना साथ और दो हफ़्ते पुराना साथ बराबर नहीं होते।
- जो "आज ही फ़ैसला कीजिए, कल मौका नहीं मिलेगा" कहे, वहीं रुक जाइए।
- भीतर की खटक को नज़रअंदाज़ न करें। अक्सर मन पहले समझ लेता है।
- पैसों के मामले में लिखा-पढ़ी रखिए। सच्चा इंसान इससे बुरा नहीं मानता।
- परिवार और पुराने मित्रों से जुड़े रहिए। बाहर से देखने वाला वह पकड़ लेता है, जो हम नहीं देख पाते।
- "ना" कहना बुरा व्यवहार नहीं है।

*एक ज़रूरी बात:* हर मीठा बोलने वाला धोखेबाज़ नहीं होता, और हर कड़वा बोलने वाला दुश्मन नहीं। संदेह नहीं, *सजगता* चाहिए। सच्चा हितैषी आपकी स्वतंत्रता, आपके रिश्तों और आपके विवेक का सम्मान करता है। जो इन्हें छीनने लगे, वह चाहे कितना भी अपना लगे, उससे सावधान रहिए।

*जागरूक रहिए, सजग रहिए।*
-मानकचंद राठौड़

03/10/2026

"नकारात्मकता का ठप्पा"
"गलत कार्य के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को व्यक्तिगत झगड़ा समझकर नकारात्मकता का ठप्पा लगा देना समाज की एक बड़ी कमज़ोरी है। यही बात नैतिक व्यक्ति को थका देती है। बदलाव तब आएगा जब हम इंसान की नीयत पर शक करना छोड़कर, गलत नीतियों पर सवाल उठाना सीखेंगे।"
- मानकचंद राठौड़

*गांधीजी पर राय बनाने से पहले: व्हाट्सएप फॉरवर्ड बनाम ऐतिहासिक तथ्य*गांधी जी से असहमत होना आपका हक़ है। पर क्या हमारी रा...
02/10/2026

*गांधीजी पर राय बनाने से पहले: व्हाट्सएप फॉरवर्ड बनाम ऐतिहासिक तथ्य*
गांधी जी से असहमत होना आपका हक़ है। पर क्या हमारी राय हमने स्वयं पढ़कर बनाई है, या सुनी-सुनाई बातों से?

*🤔 क्या उनकी अहिंसा कमज़ोरी थी?*
पूज्य बापू ने स्वयं लिखा कि कायरता और हिंसा में से चुनना हो, तो वे हिंसा चुनेंगे। उनकी अहिंसा डरपोक की ढाल नहीं, मार खाकर भी न झुकने वाले वीर का हथियार थी। जिस साम्राज्य का सूरज कभी नहीं डूबता था, उसे नमक की एक चुटकी से हिला दिया, दांडी के 240 मील पैदल चलकर।

*🤔 वे जन्मजात संत नहीं थे*
अदालत में बोलने से घबराने वाले एक शर्मीले वकील ने स्वयं को साधना से गढ़ा: आत्मचिंतन, सादा जीवन और अपनी भूलें सबके सामने स्वीकारने का साहस। गीता और जैन संत श्रीमद् राजचंद्र जी का गहरा प्रभाव था। जो अपनी भूलें स्वयं जगत के सामने रख दे, उससे अधिक ईमानदार कौन होगा?

*🤔 पाकिस्तान और दंगों पर जो कहा जाता है, उसमें सच कितना?*

- *"55 करोड़ दान में दिए":* यह दान नहीं था। विभाजन के समझौते में पाकिस्तान का हिस्सा 75 करोड़ तय हुआ था। 20 करोड़ पहले दिए जा चुके थे और बाकी 55 करोड़ कश्मीर हमले के बाद सरकार ने रोक दिए थे। बापू का तर्क था कि किया हुआ वादा निभाना देश की साख का सवाल है। उनका जनवरी 1948 का उपवास मुख्यतः दिल्ली में शांति के लिए था।
- *"विभाजन के ज़िम्मेदार गांधी":* इतिहास उलटा कहता है। वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। कांग्रेस कार्यसमिति ने उनके विरोध के बावजूद उसे स्वीकारा।
- *"सिर्फ़ एक समुदाय के हितैषी":* कोलकाता, नोआखाली और बिहार में उन्होंने दोनों समुदायों के बीच शांति के लिए काम किया। कोलकाता में हिंसा रुकी तो माउंटबेटन ने उन्हें "एक व्यक्ति की सेना" कहा।
- **स्वामी श्रद्धानंद की हत्या (1926):** बापू ने हत्या की निंदा की, स्वामी जी को बलिदानी कहा और माहौल की कटुता को भी ज़िम्मेदार माना। हत्यारे के लिए "भाई" शब्द पर समर्थक उनकी करुणा देखते हैं, जबकि आंबेडकर सहित कुछ आलोचक इसे अनुचित मानते हैं। दोनों मत इतिहास में दर्ज हैं।

सच यह भी है कि ख़िलाफ़त आंदोलन के समर्थन और हिंसा के दौर में अहिंसा की सलाह पर आंबेडकर और सावरकर जैसे नेताओं ने भी सवाल उठाए। ऐसी आलोचना इतिहास की जायज़ बहस है। पर अधूरे या गढ़े हुए दावे बहस नहीं, भ्रम फैलाते हैं।

*🤔 दुनिया ने उन्हें क्यों अपनाया?*
मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला ने उनसे प्रेरणा लेकर अपनी लड़ाई लड़ी। आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ मुश्किल से विश्वास करेंगी कि ऐसा महामानव हाड़-मांस में इस धरती पर चला था। जिन्हें दुनिया सिर आँखों पर रखे, उन्हें अपने ही घर में एक बार ठहरकर समझना तो बनता है।

*🤔 आज भी काम की कसौटी*
बापू का सूत्र था: जब उलझन हो, तो सबसे कमज़ोर व्यक्ति का चेहरा याद करो और पूछो, मेरा निर्णय उसके काम आएगा या नहीं?

गांधी जी को देवता मानना आवश्यक नहीं। पर WhatsApp के फ़ॉरवर्ड के बजाय मूल स्रोत पढ़ना आवश्यक है। फिर भी असहमत रहें, तो आपकी असहमति कम से कम मज़बूत और ईमानदार होगी।

**📚 पढ़ने के लिए:**
- *सत्य के प्रयोग* (गांधी जी की आत्मकथा)
- *महात्मा गांधी: द लास्ट फेज़* (प्यारेलाल)
- *संपूर्ण गांधी वाङ्मय* (Collected Works)

*2 अक्टूबर पर पूर्वाग्रह की जगह जिज्ञासा को दें।* 🙏

- मानकचंद राठौड़

*दस शीश, एक संकल्प**रावण की दस मुखी प्रतिभा और संस्था की दस आकांक्षाएँ*- मानकचंद राठौड़ परंपरा में रावण को महापंडित, शिव...
30/09/2026

*दस शीश, एक संकल्प*
*रावण की दस मुखी प्रतिभा और संस्था की दस आकांक्षाएँ*
- मानकचंद राठौड़

परंपरा में रावण को महापंडित, शिवभक्त, वीणावादक, कुशल शासक और अद्भुत विद्वान के रूप में भी स्मरण किया गया है। उनके *दस शीश* को अनेक विद्वान चार वेदों और छह शास्त्रों के ज्ञान का प्रतीक मानते हैं। यानी दस मुख, पर एक देह और एक व्यक्तित्व।

संस्था भी ऐसी ही एक देह है। उसके भीतर दस अलग आकांक्षाओं वाले सदस्य जुड़ते हैं, और हर आकांक्षा संस्था का एक "मुख" है। जब दसों मुख एक ही हृदय से जुड़ते हैं, तो संस्था दशानन जैसी सामर्थ्यवान हो जाती है।

*दस मुख, दस प्रतिभाएँ*

*1. दिशा देने की आकांक्षा - लंका के निर्माता का मुख।* रावण कुशल शासक और नगर-निर्माता माने गए हैं। दिशा देने वाला सदस्य भी बिखरे हाथों को एक ढाँचे में पिरोता है, संस्था की रीढ़ बनकर।

*2. दायित्व का बोध - तपस्वी का मुख।* रावण की तपस्या और संकल्प की दृढ़ता प्रसिद्ध है। कर्तव्यनिष्ठ सदस्य भी बिना अपेक्षा वर्षों तक निष्ठा से जुड़ा रहता है।

*3. सम्मान की आकांक्षा - महापंडित का मुख।* रावण की ख्याति उनकी विद्वत्ता की देन थी। सम्मान चाहने वाला सदस्य भी श्रेष्ठ कर्म से पहचान अर्जित करता है, जो दूसरों को प्रेरित करती है।

*4. विरासत की आकांक्षा - रचनाकार का मुख।* शिव तांडव स्तोत्र आज भी श्रद्धा से गाया जाता है। विरासत गढ़ने वाला सदस्य भी ऐसा कुछ रचना चाहता है जो उसके बाद भी बोलता रहे, कोई छात्रवृत्ति, कोई ट्रस्ट।

*5. समृद्धि की आकांक्षा - स्वर्ण-लंका का मुख।* समृद्धि चाहने वाला सदस्य यह स्वप्न लेकर आता है कि उसकी प्रगति अनेक के लिए अवसर बने।

*6. अपनेपन की आकांक्षा - कुटुंब-केंद्र का मुख।* अपनेपन की चाह रखने वाला सदस्य संस्था में वही कुटुंब खोजता है, जहाँ उसकी उपस्थिति मायने रखे।

*7. रिश्तों की आकांक्षा - संतान को गढ़ने वाले पिता का मुख।* माता-पिता इसी भावना से जुड़ते हैं कि संतान को सही संगति और सही जीवनसाथी मिले।

*8. सीखने की आकांक्षा - वेद-शास्त्रों के अध्येता का मुख।* सीखने की चाह वाला युवा संस्था को पाठशाला मानता है, जहाँ अनुभव उसे वह देता है जो किताबें नहीं दे सकतीं।

*9. संस्कार और धर्म से जुड़ाव - शिवभक्त का मुख।* संस्कार-प्रेमी सदस्य पर्व, तीर्थ और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का व्रत लेकर चलता है।

*10. सेवा की आकांक्षा - लोकहित के ज्ञान का मुख।* सेवा-साधक का कर्म चुपचाप पहुँचता है, किसी विद्यार्थी की फीस, किसी रोगी की दवा बनकर। *"परस्परोपग्रहो जीवानाम्"* का सूत्र वह जीता है।

*दस मुख, एक हृदय*

दशानन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता थी, दस प्रतिभाएँ, एक व्यक्तित्व। कोई सदस्य केवल एक मुख लेकर नहीं आता, एक ही व्यक्ति में कई आकांक्षाएँ साथ जल सकती हैं। जैन दर्शन का *अनेकांतवाद* यही सिखाता है कि सत्य के अनेक पक्ष होते हैं, और हर पक्ष अपनी जगह पूर्ण है। संस्था का सौंदर्य एकरूपता में नहीं, *विविधता के समन्वय* में है।

जैन ग्रंथों में रावण का उल्लेख शलाका पुरुषों की परंपरा में भी मिलता है, यह स्मरण कराता है कि हर व्यक्तित्व में अनंत संभावनाएँ छिपी होती हैं।

ये दस मुख समय के साथ बदलते भी हैं। युवावस्था में व्यक्ति सीखने और पहचान की खोज में जुड़ता है, मध्य आयु में दायित्व सँभालता है, और उत्तरार्ध में विरासत व सेवा की ओर बढ़ता है। जैन चिंतन इसे *"स्व" से "सर्व"* की यात्रा कहता है।

*संस्था कब लक्ष्य तक पहुँचती है, कब भटकती है*

रावण की कथा एक गहरा पाठ देती है: जब तक दस प्रतिभाएँ *एक साझा विवेक* से जुड़ी रहीं, वे महापंडित और कुशल शासक कहलाए। जिस क्षण एक मुख शेष नौ पर हावी हुआ, संतुलन बिगड़ गया। *शक्ति तभी तक शोभा देती है जब तक वह विवेक के अधीन रहे*, यह नियम हर संस्था पर समान रूप से लागू होता है।

*संस्था तब लक्ष्य तक पहुँचती है, जब* दसों आकांक्षाएँ एक साझा उद्देश्य के नीचे संतुलित रहती हैं, नेतृत्व उत्तरदायित्व के रूप में जिया जाता है, सम्मान कर्म का स्वाभाविक परिणाम बनता है, और हर सदस्य यह स्मरण रखता है कि वह *साधन* है, समाज-कल्याण *साध्य* है।

*चुनौती तब आती है, जब* कोई एक आकांक्षा शेष नौ से अधिक महत्व पा जाए, साधन अनजाने में साध्य जैसा प्रतीत होने लगे, या व्यक्तिगत दृष्टिकोण सामूहिक उद्देश्य पर भारी पड़ने लगे। यह किसी दुर्भावना से नहीं आता, यह मानव-स्वभाव की एक सहज सीमा है जिसके प्रति सजग रहना पड़ता है। रावण की कथा भी यही सिखाती है: दस उपलब्धियों के बीच भी सजगता की एक चूक संतुलन को डिगा सकती है।

*संतुलन बनाए रखने का मार्ग सरल है:* हर निर्णय से पहले पूछा जाए, *"यह कदम किस मुख को सशक्त कर रहा है, और क्या शेष नौ मुख इससे सहज हैं?"*

दस शीश तभी शोभा पाते हैं जब वे एक ही देह और एक ही संकल्प से जुड़े हों। संस्था के दस मुख भी तब पूर्ण होते हैं जब उनका गंतव्य एक हो: *समाज का उत्थान।*

हर सदस्य स्वयं से पूछे: *"मेरा मुख किस प्रतिभा का प्रतीक है, और क्या उसकी वाणी से किसी और का मार्ग भी उजला हो रहा है?"*

जिस दिन यह प्रश्न हर हृदय में गूँजेगा, उस दिन दस मुख एक स्वर में बोलेंगे, और संस्था बनेगी **एक जीवंत परिवार, एक साझा साधना, एक चलता-फिरता तीर्थ।**

- मानकचंद राठौड़

*कर्मनिष्ठा और विनम्रता के धनी श्री संजय डांगी जी को जीतो एपेक्स के चेयरमैन पद पर आसीन होने पर अभिनंदन!* 🙏🎉जीतो बोर्ड ऑफ...
27/09/2026

*कर्मनिष्ठा और विनम्रता के धनी श्री संजय डांगी जी को जीतो एपेक्स के चेयरमैन पद पर आसीन होने पर अभिनंदन!* 🙏🎉
जीतो बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा *श्री संजय डांगी जी* को जीतो एपेक्स का चेयरमैन सर्वसम्मति से चुना जाना संगठन के लिए एक गौरवशाली क्षण है। यह उनकी वर्षों की निष्काम सेवा, अटूट निष्ठा और संस्थागत विश्वसनीयता का सुंदर प्रतिफल है।

जीतो ऑडिट कमिटी में पारदर्शिता, JATF व श्रमण आरोग्यम में दानदाता-ट्रस्टी की भूमिका, हॉस्टल प्रोजेक्ट में उदार सहयोग और JEAP के माध्यम से युवाओं का मार्गदर्शन — उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की गवाही देता है। इस सफलता में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अल्पना डांगी जी का स्नेहपूर्ण प्रोत्साहन भी अतुलनीय है।

प्रचार से दूर केवल कर्म में विश्वास रखने वाले श्री डांगी जी का यह नेतृत्व जीतो को नई ऊंचाइयां देगा। जीतो को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के उनके संकल्प को सदा मेरा साथ बना रहेगा।

आइए, हम सब मिलकर उन्हें इस नई जिम्मेदारी हेतु हार्दिक शुभकामनाएं और पूर्ण सहयोग का वचन दें।

जय जिनेन्द्र! जय जीतो!

मानकचंद राठौड़

*JITO Members—Digital जुड़ाव को दिल के रिश्तों में बदलें*क्या हम सचमुच एक-दूसरे से जुड़े हैं, या सिर्फ फोन जुड़े हुए हैं...
26/09/2026

*JITO Members—Digital जुड़ाव को दिल के रिश्तों में बदलें*
क्या हम सचमुच एक-दूसरे से जुड़े हैं, या सिर्फ फोन जुड़े हुए हैं?

पहले मेरा दायरा परिवार-रिश्तेदारों तक सीमित था। JITO से जुड़ने के बाद यह विश्वव्यापी बन गया। लुधियाना से चेन्नई, अहमदाबाद से कोलकाता, यहाँ तक कि अमेरिका-लंदन-दुबई तक—हर जगह आत्मीयता वाला दोस्त, यह JITO की देन है।

एक बार बेटे का Visa Embassy में अटक गया, तुरंत दूसरे देश Travel करना था। विदेश में बैठे एक JITO मित्र के संपर्कों से बात घंटों में सुलझ गई। तब एहसास हुआ—यह सिर्फ Business Network नहीं, परिवार है।

भरोसा और सहयोग JITO की शक्ति है, पर रिश्ते सिर्फ Business तक क्यों सीमित रहें? *Business Network बड़ा हो रहा है, पर Personal Circle छोटा होता जा रहा है*—इसी दूरी को कम करना है।

किसी सदस्य को *बिना किसी काम के भी फोन कीजिए*—
*"कैसे हैं आप?" "परिवार कैसा है?" "कब मिल रहे हैं?"*

शायद व्यापार न मिले, *पर एक मित्र मिल जाए।*

*Digital जुड़ाव पहुँचाता है, बातचीत समझ देती है, आत्मीयता उसे सुनहरे संबंध में बदल देती है।*

इसलिए JITO में *Friendships और Family Connections* भी बनाएँ। *आज ही किसी सदस्य को फोन कीजिए—किसी काम से नहीं, सिर्फ रिश्ते के लिए।* चाहे बात Matrimony की हो, किसी सलाह की, या सिर्फ हालचाल पूछने की—मुझे भी बेझिझक फोन कीजिए। यही तो JITO का असली रिश्ता है।

याद करो कि JITO की वजह से कितनों से Business किया, साथ में यह भी कोशिश दिल में रखो कि कितनों से दिल से जुड़ पाए। 🙏

*- मानकचंद राठौड़*(मुंबई)

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Mumbai

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9820054078

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