न्याय प्रण्यास

न्याय प्रण्यास MISSION PAYBACK TO
SOCIETY
🇸🇨🇪🇺☸️🇪🇺🇸🇨
https://naaypranyas.blogspot.com/?m=1

कुछ भी अनन्त नहींइस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं कुछ भी अनन्त नहीं और कुछ भी सनातन नहीं. प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है. व...
01/10/2026

कुछ भी अनन्त नहीं

इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं कुछ भी अनन्त नहीं और कुछ भी सनातन नहीं. प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है. व्यक्तियों के लिए और समाज दोनों के लिए बदलाव जीवन का नियम है. इस परिवर्तनशील समाज में पुराने मूल्यों में निरन्तर परिवर्तन आना जरूरी है."

धम्म को सद्धम्म रूप प्राप्त होने के लिए मनुष्यों के बीच भेद करने वाले अवरोध तोड़ने चाहिए।1) आदर्श समाज कौन-सा? ब्राह्मणो...
01/10/2026

धम्म को सद्धम्म रूप प्राप्त होने के लिए मनुष्यों के बीच भेद करने वाले अवरोध तोड़ने चाहिए।

1) आदर्श समाज कौन-सा? ब्राह्मणों के मत में वेदों में ध्येयरूप समाज की व्याख्या है, और वेद स्वतःप्रमाण हैं; इसलिए वेदप्रणीत आदर्श समाज ही एकमात्र ऐसा समाज है जिसे मनुष्य को मान्य करना चाहिए।

2) वेदप्रणीत आदर्श समाज अर्थात चातुर्वर्ण्य।

3) वेदों के अनुसार ऐसे समाज को तीन शर्तें पालनी चाहिए।

4) पहली शर्त यह है कि उस समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चार वर्ण होने चाहिए।

5) इन वर्गों के पारस्परिक संबंध क्रमिक विषमता के सिद्धांत पर आधारित होने चाहिए, अर्थात ये सब समान नहीं होने चाहिए, बल्कि प्रतिष्ठा, अधिकार और विशेष हक्कों के अनुपात में एक-दूसरे पर इस प्रकार आधारित होने चाहिए।

6) ब्राह्मण सबके ऊपर, क्षत्रिय उनके नीचे परंतु वैश्यों के ऊपर, वैश्य क्षत्रियों के नीचे परंतु शूद्रों के ऊपर, और शूद्र सबके नीचे।

7) चातुर्वर्ण्य की दूसरी विशेषता यह है कि प्रत्येक वर्ग अपना विहित व्यवसाय ही करे। ब्राह्मणों का व्यवसाय—अध्ययन, अध्यापन और धार्मिक संस्कार करना; क्षत्रियों का—शस्त्र धारण करना और युद्ध करना; वैश्य का—व्यापार-व्यवसाय; शूद्रों का—ऊपर के तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना।

8) किसी भी एक वर्ण ने अपने व्यवसाय का उल्लंघन करके दूसरे के व्यवसाय पर आक्रमण नहीं करना चाहिए।

9) इस आदर्श समाज के सिद्धांत पर आग्रह करके ब्राह्मणों ने उसे लोगों को सिखाया।

10) इस सिद्धांत में विषमता है, यह स्पष्ट है। यह सामाजिक विषमता ऐतिहासिक विकास के कारण नहीं आई, बल्कि यह ब्राह्मण धर्म का शास्त्रसम्मत सिद्धांत है।

11) तथागत बुद्ध का इस सिद्धांत को आमूल विरोध था।

12) वे जाति-व्यवस्था के सर्वश्रेष्ठ विरोधक तथा समता के सबसे पहले और अत्यंत दृढ़ समर्थक थे।

13) जाति और विषमता से जुड़ा ऐसा कोई विचार नहीं है जिसका उन्होंने खंडन न किया हो।

14) इस मुद्दे पर ब्राह्मणों ने तथागत को बहुत चुनौती दी। परंतु बुद्ध ने उन सबको पूर्णतः चुप करा दिया।

15) अश्वलायन सूक्त में एक कथा आती है: एक बार ब्राह्मणों ने अपने में से अश्वलायन नामक पुरुष को बुद्ध के पास जाकर उनके जाति और विषमता संबंधी मत पर वाद-विवाद करने के लिए प्रेरित किया।

16) अश्वलायन तथागत बुद्ध के पास गया और उसने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता स्थापित करने वाला पक्ष प्रस्तुत किया।

17) वह बोला: “हे गौतम, ब्राह्मण ऐसा कहते हैं कि वे स्वयं सर्वश्रेष्ठ वर्ण हैं और शेष सब कृष्ण वर्ण के हैं। पवित्रता केवल ब्राह्मण में ही निवास करती है, अब्राह्मण में नहीं। केवल ब्राह्मण ही ब्रह्मा के औरस पुत्र हैं; वे उनके मुख से जन्मे हैं, वे उनसे उत्पन्न हुए हैं, उन्होंने उन्हें पैदा किया है और वे उनके वारिस हैं। इस पर हे गौतम, तुम्हारा क्या कहना है?”

18) तथागत बुद्ध के उत्तर से अश्वलायन बिलकुल स्तब्ध हो गया।

19) तथागत बुद्ध बोले: “अश्वलायन, क्या ब्राह्मणों की ब्राह्मणियाँ रजस्वला नहीं होतीं? क्या वे गर्भ धारण नहीं करतीं? क्या वे गर्भवती होकर ही संतान को जन्म नहीं देतीं? ऐसा होते हुए भी, अर्थात स्त्री से जन्म लेकर भी, तुम जो कुछ कहते हो, क्या सभी ब्राह्मण उसे सत्य मानते हैं?”

20) अश्वलायन निरुत्तर हो गया।

21) फिर तथागत ने अश्वलायन से दूसरा प्रश्न पूछा।

22) अश्वलायन, मान लो किसी क्षत्रिय ने ब्राह्मण स्त्री से संभोग किया, तो क्या जन्म लेगा? चौपाया प्राणी जन्म लेगा या मनुष्य प्राणी?

23) अश्वलायन ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

24) नैतिक विकास की संभावना के बारे में बात करें, तो क्या इस देश में केवल ब्राह्मण के अंतःकरण में ही द्वेष और दुरिच्छा से दूर रहने वाली प्रेमभावना उत्पन्न हो सकती है, या अन्य वर्णों के हृदय में भी वह उत्पन्न हो सकती है?

25) अश्वलायन बोला: “चारों वर्णों के अंतःकरण में प्रेमभावना उत्पन्न हो सकती है।”

26) तथागत बुद्ध ने पूछा: “अश्वलायन, योन और कंबोज तथा उनके निकटवर्ती देशों में स्वामी और दास—ये दो ही वर्ण हैं, और वहाँ स्वामी का दास तथा दास का स्वामी—ऐसा स्थित्यंतर हो सकता है, क्या तुमने यह सुना है?”

27) अश्वलायन ने उत्तर दिया।

28) यदि तुम्हारी चातुर्वर्ण्य ही आदर्श समाजरचना है, तो वह सभी देशों में क्यों नहीं पाई जाती?

29) इनमें से किसी भी मुद्दे पर अश्वलायन अपने जाति और विषमता संबंधी सिद्धांत का समर्थन नहीं कर सका। वह पूर्णतः निरुत्तर हो गया और अंत में उसने तथागत बुद्ध का अनुयायित्व स्वीकार कर लिया।

30) वसिष्ठ बोला: “तथागत, ब्राह्मण कहते हैं कि ब्राह्मण ही समाज में सबसे उच्च स्तर का है और शेष सभी वर्ण नीच स्तर के हैं। ब्राह्मण ही शुक्ल वर्ण हैं, अन्यों का वर्ण कृष्ण है। केवल ब्राह्मण ही शुद्ध वंश के हैं, अब्राह्मण शुद्ध वंश के नहीं हैं। केवल ब्राह्मण ही ब्रह्मा के सच्चे औरस पुत्र हैं; वे उनके मुख से जन्मे हैं, वे उनसे उत्पन्न हुए हैं, उन्होंने उन्हें पैदा किया है, वे उनके वारिस-पुत्र हैं।”

33) “और तुम तो अपने अभिजात वर्ग का त्याग करके उन नीच वर्ग के शिरमुंड भिक्षुओं के, उन असंस्कृत श्रीमंतों के, उन कृष्णवर्ण ब्राह्मणों के पैरों से जमे हुए लोगों की संतान में सम्मिलित हो गए हो। यह अच्छा नहीं है। यह उचित नहीं है कि तुम अपना अभिजात वर्ग छोड़कर उन नीच शिरमुंड, गँवार और हमारे पूर्वजों के पैरों से निर्मित लोगों में सम्मिलित हो गए हो।”

34) “तथागत, इन शब्दों से वे ब्राह्मण मुझे दोष देते हैं, मुझे खूब बेधड़क गालियाँ देते हैं।”

35) इस पर बुद्ध बोले: “वसिष्ठ, वास्तव में ब्राह्मण जब ऐसा बोलते हैं, तब वे अपनी प्राचीन परंपरा भूल गए प्रतीत होते हैं। अन्य वर्गों की स्त्रियों की तरह ब्राह्मण स्त्रियाँ भी गर्भवती होती हैं, प्रसव करती हैं, अपने शिशुओं का पालन-पोषण करती हैं। फिर भी ये गर्भजात ब्राह्मण स्वयं को ब्रह्मा के मुख से जन्मी सच्ची संतान, उनसे उत्पन्न, उनके द्वारा पैदा किए गए, उनके सच्चे वारिस-पुत्र बताते हैं। इससे वे ब्रह्मा की निंदा ही करते हैं।”

कृतज्ञता की सीमाएंहमारे लिए जो बहुत जरूरी काम है वह हैं उस सावधानी का पालन करना जिसका जान स्टूयार्ट मिल ने संकेत दिया है...
01/10/2026

कृतज्ञता की सीमाएं

हमारे लिए जो बहुत जरूरी काम है वह हैं उस सावधानी का पालन करना जिसका जान स्टूयार्ट मिल ने संकेत दिया है कि "हमें अपनी विशेष सुविधाओं को किसी महान पुरुष के कदमों में न रख देना चाहिए और न ही उसे इतनी शक्ति व अधिकार सौंप देने चाहिए जिसकी सहायता से वह हमारे सब संस्थानों को ही पांव तले रौंद दें."

किसी महान् पुरुष के प्रति अभारी होने में कोई बुराई नहीं जिन्होंने आजीवन देश की सेवा की हो लेकिन कृतज्ञता की सीमाएं हैं.

योग्यता से जीओअपने स्वाभिमान को खो कर जीवित रहना अपमानजनक है. जीवन में स्वाभिमान अति आवश्यक वस्तु है. इसके बगैर मनुष्य श...
30/09/2026

योग्यता से जीओ

अपने स्वाभिमान को खो कर जीवित रहना अपमानजनक है. जीवन में स्वाभिमान अति आवश्यक वस्तु है. इसके बगैर मनुष्य शून्य है. सम्मान के साथ योग्यता से जीवित रहने के लिए मनुष्य को तकलीफ़ों पर से गुजरना पड़ता है. कठोर और निरन्तर संघर्ष से ही मनुष्य को शक्ति, विश्वास और मान्यता उपलब्ध हो सकती है.

मनुष्य नश्वर है. हर एक ने एक न एक दिन मरना है लेकिन मनुष्य को आत्म सम्मान के उत्तम आदर्शों को प्रफुल्लित करने और मानवीय जीवन को सुशोभित करने हेतु समर्पित करने का संकल्प करना होगा. हम दास नहीं हैं, हम सैनिक वंश से हैं. किसी वीर पुरुष के लिए स्वाभिमान के बिना जीवन जीने से अधिक लज्जाजनक बात नहीं.

 #धम्म_जब_प्रज्ञा_और_शील_के_अतिरिक्त_करुणा_की_आवश्यकता प्रतिपादित करता है, तभी वह सद्धम्म रूप होता है।1) बुद्ध धम्म का अ...
30/09/2026

#धम्म_जब_प्रज्ञा_और_शील_के_अतिरिक्त_करुणा_की_आवश्यकता प्रतिपादित करता है, तभी वह सद्धम्म रूप होता है।

1) बुद्ध धम्म का अधिष्ठान क्या है? इस संबंध में कुछ मतभेद हैं।

2) प्रज्ञा ही बुद्ध धम्म का अधिष्ठान है या करुणा ही बुद्ध धम्म का अधिष्ठान है?

3) इस विवाद के कारण बुद्धयान में दो शाखाएँ निर्मित हुईं। एक शाखा कहती है—प्रज्ञा ही बुद्ध धम्म का अधिष्ठान है; दूसरी शाखा कहती है—करुणा ही बुद्ध धम्म का अधिष्ठान है।

4) ये दोनों शाखाएँ अब भी एक-दूसरे से विभक्त हैं।

5) बुद्ध के शब्दों की कसौटी इन दोनों शाखाओं पर लगाई जाए, तो दोनों शाखाएँ गलत प्रतीत होती हैं।

6) प्रज्ञा बुद्ध धम्म का एक आधारस्तंभ है—इसमें मतभेद नहीं है।

7) विवाद यह है कि क्या करुणा बुद्ध धम्म का आधारस्तंभ है?

8) करुणा बुद्ध धम्म का आधारस्तंभ है।

9) इसका समर्थन बुद्धवचन से ही किया जा सकता है।

10) पूर्व गांधार नामक देश में एक भयानक रोग से पीड़ित एक बुद्ध भिक्षु था। वह जहाँ-जहाँ उठता-बैठता, वह स्थान मलिन हो जाता।

11) वह गांधार देश के एक विहार में रहता था। कोई भी उसके पास नहीं जाता था और न ही संकट में उसकी सहायता करता था।

12) एक बार तथागत अपने अनुयायियों सहित वहाँ गए और आवश्यक पत्ते, बर्तन तथा गरम पानी लेकर उस वृद्ध भिक्षु के पड़े होने के स्थान पर सभी भिक्षुओं सहित पहुँचे।

13) उस स्थान से इतनी दुर्गंध आ रही थी कि उन सभी भिक्षुओं को उस मनुष्य के प्रति घृणा होने लगी। परंतु तथागत ने शुक्रदेव को गरम पानी डालने को कहकर अपने स्वयं के हाथों से उस भिक्षु का शरीर धोने और उसके रोग का उपचार करने का प्रारंभ किया।

14) ऐसा कहा जाता है कि तब भूकंप हुआ और वह स्थान एक दिव्य प्रकाश से इतना भर गया कि राजा, उसके प्रधान, देव और नाग लोग वहाँ शीघ्र दौड़कर आए और तथागत की पूजा करने लगे।

15) तथागत को संबोधित कर उन्होंने पूछा—"इतने महान उदात्त महापुरुष ने ऐसा घृणित काम क्यों किया?" इस पर तथागत ने अपनी कृति का स्पष्टीकरण दिया।

16) तथागत को संबोधित कर उन्होंने कहा—तथागत असहाय और अनाथों के मित्र हैं। शारीरिक व्याधियों से पीड़ित हैं, चाहे वे श्रमण हों अथवा अन्य कोई भी हों, उनकी सेवा करने के लिए, जो दरिद्री, अरक्षित और वृद्ध हैं उनकी सहायता करने के लिए, और दूसरों को अपने जैसा बनने की प्रेरणा देने के लिए तथागत का जन्म है।

संविधानिक तरीकेजब आर्थिक तथा सामाजिक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए संविधानिक तरीका न रह गया हो तो अपने इन उद्देश्यों को ह...
30/09/2026

संविधानिक तरीके

जब आर्थिक तथा सामाजिक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए संविधानिक तरीका न रह गया हो तो अपने इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए असंविधानिक तरीकों का कुछ औचित्य है लेकिन जहां संविधानिक तरीकों का रास्ता खुला हो असंविधानिक तरीकों के लिए कोई औचित्य नहीं है. ये तरीके अराजकता की व्याकरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं.

ऐतिहासिक परिवर्तनों के कारणऐतिहासिक परिवर्तनों के कारणों के बारे में तीन अलग-अलग दृष्टिकोण हैं. हमारे पास इतिहास पर आगस्...
29/09/2026

ऐतिहासिक परिवर्तनों के कारण

ऐतिहासिक परिवर्तनों के कारणों के बारे में तीन अलग-अलग दृष्टिकोण हैं. हमारे पास इतिहास पर आगस्टाइन का सिद्धांत है जिसके अनुसार इतिहास केवल दैवी योजना का प्रकट होना है जिसमें मानव जाति का युद्ध और पीड़ा में से गुजरना जारी रहता है जब तक कि वह दैवी परियोजना प्रलय आने तक सम्पन्न नहीं हो जाती. एक बकल का दृष्टिकोण है जिसका विश्वास था कि इतिहास भूगोल और भौतिक विज्ञान से बनता है. कार्ल मार्क्स ने तीसरा दृष्टिकोण व्यक्त किया है. उनके विचार में इतिहास आर्थिक शक्ति का परिणाम है. इन तीनों में से कोई भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं कि इतिहास महान् पुरुष की जीवनी होता है. वस्तुतः वे इस बात से ही इन्कार करते हैं कि इतिहास बनाने में मनुष्य का कोई स्थान है. अध्यात्मवादियों के सिवाय और कोई भी इतिहास के आगस्टाइन के सिद्धांत को ठीक नहीं मानता. जहां तक बकल और मार्क्स का संबंध है उनके विचारों में कुछ सच्चाई हो सकती है लेकिन वे पूर्ण सच्चाई को नहीं दर्शाते. उनका यह दावा करना कि अवैयक्तिक शक्तियां ही सब कुछ हैं और इतिहास बनाने में मनुष्य का कोई हाथ नहीं, बिल्कुल गल्त हैं. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि अवैयक्तिक शक्तियां निर्धारिक कारण हैं लेकिन अवैयक्तिक शक्तियों का प्रभाव भी मनुष्य पर निर्भर करता है इससे इन्कार करना भी मुश्किल है. चकमक पत्थर हर जगह नहीं होता लेकिन जहां यह होता है तो आग पैदा करने के लिए पत्थर को पत्थर से टकराने के लिए मनुष्य की ही आवश्यकता होती है. बीज हर जगह नहीं होते लेकिन जहां वे होते हैं तो इन्हें मजेदार (आनन्ददायक) और पौष्टिक लेप बनाने के लिए बारीक पीसने में मनुष्य की ही आवश्यकता होती है जिससे कृषि का आधार स्थगित किया जा सकता है. ऐसे बहुत से स्थान हैं जहां धातुएं नहीं होती लेकिन जहां ये होती हैं उनसे औज्तार और मशीन (यंत्र) बनाने के लिए मनुष्य की ही ज़रूरत पड़ती है जो सभ्यता और संस्कृति का आधार है."

महान पुरुष किसे कहा जा सकता है ?महापुरुष कौन ? महान् पुरुष किस को कहा जा सकता है ? यदि सैनिक वीरों, जैसे सिकन्दर, अत्तिल...
29/09/2026

महान पुरुष किसे कहा जा सकता है ?

महापुरुष कौन ? महान् पुरुष किस को कहा जा सकता है ? यदि सैनिक वीरों, जैसे सिकन्दर, अत्तिला, सीजर और तैमूरलंग के विषय में कहा जाए, तो उत्तर देना कठिन न होगा. सैनिक पुरुष बड़े-बड़े कारनामें करते हैं और बहुत से परिवर्तन कर डालते हैं. वे अपने समकालीन व्यक्तियों को अपनी भव्य विजयों से पराभूत कर देते हैं. वे महान् पुकारे जाने की प्रतीक्षा किए बिना ही महान् हो जाते हैं. जिस प्रकार मृगों का मृगराज सिंह होता है उसी प्रकार वे मनुष्यों में महान पुरुष बन जाते हैं. परन्तु यह भी समान रूपेण सत्य है कि मानव इतिहास के निर्माण में उनका योग बहुत ही सूक्ष्म होता है. उनकी विजय काल-कवलित हो जाती है, यहां तक कि नेपोलियन जैसे महान् सैनिक ने भी अपनी इतनी विजयों के पश्चात् फ्रांस को उससे भी छोटा छोड़ा जैसा उसने प्राप्त किया था. यदि थोड़े फासले से देखा जाए तो वे बड़े ही सामयिक दिखाई पड़ते हैं, यदि आवश्यक हुआ भी तो, संसार चक्र की घटनाओं में वे उस समाज के अन्दर, जिसमें वे रहते हैं, अपनी स्थायी छाप नहीं छोड़ते, उनके जीवन-कार्य और आचार के विस्तृत वर्णन रुचिकार तो हो सकते हैं, किन्तु वे समाज को प्रभावित नहीं करते और सम्पूर्ण समाज के स्वभाव को बदलने में सक्षण नहीं होते.

ईमानदारी एक महान् पुरुष की कसौटी होनी चाहिए. सत्यनिष्ठा एक महान् पुरुष की कसौटी अवश्य होनी चाहिए. क्लीमेन्श्यू ने एक बार कहा था कि सर्वाधिक राजनीतिक दुष्चित होते हैं, राजनीतिक वस्तुतः महान् हो, ऐसी बात नहीं है; घौर प्रकट रूप से जिन व्यक्तियों के विषय में उसने यह धारणा बनाई, वे अवश्य ही ऐसे व्यक्ति होंगे जिनमें सत्यनिष्ठा का अभाव होगा तो कोई व्यक्ति इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकता कि सत्यनिष्ठा ही प्रारम्भिक और प्रमुख कसौटी है क्योंकि सत्यनिष्ठा ही पर्याप्त नहीं है. एक महान् पुरुष में सत्यनिष्ठा का होना आवश्यक है क्योंकि यह उन सभी गुणों का सार है, जिनसे मनुष्य महान् कहलाता है. परन्तु एक मनुष्य को महान् बनाने के लिए उसके पास मात्र सत्यनिष्ठा के अतिरिक्त कुछ और भी होना आवश्यक है. एक मनुष्य सत्यनिष्ट होते हुए भी मूर्ख हो सकता है और एक मूर्ख एक महापुरुष के गुणों से नित्तान्त विपरीत होता है. वह मनुष्य महान् है क्योंकि वह आपत्ति-काल में समाज की सुरक्षा का मार्ग बनाता है. परन्तु वह क्या वस्तु है जो उसे मार्ग प्राप्त कराती है ? वह केवल प्रज्ञा के बल पर ही मार्ग प्राप्त कर सकता है. प्रज्ञा प्रकाश है. इसके अतिरिक्त और कोई गुण लाभदायक नहीं हो सकता. अतः यह बिल्कुल स्पष्ट है कि प्रज्ञा और सत्यनिष्ठा के समन्वय के अभाव में कोई मनुष्य महान् नहीं बन सकता. क्या एक महापुरुष के निर्माण के लिए यही समन्वय पर्याप्त है ? इस स्थिति में, जैसा मैं समझता हूं, हमें एक प्रतिष्ठित व्यक्ति और एक महापुरुष में विभेद करना चाहिए क्योंकि मेरा विश्वास है कि एक महान् पुरुष एक प्रतिष्ठित व्यक्ति से बहुत भिन्न होता है. सत्यनिष्ठा और प्रज्ञा एक व्यक्ति को अपने सभी साथियों में प्रतिष्ठित व्यक्ति बनाने के लिए पर्याप्त है परन्तु वे उसे एक महापुरुष के स्तर तक उठाने में पर्याप्त नहीं है. एक महापुरुष के अन्दर एक प्रतिष्ठित व्यक्ति से कुछ अधिक विशेषताएं होनी चाहिएं. वह विशेषताः क्या होनी चाहिए ? यहां पर महापुरुष संबंधी दार्शनिकों की परिभाषा का महत्त्व दिखाई देता है.

महापुरुष को सामाजिक उद्देश्य की गतिशीलता से प्रेरित होना चाहिए और उसे समाज को गंदगी से स्वच्छ बनाने के लिए एक भंगी की तरह और उसे सिधाने के लिए एक चाबुक की भांति काम करना चाहिए. ये वे गुण हैं जो एक प्रतिष्ठित व्यक्ति और एक महापुरुष के अन्तर को स्पष्ट करते हैं और यही वह कारण हैं जो एक महापुरुष को सम्मान और श्रद्धा का अधिकारी बनाते हैं.

*भगवान बुद्ध की माता महामाया को ही हिन्दू धर्म की लक्ष्मी देवी बनाया गया है*================                    एड आर एस...
29/09/2026

*भगवान बुद्ध की माता महामाया को ही हिन्दू धर्म की लक्ष्मी देवी बनाया गया है*
================
एड आर एस वर्मा

भगवान बुद्ध की माता *महामाया* का संबंध बौद्ध परंपरा में बुद्ध के जन्म और उनके गर्भाधान की कथा से है। प्राचीन बौद्ध कला में महामाया से जुड़े दृश्यों का विशेष महत्व रहा है।
*भरहुत स्तूप* की कला इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। भरहुत की रेलिंगों पर बुद्ध के जीवन से संबंधित अनेक प्रसंगों को प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया है। महामाया के स्वप्न से संबंधित दृश्य में *हाथी* का विशेष महत्व है—बौद्ध परंपरा के अनुसार महामाया ने स्वप्न में एक श्वेत हाथी को अपने गर्भ में प्रवेश करते देखा था। भरहुत में एक दूसरी महत्वपूर्ण देवी-प्रतिमा भी मिलती है— *गजलक्ष्मी*
गजलक्ष्मी के रूप में महामाया को कमल पर बैठी दिखाया जाता है और दोनों ओर से हाथियों द्वारा जलाभिषेक किया जाता है। भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत से संबंधित प्रकाशित सामग्री में भरहुत की गजलक्ष्मी प्रतिमाओं को *श्री-लक्ष्मी* से जोड़ा गया है; *कमल* और *हाथी* उनके प्रमुख प्रतीकों के रूप में बताए गए हैं।

*एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रश्न उठता है*

यदि भरहुत जैसे प्रारंभिक बौद्ध स्मारक में महामाया से संबंधित हाथी-प्रतीक और दूसरी ओर गजलक्ष्मी के रूप में कमल तथा हाथियों का संयोजन दिखाई देता है, तो क्या इन देवी-परंपराओं के बीच कोई सांस्कृतिक या प्रतीकात्मक संबंध रहा होगा,

महामाया और गजलक्ष्मी के रूपों में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं
*कमल,हाथी,जलाभिषेक*
उर्वरता और समृद्धि से जुड़े प्रतीक,स्त्री-दैवी शक्ति का चित्रण
भारतीय धार्मिक इतिहास में देवी-प्रतीकों का विकास अलग-अलग परंपराओं में नहीं हुआ। स्थानीय *देवी-पूजा*, बौद्ध परंपराएँ, और लोकविश्वास कई क्षेत्रों में एक-दूसरे के संपर्क में रहे हैं,इसलिए *महामाया* और *महालक्ष्मी* के बीच समानताओं को एक शोध-योग्य ऐतिहासिक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है,

*इतिहास को देखने का यही तरीका है*

पहले प्रतिमा को पहचानिए।
फिर उसका पुरातात्विक संदर्भ देखिए।फिर उसका शिलालेख और साहित्यिक संदर्भ देखिए।
फिर उसके प्रतीकों की तुलना कीजिए।और अंत में ही दो देवी-रूपों के बीच ऐतिहासिक संबंध का निष्कर्ष निकालिए।
इस दृष्टि से *भरहुत* की कला हमें स्पष्ट रूप से दिखाती है कि प्राचीन भारत में *कमल*, *हाथी* और देवी-समृद्धि जैसे प्रतीकों की एक अत्यंत पुरानी और जटिल परंपरा थी,

 #धम्म_करुणा_से_भी_अधिक_मैत्री_के_महत्व_का_प्रतिपादन_करता_है, तब सद्धम्मरूप को प्राप्त होता हैपोस्ट 1311) तथागत बुद्ध के...
29/09/2026

#धम्म_करुणा_से_भी_अधिक_मैत्री_के_महत्व_का_प्रतिपादन_करता_है, तब सद्धम्मरूप को प्राप्त होता है

पोस्ट 131

1) तथागत बुद्ध केवल करुणा सिखाकर रुके नहीं

2) करुणा का अर्थ है प्राणिमात्र के प्रति दया। तथागत बुद्ध ने इससे आगे जाकर मैत्री सिखाई—"मैत्री का अर्थ है समस्त जीव-जातियों के प्रति प्रेम"

3) केवल करुणा तक पहुँचकर न रुकते हुए आगे बढ़कर समस्त जीव-जातियों पर प्रेम किया जाना चाहिए—यह बुद्ध की शिक्षा थी

4) श्रावस्ती में रहते हुए एक सूत्र में तथागत बुद्ध ने इसे अच्छी प्रकार स्पष्ट किया

5) मैत्री के संबंध में बोलते हुए तथागत बुद्ध भिक्षुओं से कहा

6) मान लो, कोई मनुष्य एक कुआँ खोद रहा है—क्या भूमि इससे क्रोधित होती है?

7) नहीं, तथागत, नहीं—वे भिक्षु बोले

8) मान लो, कोई मनुष्य लाख और रंग लेकर हवा में चित्र बनाने लगा—क्या तुम्हें लगता है कि वह चित्र बना सकेगा?

9) नहीं, तथागत

10) क्यों नहीं? भिक्षुओं ने कहा—"क्योंकि हवा में ऐसे काले फलक नहीं होते जिन पर रंग भरा जा सके"

11) उसी प्रकार तुम्हारे मन में भी काले कल्मष नहीं होने चाहिए, क्योंकि कल्मष दुर्विचारों के ही प्रतिबिंब होते हैं

12) मान लो, कोई मनुष्य हाथ में जलती मशाल लेकर गंगा को आग लगाने चला—तो क्या वह उसे आग लगा सकेगा?

13) नहीं, नहीं, तथागत

14) क्यों नहीं? क्योंकि गंगा के जल में ज्वालाग्राहीपन नहीं है

15) अपना प्रवचन समाप्त करते हुए तथागत ने कहा—"जैसे भूमि को चोट लगी हो ऐसा प्रतीत नहीं होता और वह क्रोधित नहीं होती; जैसे हवा अपने ऊपर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं होने देती; और जैसे अग्नि से विचलित न होकर गंगाजल की तरह बहती रहती है—उसी प्रकार, भिक्षुओ, तुम दूसरों द्वारा किए गए अपमान और अन्याय को सहन करके उनके साथ मैत्री से ही व्यवहार करते रहना चाहिए

16) भिक्षुओ, मैत्री निरंतर और अप्रतिहत रूप से बहती रहनी चाहिए। अपने मन को पृथ्वी के समान दृढ़, हवा के समान निर्मल और गंगा के समान गंभीर रखना तुम्हारा पवित्र कर्तव्य है। यदि तुम ऐसा करोगे तो कितनी भी दुःसह बात घटित हो जाए, तुम सहसा विचलित नहीं होगे, क्योंकि जो कोई उपद्रव करते हैं, वे अंततः थक जाते हैं

17) तुम्हारी मैत्री का परिसर विश्व के समान असीम हो; तुम्हारे विचार भव्य और अपार हों, और उनमें द्वेष का लवलेश भी न हो

18) मेरे धम्म के अनुसार केवल करुणा से व्यवहार करना पर्याप्त नहीं है; उसमें मैत्री से व्यवहार करना आवश्यक है

19) इस प्रवचन में तथागत ने भिक्षुओं को एक कथा सुनाई, जो संस्मरणीय है

20) पूर्व में एक बार श्रावस्ती नगर में विदेशिका नाम की एक कुलीन स्त्री रहती थी। वह सभ्यता, विनम्रता और सौम्यता इन गुणों के लिए प्रसिद्ध थी। उसकी एक दासी थी, जिसका नाम काली था—बहुत चतुर, सुबह जल्दी उठने वाली और कामसू ऐसी लड़की थी वह। काली ने अपने मन में बहुत सोचा—मेरी स्वामिनी की ख्याति है कि उन्हें क्रोध आता ही नहीं, या वे उसे प्रकट नहीं करतीं, या कदाचित मैं अपना काम इतने अच्छे ढंग से करती हूँ इसलिए उनका क्रोध अप्रकट रहता होगा। मैं उन्हें कसौटी पर परखकर देखती हूँ

21) इसलिए वह दूसरे दिन देर से उठी। स्वामिनी ने उसे आवाज़ देकर पूछा—"तुम इतनी देर से क्यों उठी?" दासी ने कहा—"उसमें क्या है, बाईसाहब?" क्रोधित और चिढ़कर वह स्वामिनी मन ही मन कहने लगी—"उसमें कुछ नहीं है क्या? धूर्त कहीं की!"

22) दासी ने सोचा—"क्रोध रूपी विकार उसमें है, पर वह दिखाती नहीं; बस इसीलिए कि मैं अपना काम अच्छी तरह करती हूँ, वह क्रोधित नहीं होती। मैं और उसकी परीक्षा लूँगी," इसलिए वह दूसरे दिन और अधिक देर से उठी। स्वामिनी ने पूछा—"तुम देर से क्यों उठी?" दासी ने उत्तर दिया—"उसमें क्या है?" अपना क्रोध और चिढ़ शब्दों में व्यक्त करते हुए स्वामिनी ने कहा—"ऐसा! उसमें कुछ नहीं है क्या? धूर्त कहीं की!"

23) "अच्छा तो!" उस दासी ने सोचा—"क्रोध रूपी विकार उसमें है, पर मैं अपना काम ठीक करती हूँ, इसलिए वह दिखाती नहीं। मैं और कितनी उसकी परीक्षा लूँगी," इसलिए वह दूसरे दिन देर से ही उठी। स्वामिनी ने उसे आवाज़ देकर पूछा—"इतनी देर से क्यों उठी?" दासी ने उत्तर दिया—"उसमें क्या है?"

24) "ऐसा तो! इतनी देर से उठना माने कुछ भी नहीं क्या? धूर्त लड़की!" ऐसे उद्गार निकालकर स्वामिनी ने चिढ़कर क्रोध में एक मूसल उठाया और खून आ जाए इतने ज़ोर से उसे उसके सिर पर दे मारा।

25) गिर पड़कर खून से लथपथ हुए अपने सिर को पकड़कर काली ने चीखें मारकर सब पड़ोसियों को इकट्ठा किया और चिल्लाने लगी—"देखो बाई, मेरी स्वामिनी कितनी विनम्र है, सौम्य है! मेरी स्वामिनी ने यह सब किसलिए किया? क्योंकि उसकी इकलौती दासी देर से उठी, इसलिए वह इतनी क्रोधित और चिढ़ी हुई थी कि हाथ में मूसल लेकर मुझ पर झपटी और उसने मेरा सिर फोड़ दिया।"

26) इसका परिणाम यह हुआ कि विदेशिका कोई विनम्र और सौम्य स्त्री नहीं, बल्कि अत्यंत चिड़चिड़े स्वभाव की है—उसके विषय में यह निश्चय हो गया।

27) इसी प्रकार, जब तक चिढ़/क्रोध लाने वाली कोई बात नहीं कही जाती, तब तक भिक्षु का सौम्य, सभ्य और विनम्र होना संभव है; जब उनसे चिढ़ाने वाले शब्द कहे जाते हैं, तभी इस बात की खात्री होती है कि उनमें मैत्री अर्थात बंधुभाव है या नहीं।

28) यह बात कहकर तथागत ने कहा—"यदि भिक्षुओं ने केवल वस्त्र और अन्न पाने के लिए मैत्रीभाव व्यक्त किया, तो मैं यह नहीं मानता कि उनमें मैत्रीभाव है। जिनकी मैत्री भावना धम्म-सिद्धांतों से उत्पन्न होती है, उसी को मैं सच्चा भिक्षु मानता हूँ।"

29) पुण्यार्जन के लिए किए गए कार्य मैत्री के एक सोलहवें अंश के भी मोल के नहीं हैं। मैत्री का अर्थ है चित्त की स्वतंत्रता। वह अपने में सभी पुण्य कार्यों को समाविष्ट कर लेती है; वह चमकती है, प्रकाशित होती है, प्रज्वलित होती है।

30) भिक्षुओ, सभी तारों का वह तेज चंद्रप्रभा के एक सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं होता। चंद्रप्रभा उन सब तेज को अपने में समाविष्ट करके स्वयं चमकती और प्रज्वलित होती है। उसी प्रकार पुण्यार्जन के लिए किए गए कार्य मैत्री के एक सोलहवें अंश के भी मोल के नहीं हैं। मैत्री का अर्थ है अंतःकरण की स्वतंत्रता; वह सभी पुण्यकृत्यों को अपने में समाविष्ट करके चमकती, प्रकाशित होती और प्रज्वलित होती है।

31) उसी प्रकार, भिक्षुओ! जैसे वर्षा-ऋतु के अंत में सूर्य स्वच्छ, निरभ्र आकाश में उगकर सारे कल्मष नष्ट कर देता है और स्वयं चमकता, प्रकाशित होता और प्रज्वलित होता है। ठीक उसी प्रकार पुण्यार्जन के लिए लगाए गए सभी साधन मैत्री के एक सोलहवें अंश के बराबर भी मोल के नहीं हैं। मैत्री का अर्थ है अंतःकरण की स्वतंत्रता। वह सभी पुण्यकृत्यों को अपने में समाविष्ट करके चमकती, प्रकाशित होती और प्रज्वलित होती है।




Address

Mumbai

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when न्याय प्रण्यास posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share