29/09/2026
#धम्म_करुणा_से_भी_अधिक_मैत्री_के_महत्व_का_प्रतिपादन_करता_है, तब सद्धम्मरूप को प्राप्त होता है
पोस्ट 131
1) तथागत बुद्ध केवल करुणा सिखाकर रुके नहीं
2) करुणा का अर्थ है प्राणिमात्र के प्रति दया। तथागत बुद्ध ने इससे आगे जाकर मैत्री सिखाई—"मैत्री का अर्थ है समस्त जीव-जातियों के प्रति प्रेम"
3) केवल करुणा तक पहुँचकर न रुकते हुए आगे बढ़कर समस्त जीव-जातियों पर प्रेम किया जाना चाहिए—यह बुद्ध की शिक्षा थी
4) श्रावस्ती में रहते हुए एक सूत्र में तथागत बुद्ध ने इसे अच्छी प्रकार स्पष्ट किया
5) मैत्री के संबंध में बोलते हुए तथागत बुद्ध भिक्षुओं से कहा
6) मान लो, कोई मनुष्य एक कुआँ खोद रहा है—क्या भूमि इससे क्रोधित होती है?
7) नहीं, तथागत, नहीं—वे भिक्षु बोले
8) मान लो, कोई मनुष्य लाख और रंग लेकर हवा में चित्र बनाने लगा—क्या तुम्हें लगता है कि वह चित्र बना सकेगा?
9) नहीं, तथागत
10) क्यों नहीं? भिक्षुओं ने कहा—"क्योंकि हवा में ऐसे काले फलक नहीं होते जिन पर रंग भरा जा सके"
11) उसी प्रकार तुम्हारे मन में भी काले कल्मष नहीं होने चाहिए, क्योंकि कल्मष दुर्विचारों के ही प्रतिबिंब होते हैं
12) मान लो, कोई मनुष्य हाथ में जलती मशाल लेकर गंगा को आग लगाने चला—तो क्या वह उसे आग लगा सकेगा?
13) नहीं, नहीं, तथागत
14) क्यों नहीं? क्योंकि गंगा के जल में ज्वालाग्राहीपन नहीं है
15) अपना प्रवचन समाप्त करते हुए तथागत ने कहा—"जैसे भूमि को चोट लगी हो ऐसा प्रतीत नहीं होता और वह क्रोधित नहीं होती; जैसे हवा अपने ऊपर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं होने देती; और जैसे अग्नि से विचलित न होकर गंगाजल की तरह बहती रहती है—उसी प्रकार, भिक्षुओ, तुम दूसरों द्वारा किए गए अपमान और अन्याय को सहन करके उनके साथ मैत्री से ही व्यवहार करते रहना चाहिए
16) भिक्षुओ, मैत्री निरंतर और अप्रतिहत रूप से बहती रहनी चाहिए। अपने मन को पृथ्वी के समान दृढ़, हवा के समान निर्मल और गंगा के समान गंभीर रखना तुम्हारा पवित्र कर्तव्य है। यदि तुम ऐसा करोगे तो कितनी भी दुःसह बात घटित हो जाए, तुम सहसा विचलित नहीं होगे, क्योंकि जो कोई उपद्रव करते हैं, वे अंततः थक जाते हैं
17) तुम्हारी मैत्री का परिसर विश्व के समान असीम हो; तुम्हारे विचार भव्य और अपार हों, और उनमें द्वेष का लवलेश भी न हो
18) मेरे धम्म के अनुसार केवल करुणा से व्यवहार करना पर्याप्त नहीं है; उसमें मैत्री से व्यवहार करना आवश्यक है
19) इस प्रवचन में तथागत ने भिक्षुओं को एक कथा सुनाई, जो संस्मरणीय है
20) पूर्व में एक बार श्रावस्ती नगर में विदेशिका नाम की एक कुलीन स्त्री रहती थी। वह सभ्यता, विनम्रता और सौम्यता इन गुणों के लिए प्रसिद्ध थी। उसकी एक दासी थी, जिसका नाम काली था—बहुत चतुर, सुबह जल्दी उठने वाली और कामसू ऐसी लड़की थी वह। काली ने अपने मन में बहुत सोचा—मेरी स्वामिनी की ख्याति है कि उन्हें क्रोध आता ही नहीं, या वे उसे प्रकट नहीं करतीं, या कदाचित मैं अपना काम इतने अच्छे ढंग से करती हूँ इसलिए उनका क्रोध अप्रकट रहता होगा। मैं उन्हें कसौटी पर परखकर देखती हूँ
21) इसलिए वह दूसरे दिन देर से उठी। स्वामिनी ने उसे आवाज़ देकर पूछा—"तुम इतनी देर से क्यों उठी?" दासी ने कहा—"उसमें क्या है, बाईसाहब?" क्रोधित और चिढ़कर वह स्वामिनी मन ही मन कहने लगी—"उसमें कुछ नहीं है क्या? धूर्त कहीं की!"
22) दासी ने सोचा—"क्रोध रूपी विकार उसमें है, पर वह दिखाती नहीं; बस इसीलिए कि मैं अपना काम अच्छी तरह करती हूँ, वह क्रोधित नहीं होती। मैं और उसकी परीक्षा लूँगी," इसलिए वह दूसरे दिन और अधिक देर से उठी। स्वामिनी ने पूछा—"तुम देर से क्यों उठी?" दासी ने उत्तर दिया—"उसमें क्या है?" अपना क्रोध और चिढ़ शब्दों में व्यक्त करते हुए स्वामिनी ने कहा—"ऐसा! उसमें कुछ नहीं है क्या? धूर्त कहीं की!"
23) "अच्छा तो!" उस दासी ने सोचा—"क्रोध रूपी विकार उसमें है, पर मैं अपना काम ठीक करती हूँ, इसलिए वह दिखाती नहीं। मैं और कितनी उसकी परीक्षा लूँगी," इसलिए वह दूसरे दिन देर से ही उठी। स्वामिनी ने उसे आवाज़ देकर पूछा—"इतनी देर से क्यों उठी?" दासी ने उत्तर दिया—"उसमें क्या है?"
24) "ऐसा तो! इतनी देर से उठना माने कुछ भी नहीं क्या? धूर्त लड़की!" ऐसे उद्गार निकालकर स्वामिनी ने चिढ़कर क्रोध में एक मूसल उठाया और खून आ जाए इतने ज़ोर से उसे उसके सिर पर दे मारा।
25) गिर पड़कर खून से लथपथ हुए अपने सिर को पकड़कर काली ने चीखें मारकर सब पड़ोसियों को इकट्ठा किया और चिल्लाने लगी—"देखो बाई, मेरी स्वामिनी कितनी विनम्र है, सौम्य है! मेरी स्वामिनी ने यह सब किसलिए किया? क्योंकि उसकी इकलौती दासी देर से उठी, इसलिए वह इतनी क्रोधित और चिढ़ी हुई थी कि हाथ में मूसल लेकर मुझ पर झपटी और उसने मेरा सिर फोड़ दिया।"
26) इसका परिणाम यह हुआ कि विदेशिका कोई विनम्र और सौम्य स्त्री नहीं, बल्कि अत्यंत चिड़चिड़े स्वभाव की है—उसके विषय में यह निश्चय हो गया।
27) इसी प्रकार, जब तक चिढ़/क्रोध लाने वाली कोई बात नहीं कही जाती, तब तक भिक्षु का सौम्य, सभ्य और विनम्र होना संभव है; जब उनसे चिढ़ाने वाले शब्द कहे जाते हैं, तभी इस बात की खात्री होती है कि उनमें मैत्री अर्थात बंधुभाव है या नहीं।
28) यह बात कहकर तथागत ने कहा—"यदि भिक्षुओं ने केवल वस्त्र और अन्न पाने के लिए मैत्रीभाव व्यक्त किया, तो मैं यह नहीं मानता कि उनमें मैत्रीभाव है। जिनकी मैत्री भावना धम्म-सिद्धांतों से उत्पन्न होती है, उसी को मैं सच्चा भिक्षु मानता हूँ।"
29) पुण्यार्जन के लिए किए गए कार्य मैत्री के एक सोलहवें अंश के भी मोल के नहीं हैं। मैत्री का अर्थ है चित्त की स्वतंत्रता। वह अपने में सभी पुण्य कार्यों को समाविष्ट कर लेती है; वह चमकती है, प्रकाशित होती है, प्रज्वलित होती है।
30) भिक्षुओ, सभी तारों का वह तेज चंद्रप्रभा के एक सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं होता। चंद्रप्रभा उन सब तेज को अपने में समाविष्ट करके स्वयं चमकती और प्रज्वलित होती है। उसी प्रकार पुण्यार्जन के लिए किए गए कार्य मैत्री के एक सोलहवें अंश के भी मोल के नहीं हैं। मैत्री का अर्थ है अंतःकरण की स्वतंत्रता; वह सभी पुण्यकृत्यों को अपने में समाविष्ट करके चमकती, प्रकाशित होती और प्रज्वलित होती है।
31) उसी प्रकार, भिक्षुओ! जैसे वर्षा-ऋतु के अंत में सूर्य स्वच्छ, निरभ्र आकाश में उगकर सारे कल्मष नष्ट कर देता है और स्वयं चमकता, प्रकाशित होता और प्रज्वलित होता है। ठीक उसी प्रकार पुण्यार्जन के लिए लगाए गए सभी साधन मैत्री के एक सोलहवें अंश के बराबर भी मोल के नहीं हैं। मैत्री का अर्थ है अंतःकरण की स्वतंत्रता। वह सभी पुण्यकृत्यों को अपने में समाविष्ट करके चमकती, प्रकाशित होती और प्रज्वलित होती है।