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28/07/2026

आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) का बौद्ध धम्म में महत्व

आषाढ़ पूर्णिमा (आसाढ़ पूर्णिमा) अर्थात गुरु पूर्णिमा। इस पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में अनन्यसाधारण महत्व है।

आषाढ़ पूर्णिमा के ही दिन महामाता महामाया का गर्भधारण हुआ था, इसी दिन सिद्धार्थ गौतम ने गृहत्याग किया था, इसी दिन सारनाथ में भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र का उपदेश दिया था तथा उन पंचवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान गौतम बुद्ध को गुरु के रूप में स्वीकार किया था। इसी कारण से यह दिन #गुरु_पूर्णिमा के नाम से जाना जाने लगा। इसी दिन भिक्षु-संघ की स्थापना हुई थी, इसी दिन रात्रि में यशस नामक एक धनी व्यापारी के पुत्र को भगवान गौतम बुद्ध ने दीक्षा दी थी, और उसे खोजते हुए आए उसके पिता तथा उनके संपूर्ण परिवार ने भगवान बुद्ध से सर्वप्रथम तीन शरणों के साथ #उपासक_दीक्षा ग्रहण की थी।

बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि।

इसी दिन #वर्षावास का प्रारंभ हुआ था। ईसा पूर्व अर्थात भगवान बुद्ध के काल से ही वर्षावास प्रारंभ हैं। भगवान बुद्ध ने अपना पहला वर्षावास ई.पू. 527 में ऋषिपतन (सारनाथ) में व्यतीत किया था तथा ई.पू. 483 में अपना अंतिम 45वाँ वर्षावास किया। उन्होंने स्वयं श्रावस्ती, जेतवन, वैशाली, राजगृह आदि विहारों में वर्षावास किए। इस प्रकार भगवान बुद्ध ने सद्धर्म का प्रचार करके मानवता को धर्मपथ के राजमार्ग पर आरूढ़ किया। वर्षावास का संबंध भगवान गौतम बुद्ध के जीवन की अनेक स्मरणीय घटनाओं से जुड़ा हुआ है।

#आषाढ़_पूर्णिमा से वर्षावास आरंभ होता है और अश्विन पूर्णिमा को संपन्न होता है। बौद्ध धर्म में वर्षावास का अनन्यसाधारण महत्व है। अतः इस पूर्णिमा का अत्यधिक महत्व है, इसलिए सभी भगवान बुद्ध के अनुयायियों को इस वर्षावास काल में विशिष्ट धार्मिक उपक्रम संचालित करने चाहिए।

बौद्ध भिक्षुओं की हत्या  और बौद्ध विहारों को नष्ट करने वाला 'पुष्यमित्र शुंग' नहीं 'मिहिरकुल' था            एड आर एस वर्...
23/07/2026

बौद्ध भिक्षुओं की हत्या और बौद्ध विहारों को नष्ट करने वाला 'पुष्यमित्र शुंग' नहीं 'मिहिरकुल' था
एड आर एस वर्मा

मुगलों के पूर्व भारत में विदेशी आक्रमण होते रहे हैं पांचवीं शताब्दी में हूणों का बहुत जबरदस्त आक्रमण हुआ था, उन्होंने लगभग पूरे भारतवर्ष में शासन स्थापित कर लिया था किंतु मगध के राजा *बालादित्य* को पराजित नहीं कर पाए थे, हूण राजा *मिहिरकुल* बहुत ही क्रूर था,जिसका वर्णन *ह्वेनसांग* ने अपने यात्रा विवरण में किया है कि उसने भारत में बौद्ध धर्म को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया था, एक बार मिहिरकुल ने बौद्ध धर्म को जानने के लिए योग्य किसी बौद्ध भिक्षु को बुलाया किंतु एक साधारण बौद्ध भिक्षु को उसके पास भेज दिया गया, जिससे वह नाराज हो गया और बौद्ध भिक्षुओं और बौद्ध विहारों को नष्ट करने लगा, उसने लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दिया जिससे उत्तर भारत में बौद्ध भिक्षुओं का नामोनिशान मिट गया

छठी शताब्दी की शुरुआत में जब उत्तर-पश्चिम भारत और गांधार क्षेत्र पर खूंखार *हूण* आक्रमणकारियों का कब्जा था, तब चीन के उत्तरी *वेई राजवंश* की महारानी ने बौद्ध ग्रंथों की खोज के लिए भिक्षु *सोंग युन* को भारत भेजा था। उनकी यह यात्रा केवल ज्ञान की खोज नहीं, बल्कि साक्षात मौत से आँखें मिलाने जैसा साहसिक कारनामा था।

*क्रूरतम हूण शासक मिहिरकुल का आतंक*—उस समय गांधार और पंजाब के क्षेत्र पर हूण राजा मिहिरकुल का शासन था। इतिहासकार मिहिरकुल को "भारत का अटिला" कहते हैं, जो बौद्ध विहारों को नष्ट करने, भिक्षुओं पर अत्याचार करने और अत्यधिक क्रूरता के लिए कुख्यात था। कोई भी सामान्य व्यक्ति उसके राज्य की सीमा में कदम रखने से भी थर-थर कांपता था।

*मिहिरकुल के दरबार में सोंग युन का क्रांतिकारी हस्तक्षेप*—सोंग युन जब गांधार पहुँचे, तो उन्हें बंदी बनाकर राजा *मिहिरकुल* के सामने पेश किया गया। मिहिरकुल विदेशी भिक्षुओं को पसंद नहीं करता था और उसने सोंग युन को डराने और उनका उपहास उड़ाने का प्रयास किया।लेकिन सोंग युन ने अद्भुत क्रांतिकारी साहस का परिचय दिया। उन्होंने राजा की तलवार और उसकी क्रूरता से डरे बिना, भरे दरबार में मिहिरकुल की हिंसक नीतियों की तीखी आलोचना की। सोंग युन ने राजा को सीधे शब्दों में चेतावनी दी कि *जो शासक निर्दोषों का खून बहाता है और धम्म के मार्ग को नष्ट करता है, उसका साम्राज्य और वंश बहुत जल्द मिट्टी में मिल जाता है*

एक बौद्ध भिक्षु की यह निडरता और आत्मबल देखकर क्रूर तानाशाह मिहिरकुल हक्का-बक्का रह गया। सोंग युन के आध्यात्मिक प्रभाव और दृढ़ता के कारण वह उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सका और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करना पड़ा।

*१७० पवित्र बौद्ध ग्रंथों का संकलन*—इस जानलेवा माहौल और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, सोंग युन पीछे नहीं हटे। उन्होंने *गांधार, स्वात घाटी* और *कुरुक्षेत्र* के क्षेत्रों का भ्रमण किया। उन्होंने न केवल मौर्यकालीन और कुषाणकालीन स्थापत्य कला के अवशेषों को अपनी डायरी में दर्ज किया, बल्कि 170 से अधिक दुर्लभ और प्रामाणिक *महायान बौद्ध* ग्रंथों का संकलन किया और उन्हें सुरक्षित रूप से चीन पहुँचाया।

*सत्यता और तथ्यपरक साक्ष्य*—इस अद्भुत घटना की प्रामाणिकता पूरी तरह अकाट्य है:'लुओयांग के बौद्ध विहारों का इतिहास' इस समकालीन चीनी ऐतिहासिक दस्तावेज में सोंग युन की पूरी यात्रा, मिहिरकुल के साथ उनके संवाद और उनके द्वारा लाए गए ग्रंथों का आधिकारिक विवरण सुरक्षित है।

*समुद्रगुप्त और यशोधर्मन के शिलालेख*: भारतीय इतिहास के पुरातात्विक साक्ष्य भी तस्दीक करते हैं कि उस काल में मिहिरकुल का आतंक चरम पर था, जिससे यह साबित होता है कि सोंग युन ने कितने खतरनाक समय में यह साहसिक यात्रा पूरी की थी।

*निष्कर्ष*---भिक्षु सोंग युन का यह कारनामा सिद्ध करता है कि प्राचीन धम्म यात्री केवल शांतिप्रिय अध्येता ही नहीं थे, बल्कि वे अद्वितीय इच्छाशक्ति से ओतप्रोत ऐसे 'क्रांतिकारी पथिक' थे जो सत्य और ज्ञान की रक्षा के लिए क्रूर से क्रूर तानाशाहों की आंखों में आंखें डालकर बात करने का हौसला रखते थे।

संदर्भ:-
पुस्तक:- बुद्ध की तलाश में चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग की भारत यात्रा
लेखक :-व्हेनसॉन्ग
पेज क्रमांक :-140 से 144 तक

*जगन्नाथ रथयात्रा बुद्धिस्ट पर्व है, जिसे हिंदू पर्व में परिवर्तित किया गया है*=========================               ए...
21/07/2026

*जगन्नाथ रथयात्रा बुद्धिस्ट पर्व है, जिसे हिंदू पर्व में परिवर्तित किया गया है*
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एड आर एस वर्मा

भगवान बुद्ध के 64 नामों में से *जगन्नाथ* भी एक नाम है
भारत में प्रतिवर्ष जुलाई महीने में पर्व के रूप में रथयात्रा का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है,भारत में जो सबसे अधिक प्रचलित रथ यात्रा है वह उड़ीसा ( पुरी) की *जगन्नाथ* रथ यात्रा है, पौराणिक कहानी के अनुसार श्री कृष्णा ( जगन्नाथ) अपने भाई बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर जाते हैं, कुछ दिन वहां पर ठहरने के बाद वापस मथुरा लौट जाते हैं

*सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग का रथयात्रा का आंखों देखा वर्णन*

*व्हेनसॉन्ग* भारत में 629 ईस्वी में आया था और 16 वर्षों तक भारत भ्रमण किया इसी बीच 6 वर्षों तक *नालंदा विश्वविद्यालय* में रहकर अध्ययन भी किया था, जिस समय वह आया भारत में बुद्धिस्ट राजा *हर्षवर्धन* का शासन था, कुछ समय तक अतिथि के रूप में वह हर्षवर्धन के राज दरबार में भी रहा था, व्हेनसॉन्ग ने रथयात्रा का आंखों देखा वर्णन किया है, जिसमें शानदार रथों को खींचे जाने का विवरण है, जुलाई माह में पूरे भारत में यह रथयात्रा निकाली जाती थी, किंतु उडीसा की पुरी रथ यात्रा का विशेष महत्व था, पुरी की रथ यात्रा की प्रेरणा प्राचीन *बुद्धिस्ट* रथयात्रा से ली गई है, जगन्नाथ जो कि बुद्ध का ही एक नाम है, रथ यात्रा का जो भव्य स्वरूप आज आयोजन देखते हैं, वह व्हेनसॉन्ग और फाहियांन के समय से चली आ रही है उस समय पूरे भारत में रथयात्रा निकलती थी किंतु प्रयागराज की बुद्धिस्ट राजा *हर्षवर्धन* की रथ यात्रा का विशेष महत्व था

हर्षवर्धन एक विशाल रथ में 100 फीट ऊंचा स्तूप बनवाता था और बीच में 5 फीट ऊंची *बुद्ध* की सोने की मूर्ति होती थी, मूर्ति के बगल में राजा स्वयं *इन्द्र* का वेष धारण कर खड़ा होता था, मूर्ति के दूसरी ओर राजा का पुत्र *ब्रह्मा* का वेष धारण करके और हाथों में श्वेत चमर लिए हुए खड़ा होता था, राजा के रथ के पीछे 100 बड़े-बड़े रथ जिनमें वाद्ययंत्र का गगन व्यापी निनाद हो रहा था, रास्ते के दोनों और भारी संख्या में जनता खड़ी थी, राजा दोनों हाथों से सोने चांदी के आभूषण लुटाता हुआ चल रहा था, वेदी पर पहुंचकर मूर्ति को सुगंधित जल से स्नान कराकर कंधे पर उठाकर मूर्ति को पश्चिमी बुर्ज में ले गया, जहां पर रेशमी वस्त्रों और बहुमूल्य रत्न आभूषणों से मूर्ति को सजाया गया,
यह कार्यक्रम लगातार 15 दिनों तक चलता रहता था

*वर्तमान की रथयात्रा बुद्धिस्ट रथयात्रा की नकल है*

प्राचीन काल में बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के अवशेषों या प्रतीकों को रथों में रखकर भ्रमण कराने की परंपरा रही है, जगन्नाथ मंदिर में कोई भेदभाव नहीं होता था, सभी एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण करते थे, यह बौद्ध धर्म की जाति विहीन और समतावादी सोच से प्रेरित है, आज की रथयात्रा जगन्नाथ बलभद्र सुभद्रा की मूर्तियां असल में बौद्ध धर्म के त्रिरत्न *बुद्ध, धम्म संघ* का प्रतीक है

संदर्भ:-
पुस्तक:- बुद्ध की तलाश में चीनी बौद्ध यात्री व्हेनसॉन्ग की भारत यात्रा
लेखक:- व्हेनसॉन्ग
पेज क्रमांक :-176 से 179

*सम्राट अशोक के इतिहास को कब, किसने, कहाँ, और कैसे, ढूंढा?* =================                     एड आर एस वर्मा     दक्...
21/07/2026

*सम्राट अशोक के इतिहास को कब, किसने, कहाँ, और कैसे, ढूंढा?*
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एड आर एस वर्मा
दक्षिण भारत की हाल ही में सोने की खदान की कहानी पर एक मूवी बनी *केजीएफ* (कोलार गोल्ड फील्ड) जहां से पिछले सैकड़ो वर्षों से सोना निकाला जाता रहा है,

1915 में कर्नाटक की *हट्टी कोल माइंस* में अंग्रेजों ने एक इंजीनियर *सी बीडेन* को भेजा, खदान के सर्वे के दौरान सी बीडेन को एक बड़ा सा पत्थर मिला, जिसमें कुछ लिखा हुआ था, उस लिखावट को समझने के लिए सी वीडेन ने भारत में पोस्टेड जर्मनी के पुरातत्व अधिकारी *यूजेन जूनियस* से संपर्क किया, यूजेन जीनियस ने उस पत्थर की लिखावट का अध्ययन किया और 1925 में एक वॉल्यूम प्रकाशित किया, जिसमें यह खोज भी शामिल थी, उन्होंने अपने आलेख में लिखा कि पत्थर में *देवनामपिय अशोकस* लिखा पाया गया है, इससे यह साबित हुआ की 2200 वर्ष पहले भारत के किसी अशोक नाम के प्रतापी राजा का उल्लेख है ,

इस पत्थर में लिखे अभिलेख ने पूरी तरह भारतीय इतिहास को बदल दिया, 1915 ईसवी के पूर्व *जेम्स प्रिंसेप* को 1836 ईसवी में दिल्ली के *फिरोजशाह तुगलक* के किले में लगे हुए अशोक स्तंभ की *पाली भाषा* की लिखावट में सिर्फ *देवनामपिय* शब्द का उल्लेख मिला था, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि देवनामपिय का संबोधन किसके लिए किया गया था, अथवा किसी अशोक के लिए ही हुआ था, किंतु कोलार फील्ड में मिले शिलालेख से साबित हो गया की देवनामपिय का संबोधन *अशोक* के लिए ही हुआ था,

इस खोज ने भारत के 2200 साल पुराने इतिहास से पर्दा उठा दिया, फिरोज शाह तुगलक के किले में लगे हुए अशोक स्तंभ को पिछले 500 वर्षों से भारत के विद्वान समझे जाने वाले ब्राह्मण, *भीम की गदा*, उसमें लिखी *पाली भाषा* को संस्कृत भाषा, और उसकी इबारत को *पांडवों* की वनवास की कहानी बताते रहे हैं,

इस नए रहस्योद्घाटन ने पिछले 500 वर्षों से पड़े हुए झूठ के पर्दे को उठा दिया

*चीनी यात्री फाहियान ने खोतान ( चीन) की जगन्नाथ  (भगवान बुद्ध) की रथ यात्रा का विस्तृत वर्णन किया है, इस प्रान्त को अशोक...
20/07/2026

*चीनी यात्री फाहियान ने खोतान ( चीन) की जगन्नाथ (भगवान बुद्ध) की रथ यात्रा का विस्तृत वर्णन किया है, इस प्रान्त को अशोक के पुत्र ने बसाया था*

पाकिस्तान की सीमा से लगे चीन के खोतान प्रांत को सम्राट अशोक ने बसाया था खोतान मध्य एशिया में चीन के शिनजियांग प्रांत के दक्षिण पश्चिमी भाग में तारिम द्रोणी और कुनलुन पर्वतों के उत्तर में स्थित एक शहर है, प्राचीन काल में रेशम मार्ग का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था, इस प्राचीन राज्य के स्थापना में *सम्राट अशोक* के पुत्र द्वारा मानी जाती है,इतिहास अक्सर उन रहस्यों को अपने भीतर समेटे होता है, जो हमारी वर्तमान संकीर्ण सांस्कृतिक सीमाओं को तोड़कर एक वृहद्, सार्वभौमिक सत्य से हमारा परिचय कराते हैं। चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री *फाहियान* द्वारा ईसा की पांचवीं सदी में दर्ज किया गया एक ऐतिहासिक वृत्तांत इसका जीवंत प्रमाण है।

फाहियान ने मध्य एशिया के सिल्क रूट पर स्थित महान बौद्ध राज्य खोतान मे एक ऐसी भव्य रथयात्रा का आँखों देखा विवरण लिखा, जो सीधे तौर पर भारत की प्रसिद्ध *जगन्नाथ रथयात्रा* की याद दिलाती है।

*​फाहियान का आँखों देखा वृत्तांत* खोतान की भव्य रथयात्रा—​फाहियान जब अपने भारत प्रवास और बौद्ध ग्रंथों की खोज के दौरान खोतान साम्राज्य पहुँचा, तो वह वहाँ की बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा और सांस्कृतिक समृद्धि को देखकर चकित रह गया। अपने यात्रा वृत्तांत *रिकॉर्ड ऑफ बुद्धिस्ट किंगडम्स* में उसने लिखा:- खोतान में आषाढ़ (जून-जुलाई) के महीने में एक अत्यंत भव्य रथयात्रा का आयोजन किया जाता था। इस उत्सव के लिए एक विशाल, चार पहियों वाला और कई मंजिला रथ तैयार किया जाता था, जिसे बांसों और बहुमूल्य वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता था। इस रथ के केंद्र में भगवान बुद्ध की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती थी और बोधिसत्वों की मूर्तियां उनके अगल-बगल विराजमान होती थीं।,​सबसे क्रांतिकारी और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि फाहियान ने यह विशेष रूप से रेखांकित किया कि रथयात्रा शुरू होने से पहले, खोतान के राजा स्वयं अपने राजसी मुकुट और वस्त्रों को त्यागकर एक सामान्य सेवक की भांति आते थे और रथ के आगे के मार्ग को सोने की झाड़ू से साफ करते थे

​यह हूबहू वही परंपरा है जिसे आज भी पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा में *छेरा पंहरा* कहा जाता है, जहाँ पुरी के गजपति राजा सोने की झाड़ू से महाप्रभु के रथ के आगे मुख्य मार्ग की सफाई करते हैं।

*बुद्ध और ​जगन्नाथ* *एक वैचारिक एकात्मता*— इतिहासकारों (जैसे डॉ. आर. एल. मित्र, कनिंघम और डॉ. हरेकृष्ण महताब) और सांस्कृतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग इस बात को मानता है कि *जगन्नाथ* संस्कृति का उद्भव और विकास बौद्ध परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। ओडिशा के प्राचीन साहित्य (जैसे जयदेव का गीत गोविंद और अच्युतानंद दास की रचनाएं) में महाप्रभु बुद्ध जगन्नाथ को स्वयं (नौवां अवतार) माना गया है।

​इस ऐतिहासिक तथ्य के पीछे कई ठोस तर्क हैं: ​जातिगत अभेद और महाप्रसाद: जहाँ एक ओर नई पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था का प्रभाव दिखाई देता है, वहीं बौद्ध धर्म के बुद्ध जगन्नाथ धाम में *कोई जातिभेद* नहीं है। यहाँ बुद्ध संघ की तरह सभी समान हैं और महाप्रसाद को हर वर्ग के लोग एक साथ ग्रहण करते हैं।

*​त्रिमूर्ति का रहस्य*: *जगन्नाथ*, *बलभद्र* और *सुभद्रा* की मूर्तियों की बनावट पारंपरिक हिंदू देवी-देवताओं से भिन्न है। विद्वानों के अनुसार ये बौद्ध परंपरा के त्रिरत्न *बुद्ध, धम्म संघ* का प्रतीक रूप हैं।

*​अस्थि अवशेष की परंपरा*: पुरी में हर साल रथ यात्रा के समय मूर्तियों को बदल जाता है पुरानी मूर्तियों की जगह पर नई मूर्तियां लकड़ी की बनाई जाती हैं, तो पुरानी मूर्ति से एक रहस्यमयी ' *ब्रह्म पदार्थ*' निकालकर नई मूर्ति में डाला जाता है इतिहासकारों का मानना है कि यह परंपरा बौद्ध स्तूपों में बुद्ध के धातु-अवशेष रखने की प्रथा से प्रेरित हो सकती है, जिसे कलिंग (ओडिशा) से *दंत धातु* के रूप में श्रीलंका ले जाए जाने से पहले पुरी क्षेत्र में ही सुरक्षित किया जाता है

खोतान का यह बौद्ध साम्राज्य कभी भारतीय संस्कृति, *गांधार कला* और महायान बौद्ध धर्म का एक बहुत बड़ा केंद्र था। फाहियान का यह विवरण यह सिद्ध करता है कि: खोतान में यह उत्सव आषाढ़ मास में ही होता था, जो कि आज भी पुरी में *जगन्नाथ* रथयात्रा का नियत समय है

चाहे उसे खोतान में *बुद्ध की रथयात्रा* कहा गया हो या पुरी में *जगन्नाथ की रथयात्रा*—दोनों का मूल संदेश एक ही था: ईश्वर का अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर आम जनमानस, शोषितों और पीड़ितों के बीच जाना और राजा का प्रजा के समकक्ष आकर सेवक बन जाना।

*भारत को विश्व गुरु का दर्जा यूं ही नहीं मिला है, इसके पीछे नालंदा विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा के कई केंद्र रहे हैं, जहाँ ...
20/07/2026

*भारत को विश्व गुरु का दर्जा यूं ही नहीं मिला है, इसके पीछे नालंदा विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा के कई केंद्र रहे हैं, जहाँ पर विश्व भर के विद्यार्थी अध्ययन करने के लिए आते थे*


नालंदा की खोज हमें यह सिखाती है कि इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, वह समय की पर्तों के नीचे छिपा रह सकता है किंतु सत्य एक दिन सामने अवश्य आता है, यह खोज केवल एक प्राचीन विश्वविद्यालय की पहचान नहीं थी, भारत की उस महान बौद्धिक विरासत की खोज थी जिसने कभी पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था,कल्पना कीजिए कि दुनिया का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय, जहाँ कभी हजारों विद्यार्थी पढ़ते थे, जहाँ दूर-दूर के देशों जैसे:- *चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, श्री लंका, इंडोनेशिया* और मध्य एशिया से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे वह एक दिन पूरी तरह गायब हो जाए। उसकी इमारतें मिट्टी के मिट्टी के नीचे दब जाए

1- *एक उजड़ा हुआ टीला जिसके नीचे भारत का बौद्धिक इतिहास छिपा था*:- 12वीं शताब्दी के अंत में हुए विनाश के बाद नालंदा धीरे-धीरे उजड़ गया। समय बीतता गया, इमारतें ढहती गईं और उनके ऊपर मिट्टी की परतें जमती रहीं। सदियों तक यह स्थान केवल बड़े-बड़े टीलों के रूप में दिखाई देता था। स्थानीय लोगों को इतना पता था कि यहाँ किसी समय कोई प्राचीन नगर या मठ रहा होगा, लेकिन यह विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय है, इसका किसी को पता नहीं था।करीब 700 वर्षों तक नालंदा इतिहास के पन्नों में तो जीवित रहा, लेकिन वास्तविक दुनिया में मानो खो गया था।

19वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन इस क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने इन विशाल टीलों, टूटी हुई ईंटों, प्राचीन मूर्तियों और खंडहरों का सर्वेक्षण किया। उन्होंने अपने अभिलेखों में इन अवशेषों का उल्लेख भी किया, लेकिन उस समय वे यह पहचान नहीं पाए कि ये विश्व के सबसे महान विश्वविद्यालय के अवशेष हैं।

2- *चीनी यात्रियों व्हेनसॉन्ग, फाहियांन और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से नालंदा की खोज हुई*:- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक *अलेक्ज़ेंडर कनिंघम* ने इस स्थान का गहन अध्ययन किया। उन्होंने केवल खंडहरों को नहीं देखा, बल्कि लगभग 1200 वर्ष पहले भारत आए चीनी यात्रियों ह्वेनसांग, फाहियान और इत्सिंग के यात्रा-वृत्तांतों को भी पढ़ा।
ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वर्णन में नालंदा विश्वविद्यालय का इतना विस्तृत विवरण लिखा था कि उसमें आसपास के गाँवों, मंदिरों, मठों और दूरी तक का उल्लेख मिलता है। कनिंघम ने इन विवरणों की तुलना बिहार के इस क्षेत्र से की। जब स्थान, दूरी, भवनों की संरचना और अन्य प्रमाण एक-दूसरे से मेल खाने लगे, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है।
1193 ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय पर आक्रमण हुआ और यह नष्ट हो गया था, धीरे-धीरे यह स्थान मिट्टी और जंगलों के में दब गया, 1811 -12 के बीच में *फ्रांसिस बुकानन हैमिल्टन* ने इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और उन्हें विशाल टीले और प्राचीन अवशेष मिले, लेकिन वह इसकी पहचान नहीं कर पाए, 1847 में *मेजर मार्कहम किटो* ने खंडहरों का अध्ययन किया और पहली बार यह संभावना जताई के प्राचीन नालंदा के अवशेष हो सकते हैं, 1915 से लेकर 1937 तक बड़ी पुरातात्विक खुदाई हुई जिनमें 11 बुद्ध विहार, छह मंदिर, छात्रावास, पुस्तकालय, बुद्ध की मूर्तियां, मोहरे और हजारों ऐतिहासिक वस्तुएं मिली, इस प्रकार नालंदा की खोज केवल एक जगह मिलना नहीं था बल्कि भारत की खोई हुई बौद्धिक विरासत को फिर से पहचान मिलना था

3- *नालंदा 700 वर्षों तक गुमनामी के अंधेरे में रहा जब वह बाहर आया तो भारत को विश्व गुरु बना दिया* व्हेनसॉन्ग, फाहियांन और इत्सिंग के यात्रा वर्णन में नालंदा विश्वविद्यालय का इतना विस्तृत विवरण लिखा था, कि उसमें आसपास के गांवों ,मंदिरों ,बौद्ध मठों की दूरी तक का उल्लेख मिलता है, *कनिंघम* ने इन विवरणों की तुलना बिहार के इस क्षेत्र से जब स्थान, दूरी भवनों की संरचना और अन्य प्रमाण एक दूसरे से मेल खाने लगे, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला की यही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है, इसके बाद *भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण* ने व्यवस्थित खुदाई की, 1915 से लेकर तक कई चरणों में बड़े पैमाने पर उत्खनन हुआ जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, वैसे-वैसे इतिहास की नई दुनिया सामने आई

*जिस जयचंद को गद्दार प्रचारित किया जाता है, उसके दादा गोविन्दचन्द्र ने श्रावस्ती बुद्ध विहार के लिए 6 गांव दान में दिए थ...
19/07/2026

*जिस जयचंद को गद्दार प्रचारित किया जाता है, उसके दादा गोविन्दचन्द्र ने श्रावस्ती बुद्ध विहार के लिए 6 गांव दान में दिए थे, और उनकी 'दादी कुमार देवी' ने सारनाथ में नौ मंजिला बुद्ध विहार बनवाया था*


*जयचंद* को गद्दार प्रचारित करने का सिर्फ एक ही कारण था कि वह बुद्धिस्ट परंपरा से आते थे, उनके दादा *गोविंदचंद्र* ने श्रावस्ती बुद्ध विहार के लिए 6 गांव दान में दिए थे और उनकी दादी *कुमार देवी* ने सारनाथ में 9 मंजिला बुद्ध विहार बनवाया था, जयचंद और पृथ्वीराज के बीच में युद्ध का कारण एक ही बताया जाता है कि पृथ्वीराज ने जयचंद की पुत्री *संयोगिता* का अपहरण कर लिया था जबकि जयचंद की कोई पुत्री ही नहीं थी, पृथ्वीराज के दरबारी कवि *चंद्रवरदाई* की मृत्यु 12 वी शताब्दी में हो चुकी थी, उनके नाम से 700 वर्षों बाद 19वीं शताब्दी में *पृथ्वीराजरासो* नामक एक फर्जी पुस्तक लिखी गई, इसी पुस्तक में *जयचंद* को गद्दार प्रचारित किया गया है, जब यह पुस्तक कोलकाता में *जॉर्जबुलर* के पास छपने के लिए आई तो उन्होंने पृथ्वीराज रासो की तिथियों को पूरी तरह काल्पनिक और अनैतिहासिक मानकर छापने से इनकार कर दिया था, बाद में बनारस की *नागरी प्रचारिणी सभा* ने अपने जीवन प्रेस में 1899 में पुस्तक को प्रकाशित किया था

यदि चीनी बौद्ध यात्रियों—विशेषकर *फाहियान* (5वीं शताब्दी) और *ह्वेनसांग* (7वीं शताब्दी)—ने भारत के बौद्ध तीर्थों का इतना सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन न किया होता, तो संभव है कि अनेक प्राचीन बौद्ध स्थलों की पहचान करना कहीं अधिक कठिन होता। उन्होंने केवल स्थलों का नाम ही नहीं लिखा, बल्कि नगरों के बीच की दूरी, दिशा, नदियों, स्तूपों, विहारों और महत्वपूर्ण भवनों का भी विस्तार से उल्लेख किया। यही विवरण बाद में आधुनिक पुरातत्त्वविदों के लिए मार्गदर्शक बने।

ब्रिटिश पुरातत्त्वविद *एलेक्जेंडर कनिंघम* ने इन चीनी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांतों का सावधानीपूर्वक अध्ययन से *सहेत–महेत* क्षेत्र की पहचान प्राचीन *श्रावस्ती* के रूप में की। इसके बाद कराई गई खुदाइयों में अनेक महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था *गंधकुटी* का स्थल।

बौद्ध परंपरा के अनुसार *गंधकुटी जेतवन* महाविहार का केंद्रीय भाग था और यही भगवान बुद्ध का निवास-स्थान माना जाता है। *फाहियान* ने लिखा है कि गंधकुटी के चारों ओर सदाबहार वृक्षों के वन थे, रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे और वातावरण पुष्पों की सुगंध से महकता रहता था। इसी कारण इसे *गंधकुटी* अर्थात सुगंधित कुटी कहा गया।

*जेतवन* वही स्थान है जहाँ भगवान *बुद्ध* ने अपने जीवन के सबसे अधिक 25 वर्षावास बिताए। पालि त्रिपिटक के अनुसार बुद्ध ने यहीं सर्वाधिक उपदेश दिए, और परंपरा के अनुसार लगभग 844 सुत्तों का देशना भी इसी क्षेत्र में हुई। इस दृष्टि से जेतवन बौद्ध इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण उपदेश-स्थल माना जाता है।

जेतवन विहार का निर्माण प्रसिद्ध दानवीर *अनाथपिंडिक* (सुदत्त) ने कराया था। उन्होंने भिक्षुओं के निवास, ध्यान-कक्ष, सभागृह और अन्य आवश्यक भवन बनवाए थे। आधुनिक उत्खनन में विहार संख्या 19 के ध्यान-कक्ष के उत्तर-पश्चिमी कोने की नींव से एक अत्यंत महत्वपूर्ण ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। इस ताम्रपत्र पर स्पष्ट रूप से *जेतवन* का उल्लेख मिलता है, जिसने यह प्रमाणित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि उत्खनित स्थल वास्तव में प्राचीन जेतवन महाविहार ही है।

यह ताम्रपत्र लगभग दो फीट से अधिक ऊँचे मिट्टी के संदूक में सुरक्षित रखा गया था। इसका आकार लगभग 18 इंच लंबा, 14 इंच चौड़ा और लगभग एक-चौथाई इंच मोटा है तथा इस पर 27 पंक्तियाँ अंकित हैं। यह अभिलेख गहड़वाल वंश के राजा *गोविंदचंद्र* का है, जिस पर उनकी राजमुद्रा अंकित है। यह वाराणसी से जारी किया गया था और इसमें संवत् 1186, आषाढ़ पूर्णिमा, सोमवार की तिथि दर्ज है।

आषाढ़ पूर्णिमा को आज हम गुरु पूर्णिमा के रूप में जानते हैं। बौद्ध परंपरा में यही वह दिन माना जाता है जब भगवान बुद्ध ने सारनाथ के *ऋषिपत्तन मृगदाय* में अपना प्रथम उपदेश देकर धम्मचक्र प्रवर्तन किया था। इसी कारण यह दिन गुरु के सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

ताम्रपत्र के अनुसार, राजा गोविंदचंद्र ने इसी शुभ अवसर पर जेतवन के भिक्षु संघ के पालन-पोषण के लिए छह गाँवों की आय दान में प्रदान की। यह अभिलेख इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि 12वीं शताब्दी तक भी श्रावस्ती और जेतवन बौद्ध गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बने हुए थे तथा तत्कालीन शासकों का संरक्षण उन्हें प्राप्त था।

राजा गोविंदचंद्र, गहड़वाल वंश के प्रमुख शासक थे और वे राजा *जयचंद्र* के दादा थे। जयचंद्र को बाद की लोककथाओं में अक्सर "*गद्दार*" के रूप में चित्रित किया गया, किंतु समकालीन अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि गहड़वाल शासकों ने बौद्ध और ब्राह्मण—दोनों धार्मिक संस्थानों को दान और संरक्षण दिया। बोधगया तथा अन्य अभिलेखों से भी जयचंद्र द्वारा बौद्ध संस्थानों को दिए गए संरक्षण के प्रमाण मिलते हैं।

इस प्रकार *श्रावस्ती* की खोज केवल एक पुरातात्त्विक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि चीनी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत, उत्खननों में मिले अवशेषों और अभिलेखीय साक्ष्यों के संयुक्त अध्ययन का परिणाम थी। इन प्रमाणों ने प्राचीन भारत के बौद्ध इतिहास को समझने में अमूल्य योगदान दिया।

17/07/2026

** भाजी-भाकर बनाम फास्ट फूड **

**ताकत चाहिए या सिर्फ स्वाद?**

भाजी-भाकर शरीर को पोषण, ऊर्जा और तंदुरुस्ती देती है।
फास्ट फूड कुछ मिनटों का स्वाद देता है, लेकिन अक्सर शरीर पर अतिरिक्त तेल, नमक और चीनी का बोझ बढ़ाता है।

**अपनी थाली में रखें:**
ताज़ी भाजी
भाकर/रोटी
दाल और मौसमी भोजन

**स्वस्थ शरीर, तेज़ दिमाग और बेहतर जीवन की शुरुआत अपनी थाली से होती है।**

**आज का संकल्प:**
*"फास्ट फूड कम, घर का पौष्टिक भोजन ज़्यादा।"*

#स्वस्थभारत

 #भावी_पिढीला_प्रेरणा_देणारे_कार्य अमरावती शहरात डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या पुतळ्याला योग्य स्थान, भव्य परिसर आणि त्य...
13/07/2026

#भावी_पिढीला_प्रेरणा_देणारे_कार्य

अमरावती शहरात डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या पुतळ्याला योग्य स्थान, भव्य परिसर आणि त्यांच्या विचारांचे स्मारक उभारण्यासाठी ज्यांनी अनेक वर्षे सातत्याने संघर्ष केला, त्या सर्व ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ते, अनुयायी, सामाजिक संघटना आणि आंबेडकरी जनतेला मनःपूर्वक अभिवादन!

Writ Petition No. 3488/2016, मुंबई उच्च न्यायालय, नागपूर खंडपीठ, दिनांक 13 जुलै 2026 ला ऐतिहासिक निर्णय दिला. अमरावती येथील डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांच्या पुतळ्याभोवती इर्विन चौकातील भित्तीचित्र आणि परिसर विकासा बाबत डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांचे विचार, कार्य आणि जीवनदर्शन जनतेपर्यंत पोहोचविण्यासाठी उभारण्यात येणारे भित्तीचित्र व परिसर विकास हा "सार्वजनिक उद्देश" आहे आणि तो भावी पिढ्यांसाठी प्रेरणादायी ठरेल.

डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांचे विचार केवळ स्मारक नाहीत, ते आपल्या राष्ट्राच्या बौद्धिक आणि नैतिक पायाभरणीतील गुंतवणूक आहेत."Men are mortal. So are ideas. An idea needs propagation as much as a plant needs watering." — या वचनातून न्यायालयानेही सिद्ध केले की इतिहासाची, ज्ञानाची आणि प्रेरणेची जपणूक हा प्रत्येक नागरिकाचा कर्तव्य आहे (अनुच्छेद 51A).हे केवळ जमीन संपादनाचे प्रकरण नाही हे जीवनाला अर्थ देणार्‍या विचारांचे, समतेच्या आणि न्यायाच्या मूल्यांचे सामूहिक रक्षण आहे.

हा केवळ एका पुतळ्याचा प्रश्न नव्हता; हा भारतीय संविधानाच्या मूल्यांचा, समता-स्वातंत्र्य-बंधुतेच्या विचारांचा आणि भावी पिढीला प्रेरणा देणाऱ्या इतिहासाच्या जतनाचा लढा होता.

आजचा निर्णय आठवण करून देतो की, डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांच्या
विचारांना पाणी देणं हे समाजाच्या प्रगतीसाठी गरजेचं आहे. डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांच्या विचारांना पुढच्या पिढीपर्यंत पोहोचवण्याची जबाबदारी आपण सर्व मिळून निर्माण करूया.

हा विजय टिम वर्क आणि विचारांचा आहे.
जय भीम!
नमो बुद्धाय!

#जयभीम

भगवान बुद्ध की छठी शताब्दी की मूर्तियां बांधवगढ़ ( म प्र) के जंगल से मिली                   बांधवगढ़ के जंगल में मौजूद भ...
12/07/2026

भगवान बुद्ध की छठी शताब्दी की मूर्तियां बांधवगढ़ ( म प्र) के जंगल से मिली

बांधवगढ़ के जंगल में मौजूद भगवान बुद्ध की छठवीं शताब्दी की तीन मूर्तियां मिली है,जिन्हें तकरीबन चौदह सौ साल प्राचीन बताई जा रही हैं। लेकिन इसे और पीछे ले जाना होगा।वहाँ के स्थानीय लोग *बुद्धिस्ट देवी तारा* की पूजा *खैर माई* के रूप में करते हैं।

अब पता चला है कि खैर माई वस्तुतः बुद्धिस्ट देवी तारा हैं। साथ में तथागत बुद्ध और **अवलोकितेश्वर* की भी मूर्तियाँ मिली हैं।दरअसल इस क्षेत्र का नाम धमोखर ही बता देता है कि कभी यह *धम्म* क्षेत्र रहा है।जब की ये मूर्तियाँ हैं, तब इस क्षेत्र में मघों का शासन था और मघ राजा *बुद्धिस्ट* थे।

मूर्तियाँ मिली नहीं हैं बल्कि पहले से ही मिली हुई थीं। सिर्फ नाम बदला था और अब पुरातत्व विभाग ने इन्हें बुद्धिस्ट मूर्तियाँ घोषित कर दिया है।

( टाइम्स ऑफ इंडिया, 9 जुलाई, 2023 )

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