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 #रमाई_जयंती_एक_नया_दृष्टिकोणक्या आपने कभी रमाई को एक **सफल उद्यमी** की नज़र से देखा है?सदियों पहले, रमाई ने गोबर के उपल...
27/05/2026

#रमाई_जयंती_एक_नया_दृष्टिकोण
क्या आपने कभी रमाई को एक **सफल उद्यमी** की नज़र से देखा है?

सदियों पहले, रमाई ने गोबर के उपले (गोवरिया) के व्यवसाय को अपनाकर न केवल अपने परिवार का पेट भरा, बल्ड़ कुटुंब की आर्थिक ज़िम्मेदारी भी संभाली। उन्होंने एक पारंपरिक क्रिया को आजीविका का साधन बनाया।

आज, वही गोबर का व्यवसाय **बड़े औद्योगिक रूप** में सफल है। उपलों का उपयोग कारखानों, भट्टियों और अन्य जगहों पर ईंधन के रूप में हो रहा है, जिससे बड़ा मुनाफा कमाया जा रहा है।

लेकिन अफसोस! साहित्य और समाज ने रमाई की छवि केवल एक **दुर्बल, गरीब और दयनीय** महिला के रूप में ही बनाई है। यह एकांगी दृष्टिकोण है।

समय आ गया है कि हम रमाई के संघर्ष के उस पहलू को देखें, जहां उन्होंने:
★ आर्थिक मज़बूती के लिए व्यवसाय शुरू किया।
★परिवार की ज़िम्मेदारी स्वयं संभाली।
★सीमित संसाधनों से भी आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखाया।

यह कहानी केवल शोषण और दुख की नहीं, बल्ड़ **साहस, उद्यमशीलता और आर्थिक सशक्तिकरण** की भी है।

बहुजन समाज को रमाई के इस **आर्थिक दर्शन** से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है। छोटे व्यवसाय, स्वरोज़गार और आत्मनिर्भरता का यह संदेश हर घर तक पहुंचाना हम सभी की ज़िम्मेदारी है।

20/05/2026
19/05/2026

सावीत्रीबाई फुले
महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता

19/05/2026

महापुरुषों को कार्य को युवाओं में निरंतर जागरुकता का प्रयास
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18/05/2026

महापुरुषों के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को तैयार करना चाहिए
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16/05/2026

अभ्यासिकेचे विद्यार्थी महापुरुषांच्या विचारांना कटीबध्द

 #कर्मकांडांना_मुठमाती_देण्यासाठी_स्वतःलाच_गाडावे_लागते..चळवळीला 33,500₹ चे दानदि. 9 मे 2026 रोजी स्मृतीशेष जनाबाई संभाज...
15/05/2026

#कर्मकांडांना_मुठमाती_देण्यासाठी_स्वतःलाच_गाडावे_लागते..
चळवळीला 33,500₹ चे दान

दि. 9 मे 2026 रोजी स्मृतीशेष जनाबाई संभाजीराव गोटे (वय 98) यांचे वृद्धापकाळाने शांतपणे निधन झाले. त्या प्रा. अनिल संभाजीराव गोटे, प्रोफेसर कॉलनी, महादेव खोरी, अमरावती यांच्या मातोश्री होत.

त्यांच्या अंतिम यात्रेचे वैशिष्ट्य म्हणजे कोणतेही अंधश्रद्धापूर्ण कर्मकांड, दिखाऊ विधी किंवा परंपरागत खर्चिक प्रथा न करता, “जीवन अनित्य आहे” या धम्म विचाराचे स्मरण ठेवत अत्यंत साधेपणाने अंतिम विधी पार पडले.

समाजात वर्षानुवर्षे चालत आलेली गोड जेवण, कपडे आणि दिखाव्यावर होणारी उधळपट्टी थांबवून, त्या खर्चाचा उपयोग समाजहितासाठी व्हावा हा विचार सौ. कविता अनिल गोटे यांनी नातेवाईकांसमोर मांडला.
त्यांनी सुचविले की, हा निधी मागील 14 वर्षांपासून झोपडपट्टी, वस्ती आणि ग्रामीण भागातील संसाधनविहीन विद्यार्थ्यांसाठी कार्यरत असलेल्या राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका ला दान करण्यात यावा.

या सामाजिक आणि धम्ममूल्यांच्या विचाराला सर्व नातेवाईकांनी सकारात्मक प्रतिसाद देत अभ्यासिकेसाठी ₹33,500/- दान करण्याचा संकल्प केला.

मा. अनिल गोटे हे मागील 14 वर्षांपासून अभ्यासिकेचे सक्रिय समन्वयक म्हणून कार्यरत आहेत.
“विहार तेथे अभ्यासिका” ही चळवळ कोणतीही शासकीय मदत न घेता, केवळ “Pay Back To Society” या सामाजिक बांधिलकीच्या तत्वावर अविरत सुरू आहे.
ही केवळ अभ्यासिका नाही, तर समाजातील वंचित विद्यार्थ्यांच्या भविष्याला दिशा देणारी परिवर्तनाची चळवळ आहे.

दानदाते मा. अनिल गोटे, सौ. कविता गोटे आणि सर्व नातेवाईकांचे अभ्यासिका परिवारातर्फे मनःपूर्वक आभार!

06/05/2026

चैत्र शुक्ल अष्टमी चक्रवर्ती सम्राट असोक जयंती,
राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले ११ अप्रैल ८ अप्रैल छत्रपति शिवाजी महाराज, १४ अप्रैल डॉ बाबासाहेब आंबेडकर जयंती.
महापुरुषों का कांरवा अभ्यासिका आंदोलन के माध्यम से आगे बढ़ रहा है
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 #आंदोलन_खड़ा_करना_है_तो “संघटक” चाहिए, सिर्फ “प्रभावक” से काम नहीं चलता।आज हर कोई सोशल मीडिया पर दिखना चाहता है, सुना ज...
03/05/2026

#आंदोलन_खड़ा_करना_है_तो
“संघटक” चाहिए, सिर्फ “प्रभावक” से काम नहीं चलता।

आज हर कोई सोशल मीडिया पर दिखना चाहता है, सुना जाना चाहता है, वायरल होना चाहता है। लेकिन आंदोलन वायरल पोस्ट से नहीं, लोगों के मन से खड़ा होता है। और यहीं सबसे बड़ी कमी दिखती है—संघटकों की।

संघटक कौन होता है?
वह जो चुपचाप काम करता है। जो खुद को नहीं, उद्देश्य को आगे रखता है। जो लोगों को ढूंढता है, उन्हें समझता है, गढ़ता है और धीरे-धीरे एक जीवंत नेटवर्क बनाता है। जनसंगठन खड़े करता है, जनआंदोलन तैयार करता है।

इसका सबसे मजबूत उदाहरण हैं कांशीराम।

कांशीराम साहब ने कभी अपनी छवि बनाने पर जोर नहीं दिया। उन्होंने जीवनभर सिर्फ एक काम किया—लोगों को जोड़ना और लोगों को तैयार करना।

उन्होंने BAMCEF, DS-4 और आगे चलकर BSP खड़ी की—यह एक दिन का काम नहीं था, बल्कि वर्षों की संगठन शक्ति का परिणाम था।

उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी, घर-परिवार छोड़ा, व्यक्तिगत सुखों का त्याग किया—क्योंकि उन्हें पता था कि आंदोलन व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी है।

वे गांव-गांव गए, हजारों कार्यकर्ता तैयार किए। उनका सिद्धांत था—“एक नेता नहीं, हजारों नेता बनाओ।”

यही असली संघटक की पहचान है—खुद बनना और दूसरों को बनाना।

लेकिन आज क्या हो रहा है?
आंदोलन = इवेंट
कार्यक्रम = फोटो
संघर्ष = पोस्ट
और कार्यक्रम खत्म, तो काम खत्म।

यह सोच खतरनाक है। क्योंकि ऐसी उथली “प्रभावक संस्कृति” आंदोलन को मजबूत नहीं करती—उसे खोखला कर देती है।

साफ शब्दों में—
रोशनी में खड़े होकर आंदोलन नहीं बढ़ता।
वह छाया में खड़े होकर, लोगों को आगे करके बढ़ता है।

अब सवाल सीधा है:
आप “दिखने वाले प्रभावक” बनना चाहते हैं या “तैयार करने वाले संघटक”?

अगर बहुजन आंदोलन को सच में मजबूत करना है, तो कांशीराम के रास्ते पर चलना होगा—
शांत रहकर काम करो, लोगों के बीच जाओ, उन्हें तैयार करो, संगठन बनाओ।

क्योंकि आखिर में—
आंदोलन पोस्ट से नहीं, संघटकों से खड़ा होता है।

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