20/07/2026
*भारत को विश्व गुरु का दर्जा यूं ही नहीं मिला है, इसके पीछे नालंदा विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा के कई केंद्र रहे हैं, जहाँ पर विश्व भर के विद्यार्थी अध्ययन करने के लिए आते थे*
नालंदा की खोज हमें यह सिखाती है कि इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, वह समय की पर्तों के नीचे छिपा रह सकता है किंतु सत्य एक दिन सामने अवश्य आता है, यह खोज केवल एक प्राचीन विश्वविद्यालय की पहचान नहीं थी, भारत की उस महान बौद्धिक विरासत की खोज थी जिसने कभी पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था,कल्पना कीजिए कि दुनिया का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय, जहाँ कभी हजारों विद्यार्थी पढ़ते थे, जहाँ दूर-दूर के देशों जैसे:- *चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, श्री लंका, इंडोनेशिया* और मध्य एशिया से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे वह एक दिन पूरी तरह गायब हो जाए। उसकी इमारतें मिट्टी के मिट्टी के नीचे दब जाए
1- *एक उजड़ा हुआ टीला जिसके नीचे भारत का बौद्धिक इतिहास छिपा था*:- 12वीं शताब्दी के अंत में हुए विनाश के बाद नालंदा धीरे-धीरे उजड़ गया। समय बीतता गया, इमारतें ढहती गईं और उनके ऊपर मिट्टी की परतें जमती रहीं। सदियों तक यह स्थान केवल बड़े-बड़े टीलों के रूप में दिखाई देता था। स्थानीय लोगों को इतना पता था कि यहाँ किसी समय कोई प्राचीन नगर या मठ रहा होगा, लेकिन यह विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय है, इसका किसी को पता नहीं था।करीब 700 वर्षों तक नालंदा इतिहास के पन्नों में तो जीवित रहा, लेकिन वास्तविक दुनिया में मानो खो गया था।
19वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन इस क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने इन विशाल टीलों, टूटी हुई ईंटों, प्राचीन मूर्तियों और खंडहरों का सर्वेक्षण किया। उन्होंने अपने अभिलेखों में इन अवशेषों का उल्लेख भी किया, लेकिन उस समय वे यह पहचान नहीं पाए कि ये विश्व के सबसे महान विश्वविद्यालय के अवशेष हैं।
2- *चीनी यात्रियों व्हेनसॉन्ग, फाहियांन और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से नालंदा की खोज हुई*:- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक *अलेक्ज़ेंडर कनिंघम* ने इस स्थान का गहन अध्ययन किया। उन्होंने केवल खंडहरों को नहीं देखा, बल्कि लगभग 1200 वर्ष पहले भारत आए चीनी यात्रियों ह्वेनसांग, फाहियान और इत्सिंग के यात्रा-वृत्तांतों को भी पढ़ा।
ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वर्णन में नालंदा विश्वविद्यालय का इतना विस्तृत विवरण लिखा था कि उसमें आसपास के गाँवों, मंदिरों, मठों और दूरी तक का उल्लेख मिलता है। कनिंघम ने इन विवरणों की तुलना बिहार के इस क्षेत्र से की। जब स्थान, दूरी, भवनों की संरचना और अन्य प्रमाण एक-दूसरे से मेल खाने लगे, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है।
1193 ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय पर आक्रमण हुआ और यह नष्ट हो गया था, धीरे-धीरे यह स्थान मिट्टी और जंगलों के में दब गया, 1811 -12 के बीच में *फ्रांसिस बुकानन हैमिल्टन* ने इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और उन्हें विशाल टीले और प्राचीन अवशेष मिले, लेकिन वह इसकी पहचान नहीं कर पाए, 1847 में *मेजर मार्कहम किटो* ने खंडहरों का अध्ययन किया और पहली बार यह संभावना जताई के प्राचीन नालंदा के अवशेष हो सकते हैं, 1915 से लेकर 1937 तक बड़ी पुरातात्विक खुदाई हुई जिनमें 11 बुद्ध विहार, छह मंदिर, छात्रावास, पुस्तकालय, बुद्ध की मूर्तियां, मोहरे और हजारों ऐतिहासिक वस्तुएं मिली, इस प्रकार नालंदा की खोज केवल एक जगह मिलना नहीं था बल्कि भारत की खोई हुई बौद्धिक विरासत को फिर से पहचान मिलना था
3- *नालंदा 700 वर्षों तक गुमनामी के अंधेरे में रहा जब वह बाहर आया तो भारत को विश्व गुरु बना दिया* व्हेनसॉन्ग, फाहियांन और इत्सिंग के यात्रा वर्णन में नालंदा विश्वविद्यालय का इतना विस्तृत विवरण लिखा था, कि उसमें आसपास के गांवों ,मंदिरों ,बौद्ध मठों की दूरी तक का उल्लेख मिलता है, *कनिंघम* ने इन विवरणों की तुलना बिहार के इस क्षेत्र से जब स्थान, दूरी भवनों की संरचना और अन्य प्रमाण एक दूसरे से मेल खाने लगे, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला की यही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है, इसके बाद *भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण* ने व्यवस्थित खुदाई की, 1915 से लेकर तक कई चरणों में बड़े पैमाने पर उत्खनन हुआ जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, वैसे-वैसे इतिहास की नई दुनिया सामने आई