Brij yatra

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💰💰🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄💰💰*(अपरा एकादशी व्रत -आज)*********************ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। ज्येष...
13/05/2026

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*(अपरा एकादशी व्रत -आज)*
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*ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो व्यक्ति एकादशी का व्रत पूरे विधि विधान के साथ करता है। उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। साथ ही घर परिवार में भी सुख समृद्धि बनी रहती है।*

*(अपरा एकादशी कब है ?)*
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*ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का आरंभ 12 मई को दोपहर में 2 बजकर 53 मिनट पर आरंभ होगी और 13 अप्रैल को एकादशी तिथि दोपहर में 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगी।*

*शास्त्रों के नियमों के अनुसार, एकादशी तिथि का व्रत तब किया जाता है जब उदयकाल में एकादशी तिथि लग रही हो।*

*ऐसे में 13 मई को सुबह को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि लगी रहेगी। इसलिए अपरा एकादशी का व्रत 13 मई को ही रखा जाएगा। वहीं, एकादशी का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। 14 मई को द्वादशी तिथि लग रही है। इसलिए व्रत का पारण 14 तारीख में 11 बजकर 20 मिनट पर किया जाएगा।*

*(अपरा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व)*
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*अपरा शब्द का अर्थ है, जिसकी सीमा न हो। अर्थात इस दिन किया गया जप, तप, व्रत और दान अनंत गुना फल देने वाला होता है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है।*

*यह एकादशी विशेष रूप से उन लोगों के लिए कल्याणकारी मानी जाती है, जो अपने जीवन में किए गए जाने-अनजाने पापों से मुक्ति चाहते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से ब्रह्महत्या, परनिंदा, असत्य भाषण और अन्य गंभीर दोषों से भी मुक्ति मिलती है। साथ ही, यह व्रत साधक को मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।*

*(पूजा विधि)*
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*अपरा एकादशी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर अच्छे से घर की सफाई करें। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और व्रत का संकल्प लें और साफ वस्त्र धारण करें। ।*

*इसके बाद हाथ में थोड़ा जल लेकर पूजा स्थल पर जल छिड़कें और व्रत पूरा करने का संकल्प लें।*
*अब एक लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उसपर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें।*
*अब भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का अभिषेक करके उन्हें नए वस्त्र अर्पित करें।*
*इसके बाद घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें।*
*इसके बाद उन्हें माखन मिश्री का भोग लगाएं।*
*एकादशी व्रत कथा का पाठ करें।*
*अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और उन्हें भोग लगाकर परिवार जनों में प्रसाद बांट दें।*

*(क्या करें और क्या न करें)*
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*इस पावन दिन सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।*
*फलाहार करें, मन को शांत रखें और भगवान के नाम का स्मरण करते रहें। जरूरतमंदों को जल, फल, अन्न या वस्त्र दान करना अत्यंत पुण्यकारी होता है।*
*वहीं इस दिन कुछ कार्यों से बचना भी आवश्यक है; जैसे चावल का सेवन, तामसिक भोजन, क्रोध, निंदा और असत्य भाषण। इसके अलावा बाल और नाखून काटना, दोपहर में सोना और तुलसी के पत्ते तोड़ना भी वर्जित माना गया है।*

*इन नियमों का पालन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और साधक के ऊपर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।*

*(अपरा एकादशी पर दान का महत्व)*
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*सनातन परंपरा में दान को सर्वोत्तम कर्म माना गया है। साथ ही अपरा एकादशी जैसे पुण्यदायी मौके पर इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है और जीवन के कष्टों को दूर करता है।*

*इस पावन अवसर पर ब्राह्मणों, दीन-हीन, असहाय और जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अन्न और धन का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा पुण्य कार्य बताया गया है।*

*गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी दान के महत्व को बताते हुए कहा है-*

*तुलसी पंछी के पिये घटे न सरिता नीर।*
*दान दिये धन ना घटे जो सहाय रघुवीर।।*

*अर्थात् जिस प्रकार पक्षियों के पानी पीने से नदी का जल कम नहीं होता, उसी प्रकार यदि भगवान का आशीर्वाद आपके साथ है तो दान देने से आपके धन के भंडार में कभी कमी नहीं होती।*
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*【लाडली जी सेवा संस्थान वृंदावन】*

*👉अपरा /अचला एकादशी व्रत -आज 13 मई बुधवार को है जी*

*आप भी गोसेवा में शामिल हो जाईये जी*

(सेवा का संकल्प हेतु आपका नाम जन्मस्थान व गोत्र लिखें)

*1-एक बड़ी गाड़ी हरे चारे की सेवा -21 मन -2700/*

*2-एक छोटी गाड़ी हरे चारे की सेवा-11 मन -1400/*

*3-एक तांगा हरे चारे की सेवा-5 मन -650/*
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*🛟पेटीएम /गूगल पे /फोन पे- 8791423605🛟*
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🥉🥉🥉🥉🥉🥉🥉🥉🥉🥉🥉*【गुरु महिमा का अद्भुत रहस्य】**एक बार की बात है, वीणापाणि देवर्षि नारद, जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु ...
07/05/2026

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*【गुरु महिमा का अद्भुत रहस्य】*

*एक बार की बात है, वीणापाणि देवर्षि नारद, जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु से मिलने वैकुंठ धाम पधारे*

*भगवान विष्णु ने नारद मुनि का बहुत आदर-सत्कार किया, उन्हें अपने पास आसन दिया और प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया।*

*जब सत्संग समाप्त हुआ और नारद जी विदा लेकर जाने लगे, तो प्रभु की एक लीला शुरू हुई। नारद जी अभी कक्ष से बाहर निकले ही थे कि भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी से गंभीर स्वर में कहा:*

*"हे देवी! जिस स्थान पर अभी नारद बैठा था, उस स्थान को तुरंत गाय के गोबर से लीप कर पवित्र कर दो।"*

😲 *(नारद जी का आश्चर्य और प्रश्न)*

*नारद जी, जो अभी द्वार पर ही खड़े थे, उन्होंने यह बात सुन ली। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई! जिनका तीनों लोकों में सम्मान होता है, उनके जाने के बाद उनका आसन 'अपवित्र' माना जाए?*

*वे तुरंत वापस लौटे और हाथ जोड़कर भगवान से पूछा:*
*"हे प्रभु! जब मैं आया तो आपने मेरा इतना सम्मान किया, परंतु मेरे जाते ही आपने उस स्थान को गोबर से लीपने का आदेश क्यों दिया? क्या मुझमे कोई दोष है?"*

*(भगवान विष्णु ने शांत भाव से उत्तर दिया:)*

*हे नारद! मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप 'देवर्षि' हैं, परम भक्त हैं। लेकिन मैंने स्थान पवित्र करने को इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है। आप 'निगुरे' हैं। और शास्त्रों का मत है कि जिस स्थान पर कोई निगुरा (बिना गुरु वाला) व्यक्ति बैठ जाता है, वह स्थान अपवित्र हो जाता है।"*

🎣 *गुरु की खोज और मछुआरा*

*यह सुनकर नारद जी की आँखे खुल गईं। उन्होंने पूछा, "प्रभु! फिर मैं किसे अपना गुरु बनाऊं?"*

*नारायण ने आदेश दिया: "हे नारद! पृथ्वी लोक पर जाओ। वहाँ जो भी व्यक्ति तुम्हें सबसे पहले मिले, उसे ही अपना गुरु मान लेना।"*

*नारद जी धरती पर आए। विधाता की लीला देखिये, उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला मछुआरा जाल फेंकते हुए दिखाई दिया। नारद जी का मन खट्टा हो गया। वे सोचने लगे, "यह अनपढ़ मछुआरा, जो जीव हत्या करता है, यह मेरा गुरु कैसे हो सकता है?"*

*वे वापस बैकुंठ गए और भगवान से कहा, "प्रभु! वह तो एक साधारण मछुआरा है, उसे तो ज्ञान का 'क' भी नहीं पता, मैं उसे गुरु कैसे मानूँ?"*

*भगवान ने कठोरता से कहा, "नारद! मेरा आदेश अटल है। जाओ और उसे ही गुरु स्वीकार करो।"*
*विवश होकर नारद जी वापस आए और भारी मन से उस मछुआरे को अपना गुरु स्वीकार किया। लेकिन मन में श्रद्धा नहीं थी, केवल औपचारिकता थी। लौटकर उन्होंने भगवान से कहा, "प्रभु! मान लिया उसे गुरु, पर वह मुझे सिखाएगा क्या?"*

⚡ *श्राप और गुरु की शक्ति*

*शिष्य के मन में गुरु के प्रति ऐसी अवज्ञा देख विष्णु जी को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा:*

*"नारद! तुमने गुरु की निंदा की है, उन्हें छोटा समझा है। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम्हें ८४ लाख योनियों में भटकना पड़ेगा।"*

*श्राप सुनते ही नारद जी कांप उठे। वे रोने लगे, "हे नाथ! यह तो बहुत बड़ा दंड है। कृपया इस श्राप से मुक्ति का उपाय बताएं।"*
*विष्णु जी ने कहा, "इसका उपाय मेरे पास नहीं है। जिसने तुम्हें श्राप से बचाया जा सकता है, वह तुम्हारे गुरु ही हैं। जाओ, उनसे ही उपाय पूछो।"*

*नारद जी भागे-भागे अपने गुरु (मछुआरे) के पास गए और उन्हें सारी व्यथा सुनाई। मछुआरे ने अपनी सहज बुद्धि से मुस्कुराते हुए कहा:*

*ऋषिवर! चिंता न करें। आप जाकर भगवान विष्णु से कहें कि वे जमीन पर ८४ लाख योनियों के चित्र (तस्वीरें) बना दें। आप उन चित्रों पर लेटकर गोल घूम लीजियेगा। बस, हो गई आपकी ८४ लाख योनियों की यात्रा!"*

✨ *समाधान और क्षमा*

*नारद जी ने ऐसा ही किया।* *उन्होंने प्रभु से चित्र बनवाए और उन पर लेटकर घूम लिए। फिर हाथ जोड़कर बोले, "प्रभु! मैंने आपके कहे अनुसार ८४ लाख योनियों का चक्कर लगा लिया। अब मुझे क्षमा करें, आगे से कभी गुरु की निंदा नहीं करूँगा।"*
*भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले:*
*"देखा नारद! जिस गुरु को तुम अज्ञानी और छोटा समझ रहे थे, उसी ने तुम्हें मेरे दिए हुए श्राप से बचा लिया। मेरी शक्ति तुम्हें श्राप दे सकती थी, लेकिन उस श्राप को काटने की युक्ति केवल गुरु के पास थी।"*

📜 अनमोल सीख
संत कबीर जी ने ठीक ही कहा है:
> गुरु गूंगे गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दास।
> गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस।।
>
*अर्थात्, गुरु चाहे गूंगा हो या बावरा (सीधा-सादा) दिखाई दे, हमें हमेशा उनका दास बनकर रहना चाहिए। यदि गुरु की आज्ञा से नरक में भी जाना पड़े, तो शिष्य को यह विश्वास रखना चाहिए कि इसमें भी मेरा कल्याण है और अंत में स्वर्ग ही प्राप्त होगा।*

भक्ति का प्रमाण:
*यही अटूट विश्वास धन्ना भगत ने दिखाया था। पंडित जी ने उन्हें एक साधारण पत्थर देकर कहा था कि "यही ठाकुर जी हैं"। धन्ना भगत के भोले विश्वास और निष्ठा ने उस साधारण पत्थर से भी भगवान को प्रकट कर दिया।*

*सार: गुरु व्यक्ति नहीं, एक 'तत्व' है। यदि शिष्य का विश्वास पक्का हो, तो गुरु का आशीर्वाद पत्थर को भी पारस बना सकता है।*

🙏 जय गुरुदेव! जय श्री हरि! 🙏
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*🌹नंदिनी गोशाला ट्रस्ट वृंदावन🌹*

-8791423605*
जो भी दान करना है इस नं पे कर देना।

🏵️🏵️🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🏵️🏵️*【गोमाता की उतपत्ति एवं गोशाला निर्माण का महत्व】**👉गाय की उत्पत्ति के बिषय में एक बार महर्षि नारद ने भगवन...
04/05/2026

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*【गोमाता की उतपत्ति एवं गोशाला निर्माण का महत्व】*

*👉गाय की उत्पत्ति के बिषय में एक बार महर्षि नारद ने भगवन नारायण से प्रश्न किया तो भगवान नारायण ने बताया की हे नारद ! गौमाता का प्राकट्य भगवान श्रीकृष्ण के वाम भाग से हुआ है! उन्होंने बताया कि एक समय की बात है भगवान श्रीकृष्ण राधा गोपियों से घिरे हुए पुण्य बृंदाबन में गए, और थके होने से वे एकांत में बैठ गए।*

*👉उसी समय उनके मन में दूध पीने की इच्छा जागृत हुई, तो उन्होंने अपने बाम भाग से लीला पूर्वक ''सुरभि गौ '' को प्रकट किया । उस गौ के साथ बछड़ा भी था और सुरभि के थनो में दूध भरा था! उसके बछड़े का नाम ''मनोरथ ''था! उस सुरभि गौ को सामने देख कर श्रीदामा जी ने एक नूतन पात्र पर उसका दूध दूहा! वह दूध जन्म और मृत्यु को दूर करने वाला एक दूसरा अमृत ही था !स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उस स्वादिस्ट दूध को पिया!*

*👉भगवान नारायण ने आगे देवर्षि नारद जी को बताया कि श्री दामा जी के हाथ से वह दूध का पात्र गिर कर फूट गया और दूध धरती पर फ़ैल गया! गिरते ही यह दूध सरोवर के रूप में परणित हो गया!*

*जो गोलोक में ''क्षीर सरोवर '' के नाम से प्रसिद्द है! भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से उसी समय अकस्मात असंख्य कामधेनु गौएँ प्रकट हो गई !जितनी वो गायें थी उतने ही गोपी भी उस ''सुरभि '' गाय के रोमकूप से निकल आये! फिर उन गउवों से बहुत सी संताने हुई! इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण जी से प्रकट सुरभि देवी से गायों का प्राकट्य कहा जाता है! उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने देवी ''सुरभि '' की पूजा की और इस प्रकार त्रिलोकी में उस देवी सुरभि की दुर्लभ पूजा का प्रचार हो गया !*

*👉पुराणो में गाय की पूजा से प्राप्त प्रतिफल का आख्यान है - जो गौशाला में स्थित गॉवों की प्रदछिणा करता है ,उसने मानों सम्पूर्ण चराचर विश्व की प्रदछिणा कर ली ! गायों की सींग का जल परम पवित्र है, वह सम्पूर्ण पापों का शमन करता है ,साथ ही गायों के शरीर को खुजलाना -सहलाना भी सभी दोष पापों का शमन करता है! गायों को ग्रास देने वाला स्वर्ग लोक में पूर्ण प्रतिष्ठा पता है !*

*जो व्यक्ति लगातार एक वर्ष तक भोजन करने से पूर्व गाय को ग्रास खिलाता है वह ज्ञानी बन जाता है!*

*👉गायों के लिए जो धूप और ठण्ड से बचाने वाले गौशाला का निर्माण करता है वह अपने सात कुल का उद्धार कर लेता है !*
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🙏 जय गुरुदेव 🙏

💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰*{ज्येष्ठ मास आज से-इसी मास में आएगा पुरुषोत्तम मास)}**ज्येष्ठ मास का आरंभ आज 2 मई से होने जा रहा है। इस बार ...
02/05/2026

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*{ज्येष्ठ मास आज से-इसी मास में आएगा पुरुषोत्तम मास)}*

*ज्येष्ठ मास का आरंभ आज 2 मई से होने जा रहा है। इस बार ज्येष्ठ मास सिर्फ एक महीने का नहीं बल्कि पूरे 60 दिन यानी दो महीने का होगा। कहा जाता है कि इस महीने में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है। ज्येष्ठ मास में इस बार हनुमान जी के साथ साथ भगवान विष्णु की पूजा अर्चना भी की जाएगी। क्योंकि, इस बार ज्येष्ठ मास में अधिक मास का संयोग भी बना हुआ है। बता दें कि हर तीन साल में एक बार अधिक मास जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस बार पुरुषोत्तम मास लगने के कारण ज्येष्ठ मास 2 महीने का होगा। इस महीने में दान पुण्य और धार्मिक कार्य करने का विशेष महत्व है।*

*(ज्येष्ठ मास (जेठ मास) का महात्म्य – )*

*हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास (जेठ महीना) अत्यंत पवित्र और तपस्या का माह माना जाता है। यह मास आमतौर पर मई-जून के समय आता है और इस दौरान सूर्य की तपन सबसे अधिक होती है। धार्मिक दृष्टि से यह समय संयम, सेवा और भक्ति का विशेष अवसर देता है।*

*🌿 ज्येष्ठ मास का महत्व*

*तप और संयम का माह*

*इस महीने में तेज गर्मी के कारण व्यक्ति को धैर्य, सहनशीलता और संयम का अभ्यास करना पड़ता है। यही तपस्या आत्मिक उन्नति का मार्ग बनती है।*
**दान-पुण्य का विशेष फल)*

*ज्येष्ठ मास में जल दान, छाया दान (जैसे पेड़ लगाना), पंखा, वस्त्र, और ठंडे पेय पदार्थों का दान बहुत पुण्यदायी माना जाता है।*
*👉 खासकर प्यासे लोगों को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य कहा गया है।*

*भगवान विष्णु की उपासना*

*इस महीने में भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी होती है। व्रत, जप, और कथा सुनने से जीवन में सुख-शांति आती है।*

*(निर्जला एकादशी का महत्व)*

*ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी सबसे बड़ी एकादशी मानी जाती है। इस दिन बिना जल के व्रत रखकर भगवान विष्णु की आराधना करने से वर्षभर की एकादशियों का फल मिलता है।*

*(गंगा दशहरा)*

*इसी मास में गंगा दशहरा आता है, जिस दिन माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व है।*
🌼 आध्यात्मिक संदेश
ज्येष्ठ मास हमें सिखाता है कि जैसे हम गर्मी सहते हैं, वैसे ही जीवन की कठिनाइयों को भी धैर्य और श्रद्धा से सहना चाहिए।
यह महीना सेवा, त्याग और भक्ति का प्रतीक है।
संक्षेप में:
*👉 “ज्येष्ठ मास तप, दान और भगवान की भक्ति का महीना है, जो जीवन को पवित्र और सुखमय बनाता है।”*

*राधे राधे जी*

🐄🐄💰💰🐄🐄💰💰🐄🐄💰💰*ॐ नमो भगवते वासुदेवाय**{मोहिनी एकादशी व्रत कथा*} *युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! वैशाख मास के शुक्लपक्ष में ...
30/04/2026

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*ॐ नमो भगवते वासुदेवाय*

*{मोहिनी एकादशी व्रत कथा*}

*युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! वैशाख मास के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसका क्या फल होता है? उसके लिए कौन सी विधि है?*

*भगवान श्रीकृष्ण बोले : धर्मराज ! पूर्वकाल में परम बुद्धिमान श्रीरामचन्द्रजी ने महर्षि वशिष्ठजी से यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे पूछ रहे हो ।*

*श्रीराम ने कहा : भगवन् ! जो समस्त पापों का क्षय तथा सब प्रकार के दु:खों का निवारण करनेवाला, व्रतों में उत्तम व्रत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ ।*

*वशिष्ठजी बोले : श्रीराम ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । मनुष्य तुम्हारा नाम लेने से ही सब पापों से शुद्ध हो जाता है । तथापि लोगों के हित की इच्छा से मैं पवित्रों में पवित्र उत्तम व्रत का वर्णन करुँगा । वैशाख मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम ‘मोहिनी’ है । वह सब पापों को हरनेवाली और उत्तम है । उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोहजाल तथा पातक समूह से छुटकारा पा जाते हैं ।*

*सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नाम की सुन्दर नगरी है ।*
*वहाँ धृतिमान नामक राजा, जो चन्द्रवंश में उत्पन्न और सत्यप्रतिज्ञ थे, राज्य करते थे । उसी नगर में एक वैश्य रहता था, जो धन धान्य से परिपूर्ण और समृद्धशाली था । उसका नाम था धनपाल । वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था । दूसरों के लिए पौसला (प्याऊ), कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था । भगवान विष्णु की भक्ति में उसका हार्दिक अनुराग था । वह सदा शान्त रहता था । उसके पाँच पुत्र थे : सुमना, धुतिमान, मेघावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि । धृष्टबुद्धि पाँचवाँ था । वह सदा बड़े बड़े पापों में ही संलग्न रहता था । जुए आदि दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी । वह वेश्याओं से मिलने के लिए लालायित रहता था । उसकी बुद्धि न तो देवताओं के पूजन में लगती थी और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सत्कार में । वह दुष्टात्मा अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता था। एक दिन वह वेश्या के गले में बाँह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया । तब पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बन्धु बान्धवों ने भी उसका परित्याग कर दिया । अब वह दिन रात दु:ख और शोक में डूबा तथा कष्ट पर कष्ट उठाता हुआ इधर उधर भटकने लगा । एक दिन किसी पुण्य के उदय होने से वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पर जा पहुँचा । वैशाख का महीना था । तपोधन कौण्डिन्य गंगाजी में स्नान करके आये थे । धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिन्य के पास गया और हाथ जोड़ सामने खड़ा होकर बोला : ‘ब्रह्मन् ! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो ।’*

*कौण्डिन्य बोले : वैशाख के शुक्लपक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो । ‘मोहिनी’ को उपवास करने पर प्राणियों के अनेक जन्मों के किये हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं |’*

*वशिष्ठजी कहते है : श्रीरामचन्द्रजी ! मुनि का यह वचन सुनकर धृष्टबुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया । उसने कौण्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया । नृपश्रेष्ठ ! इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरुढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया । इस प्रकार यह ‘मोहिनी’ का व्रत बहुत उत्तम है । इसके पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है ।’*

हरि बोल 🚩
🙏
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📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿*【अक्षय तृतीया पर ही क्यों होते हैं बांकेबिहारी जी के चरण दर्शन】**💰चमत्कारिक स्वर्ण मुद्रा: निधिवन में जब स्व...
19/04/2026

📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿📿

*【अक्षय तृतीया पर ही क्यों होते हैं बांकेबिहारी जी के चरण दर्शन】*

*💰चमत्कारिक स्वर्ण मुद्रा: निधिवन में जब स्वामी हरिदास जी ठाकुर बांके बिहारी जी की सेवा करते थे, तो उन्हें ठाकुरजी की सेवा और भोगराग के लिए आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। इस पर ठाकुरजी ने प्रसन्न होकर रोज सुबह अपने चरणों के पास एक स्वर्ण मुद्रा (सोने का सिक्का) प्रकट करने की कृपा की।*

*👉सेवा की व्यवस्था: स्वामीजी उसी स्वर्ण मुद्रा से नित्य प्रति बिहारी जी के भोग और सेवा की व्यवस्था संचालित करते थे।*

*(चरण दर्शन की मान्यता: )*

*👉मान्यता है कि चूँकि बिहारी जी के चरणों से ही स्वर्ण मुद्रा निकलती थी, इसलिए स्वामी हरिदास ने ठाकुरजी के चरणों को ढक दिया था, ताकि लोग उस मुद्रा की ओर आकर्षित न हों।*

*👉अक्षय तृतीया का महत्व: इसी पौराणिक मान्यता के कारण, बांके बिहारी के चरणों के दर्शन वर्ष में केवल एक बार अक्षय तृतीया के दिन ही भक्तों को कराए जाते हैं।*

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*{लाडली जी सेवा संस्थान का प्रकल्प-}*

*{नंदिनी गोशाला ट्रस्ट वृन्दावन}*

*👉की ओर से अक्षय तृतीया पर नवीन गोशाला का निर्माण आरम्भ हो रहा है।*

*अक्षय तृतीया पर आप भी निर्माण में ईंट दान /सीमेंट दान /रोडी /चंबल /डस्ट दान कर सकते हैं।*
*
*👉एक ट्रॉली ईंट-51000/*

*👉एक ट्रक डस्ट/रोड़ी/चंबल-45000/*

*👉एक ट्रॉली डस्ट/चंबल-5100/*

*(इसके अलावा आप अपनी श्रद्धा व क्षमता से गोशाला को ईंट भी दान कर सकते हैं)*

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*सेवा भेजने के लिए संस्था की बैंक डिटेल प्राप्त करें या पेटीएम/गूगल पे फोन पे-8791423605*

*इस सम्बन्ध में सभी जानकारी के लिए काल /व्हाट्सएप-8791423605*

💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰*{जब सूरदास जी गोलोकधाम गए ,उनका  अंतिम पद,)**यह प्रसंग पुष्टिमार्ग के इतिहास में सबसे भावुक और महत्वपूर्ण क्...
16/04/2026

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*{जब सूरदास जी गोलोकधाम गए ,उनका अंतिम पद,)*

*यह प्रसंग पुष्टिमार्ग के इतिहास में सबसे भावुक और महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है। जब सूरदासजी का अंत समय निकट आया, तब श्री विट्ठलनाथजी (गुसाईं जी) ने जो शब्द कहे, वे आज भी हर वैष्णव के हृदय में अंकित हैं।*

*(पुष्टिमार्ग का जहाज: सूरदासजी का अंतिम समय)*

*सूरदासजी कई वर्षों तक श्रीनाथजी की सेवा करने के बाद, अंततः पारसोली (चंद्र सरोवर के पास) में जाकर लेट गए। उन्हें आभास हो गया था कि अब वे अपने प्रभु के नित्य लीला-धाम में प्रवेश करने वाले हैं।*

*उधर, गोवर्धन में श्रीनाथजी के मंदिर में जब श्री विट्ठलनाथजी (महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र) आरती कर रहे थे, तो उन्हें अपनी दिव्य शक्ति से ज्ञात हुआ कि सूरदासजी अब विदा ले रहे हैं।*

*(गुसाईं जी की पुकार)*

*आरती के बाद गुसाईं जी ने अपने सभी शिष्यों और वैष्णवों को संबोधित करते हुए कहा:*

*"पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, सो जाको कछू लेना होय सो लेउ।"*

*(पुष्टिमार्ग का जहाज अब जा रहा है, जिसे जो कुछ भी (भक्ति, ज्ञान, भाव) लेना हो, वह ले ले।)*

*यह सुनते ही सभी वैष्णव दौड़कर पारसोली पहुँचे। उन्होंने देखा कि सूरदासजी प्रभु के ध्यान में मग्न थे।*

अंतिम संवाद
*विट्ठलनाथजी ने सूरदासजी से पूछा— "सूर! तुम प्रभु के गुणगान में इतने मग्न रहे, क्या तुमने अपने गुरु (श्री वल्लभाचार्य) के लिए कुछ नहीं कहा?"*
*सूरदासजी ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया— "महाराज! मैंने जो कुछ भी गाया, वह सब श्री वल्लभाचार्य जी की कृपा ही तो थी। गुरु और गोविंद में कोई अंतर नहीं है।"*

*तभी उन्होंने अपना अंतिम और अत्यंत मार्मिक पद गाया:*

*"खंजन नैन रूप मद माते..."*

*(मेरे नेत्र खंजन पक्षी की तरह चंचल हैं और प्रभु के रूप के मद में डूबे हुए हैं...)*

*यह पद गाते-गाते सूरदासजी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया और श्रीनाथजी के चरणों में लीन हो गए।*

*उन्हें 'जहाज' क्यों कहा गया?*
*महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के मार्ग को 'पुष्टिमार्ग' (कृपा का मार्ग) कहा जाता है। सूरदासजी को इसका 'जहाज' इसलिए कहा गया क्योंकि:*

*भवसागर से पार उतारने वाले: जिस प्रकार एक विशाल जहाज हजारों यात्रियों को समुद्र के उस पार ले जाता है, सूरदासजी के पदों (सूरसागर) ने लाखों भक्तों को संसार रूपी सागर से पार उतारकर कृष्ण प्रेम तक पहुँचाया।*

*दृढ़ आधार: पुष्टिमार्ग की भक्ति पद्धति और कीर्तन सेवा का सबसे मजबूत आधार सूरदासजी ही थे।*

*अनन्य कृपा: उन्होंने सिद्ध किया कि प्रभु की कृपा (पुष्टि) होने पर एक नेत्रहीन व्यक्ति भी जगत के रचयिता को साक्षात देख सकता है।*

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16/04/2026

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*श्री वृन्दावन वास की आस करें शिव शेष।।*
*जाकी महिमा को कहैं श्रीकृष्ण धरें सखी भेष।।*
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*।।श्री वृन्दावन धाम में इस परम पवित्र अभियान से जुड़ें।।*

*🙏🏻जय जय श्रीराधे🙏🏻*

*जैसा कि आप सभी भैया बहनों को ज्ञात है कि इस समय श्री लाडली जी सेवा संस्थान श्रीधाम वृन्दावन में ट्रस्ट के आश्रम एवं मन्दिर व अतिथिगृह के निर्माण का कार्य प्रारंभ हो चुका है।*
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*(नए प्रकल्प का शुभारंभ)*

*👉आगामी अक्षय तृतीया पर्व 20 अप्रैल 2026 पर श्री नंदनी गोशाला ट्रस्ट का गठन कर गोशाला निर्माण के लिए भूमि पूजन का कार्य आरंभ होगा जी*

*👉जिसमे 100 गोमाताओ के पालन की समुचित व्यवस्था की जानी है जी*

*👉आप इस अवसर पर वृन्दावन धाम में सादर आमंत्रित हैं जी*

*गोशाला में ही सदस्यों के ठहरने के लिए कमरों का निर्माण भी होना है जी ।इस ट्रस्ट से जुड़ने का लाभ यह है कि आप जब भी बृज दर्शन हेतु आएंगे तो गोमाताओ के दर्शन सेवा एवं ठहरने के लिए स्थान भी मिलेगा जी।*

*👉विशेष बात यह है कि ट्रस्ट की आजीवन सदस्यता के लिए बहुत ही छोटी सी सेवा रखी गयी है जो कि 5100 ₹ है और वार्षिक सेवा 2100 ₹ है, जो कि प्रत्येक वर्ष अक्षय तृतीया के दिन देनी है।*

*👉गोशाला में ट्रस्टी बनने की सेवा-एक लाख ग्यारह हजार है जी*

*👉जो अपने नाम से कमरा निर्माण कराना चाहते हैं उनके लिए कमरे की सेवा 5 लाख ग्यारह हजार है जी*

*अतः जो भी भैया बहन जुड़ना चाहते हैं वे शीघ्र ही अवगत कराएं।*

_*ट्रस्ट के सेवा प्रकल्प कुछ इस प्रकार से हैं*_

*1-लाडली जी सेवा संस्थान*
*(नित्य गो सेवा)*
रोजाना सभी सदस्यों के संकल्प से सड़क पर रह रही गो माता को चारे की सेवा
( *नित्य मानव सेवा)*
रोजाना सभी सदस्यों के संकल्प से सड़क पर रुक रहे गरीबों ,बीमारों व असहायों को भोजन सेवा
*नित्य वानर सेवा*
वृन्दावन के बन्दरो को नित्य भोजन सेवा
*आगामी (भविष्य) में प्रस्तावित प्रकल्प*

*1-नंदिनी गोशाला*
(असहाय व व्रद्ध गो माता के लिए)
*2-लाडली गुरुकुल*
(सनातनी बालको के लिए उच्च व आधुनिक सनातनी शिक्षा)

*3-लाडली कुंज(वृद्धाश्रम)*
(असहाय व निरीह वृद्धों के लिए आसरा)

*4-कन्या अनाथ आश्रम*
(अनाथ कन्याओ के लिए शिक्षा -दीक्षा व विवाह )

*5-गोपाल रक्षा दल-समस्त देश में सनातन धर्म की रक्षा हेतु हिन्दू बोर्ड की स्थापना*
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_*जो भी भैया बहन इस सेवा प्रकल्प में किसी भी प्रकार का सहयोग करना चाहते हैं या आजीवन सदस्यता ग्रहण करना चाहते हैं -अपना नाम ,पूरा पता व फ़ोटो व्हाट्सएप करें*
*व्हाट्सएप नम्बर -8791423605*

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*(लाडली जी सेवा संस्थान वृंदावन -धार्मिक प्रसारण)*

🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰*🌀 वरुथिनी एकादशी: श्रद्धा और कायाकल्प की अमर गाथा**वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की वह पावन तिथि, जिसे हम वरुथिनी ...
13/04/2026

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*🌀 वरुथिनी एकादशी: श्रद्धा और कायाकल्प की अमर गाथा*

*वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की वह पावन तिथि, जिसे हम वरुथिनी एकादशी के नाम से जानते हैं, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुख से धर्मराज युधिष्ठिर के लिए निःसृत हुई थी। यह कथा हमें प्राचीन काल के उस दौर में ले जाती है, जहाँ नर्मदा के कल-कल बहते तट पर राजा मान्धाता का शासन था।*

🧘‍♂️ *(राजा की घोर तपस्या और संकट की घड़ी)*

*राजा मान्धाता एक न्यायप्रिय और परम तपस्वी शासक थे। एक समय वे राज-पाट के मोह को त्यागकर घने वन की नीरवता में चले गए। वहाँ वे एक विशाल वृक्ष के नीचे अपनी सुध-बुध खोकर, मौन धारण किए भगवान विष्णु के ध्यान में लीन हो गए।*

*अभी वे ध्यान की गहराइयों में ही थे कि अचानक एक हिंसक जंगली भालू वहाँ पहुँचा। भालू ने राजा पर हमला किया और उनके पैर को अपने जबड़ों में जकड़कर चबाने लगा। पीड़ा असह्य थी, लेकिन राजा की भक्ति की पराकाष्ठा देखिए—उन्होंने न तो भालू पर क्रोध किया और न ही अपनी तपस्या भंग की। वे पत्थर की मूर्ति के समान अचल रहे। जब भालू उन्हें घसीटकर जंगल के भीतर ले जाने लगा, तब राजा ने शरीर के मोह को त्यागकर केवल अपने 'नारायण' को पुकारा।*

✨ *(भगवान श्रीहरि का प्रकट होना)*

*भक्त की मौन पुकार जब वैकुंठ पहुँची, तो करुणासागर भगवान विष्णु स्वयं वहां प्रकट हुए। उन्होंने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र से क्षण भर में उस भालू का अंत कर दिया और मान्धाता के प्राण बचाए।*

*भालू के चबाने के कारण राजा का पैर क्षत-विक्षत हो चुका था। अपने सुंदर शरीर को इस कुरूप अवस्था में देख राजा अत्यंत दुखी हुए। तब भगवान विष्णु ने स्नेहपूर्ण स्वर में कहा:*

*"हे राजन! विलाप मत करो। यह शारीरिक कष्ट तुम्हारे पूर्व जन्म के संचित पापों का परिणाम है। यदि तुम पुनः अपनी काया को स्वस्थ और दिव्य बनाना चाहते हो, तो मथुरा जाओ। वहाँ वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरे 'वराह अवतार' की पूजा करो। इस व्रत की शक्ति ही तुम्हें पुनः पूर्ण बनाएगी।"*

*(व्रत का प्रभाव और कायाकल्प)*

*भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर राजा मथुरा पहुँचे और पूर्ण श्रद्धा के साथ वरुथिनी एकादशी का उपवास किया। जैसे-जैसे व्रत के नियम पूरे हुए, राजा के अंग किसी चमत्कार की भांति फिर से सुंदर और सुडौल होने लगे। इस व्रत के पुण्य से वे न केवल स्वस्थ हुए, बल्कि मृत्यु के पश्चात उन्हें मोक्ष और स्वर्ग की प्राप्ति हुई।*

*(वरुथिनी एकादशी व्रत का महात्म्य (महत्व)*

*शास्त्रों में इस एकादशी को 'सौभाग्य प्रदायिनी' माना गया है। इसके फल अत्यंत विस्मयकारी बताए गए हैं:*

*तपस्या का पुण्य: इस एक दिन के व्रत से साधक को 10,000 वर्षों की कठोर तपस्या के बराबर पुण्य मिलता है।*

*महादान के समान: सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर एक मन स्वर्ण (सोना) दान करने से जो फल मिलता है, वही फल वरुथिनी एकादशी का उपवास रखने मात्र से प्राप्त हो जाता है।*

*कष्टों से मुक्ति: यह व्रत शारीरिक व्याधियों और पूर्व जन्म के पापों के प्रभाव को नष्ट करने वाला माना गया है।*

*मधुसूदन पूजन: इस दिन भगवान के 'मधुसूदन' या 'वराह' रूप की आराधना की जाती है, जो जीवन के अंधेरे को दूर करते हैं।*

*(व्रत के विशेष नियम और सावधानी)*

*👌इस व्रत को पूर्ण फलदायी बनाने के लिए कुछ वर्जनाओं का पालन अनिवार्य है:*

*1. भोजन का पात्र: इस दिन कांसे के बर्तनों में भोजन करना वर्जित है।*

*2. सात्विकता: मांस, मदिरा, मसूर की दाल और शहद का त्याग करें।*

*3. आचरण: परनिंदा (दूसरों की बुराई) से बचें और ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें।*

*यह व्रत संदेश देता है कि चाहे प्रारब्ध (भाग्य) के कारण दुःख मिले, लेकिन भगवान की शरण में जाने और संयम के साथ व्रत करने से नियति को भी बदला जा सकता है।*

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*【लाडली जी सेवा संस्थान वृंदावन】*

*👉वरुथिनी एकादशी व्रत -13 अप्रैल सोमवार को है जी*

*आप भी गोसेवा में शामिल हो जाईये जी*

(सेवा का संकल्प हेतु आपका नाम जन्मस्थान व गोत्र लिखें)

*1-एक बड़ी गाड़ी हरे चारे की सेवा -21 मन -2700/*

*2-एक छोटी गाड़ी हरे चारे की सेवा-11 मन -1400/*

*3-एक तांगा हरे चारे की सेवा-5 मन -650/*
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*🛟पेटीएम /गूगल पे /फोन पे- 8791423605🛟*
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🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰*🌊 बंधन की असली जंजीर: एक दिव्य बोध कथा!**गांव की सीमा जहाँ समाप्त होती थी, वहीं एक प्राचीन और रहस्यमयी कुआँ ...
11/04/2026

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*🌊 बंधन की असली जंजीर: एक दिव्य बोध कथा!*

*गांव की सीमा जहाँ समाप्त होती थी, वहीं एक प्राचीन और रहस्यमयी कुआँ था। काई से ढकी उसकी दीवारें और उसका अथाह गहरा जल न जाने कितनी सदियों की कहानियाँ समेटे हुए था। इसी कुएँ के तट पर हर भोर एक तपस्वी संत पधारते थे।*

⛓️ *(तपस्या का आडंबर:)*

*उन संत की ख्याति दूर-दूर तक थी। उनकी तपस्या का ढंग बड़ा ही विस्मयकारी था—वे अपने शरीर को भारी-भरकम लोहे की जंजीरों से जकड़ लेते और उस गहरे कुएँ के भीतर लटक जाते। घंटों बीत जाते, वे हवा में झूलते हुए आँखें मूंदकर बस एक ही नाम रटते— "कृष्ण... कृष्ण..."*

*गांव वाले किनारे पर खड़े होकर श्रद्धा से भर जाते। वे सोचते कि इतनी भारी जंजीरों का कष्ट सहकर जो व्यक्ति भगवान को पुकार रहा है, वह निश्चित ही सिद्ध पुरुष होगा। संत भी अक्सर गर्व से कहते, "जिस दिन ये जंजीरें टूटेंगी, समझ लेना उसी दिन गोविंद से मेरा मिलन होगा।" वे जंजीर को अपनी सुरक्षा और अपनी तपस्या का प्रमाणपत्र मानते थे।*

*एक दिन, गांव का एक सीधा-साधा व्यक्ति, जिसके पास न तो ज्ञान था और न ही कोई सिद्धि, चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था। उसके मन में एक भोली सी जिज्ञासा जागी— "क्या भगवान सिर्फ कष्ट सहने वालों को मिलते हैं? क्या मुझ जैसा साधारण व्यक्ति उन्हें नहीं देख सकता?"*

*उसके पास कोई लोहे की जंजीर नहीं थी। उसने पास पड़ी एक पुरानी और कमजोर सी रस्सी उठाई। उसके मन में कोई अहंकार नहीं था, बस एक तड़प थी। उसने उस कच्ची रस्सी को अपने पैरों से बांधा और कुएँ की गहराई में लटक गया।*
*उसने आँखें बंद कीं और डूबते हुए मन से पुकारा:*

*'हे सांवरे! मुझे नहीं पता तपस्या क्या होती है। मेरे पास न जंजीरें हैं, न शक्ति। बस ये टूटी सी रस्सी है और मेरा अटूट भरोसा। मुझे थाम लो प्रभु!"*

*✨ चमत्कार और दर्शन*

*तभी एक विस्मयकारी घटना घटी। उस व्यक्ति का भार पड़ते ही वह कच्ची रस्सी 'तड़ाक' से टूट गई। वह व्यक्ति मौत के मुंह में गिरने ही वाला था कि अचानक कुएँ के भीतर एक अलौकिक प्रकाश फैल गया।*

*इससे पहले कि वह ठंडे पानी को छू पाता, दो कोमल और शक्तिशाली भुजाओं ने उसे बीच हवा में ही थाम लिया। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कान लिए उसे अपनी गोद में उठाए हुए थे।*

*वह व्यक्ति भावुक होकर प्रभु के चरणों से लिपट गया और सिसकते हुए पूछा— "प्रभु! मैं तो पापी हूँ, साधारण हूँ। वो महात्मा तो वर्षों से लोहे की जंजीरों में लटककर आपको पुकार रहे हैं, आप उनके पास क्यों नहीं गए?"*

*🗣️ ईश्वर का उत्तर:*

*भगवान कृष्ण की मुस्कान और गहरी हो गई। उन्होंने बड़े प्रेम से कहा:*

*"पुत्र! वह संत मुझे पुकारते तो हैं, लेकिन उन्हें भरोसा मुझ पर नहीं, बल्कि उस मजबूत लोहे की जंजीर पर है। उन्हें लगता है कि जब तक जंजीर है, वे सुरक्षित हैं। उन्होंने जंजीर को अपनी रक्षा का आधार मान लिया है।"*

*"परंतु तुमने... तुमने एक कमजोर रस्सी चुनी। तुम जानते थे कि यह रस्सी तुम्हें नहीं बचा सकती। तुमने अपना पूरा जीवन, अपनी पूरी सुरक्षा मुझ पर छोड़ दी। जहाँ 'भरोसा' सौ प्रतिशत होता है, वहाँ मुझे दौड़े चले आना ही पड़ता है।"*

*हम भी अपने जीवन में कई बार अहंकार, धन, पद या दिखावे की जंजीरों से बंधे रहते हैं और सोचते हैं कि हम बहुत बड़े भक्त हैं। लेकिन सच तो यह है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी 'मजबूत साधन' की नहीं, बल्कि 'पूर्ण समर्पण' की आवश्यकता होती है।*

*याद रखें: साधन चाहे कितना भी छोटा हो, अगर 'विश्वास' अटूट है, तो परमात्मा को प्रकट होना ही पड़ता है।*

*'जहाँ समर्पण पूरा है, वहीं गोविंद का बसेरा है।"*

🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏

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*(कृपया यह पोस्ट अपने सभी मित्रों व रिश्तेदारों में शेयर करें जी)*

*आप भी आएं अपने साथियों को भी लाएं।।*

*【जल्दी रजिस्ट्रेशन कराएं】*

*(🍬पुरुषोत्तम मास में बृज चौरासी कोस यात्रा का पुण्य प्राप्त करें)*🍬

*लाडली जी सेवा संस्थान वृन्दावन के पावन सान्निध्य में*

*🍬दिनाँक-17 मई से 23 मई 2026*🍬

*✍️।।जल्दी रजिस्ट्रेशन कराएं जी।।*

*1-वृन्दावन में आवासीय व्यवस्था।।*
*डबलबेड वातानुकूलित कमरे।*
*2-सुबह चाय से रात्रि के भोजन तक शुद्ध एवं स्वच्छ ताजा भोजन*

*3- कार से यात्रा,गाइड एवं पूजा हेतु आचार्य*

*[सम्पूर्ण खर्च-15100/* प्रति यात्री】*

*रजिस्ट्रेशन कराने हेतु -प्रति यात्री 3100/ जमा करना है। बाकी राशि यही आकर जमा करनी है।।*

*👉विशेष सूचना【इसी समय पर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भी प्रस्तावित है । यदि कोई सज्जन मुख्य यजमान बनकर कथा का आयोजन कराना चाहते हैं तो सम्पर्क कर सकते हैं जी)*

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*{सम्पर्क सूत्र-8791423605-आचार्य लक्ष्मीनारायण शर्मा वृन्दावन*

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