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🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰*(जीवन के सर्वोत्तम प्रश्नोत्तर)**उत्तरकांड के इस पावन संवाद में, पक्षीराज गरुड़ जी अपने मोह और संदेह के निवा...
10/06/2026

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*(जीवन के सर्वोत्तम प्रश्नोत्तर)*

*उत्तरकांड के इस पावन संवाद में, पक्षीराज गरुड़ जी अपने मोह और संदेह के निवारण के बाद, काकभुशुंडि जी से अत्यंत गूढ़ और कल्याणकारी *७ प्रश्न पूछते हैं।*

*ये सात प्रश्न मानव जीवन, अध्यात्म और व्यवहार के सबसे बड़े संशयों को समेटे हुए हैं।*

*काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी के इन प्रश्नों को सुनकर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की और उनके बड़े ही सरल और सटीक उत्तर दिए। आइए इन सात प्रश्नों और उनके उत्तरों को क्रम से समझते हैं:*

१: सब ते दुर्लभ कवन सरीरा? (सबसे दुर्लभ शरीर कौन सा है?)
*उत्तर:* काकभुशुंडि जी ने बताया कि *मनुष्य का शरीर* सबसे दुर्लभ है।

नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत जेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग नसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥

*अर्थात्, चराचर के सभी जीव मनुष्य शरीर की याचना करते हैं। यह शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष (अपवर्ग) की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है।*

२: सबसे बड़ा दुःख और सबसे बड़ा सुख क्या है?
*उत्तर: सबसे बड़ा दुःख: दरिद्रता (गरीबी)* इस संसार का सबसे बड़ा दुःख है।
*सबसे बड़ा सुख: संतों का मिलन (सत्संग)* इस संसार का सबसे बड़ा सुख है।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥

३: संतों और असंतों (दुष्टों) का सहज स्वभाव कैसा होता है?
*उत्तर:* काकभुशुंडि जी ने इसे बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया:―
*संत का स्वभाव:* संत का स्वभाव चंदन की तरह होता है। कुल्हाड़ी चंदन के पेड़ को काटती है, लेकिन चंदन अपनी प्रकृति के अनुसार उस काटने वाली कुल्हाड़ी को भी सुगंधित कर देता है। इसलिए संत खुद कष्ट सहकर भी दूसरों का भला करते हैं।
*असंत (दुष्ट) का स्वभाव:* दुष्ट का स्वभाव कुल्हाड़ी की तरह होता है। कुल्हाड़ी चंदन को काटती है (नुकसान पहुँचाती है), लेकिन अंत में उसे खुद भी आग में तपना पड़ता है। दुष्ट दूसरों का अहित करते-करते स्वयं का विनाश कर लेता है।

४: सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पाप क्या है?
*उत्तर:- सबसे बड़ा पुण्य: परहित (दूसरों की भलाई करना)* ही सबसे बड़ा धर्म या पुण्य है।
*सबसे बड़ा पाप:- परपीड़ा (दूसरों को दुःख पहुँचाना या सताना)* ही सबसे बड़ा पाप है।

पर हित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

५: *मानस रोग (मन की बीमारियाँ) कौन-कौन सी हैं?*
*उत्तर:* काकभुशुंडि जी ने मानसिक विकारों को सबसे खतरनाक रोग बताया:―
*मोह* सभी रोगों की जड़ है।
*काम* (वासना) वात (गैस) रोग की तरह है।
*लोभ* अपार कफ है।
*क्रोध* पित्त है, जो छाती को जलाता रहता है।

जब ये तीनों (काम, क्रोध, लोभ) आपस में मिलते हैं, तो जीवन में कष्टदायक त्रिदोष (सन्निपात) पैदा करते हैं।

६: ज्ञान और भक्ति में से कौन सा मार्ग श्रेष्ठ और सुगम है?
*उत्तर:* काकभुशुंडि जी ने स्पष्ट रूप से *भक्ति मार्ग* को श्रेष्ठ और सुगम बताया।
*ज्ञान का मार्ग:* यह तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है। इसमें साधक को अहंकार या पतन का डर हमेशा रहता है (जैसे दीपक को हवा का डर होता है)।
*भक्ति का मार्ग:* यह स्वतंत्र और अत्यंत सुगम है। भक्ति एक ऐसी 'चिंतामणि' है, जो बिना किसी बाहरी साधन के स्वयं प्रकाशित रहती है और भक्त को सहज ही ईश्वर तक पहुँचा देती है।

७: बुद्धिमानों के शिरोमणि गरुड़ जी ने अंतिम प्रश्न पूछा कि— ज्ञान, विज्ञान और विवेक का वास्तविक स्वरूप क्या है?
*उत्तर:*
*ज्ञान:* ईश्वर और जीव के भेद को समझना और माया से दूर रहना ज्ञान है।
*विज्ञान:* सब कुछ छोड़कर केवल और केवल श्री राम के चरणों में अनन्य प्रेम होना ही सच्चा विज्ञान है।
*विवेक:* सत्य और असत्य का निर्णय कर पाना, और यह जान लेना कि संसार नश्वर है और केवल परमात्मा ही शाश्वत सत्य हैं, विवेक है।
ये सात प्रश्न और उत्तर पूरे रामचरितमानस का निचोड़ हैं, जो मनुष्य को जीवन जीने की सही कला और अध्यात्म का सर्वोच्च ज्ञान देते हैं ।

जय श्रीराम

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ललिता सखी का स्थान ब्रज क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।1️⃣ ललिता सखी का गाँवललिता सखी का गाँव उँचागाँव माना जा...
05/06/2026

ललिता सखी का स्थान ब्रज क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
1️⃣ ललिता सखी का गाँव
ललिता सखी का गाँव उँचागाँव माना जाता है।
यह गाँव बरसाना के पास स्थित है, जो राधा रानी की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है।
2️⃣ वहाँ का पवित्र कुंड
उँचागाँव में एक बहुत प्रसिद्ध कुंड है जिसे
ललिता कुंड कहा जाता है।
3️⃣ ललिता कुंड का महत्व
माना जाता है कि यहाँ ललिता सखी और अन्य सखियाँ जल क्रीड़ा करती थीं।
इस स्थान पर राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन ब्रज की परंपराओं में मिलता है।
ब्रज यात्रा करने वाले भक्त इस कुंड के दर्शन करने अवश्य जाते हैं।
यह स्थान बहुत शांत और आध्यात्मिक माना जाता है।
🌸 विशेष बात:
ललिता सखी, राधा रानी की सबसे प्रिय और प्रमुख सखी मानी जाती हैं। वे राधा-कृष्ण की लीलाओं में संदेशवाहक और सहयोगी के रूप में वर्णित हैं।

💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰*【आपका परिचय-】**एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था । एक छोटी सी रियासत में मेहमान बना ।...
04/06/2026

💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰💰

*【आपका परिचय-】*

*एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था । एक छोटी सी रियासत में मेहमान बना ।*

*उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :*

*स्वामी, एक प्रश्न मैं बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं । कोई उत्तर नहीं मिलता ।*
*क्या आप मुझे उत्तर देंगे?*

*संन्यासी ने राजा से कहा : निसंदेह आज तुम खाली नहीं लौटोगे। निश्चित दूंगा। पूछो।*

*राजा ने कहा : मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं । ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना। मैं सीधा मिलना चाहता हूं।*

*उस संन्यासी ने कहा : अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर?*

*राजा ने कहा: माफ़ करिए , शायद आप समझे नहीं। मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले व्यक्ति की बात कर रहा हूं ; जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो?*

*संन्यासी ने कहा : महानुभाव, भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का ही धंधा करता हूं। अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें।*

*तुम तो बीस साल से भगवान से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो।*

*राजा ने हिम्मत की और उसने कहा : अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए।*

*संन्यासी ने कहा : इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं।*

*राजा ने अपना नाम, अपना महल का नाम, अपना परिचय, अपनी उपाधियां लिखकर उन्हें दी!*

*तब वह संन्यासी बोला कि महाशय, ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं हैं।*

*राजा हतप्रभ था कि इस सन्यासी को मेरे परिचय पर संदेह क्यों हो रहा है?*

*संन्यासी ने कहा : अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे? तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा?*

*उस राजा ने कहा : नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा? नाम, नाम है, और मैं, मैं हूं!*

*तो संन्यासी ने कहा : एक बात तो तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं। आज तुम राजा हो, कल गांव के भिखारी हो जाओगे तो क्या बदल जाओगे?*

*उस राजा ने कहा : नहीं, अगर मेरा राज्य चला जाएगा, मैं भिखारी भी हो जाऊंगा, लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा? मैं तो जो हूं, हूं। राजा होकर जो हूं, भिखारी होकर भी वही रहूँगा! अगर महल, राज्य और धन- संपति नहीं भी होगी तो भी मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं!*

*फिर संन्यासी ने कहा : तो तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं।*
*अब ये बताओ तुम्हारी उम्र कितनी है?*

*उसने कहा : चालीस वर्ष!*

*संन्यासी ने कहा: तो पचास वर्ष के होकर क्या तुम कुछ और हो जाओगे? जब तुम बीस वर्ष या जब बच्चे थे तो क्या तब तुम कोई और थे?*

*उस राजा ने कहा : नहीं! उम्र बदलती है, शरीर बदलता है लेकिन मैं कभी नहीं बदला! मैं तो जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था, वह आज भी है!*

*संन्यासी ने कहा : अब तो उम्र भी तुम्हारा परिचय नहीं रहा, शरीर भी तुम्हारा परिचय नहीं रहा! अब अपना असली परिचय लिखकर दो कि असलियत में तुम कौन हो? अगर वह आप लिख दोगे तो मैं उसे भगवान के पास पहुंचा दूंगा, अन्यथा गलत जानकारी देने के कारण मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ! अभी तक तुम स्वयं बतला चुके हो कि अब तक का दिया परिचय तुम्हारा नहीं है।*

*राजा बोला : अब तो बड़ी कठिनाई हो गई। उसे तो मैं भी नहीं जानता! आखिर जो मैं हूं , उसे तो मैं नहीं जानता! अब तक मैं इन्हीं को अपना परिचय समझता था!*

*संन्यासी ने कहा : मेरे लिय भी यह धर्म संकट है कि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं, बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है, तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलाना चाहता है?*

*तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो ।*

*और मैं तुमसे वचन देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम्हें भगवान को खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि स्वयं को जानने में ही वह भी जान लिया जाएगा जो परमात्मा है यानी जिसने खुद को जान लिया उसने परमात्मा को पा लिया!*

*खुद के बोध के लिय सदगुरु की शरणागत होना होगा तभी साक्षात् परम ब्रह्म का दर्शन हो पायेगा!*

*जिसने भी वह दर्शन किया, अपने अन्दर जीते जी किया।*
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🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄*🐂 गाय के किस अंग में है कोन से देवता का वास 🐂**साधु संत कहते हैं कि जो मनुष्य प्रातः स्नान करके गौ स्पर्श कर...
03/06/2026

🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄

*🐂 गाय के किस अंग में है कोन से देवता का वास 🐂*

*साधु संत कहते हैं कि जो मनुष्य प्रातः स्नान करके गौ स्पर्श करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं और वेदों में भी गाय की महत्ता और उसके अंग- प्रत्यंग में दिव्य शक्तियां होने का वर्णन मिलता है।*

*गाय के गोबर में लक्ष्मी, गोमूत्र में भवानी, चरणों के अग्रभाग में आकाशचारी देवता, रंभाने की आवाज में प्रजापति और थनों में समुद्र प्रतिष्ठित है मान्यता है।*

*गौ को के पैरों में लगी हुई मिट्टी का तिलक करने से तीर्थ-स्नान का पुण्य मिलता है। यानी सनातन धर्म में गौ को दूध देने वाला एक केवल पशु न मानकर सदा से ही उसे देवताओं की प्रतिनिधि माना गया है।*

*गाय के अंगों में देवी देवताओं का निवास*

*पद्म पुराण के अनुसार गाय के मुख में चारों वेदों का निवास है। उसके सींगों में भगवान शिव और विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सींग के अग्रभाग में इंद्र, दोनों कानों में अश्वनी कुमार, नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़, जिव्हा (जीभ) में सरस्वती, अपान (गुदा) में समस्त तीर्थ, मूत्र स्थान में गंगा जी, रोमकुपो में ऋषिगण, पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम पार्श्व में महाबली यक्ष, मुख के भीतर गंधर्व, नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले भाग में अप्सराएं स्थित हैं।*

*भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्मांड पुराण, महाभारत में भी गौ के अंग-प्रत्यंग में देवी देवताओं की स्थिति का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।*

*गायों का समूह जहां बैठकर आराम से स्वांस लेता है उस स्थान की ने केवल शोभा बढ़ाती है, अपितु वँहा का सारा पाप भी नष्ट हो जाता है। तीर्थो में स्नान दान करने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से, व्रत-उपवास, जप-तप और हवन-यज्ञ करने से जो पुण्य मिलता है। वही पुन्य गौसेवा गौमाता को भोजन चारा खिलाने से प्राप्त हो जाता है।*

*एकादशी पर गौसेवा से दुख दुर्भाग्य दूर होता है और घर में सुख समृद्धि आती है। जो मनुष्य गौ की श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, देवता उन पर सदैव प्रसन्न रहते हैं जिसके फलस्वरूप घर मे धन-धान्य सुख समृद्धि आती है।*

*👉अमावश्या पर गौसेवा गौमाताओं को भोजन चारा इत्यादि खिलाने से पितृगण प्रश्नन होते हैं जिसके फलस्वरूप वंश में वृद्धि संतान उतपत्ति पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।*

*👉जिस घर में भोजन करने से पूर्व गौग्रास निकाला जाता है उस परिवार में अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती।*

*।। इति शुभम् ।।*

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