ब्रज साहित्य परिषद् न्यास्

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ब्रज साहित्य परिषद् न्यास् ब्रजभाषा के संरक्षण/संवर्धन हेतु कार्यरत।
ब्रजरसिक भक्तों की जन्म जयन्तियां एवं काव्य गोष्ठी आयोजन।
(3)

21/11/2025

डाकोर वाले पूज्य बड़े महाराज जी का संतो के प्रति अदभुत प्रेम।

निरन्तर वंदनीय पूज्य संत श्री गयाप्रसाद पण्डित जी महाराज के 132 वें जन्म जयंती महोत्सव की सभी को मंगल बधाई।
27/10/2025

निरन्तर वंदनीय पूज्य संत श्री गयाप्रसाद पण्डित जी महाराज के 132 वें जन्म जयंती महोत्सव की सभी को मंगल बधाई।

दुर्लभ दीपावली दर्शनपूज्य संत पं• श्री गयाप्रसाद जी महाराज, गोवर्धन
19/10/2025

दुर्लभ दीपावली दर्शन
पूज्य संत पं• श्री गयाप्रसाद जी महाराज, गोवर्धन

16/10/2025

प्रिय रामनामतें जाहि न रामो ।
ताको भलो कठिन कलिकालहुँ आदि - मध्य - परिनामो ॥१॥
सकुचत समुझि नाम - महिमा मद - लोभ - मोह - कोह - कामो ।
राम - नाम - जप - निरत सुजन पर करत छाँह घोर धामो ॥२॥
नाम - प्रभाउ सही जो कहै कोउ सिला सरोरुह जामो ।
जो सुनि सुमिरि भाग - भाजन भइ सुकृतसील भील - भामो ॥३॥
बालमीकि - अजामिलके कछु हुतो न साधन सामो ।
उलटे पलटे नाम - महातम गुंजनि जितो ललामो ॥४॥
रामतें अधिक नाम - करतब , जेहि किये नगर - गत गामो ।
भये बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदाससे बामो ॥५॥

भावार्थः - जिसे श्रीरामजी भी राम - नामकी अपेक्षा अधिक प्यारे नहीं है ( यदि कोई कहे कि तुम्हें राम मिल जायँगे , पर राम - नाम छोड़ना होगा , तो वह इस बातको भी स्वीकार नहीं करता ; वह कहता है कि यदि श्रीरामके मिलनेसे राम - नाम छोड़ना पड़े तो मुझे श्रीरामके मिलनेकी आवश्यकता नहीं है । मुझे तो उनका नाम ही सदा चाहिये । ऐसे नाम - प्रेमीसे राम कितना प्रेम करते हैं , सो तो केवल राम ही जानते हैं , गोसाईंजी कहते हैं कि जो इस प्रकार राम - नामका मतवाला हैं ) उसका इस कराल कलिकालमें , आदि मध्य और अन्त , तीनों ही कालोंमें कल्याण होगा ॥१॥

नामकी महिमा समझकर अभिमान , लोभ , अज्ञान , क्रोध और काम सकुचा जाते हैं , सामने नहीं आते । जो सज्जन सदा राम - नामका जप करते रहते हैं , उनपर कड़ी धूप भी छाया कर देती है ( महान - से - महान दुःख भी सुखरुप बन जाते हैं ) ॥२॥

यदि कोई कहे कि नामके प्रभावसे पत्थरमें कमल उत्पन्न हो गया , तो उसे भी सच ही समझना चाहिये ( क्योंकि राम - नामके प्रभावसे असम्भव भी सम्भव हो जाता हैं ) जिस नामको सुनने और स्मरण करनेसे भीलनी शबरी भी परम भाग्यवती तथा शील और पुण्यमयी बन गयी ( उससे क्या नहीं हो सकता ? ) ॥३॥

वाल्मीकि और अजामिलके पास तो कोई भी साधनकी सामग्री नहीं थी , किन्तु उन्होंने भी उलटे - पुलटे राम - नामके माहात्म्यसे घुँघचियोंसे जवाहरात जीत लिये ( परम रत्न परमात्माको प्राप्त कर लिया ) ॥४॥

नामकी शक्ति श्रीरघुनाथजीसे भी अधिक है , ( क्योंकि श्रीरामजी इस नामसे ही वशमें होते हैं ) इस राम - नामने ग्रामीण मनुष्योंको चतुर नागरिक बना दिया ( असभ्योंका परम पुनीत महात्मा बना दिया ) । जिसे जपकर तुलसीदास - सरीखे बुरे जीव भी डंकेकी चोट अच्छे हो गये ( फिर कहनेको क्या रह गया ? ) ॥५॥

15/10/2025

मिली सखी सहेली हरिवंशी अग्रदासी।

25/09/2025
पूज्य श्री महाराज जी के मंगलमय जन्मोत्सव की बधाई |
28/08/2025

पूज्य श्री महाराज जी के मंगलमय जन्मोत्सव की बधाई |

27/08/2025

विगत बरसन की तरै अबकै हू आपकी अपनी ब्रज साहित्य परिषद न्यास के तत्वावधान में एक सरस ब्रजभासा काव्य गोष्ठी बलदेव छट महोत्सव के उपलक्ष्य में 27.8.25 कूं सांय चार बजे ते दाऊजी मन्दिर मोदी खाना बड़ा बाजार गोवर्धन में हैवौ सुनिश्चित भयौ है जाकी सूचना आयोजक द्वारा समाचार पत्र में हू प्रकाशित कराकें सभी पदाधिकारियों सदस्यों साहित्य सेवियों साहित्यानुरागिन ते कार्य क्रम में समय ते उपस्थित हैकै कार्य क्रम कूं सफल बनायबे की प्रार्थना करी गई है और करी जाय रही है उपलब्ध हैं सूचना

19/08/2025

जानिये कब से शिवजी के दुग्धाभिषेक की परम्परा शुरू हुई |

16/08/2025

अपने साधन को कभी शिथिल नहीं पड़ने देना और अपने साधन से कभी सन्तुष्ट नहीं होना |

"मैं जब जब सोहनी लगाऊं, यह लाला कनुवा  पत्थर-कंकड़ लाकर मेरे सामने डार देवै।"परम पूज्य प्रातः स्मरणीय संत श्री गयाप्रसाद...
13/08/2025

"मैं जब जब सोहनी लगाऊं, यह लाला कनुवा पत्थर-कंकड़ लाकर मेरे सामने डार देवै।"
परम पूज्य प्रातः स्मरणीय संत श्री गयाप्रसाद जी महाराज (पण्डित जी) की पुण्यतिथि पर -
बाबा के लाला की जय 🙏🏻 🙏🏻 🙏🏻

पूज्य पण्डित जी गोवर्धन जी में विराजते थे।
वे नित्य सोहनी सेवा करते।

सोहनी सेवा करने का उनका भाव यह था कि —
"मेरे प्रियालाल जी इसी पथ से गुजरेंगे, इस पथ के कंकड़-पत्थर, काँटे उन्हें न चुभें। प्रियालाल जी को इस पथ पर चलने में कोई कष्ट न हो।"

पथ की सफाई करते हुए उन्हें स्वयं कोई काँटा चुभ जाता —
तो वे आनन्द से उछल पड़ते,
कि —
"अच्छा हुआ यह काँटा मुझे चुभा।
अगर यह प्रियालाल जी के चरणों में चुभता तो उन्हें कितना कष्ट होता!
मेरी स्वामिनी कितनी कोमल हैं — वे यह दर्द कैसे सहतीं!
अच्छा हुआ, यह मुझे चुभा..."

● सोहनी सेवा करते-करते यदि सोहनी झड़ जाती थी,
छोटी हो जाती थी — तो वे उसे एक गड्ढा बनाकर समाधि देते।

उनका भाव था —
"इस सोहनी ने प्रियालाल जी की सेवा की है,
ब्रजरज का इसे नित्य अभिषेक प्राप्त हुआ है,
यह तो परम वन्दनीय है।
इसे यहाँ-वहाँ फेंक देंगे तो किसी के पैर उस पर पड़ेंगे,
और सोहनी जी की अवहेलना हो जाएगी!"

यह दिव्य, निष्कलुष भाव उनका था।

● बाबा अपनी कुटिया के सामने सोहनी लगाते
और सोहनी लगाते-लगाते रोने लगते।

एक दिन एक महात्मा उनके पास आए और पूछने लगे —
"बाबा, आप क्यों रो रहे हैं?"

तो बाबा ने सहज भाव से कहा —

"मैं जब जब सोहनी लगाऊं, यह लाला कनुवा पत्थर-कंकड़ लाकर मेरे सामने डार देवै।"

इसी खुशी के कारण पण्डित जी को आनंदाश्रु आ रहे हैं
यह श्री कृष्ण प्रेम ही तो है!"

06/08/2025

ब्रजवासियों का संतों के प्रति प्रेम |

Address

ब्रज साहित्य परिषद् न्यास (परासौली)
Mathura
281502

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