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21/08/2026

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🌙 क्या आप जानते हैं वृंदावन के प्यारे कान्हा को 'श्रीकृष्णचंद्र' क्यों कहा जाता है? वृंदावन के कान्हा का चंद्रमा से कनेक...
20/08/2026

🌙 क्या आप जानते हैं वृंदावन के प्यारे कान्हा को 'श्रीकृष्णचंद्र' क्यों कहा जाता है?
वृंदावन के कान्हा का चंद्रमा से कनेक्शन: इसलिए कहलाए 'श्रीकृष्णचंद्र' 🌙🦚
क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्रीकृष्ण को हमेशा 'श्रीकृष्णचंद्र' या 'चंद्रवंशी' क्यों कहा जाता है? दरअसल, श्री हरि विष्णु के इस अवतार का चंद्रमा से बेहद गहरा नाता रहा है। आइए जानते हैं इसके पीछे के अद्भुत रहस्य:
✨ जन्म और ज्योतिषीय योग
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को महानिशीथ काल (मध्यरात्रि) में हुआ था।
उस समय चंद्रमा अपने सबसे प्रिय 'रोहिणी नक्षत्र' में था।
रात्रि 12 बजे वृष लग्न था और चंद्रमा लग्न में ही उच्च के होकर विराजमान थे।
मूलतः श्रीकृष्ण का अवतार पूरी तरह से 'चंद्रमा प्रधान' था।
✨ 16 कलाओं से परिपूर्ण अवतार
जिस प्रकार चंद्रमा की 16 कलाएं (अवस्थाएं) होती हैं और एक स्त्री 16 श्रृंगार से सम्पूर्ण होती है, ठीक उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण थे। उपनिषदों के अनुसार, 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्वर तुल्य (सम्पूर्ण ब्रह्म) होता है।
कलाओं के नाम: अन्नमया, प्राणमया, मनोमया, विज्ञानमया, आनंदमया, अतिशयिनी, विपरिनाभिमी, संक्रमिनी, प्रभवि, कुंथिनी, विकासिनी, मर्यदिनी, सन्हालादिनी, आह्लादिनी, परिपूर्ण और स्वरुपवस्थित।
✨ श्रीकृष्ण और चंद्रमा के बीच अद्भुत समानताएं:
🌺 त्वचा का रंग: उनका रंग 'मेघ श्यामल' था, ठीक वैसे ही जैसे चंद्रमा बादलों के बीच छिप गया हो (काला, नीला और सफेद का मिश्रण)।
🌺 मादक सुगन्ध: उनके शरीर से हमेशा चंद्रमा प्रधान 'रातरानी' के पुष्पों जैसी मनमोहक गंध आती थी।
🌺 शारीरिक बनावट: उनकी देह चंद्रमा के समान ही अत्यंत कोमल (मृदु) थी, लेकिन युद्ध के समय वह वज्र के समान कठोर हो जाती थी। (जैसे चंद्रमा पूर्णिमा पर पूर्ण और अमावस्या पर शून्य हो जाता है)।
🌺 समुद्री निवास: उन्होंने अपना अंतिम पड़ाव चंद्र प्रधान समुद्री क्षेत्र 'द्वारिका' को बनाया, जहां वे साल में केवल 6 महीने ही रहते थे (चंद्रमा के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की तरह)।
🌺 अंतिम समय: श्रीकृष्ण ने अपनी देह भी चंद्रमा प्रधान 'सोमनाथ तीर्थ' (प्रभास क्षेत्र) में ही छोड़ी थी।
यही कारण है कि हर भक्त उन्हें बड़े ही प्रेम से 'श्रीकृष्णचंद्र' कहकर पुकारता है। 🙏
जय जय श्री राधे! 🌺🌍
जय श्रीकृष्णचंद्र!

हरिद्वार के नील पर्वत की चोटी पर विराजमान मां चंडी देवी मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसे हरिद्वार के प्रस...
20/08/2026

हरिद्वार के नील पर्वत की चोटी पर विराजमान मां चंडी देवी मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसे हरिद्वार के प्रसिद्ध सिद्धपीठों में माना जाता है और यह पंच तीर्थों में शामिल नील पर्वत तीर्थ से भी जुड़ा है।

🔱 प्राचीन इतिहास

परंपरा के अनुसार मंदिर की मुख्य प्रतिमा की स्थापना आदि शंकराचार्य से जुड़ी 8वीं शताब्दी की मान्यता है। वर्तमान मंदिर भवन का निर्माण 1929 में कश्मीर के राजा सुचत सिंह ने करवाया था।

🌺 मां चंडी की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार असुरराज शुंभ और निशुंभ ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की प्रार्थना पर देवी चंडिका का प्राकट्य हुआ।
देवी और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। देवी के क्रोध से प्रकट हुई कालिका ने चंड और मुंड का वध किया, जिसके बाद देवी चंडिका ने शुंभ और निशुंभ का भी संहार किया। मान्यता है कि युद्ध के बाद देवी ने नील पर्वत पर विश्राम किया, इसलिए यह स्थान मां चंडी की पवित्र उपस्थिति से जुड़ा माना जाता है।

🙏 धार्मिक महत्व

मां चंडी देवी को भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली देवी के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है। हरिद्वार के मां चंडी देवी, मां मनसा देवी और मां माया देवी के मंदिरों का धार्मिक महत्व विशेष है।

🚡 मंदिर तक कैसे पहुंचें?

चंडी घाट से मंदिर तक लगभग 3 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई की जा सकती है। इसके अलावा रोपवे (उड़न खटोला) से भी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
जय मां चंडी देवी 🙏🚩
हर हर महादेव 🔱
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19/08/2026

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हर हर महादेव
17/08/2026

हर हर महादेव

हर हर महादेव 🙏🕉️
17/08/2026

हर हर महादेव 🙏🕉️

🕉️🪱 उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर ..🕉️क्यों खुलता है सिर्फ साल में एक दिन..‼️🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 हिंदू धर्म में सदियों से नागों...
17/08/2026

🕉️🪱 उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर ..🕉️
क्यों खुलता है सिर्फ साल में एक दिन..‼️
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है।

इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।

नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।

पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया।

लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।

यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।

*नाग पंचमी पर्व पर भगवान श्री नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए मध्य रात्रि में पट खुले।*

*मंदिर के पट खुलने के बाद सर्वप्रथम श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाडा श्री महाकालेश्वर मंदिर के महंत श्री विनीतगिरी महाराज जी ने विधि-विधान से श्री नागचंद्रेश्वर भगवान का पूजन अर्चन किए

श्री नाग चंद्रेश्वर की प्रतिमा के पूजन के पश्चात श्री नागचंद्रेश्वर के शिवलिंग का पूजन और अभिषेक किया गया। *

*पूजन अर्चन के बाद भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन आम दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए गए ।*👏👏👏

नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।

नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होती है।

🙏🌷 ॐ नागेश्वराय नमः 🌷🙏
🌷🙏 हर हर महादेव 🙏🌷
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16/08/2026

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