SHEwet Foundation

SHEwet Foundation To empower adolescent girls and women through access to health, education, and social justice—creating safe spaces, informed communities, and inspired futures.

At  , we believe that education is not just a right, but a key to a brighter future. For countless children, especially ...
08/09/2025

At , we believe that education is not just a right, but a key to a brighter future. For countless children, especially girls, a book is more than just pages—it's a path to empowerment and a world of possibilities.

At Shewet Foundation, we believe in creating safe spaces where women and girls can speak openly about their bodies, heal...
01/08/2025

At Shewet Foundation, we believe in creating safe spaces where women and girls can speak openly about their bodies, health, and rights.
Last week, we organized a community awareness session in the heart of the village to break the silence around menstrual health. Women of all ages joined us for open discussions, storytelling, and peer-sharing—building knowledge, confidence, and solidarity.
Together, we’re shaping a world where no woman feels ashamed of her period.

अक्टूबर जंक्शन: समय, संबंध और बनारस की कविताइस अनंत दुनिया में, जो असंख्य वर्षों से अनवरत चल रही है, अनगिनत लोग आए और चल...
31/03/2025

अक्टूबर जंक्शन: समय, संबंध और बनारस की कविता

इस अनंत दुनिया में, जो असंख्य वर्षों से अनवरत चल रही है, अनगिनत लोग आए और चले गए। हर किसी ने अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जिया—कुछ साधारण, कुछ असाधारण। लेकिन उनमें से कई कहानियाँ, जो अकल्पनीय और अनोखी थीं, समय की धूल में कहीं दबकर रह गईं। ऐसी कहानियों को जीवित रखने का जिम्मा हमारे समाज के उन कथाकारों ने उठाया, जिनके पास शब्दों की ताकत और संवेदनाओं की गहराई है। इन्हीं में से एक हैं दिव्य प्रकाश दुबे, जिन्होंने "अक्टूबर जंक्शन" के जरिए सुदीप और चित्रा की कहानी को न सिर्फ सुना, बल्कि इसे दुनिया के सामने एक काव्यात्मक चित्र की तरह पेश किया।

सुदीप और चित्रा: दो किनारे, एक कहानी
सुदीप और चित्रा इस कहानी के दो ध्रुव हैं—दो समानांतर रेल की पटरियाँ, जो एक साथ चलती हैं, एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं, पर कभी मिल नहीं पातीं। या शायद गंगा के दो किनारे, जो पास हैं, एक-दूसरे को देखते हैं, पर बीच में बहती नदी उन्हें अलग रखती है। उनकी मुलाकातें हर साल 10 अक्टूबर को बनारस में होती हैं—एक ऐसा दिन, जो उनके जीवन में एक जंक्शन बन जाता है। वे न दोस्त हैं, न प्रेमी, न रिश्तेदार, फिर भी उनके बीच का यह अनकहा बंधन उनकी आत्मा को गहरे तक छूता है। बनारस के किसी बाबा की वह बात यहाँ सच साबित होती है—"वो कहीं नहीं गया है, वो तुझमें ही है।" यह रिश्ता शारीरिक दूरी से परे, आत्मा की गहराइयों में बसता है।

"अक्टूबर जंक्शन" सिर्फ सुदीप और चित्रा की कहानी नहीं है; यह अक्टूबर की भी कहानी है। अक्टूबर इस किताब में एक महीने से कहीं बढ़कर है—यह आशा की हवा है, विश्वास की गर्माहट है, प्रतीक्षा की ठंडी छाँव है, और सुकून की वह धुन है जो दिल को थाम लेती है। यह वह समय है जब बनारस की गलियों में घंटियों की आवाज़ गंगा के प्रवाह के साथ मिलती है, और सुदीप-चित्रा की दुनिया एक-दूसरे से टकराकर एक क्षणिक लेकिन अनंत संगीत रचती है। अक्टूबर प्रेम से परे है—यह वह जादू है जो बाकी महीनों में कभी नहीं बिखरता। यह परिवर्तन के रंगों और नई शुरुआत की सुगंध के साथ आता है, जो हर मुलाकात को एक नया अध्याय बनाता है।

बनारस इस कहानी का मूक नायक है। यह वह शहर है जहाँ जीवन और मृत्यु एक साथ साँस लेते हैं, जहाँ गंगा का किनारा सपनों और वास्तविकता को एक धागे में पिरोता है। दिव्य प्रकाश दुबे ने बनारस को इस तरह चित्रित किया है कि आप मंदिरों की घंटियों को सुन सकते हैं, गंगा की लहरों को महसूस कर सकते हैं, और उस हवा को छू सकते हैं जिसमें सुदीप और चित्रा हर साल एक-दूसरे से मिलते हैं। यह सेटिंग कहानी को एक जीवंत रंग देती है, जो पाठक को उस दुनिया में खींच ले जाती है जहाँ समय ठहर जाता है।

"अक्टूबर जंक्शन" कोई साधारण उपन्यास नहीं है; यह एक कविता है, जहाँ हर पंक्ति में भावनाएँ नृत्य करती हैं। सुदीप और चित्रा इस कविता के दो स्वर हैं—अलग-अलग, पर एक साथ होने पर ही पूरे। उनकी हर मुलाकात एक नया छंद है, जो पाठक के मन में एक गूंज छोड़ जाता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि कुछ रिश्ते परिभाषाओं से परे होते हैं, और कुछ क्षण समय की सीमाओं को तोड़ देते हैं।

आभार और आशा
इस खूबसूरत कहानी से मिलवाने के लिए हमारी प्यारी सी मुस्कान का धन्यवाद, जिसने मुझे दिव्य प्रकाश दुबे के शब्दों के जरिए सुदीप, चित्रा और अक्टूबर की दुनिया तक पहुँचाया। यह किताब मेरे लिए सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक एहसास बन गई है। उम्मीद है कि आने वाले समय में ऐसे और सुदीप और चित्रा अपनी कहानियाँ हमारे सामने लाएँगे, जो जीवन को और समृद्ध करेंगी।

साभार,
With Good luck and light

'यार पापा' एक ऐसी किताब है जो उस शाश्वत विषय पर बुनती है जिसे अनगिनत लेखकों ने अनगिनत तरीकों से छूने की कोशिश की है - Hu...
29/03/2025

'यार पापा' एक ऐसी किताब है जो उस शाश्वत विषय पर बुनती है जिसे अनगिनत लेखकों ने अनगिनत तरीकों से छूने की कोशिश की है - Humans and thier offsprings. हर प्रजाति के लिए प्रजनन उसकी उत्तरजीविता का आधार हो सकता है, पर क्या माता-पिता बनना केवल अपनी प्रजाति को बचाए रखने की एक जैविक प्रक्रिया है? या इसमें कुछ और भी गहरा छिपा है? आधुनिक लेखकों ने परवरिश के तौर-तरीकों पर ढेरों किताबें लिख डालीं, लेकिन क्या इन किताबों को पढ़कर कोई सचमुच ऐसी संतान पाल सकता है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन जाए?

सर Divya Prakash Dubey की 'यार पापा' इसी जटिल रिश्ते को अपने अनूठे अंदाज में समझने और समझाने की एक छोटी मगर सशक्त कोशिश है। इस कहानी का केंद्र है मनोज, जिसे अपने पिता से कहानियों का अनमोल खजाना विरासत में मिला - ऐसी कहानियां जो काले बादलों के बीच चिराग बनकर उसे रास्ता दिखाती रहीं। लेकिन इन कहानियों के साथ आई गरीबी, असमर्थता और सिस्टम से टकराने की एक चिंगारी भी। मनोज ने अपनी बेटी को हर सुख-सुविधा से नवाजा, पर वह अपने पिता की तरह उसे कहानियां न दे सका। नतीजतन, उसकी बेटी को कहानियों को दर-बदर तलाशना पड़ा।

मनोज भारत का सबसे बड़ा वकील बना, मगर अपने पिता के उस अधूरे वादे को पूरा करने में नाकाम रहा जब तक कि उसने 'पिता होने' का असली मतलब नहीं समझा। शायद अपने पिता से मिली असमर्थता पर उसका गुस्सा ही उसे इतना बड़ा वकील बनने की प्रेरणा दे गया, पर यही गुस्सा उसे पितृत्व की गहराई को समझने से रोकता भी रहा। जहां उसके पिता ने उसे कहानियों से समृद्ध किया, वहीं मनोज अपनी बेटी को भौतिक सुख देता रहा, लेकिन भावनाओं का वह पुल बनाने में चूक गया।

इस कहानी को जीवंत बनाने में कई पात्रों का योगदान है, जो हर कोने से इंसानी जज्बातों को उकेरते हैं। ये किरदार न सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि हमें मानव मन की गहराइयों में ले जाकर अंत तक जोड़े रखते हैं।

'यार पापा' बताती है कि अपने पिता को समझना एक ऐसी यात्रा है जो उम्र के साथ धीरे-धीरे खुलती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, उनके व्यक्तित्व की परतें हमारे सामने आती हैं, और अंत में हम खुद को उनके ही एक रूप में पाते हैं। यह किताब महज एक कहानी नहीं, बल्कि पिता और संतान के बीच के उस अनकहे बंधन का आईना है, जो हमें अपनी जड़ों और अपनी विरासत पर सोचने को मजबूर करती है।

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