30/11/2023
कौन है ये आर्य? यह प्रश्न स्वयं नेहरू ने "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" में भी उठाया है और उन्हें विदेशी, एलियन बताया है।
पुस्तक का यह पार्ट कौमनस्टों ने NCERT की पुस्तकें लिखवाते पाठ्यक्रम में डाला था। क्योंकि कौमनस्टों को आर्य सभ्यता आर्यावर्त्त के विरुद्ध नैरेटिव सेट करने का इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं मिला।
नेहरू जी बताते हैं कि जब मै जलसों में जाता था जिनमें ठेठ देहात से आये हुए गरीब किसान, गंवार और मेले कुचले फटेहाल मजदूर आते थे, और मैं भाषण देता था, उसमें दुनिया में होने वाली तब्दीलियों के बारे में बताता था तो लोग अक्सर आर्यसमाज अमर रहे के नारे लगाते थे।
तब मै पलटकर पूछता था "कौन है ये आर्य?" और लोग चुप हो जाते थे। फिर नेहरू जी उन्हें समझाते कि आर्य बाहर से आये हैं, विदेशी हैं। और कुछ नहीं हैं।
देहाती, गंवार मेले कुचलों को नेहरू द्वारा ज्ञान देने का विवरण सीताराम गोयल ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है। वे स्वयं उस सभा में मौजूद थे और मंच से उतरकर गाड़ी की तरफ जाते समय एक किसान ने उनके पैर छूने चाहे तो नेहरू ने न केवल उसे किक मारी बल्कि उसे अपने बूटों से तब तक रौंदते रहे जब तक कि उसे खींचकर दूर न ले जाया गया।
आर्य पूर्वज लिखते हैं "किसान की धुनाई करते हुए नेहरू किसी जानवर जैसा लग रहा था। उसके चेहरे पर इतना गुस्सा था, और वह क्यों था, उसे वे आज तक नहीं जान पाए।"
कोई व्यक्ति इतने बड़े पद पर रहते हुए अपने ही देशवासियों से इतनी घृणा कर सकता है, वे शॉक्ड हो गए। इस घटना के बाद आर्यपूर्वज नेहरू की किसी भी सभा में दुबारा नहीं गए और उनकी कम्पनी छोड़ दी।
आर्य, आर्यावर्त्त और आर्य सामाजिक परम्परागत ग्रामीणों के प्रति (जिसे ये भारतीय मानते हैं।) इस परिवार और उसकी कम्पनी की अतिशय घृणा रही है। नेहरू जी का बस चलता तो तत्कालीन समस्त बचे हुए आर्यवंशियों पर वे बुलडोजर चलवा देते।
बाद में उन्होंने और उनकी पुत्री ने कौमनस्टों को खुली छूट दी जिन्होंने भारत पर निर्बाध, 75 वर्ष तक मानसिक वैचारिक बुलडोजर चलाया और भारत को INDIA बनने पर मजबूर किया।
लगभग सभी पॉवरफुल चमचे आरम्भ से ही नेहरू के इस मन्तव्य को जानते थे। कांग्रेस में ऊपर चढ़ने और आगे बढ़ने, अंग्रेजों सत्ता हस्तांतरण की शर्त ही अतिशय आर्य घृणा और भारत विखंडन थी। वह प्रत्येक भाव जो देश को अखण्ड करता है, इन्हें उससे चिढ़ है।
भारत विभाजन और पाकिस्तान निर्माण इनकी इसी विध्वंसक सोच का मूर्त रूप था। भारत देश को इन्होंने बिल्कुल केक काटने जैसे काट दिया था जिसका इन्हें आज तक रत्ती भर अफसोस नहीं है। बल्कि आप इन्हें उस पर इतराते हुए ही महसूस करेंगे।
जब भी इनका खतरनाक और अत्यंत शक्तिशाली इकोसिस्टम पराजित होता है, इनके तलुआचाट घाघ वैचारिक पोषकों ने सीधा सीधा आर्यों, आर्यावर्त्त, आर्यसमाज पर हमला करने की रणनीति बनाई।
उन्हें जब भी आर्यों को गाली देनी होती है, वे हिन्दू, अंधभक्त, ब्राह्मण, सामंती, मनुवादी, संघी, पोंगापंथी, गौमूत्रसेवी इत्यादि प्रच्छन्न शब्दावली का सहारा लेते रहे।
भारत, आर्य, आर्यावर्त्त, आर्यसमाज, हिमालय जैसे प्रतीकों से इन्हें अतिशय घृणा है। अपनी सभाओं में ये इन शब्दों से परहेज करते हैं।
कौरवों के विनाश के बाद जो गुस्सा धृतराष्ट्र में भीम के प्रति था, लगभग वही स्थिति आज कौमनस्टों की है।
लेकिन कहते हैं न, दिल की बात होंठों पर आ ही जाती है।
छिपी शब्दावली से उन्हें अपने अटैक में वह मजा नहीं आता। जब तब वे फट पड़ते हैं, संसद में भी उनके नेता खड़गे आर्यों को विदेशी बताते हैं। जबकि अंबेडकर ने शूद्रों को आर्य मूलनिवासी बताया है।
पर कौमग्रसी और कौमनस्ट बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि उन्हें वैदिक धर्म, आर्य, आर्यावर्त्त और आर्यसमाज से भयंकर घृणा है। वे इसे नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके चमचे समय समय पर आकर चाहे जितनी सफाई दें, लीपापोती करें, बात को घुमाएं, पर वस्तुतः उन्हें आर्य, आर्यसमाज, आर्यावर्त्त को नष्ट करना ही करना है।
अब तक क्यों नहीं हुआ? यह ईश्वर की कृपा ही है।
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