29/10/2025
गंगा किनारे मानवता की कहानी – पटना में छठ पूजा
मैं पटना में अपने दल के प्रचार अभियान पर था। दिनभर की जनसभाओं और मुलाकातों के बाद शाम को जब गंगा किनारे पहुँचा, तो वहाँ का दृश्य देखकर मन भर आया।
सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था, और गंगा के जल पर सैकड़ों दीयों की लौ लहरों के साथ झिलमिला रही थी।
चारों ओर गूंज रही थी आवाज़ — “छठी मैया की जय!”
स्त्रियाँ उपवास रखकर श्रद्धा से जल में खड़ी थीं, और पूरा वातावरण भक्ति, प्रेम और एकता की भावना से भरा हुआ था।
छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारत की सबसे प्राचीन परंपराओं में से एक है।
इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है, और कहा जाता है कि भगवान राम और सीता जी ने अयोध्या लौटने के बाद पहली छठ पूजा की थी।
यह पर्व बिना किसी भेदभाव के मनाया जाता है — न मंदिर की दीवारें, न पुजारी की सीमाएँ — बस श्रद्धा, स्वच्छता और समानता।
यह सचमुच जनता का पर्व है — सबका, बिना किसी भेदभाव के।
गंगा तट पर उस शाम मैंने देखा — हर जाति और समुदाय के लोग एक साथ खड़े थे।
दलित, यादव, कुर्मी, ब्राह्मण, भूमिहार और मुस्लिम — सभी एक ही भाव से सूर्य को अर्घ्य देने आए थे।
जब महिलाएँ फल और ठेकुआ से भरे सूप लेकर नंगे पाँव घाट की ओर जा रही थीं,
मुस्लिम भाई सड़क पर पानी छिड़कते नज़र आए, ताकि व्रती महिलाओं के पैर ठंडे रहें।
यह एक मौन परंतु महान सेवा थी — इंसानियत का असली चेहरा।
पास ही रंजीत पासवान, एक किसान, और पंडित मिश्रा, एक पुजारी, अपने-अपने पूजा स्थल बगल-बगल में सजा रहे थे — टोकरी जमाते, दीये जलाते, प्रसाद रखते हुए।
किसी ने किसी से यह नहीं पूछा कि कौन किस जाति का है।
उस क्षण श्रद्धा और सरलता ने सभी भेद मिटा दिए थे।
मैंने वहाँ खड़े होकर महसूस किया — यही है भारत की असली ताकत, जो न सत्ता में है, न संपत्ति में,
बल्कि उस मानवता में है जो हमें एक करती है।
उस शाम गंगा ने केवल अर्घ्य नहीं, बल्कि प्यार, समानता और एकता का संदेश भी अपने साथ बहाया।
यही है भारत की आत्मा,
यही है वह भारत, जिसमें कांग्रेस पार्टी विश्वास करती है,
और यही है भारत का सपना, जिसे राहुल गांधी जी देख रहे हैं
जहाँ पर्व जोड़ते हैं, तोड़ते नहीं;
जहाँ धर्म इंसानियत का माध्यम है, दीवार नहीं।
जब सैकड़ों दीये गंगा में एक साथ बहे, उनकी रोशनी एक हो गई
जैसे विविधताओं से भरा भारत, एकता की एक ही लौ में जगमगाता है।
उस रात पटना की गंगा के तट पर मैंने सिर्फ़ एक पर्व नहीं देखा
मैंने भारत की जीवंत आत्मा को देखा।