17/09/2025
कुछ स्मृतियाँ चिरसंग्रहणीय होती हैं... K NEWS के 'कविता ज़िन्दाबाद' की शूटिंग के बाद ४ या ५ एपिसोड के प्रसारण हुए... हमारे एपिसोड के नम्बर ही नहीं आया... संयोग से इस बार की कानपुर यात्रा में आदरणीय सन्देश तिवारी भैया ने एक SSD दी, जिसमें यह एपिसोड मिल गया... पिक्चर क्वालिटी और वॉइस क्वॉलिटी दोनों ही बहुत अच्छी नहीं थी कई घण्टे के परिश्रम के बाद यह इस तरह एडिट हो पाया है.... श्रद्धेय प्रमोद तिवारी सर की कविताओं का हमारे जीवन पर विशेष प्रभाव रहा है...विशेष कर नदिया गीत का... उनकी स्मृति में कभी यह गीत लिखा...
उपलब्धियाँ बहुत होंगी, पर आप न होंगे साथ में।
ऐसा कभी कहाँ सोचा था, क्या है विधि के हाथ में?
स्वर्णिम सुधियाँ शेष बची हैं, और कई सीखें।
बाहर मुस्कानें हँसतीं हैं, भीतर से चीखें।।
हँसते हुए लकीरें सारी, चेहरे पर से साफ़ थीं;
देख नहीं पाये हम जो भी लिखा हुआ था माथ में।
कविता की अनवरत साधना, अपनी शर्तों पर।
मस्त फ़क़ीरी, सादा जीवन, अपने ही तेवर।
'नदिया' के तट पर हम खोजें, दूर आपको 'चाॅंद' तक;
संवेदना, दया, करुणा, वात्सल्य, स्नेह के क्वाथ में।
जीवन भर असत्य से लड़ना, चन्दन सम रहना।
प्रश्न न्याय का उठे जहाँ पर, साफ़-साफ़ कहना।।
विष पीकर, पीयूष बाँटकर, इस नश्वर संसार को।
आप रुद्र थे समा गये हैं, फिर से भोलेनाथ में।।
उपलब्धियाँ बहुत होंगी, पर आप न होंगे साथ में।
ऐसा कभी कहाँ सोचा था, क्या है विधि के हाथ में?
- पं. धीरज मिश्र 'शाण्डिल्य'
शब्दकार प्रमोद तिवारी साहित्य-सेवा न्यास