30/06/2026
"मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर बस से अपने गांव लौटने वाला नेता..."
भारतीय राजनीति में सादगी की जब भी चर्चा होगी, पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी साहिब सिंह लाकड़ा (वर्मा) जी का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।
आज 30 जून को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏🌹
15 मार्च 1943 को दिल्ली के मुंडका गांव में एक जाट किसान परिवार में जन्मे चौधरी साहिब सिंह लाकड़ा (वर्मा) जी का मूल पैतृक संबंध उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के रमाला गांव से था। लाकड़ा चौहान गोत्र के इस किसान पुत्र ने अपनी सादगी, ईमानदारी और जनसेवा से दिल्ली की राजनीति में एक अलग पहचान बनाई।
बहुत कम लोग जानते हैं कि राजनीति में आने से पहले वे पुस्तकालयाध्यक्ष (लाइब्रेरियन) थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा लाइब्रेरी साइंस में पीएचडी की। बाद में दिल्ली नगर निगम के पुस्तकालय में कार्य किया। इसी दौरान उनका संपर्क जनसंघ के वरिष्ठ नेताओं, विशेषकर अटल बिहारी वाजपेयी जी से हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित होकर उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए।
27 फरवरी 1996 को वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने शिक्षा, ग्रामीण विकास और आधारभूत संरचना पर विशेष ध्यान दिया। गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (IP University) की स्थापना उनके कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में मानी जाती है। उन्होंने ग्रामीण दिल्ली को लुटियंस दिल्ली से विकास की मुख्यधारा में जोड़ने का कार्य किया, गांवों में शिक्षा का विस्तार किया तथा हर गांव में लाइब्रेरी स्थापित करने की पहल को आगे बढ़ाया। यही कारण था कि वे शिक्षकों, विद्यार्थियों और ग्रामीण समाज में अत्यंत लोकप्रिय रहे।
उनकी पहचान केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि जवाबदेह और सादगीपूर्ण जननेता के रूप में रही। बढ़ती प्याज की कीमतों के बीच उन्होंने मुख्यमंत्री पद की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दिया।
पत्रकार मनोज कुमार मिश्रा की पुस्तक Delhi Darbar के अनुसार, 12 अक्टूबर 1998 को जब वे मुख्यमंत्री आवास छोड़कर अपने गांव लौटने लगे, तब हजारों जाट समर्थक मुख्यमंत्री आवास के बाहर एकत्र हो गए। बताया जाता है कि लगभग 5,000 समर्थकों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया और एक बुजुर्ग ने कहा— "आप जाट हो, हम आपको इस तरह इस्तीफा देकर जाने नहीं देंगे।" लेकिन संगठन के निर्णय का सम्मान करते हुए वे बस में बैठकर वहां से रवाना हो गए। सत्ता छोड़ने के बाद बस से गांव लौटने की यह घटना आज भी भारतीय राजनीति में सादगी और लोकतांत्रिक मर्यादा की सबसे बड़ी मिसालों में गिनी जाती है।
1999 में जनता ने उनके प्रति अपना विश्वास फिर जताया और उन्होंने बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट लगभग 2 लाख मतों के अंतर से जीती। इसके बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में श्रम एवं रोजगार मंत्री बने। मंत्री रहते हुए उन्होंने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) पर ब्याज दर घटाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए लाखों कर्मचारियों के हितों की मजबूती से रक्षा की। उनके इस दृढ़ रुख की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई और मीडिया ने उन्हें "A Bull in a China Shop" कहकर भी सराहा।
उन्होंने हमेशा संगठन को स्वयं से ऊपर रखा। जब वे मुख्यमंत्री बने तो उनके नाम का प्रस्ताव मदन लाल खुराना जी ने रखा था, और बाद में नेतृत्व परिवर्तन के समय उन्होंने स्वयं सुषमा स्वराज जी के नाम का समर्थन किया। यही उनकी राजनीतिक संस्कृति थी।
बहुत कम लोगों को यह भी ज्ञात है कि 'हरिभूमि' राष्ट्रीय हिंदी दैनिक समाचार पत्र भी उनके स्वामित्व में प्रकाशित होता था।
30 जून 2007 को राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना में एक विद्यालय की आधारशिला रखकर दिल्ली लौटते समय दिल्ली-जयपुर हाईवे पर हुई सड़क दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। उनके निधन से दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत ने एक ऐसा जननेता खो दिया जिसने राजनीति को सत्ता नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनाया।
आज उनके पुत्र प्रवेश साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के उपमुख्यमंत्री हैं। समय बदलता है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व अपने पद से नहीं, अपने चरित्र और सादगी से इतिहास बनाते हैं।
चौधरी साहिब सिंह लाकड़ा (वर्मा) जी का जीवन हमें सिखाता है कि राजनीति का सबसे बड़ा सम्मान कुर्सी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है।
ऐसे कर्मयोगी, किसान पुत्र, शिक्षाविद, सादगी की प्रतिमूर्ति और जननेता को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन ।