03/02/2026
रोहित ढकाल संस्कृत से पीएचडी कर रहे हैं, लेकिन उनकी पहचान किसी डिग्री से नहीं, बल्कि उस सेवा से है जो वे #बनारस के #ललिताघाट स्थित #मुमुक्षुभवन में करते हैं। यहां वे उन बुजुर्गों के साथ रहते हैं, जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर #मोक्ष की कामना लेकर काशी आते हैं। इस समय भवन में 10 माताएं और 5 पिता रहते हैं—रोहित के लिए ये सब उनके अपने माता-पिता जैसे हैं।
रोहित बताते हैं कि आम धारणा है कि लोग मरने के लिए #काशी आते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यहां भी अमीरी-गरीबी का फर्क दिखता है। जिनके पास पैसे हैं, वे होटल और #काशीवास चुनते हैं; जिनके पास नहीं, उनके लिए मुमुक्षु भवन ही सहारा है। यहां भोजन, दवा, देखभाल से लेकर अंतिम संस्कार तक की जिम्मेदारी मठ उठाता है। रोहित कहते हैं, “यह सब मैं किसी वाहवाही के लिए नहीं करता। मुझे इस सेवा में आनंद मिलता है।”
असम में जन्मे रोहित का परिवार नेपाल से जुड़ा है। बचपन में वे बनारस के एक #गुरुकुल में पढ़ने आए और यहीं के होकर रह गए। गुरुकुल की सख्त दिनचर्या—सुबह चार बजे उठना, पूजा-पाठ, पढ़ाई और सेवा—ने उनके जीवन को अनुशासित बनाया। आर्थिक तंगी के बावजूद यहीं उन्हें पढ़ने-लिखने और लोगों की मदद करने की आदत पड़ी।
मुमुक्षु भवन कभी 60 साल तक कब्जे में रहा, उपेक्षा और चोरी का शिकार हुआ। #नेपाल सरकार के सहयोग से धीरे-धीरे इसे फिर से संवारने का काम हुआ। #काशीविश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के दौरान पुरानी इमारत को नुकसान पहुंचा, तो बुजुर्गों को गुरुकुल वाले हिस्से में शिफ्ट करना पड़ा।
आज भी यहां रहने वाली कई माताएं 90 साल की उम्र में खुद खाना बनाती हैं। उनका प्रण है कि जीवन का अंतिम समय काशी में, अपने हाथों से बने भोजन के साथ बिताएंगी। रोहित और गुरुकुल के बच्चे उनकी दवा, देखभाल और दैनिक जरूरतों में जुटे रहते हैं।
अब तक 25 से अधिक माताओं का अंतिम संस्कार कराने को रोहित “सौभाग्य” कहते हैं—क्योंकि मुमुक्षु भवन में आना मोक्ष की चाह लेकर आना है। रोहित खुद को बस एक माध्यम मानते हैं। वे कहते हैं, “मैं पढ़ने आया था, लेकिन यहीं का हो गया। अब लौटना नहीं—इन मां-बाप की सेवा ही मेरा जीवन है।”