31/07/2026
वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ भारतीय इतिहास के उन महान राजपूत योद्धाओं में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने अद्वितीय साहस, स्वामिभक्ति, कूटनीति और त्याग से मारवाड़ की स्वतंत्रता और राठौड़ वंश की रक्षा की। वे किसी राज्य के राजा नहीं थे, फिर भी उनके योगदान ने उन्हें इतिहास के अमर नायकों में स्थान दिलाया। उन्हें “मारवाड़ का उद्धारक”, “मारवाड़ रत्न” और “स्वामिभक्ति का सर्वोच्च प्रतीक” कहा जाता है।
जन्म एवं परिवार
* जन्म: 13 अगस्त 1638
* जन्म स्थान: सालवा गाँव, मारवाड़ (वर्तमान जोधपुर, राजस्थान)
* पिता: आसकरण राठौड़ (महाराजा जसवंत सिंह के विश्वस्त सामंत/मंत्री)
* माता: नेतकँवर (नेतकंवर) देवी
दुर्गादास का पालन-पोषण मुख्यतः उनकी माता ने किया। उन्होंने बाल्यकाल से ही उनमें स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम, धर्मरक्षा और वीरता के संस्कार विकसित किए।
महाराजा जसवंत सिंह के प्रति निष्ठा
सन् 1678 में मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह के निधन के बाद मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने मारवाड़ पर अधिकार करने का प्रयास किया। उसी समय जसवंत सिंह के उत्तराधिकारी राजकुमार अजीत सिंह का जन्म हुआ। औरंगज़ेब उन्हें अपने नियंत्रण में रखना चाहता था।
ऐसी कठिन परिस्थिति में दुर्गादास राठौड़ ने अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर शिशु अजीत सिंह और राजपरिवार को सुरक्षित निकाला। इसके बाद उन्होंने लगभग तीन दशकों तक मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया और अंततः अजीत सिंह को मारवाड़ का वैध शासक स्थापित कराया।
औरंगज़ेब के विरुद्ध संघर्ष
दुर्गादास ने प्रत्यक्ष युद्धों के साथ-साथ गुरिल्ला युद्धनीति और कूटनीतिक रणनीतियों का भी सफल उपयोग किया। वे मुगल सेना को लंबे समय तक चुनौती देते रहे। उन्होंने मारवाड़ की स्वतंत्रता, राजपूत सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
धार्मिक सहिष्णुता
दुर्गादास केवल वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि उच्च चरित्र और उदार विचारों वाले व्यक्तित्व भी थे। उन्होंने औरंगज़ेब के पुत्र शहज़ादा अकबर के परिवार को संरक्षण दिया तथा उनके बच्चों की सुरक्षा और उचित पालन-पोषण सुनिश्चित किया। यह उनके न्यायप्रिय और मानवीय स्वभाव का प्रमाण माना जाता है।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
* अद्वितीय स्वामिभक्ति
* मातृभूमि के प्रति समर्पण
* अदम्य साहस और पराक्रम
* उत्कृष्ट युद्धनीति एवं नेतृत्व
* सत्यनिष्ठा और ईमानदारी
* धर्म एवं संस्कृति के रक्षक
* सहिष्णु और न्यायप्रिय व्यक्तित्व
निधन
* निधन: 22 नवम्बर 1718
* स्थान: उज्जैन (मध्य प्रदेश)
उज्जैन में उनकी स्मृति में निर्मित छतरी आज भी उनके त्याग और वीरता की याद दिलाती है।
प्रसिद्ध दोहा
“माई ऐहड़ा पूत जण, जेहड़ा दुर्गादास।
मार मंडासो थामियो, बिण थाम्बा आकास॥”
अर्थ: हे माता! यदि पुत्र को जन्म देना हो तो दुर्गादास जैसा पुत्र देना, जिसने बिना किसी सहारे के आकाश समान विशाल मारवाड़ की आन-बान और सम्मान को संभाले रखा।
प्रेरणा
वीर दुर्गादास राठौड़ का जीवन हमें सिखाता है कि निष्ठा, त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति किसी भी व्यक्ति को अमर बना सकते हैं। वे केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की गौरवशाली विरासत के प्रेरणास्रोत हैं। उनके जीवन से स्वाभिमान, कर्तव्यनिष्ठा और मातृभूमि की रक्षा का संदेश मिलता है।