21/08/2026
झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पर्वत को जैन धर्म में तीर्थराज कहा गया है। 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पावन भूमि से निर्वाण प्राप्त किया तथा असंख्य मुनिराजों ने यहाँ कठोर तप और साधना कर कर्मों का क्षय किया। पर्वत पर स्थित विभिन्न टोंक उन्हीं महान निर्वाण स्थलों की स्मृति हैं। इसलिए सम्मेद शिखरजी का प्रत्येक कण जैन समाज के लिए अत्यंत श्रद्धा और विनय का विषय है।
सम्मेद शिखरजी को पर्यटन स्थल समझकर नहीं, सिद्धों की भूमि समझकर जाना चाहिए। यहाँ की वंदना में कदम-कदम पर संयम, मौन, श्रद्धा और विनय होना चाहिए। नंगे पैर लगभग 27 किलोमीटर की कठिन वंदना करने का उद्देश्य केवल पर्वत पर चढ़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, प्रमाद और विषय-कषाय को कम करना है।
तीर्थ की महिमा जितनी महान है, उसकी अविनय का दोष भी उतना ही गंभीर हो सकता है। तीर्थ पर हँसी-मजाक, मौज-मस्ती, अहंकार, दिखावा, गंदगी फैलाना, जूठन छोड़ना या तीर्थ की पवित्रता को सामान्य स्थान की तरह लेना—ये सब ऐसे आचरण हैं जिनसे हर श्रावक को बचना चाहिए।
कहा जाता है कि एक व्यक्ति सम्मेद शिखरजी की वंदना के लिए गया, लेकिन उसके मन में श्रद्धा के स्थान पर अहंकार था। वह रास्ते में तीर्थ की मर्यादा का ध्यान नहीं रखता था, हँसी-मजाक करता और दूसरे श्रद्धालुओं की आस्था का भी उपहास करता था। बुजुर्गों ने उसे कई बार समझाया कि यह सिद्धों की भूमि है, यहाँ विनय रखो, लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी। किवदंती के अनुसार, वंदना से लौटने के बाद कुछ ही समय में उसके शरीर का एक अंग ऐसा जकड़ गया कि उसे लखवा मार गया और वह चलने-फिरने तक में असमर्थ हो गया। तब उसे अपने किए हुए अविनय की याद आई और उसने इसे तीर्थ के प्रति किए गए अपने अपराध का परिणाम मानकर पश्चात्ताप किया।
जैन कर्मसिद्धांत हमें बताता है कि कर्म का बंधन केवल बाहरी क्रिया से नहीं, बल्कि उसके पीछे के भाव और अभिप्राय से भी होता है। इसलिए जहाँ शुद्ध श्रद्धा, विनय और आत्मकल्याण की भावना से की गई वंदना निर्जरा का कारण बन सकती है, वहीं अहंकार, उपहास, प्रमाद और दुर्भावना से किया गया आचरण अपने लिए अशुभ कर्मबंध का कारण बन सकता है।
याद रखिए—जिस पर्वत पर 20 तीर्थंकरों ने संसार का अंत कर मोक्ष प्राप्त किया, वहाँ जाकर हमें अपने अहंकार का विस्तार नहीं, बल्कि उसका क्षय करना है।
तीर्थराज सम्मेद शिखरजी पर जाएँ तो मौन रखें, मर्यादा रखें, स्वच्छता रखें, संयम रखें और सिद्धों के प्रति पूर्ण विनय रखें। यह केवल एक पर्वत नहीं, अनंत सिद्धात्माओं की निर्वाणभूमि है।
तीर्थराज की वंदना पर्यटन की तरह नहीं, साधना की तरह करें।
🙏 जय जिनेन्द्र।
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