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ये पेज जैन धरोहरों की जानकारियों के संकलन हेतु है।

धर्म - जैन ।। भाषा - प्राकृत ।। लिपि - ब्राह्मी
शासन नायक - तीर्थंकर महावीर
प्रमुख सिद्धांत - अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद
मूल मंत्र - नमोकार मंत्र

आज कलश दशमी का त्यौहार है।महिलाएं कलश में द्रव्य लेकर मंदिरजी जाती हैं। और आदिनाथ भगवान की पूजा करती हैं और कलश दशमी की ...
22/08/2026

आज कलश दशमी का त्यौहार है।
महिलाएं कलश में द्रव्य लेकर मंदिरजी जाती हैं। और आदिनाथ भगवान की पूजा करती हैं और कलश दशमी की कथा करती हैं।

22/08/2026

तीर्थराज पर धर्म की प्रभावना के निमित्त बनिये, जिन धर्म प्रभावना के एम्बेसेडर बनिए। लोगो को प्रभु भक्ति की शिक्षा दीजिए।

विभिन्न धर्मों में ईश्वर की अवधारणा — एक तुलनात्मक दृष्टिक्या सभी धर्म ईश्वर को एक ही रूप में मानते हैं?क्या ईश्वर सृष्ट...
22/08/2026

विभिन्न धर्मों में ईश्वर की अवधारणा — एक तुलनात्मक दृष्टि

क्या सभी धर्म ईश्वर को एक ही रूप में मानते हैं?
क्या ईश्वर सृष्टि का कर्ता और नियंता है, या केवल सर्वज्ञ और वीतराग परमात्मा?

इस पोस्टर में जैन धर्म, बौद्ध धर्म, विभिन्न हिंदू दर्शनों, सिख, इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म में ईश्वर की अवधारणा को सरल भाषा और उदाहरणों के साथ समझने का प्रयास किया गया है।

जैन दर्शन की विशेष दृष्टि
जैन धर्म सृष्टि के रचयिता या कर्मफल देने वाले किसी नियंता ईश्वर को स्वीकार नहीं करता।
परंतु जो जीव अपने समस्त घातिया कर्मों का क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त करता है, वही अरिहंत/सिद्ध परमात्मा कहलाता है।

अर्थात् जैन दर्शन में भगवान कर्ता नहीं, ज्ञाता-दृष्टा और वीतराग हैं।

अलग-अलग मान्यताओं को समझें, तुलना करें और दर्शन को गहराई से जानें।

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झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पर्वत को जैन धर्म में तीर्थराज कहा गया है। 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों न...
21/08/2026

झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित पारसनाथ पर्वत को जैन धर्म में तीर्थराज कहा गया है। 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पावन भूमि से निर्वाण प्राप्त किया तथा असंख्य मुनिराजों ने यहाँ कठोर तप और साधना कर कर्मों का क्षय किया। पर्वत पर स्थित विभिन्न टोंक उन्हीं महान निर्वाण स्थलों की स्मृति हैं। इसलिए सम्मेद शिखरजी का प्रत्येक कण जैन समाज के लिए अत्यंत श्रद्धा और विनय का विषय है।

सम्मेद शिखरजी को पर्यटन स्थल समझकर नहीं, सिद्धों की भूमि समझकर जाना चाहिए। यहाँ की वंदना में कदम-कदम पर संयम, मौन, श्रद्धा और विनय होना चाहिए। नंगे पैर लगभग 27 किलोमीटर की कठिन वंदना करने का उद्देश्य केवल पर्वत पर चढ़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, प्रमाद और विषय-कषाय को कम करना है।

तीर्थ की महिमा जितनी महान है, उसकी अविनय का दोष भी उतना ही गंभीर हो सकता है। तीर्थ पर हँसी-मजाक, मौज-मस्ती, अहंकार, दिखावा, गंदगी फैलाना, जूठन छोड़ना या तीर्थ की पवित्रता को सामान्य स्थान की तरह लेना—ये सब ऐसे आचरण हैं जिनसे हर श्रावक को बचना चाहिए।

कहा जाता है कि एक व्यक्ति सम्मेद शिखरजी की वंदना के लिए गया, लेकिन उसके मन में श्रद्धा के स्थान पर अहंकार था। वह रास्ते में तीर्थ की मर्यादा का ध्यान नहीं रखता था, हँसी-मजाक करता और दूसरे श्रद्धालुओं की आस्था का भी उपहास करता था। बुजुर्गों ने उसे कई बार समझाया कि यह सिद्धों की भूमि है, यहाँ विनय रखो, लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी। किवदंती के अनुसार, वंदना से लौटने के बाद कुछ ही समय में उसके शरीर का एक अंग ऐसा जकड़ गया कि उसे लखवा मार गया और वह चलने-फिरने तक में असमर्थ हो गया। तब उसे अपने किए हुए अविनय की याद आई और उसने इसे तीर्थ के प्रति किए गए अपने अपराध का परिणाम मानकर पश्चात्ताप किया।

जैन कर्मसिद्धांत हमें बताता है कि कर्म का बंधन केवल बाहरी क्रिया से नहीं, बल्कि उसके पीछे के भाव और अभिप्राय से भी होता है। इसलिए जहाँ शुद्ध श्रद्धा, विनय और आत्मकल्याण की भावना से की गई वंदना निर्जरा का कारण बन सकती है, वहीं अहंकार, उपहास, प्रमाद और दुर्भावना से किया गया आचरण अपने लिए अशुभ कर्मबंध का कारण बन सकता है।

याद रखिए—जिस पर्वत पर 20 तीर्थंकरों ने संसार का अंत कर मोक्ष प्राप्त किया, वहाँ जाकर हमें अपने अहंकार का विस्तार नहीं, बल्कि उसका क्षय करना है।

तीर्थराज सम्मेद शिखरजी पर जाएँ तो मौन रखें, मर्यादा रखें, स्वच्छता रखें, संयम रखें और सिद्धों के प्रति पूर्ण विनय रखें। यह केवल एक पर्वत नहीं, अनंत सिद्धात्माओं की निर्वाणभूमि है।

तीर्थराज की वंदना पर्यटन की तरह नहीं, साधना की तरह करें।

🙏 जय जिनेन्द्र।

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देवराज इन्द्र और प्रमुख देवगण अपने कर-कमलों में एक अत्यंत चमत्कारी, स्वर्ण और नव-निधियों की मणियों से जड़ी दिव्य पालकी क...
21/08/2026

देवराज इन्द्र और प्रमुख देवगण अपने कर-कमलों में एक अत्यंत चमत्कारी, स्वर्ण और नव-निधियों की मणियों से जड़ी दिव्य पालकी को संभाले खड़े थे। उस शिविका से ऐसी उज्ज्वल प्रभा फूट रही थी मानो साक्षात् कोटि सूर्यों का तेज उसमें समा गया हो।
​यह देखकर इन्द्राणी विस्मय में पड़ गईं। वे हाथ जोड़कर आगे बढ़ीं और बोलीं, "हे देवराज! त्रिभुवन में ऐसा कौन-सा महाप्रतापी सम्राट अथवा कौन-सा अद्वितीय पुण्यवान जीव उत्पन्न हुआ है, जिसके लिए स्वयं सुरपति अपने हाथों में यह अलौकिक 'उत्तरकुरु' पालकी धारण किए खड़े हैं? यह पालकी किस महापुरुष के निष्क्रमण का साधन बनने जा रही है?"
​देवराज इन्द्र ने गंभीर और भक्ति-विभोर स्वर में कहा, "हे देवी! यह पालकी किसी सांसारिक सम्राट के राज्याभिषेक के लिए नहीं, बल्कि तीनों लोकों के नाथ, बाईसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ के महात्याग के लिए रची गई है। मृत्युलोक में इस समय एक अभूतपूर्व घटना घटित हुई है।"
​इन्द्र ने आगे का वृत्तांत सुनाते हुए कहा, "शौरीपुर से जब युवराज नेमिनाथ की बारात जूनागढ़ पहुँची, तो नगर के फाटकों पर उन्होंने विवाह-भोज के लिए बाड़े में कैद किए गए मूक पशुओं का हृदयविदारक क्रंदन सुन लिया। भय से कांपते उन बेजुबान जीवों की आंखों में मृत्यु का आतंक देखकर करुणासागर नेमिनाथ का हृदय संसार के मोह से एक ही क्षण में विरक्त हो गया। उन्होंने राजसी मुकुट, वैवाहिक बंधन और सारे संसार का वैभव तिनके के समान त्याग दिया है और रथ को गिरिनार की ओर मोड़ लिया है।"
​इतना कहते ही देवलोक में शंखों और दुंदुभियों की गूंज उठने लगी। ब्रह्मलोक से लौकांतिक देव पहले ही मृत्युलोक पहुँचकर प्रभु के वैराग्य की स्तुति कर रहे थे।
​देवराज इन्द्र और देवगण उस 'उत्तरकुरु' शिविका को लेकर तत्क्षण आकाश मार्ग से धरती की ओर उतरे। वह दिव्य पालकी सीधे प्रभु नेमिनाथ के सम्मुख उपस्थित की गई। अनमोल मोतियों की झालरों और पारिजात के पुष्पों से सुवासित उस शिविका पर भगवान नेमिनाथ पद्मासन लगाकर आरूढ़ हुए।
​पहले मनुष्यों ने उस पावन पालकी को अपने कंधों पर उठाया, फिर विद्याधरों ने उसे संभाला, और अंत में स्वयं देवों ने अपने शीश पर धारण कर उसे बादलों के पार उड़ा दिया। मंद-मंद सुगंधित समीर और देव-जयकारों के बीच वह उत्तरकुरु पालकी गिरिनार पर्वत के शांत 'सहकार वन' में उतरी।
​वहाँ प्रभु पालकी से उतरे, अपने हाथों से केश-लुंचन किया, सर्व परिग्रह का त्याग किया और एक हजार राजाओं के साथ मोक्ष-पथ की गहन साधना में लीन हो गए।

भोगांव (मैनपुरी), उत्तर प्रदेश में जिन प्रतिमाएं प्राप्त! 19 अगस्त को मकान की नींव की खुदाई के दौरान दो प्राचीन जैन प्रत...
20/08/2026

भोगांव (मैनपुरी), उत्तर प्रदेश में जिन प्रतिमाएं प्राप्त!

19 अगस्त को मकान की नींव की खुदाई के दौरान दो प्राचीन जैन प्रतिमाएँ एवं एक पाषाण चरण पादुका प्राप्त हुईं।

बताया गया है कि एक प्रतिमा पर तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का लांछन अंकित है, जबकि दूसरी प्रतिमा का लांछन मिट चुका है। प्रतिमाओं के साथ प्राप्त चरण पादुका पर भगवान के पवित्र चरण उत्कीर्ण हैं। 🙏

विशेष संयोग यह भी रहा कि इसी दिन भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण कल्याणक (मोक्ष सप्तमी) पर्व था। जैन समाज ने श्रद्धापूर्वक इन प्राचीन धरोहरों को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान कराया।

यह घटना भोगांव की प्राचीन जैन विरासत और ऐतिहासिक जड़ों की ओर एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। 🛕🙏

अरिहंत सिद्ध मंगल 🙏
अरिहंत सिद्ध उत्तम 🙏

#भोगांव #मैनपुरी #जैनधर्म #जैनइतिहास #दिगम्बरजैन #जैनप्रतिमा #अजितनाथ #पार्श्वनाथ #मोक्षसप्तमी #निर्वाणकल्याणक #जैनधरोहर

भगवान की निस्वार्थ भक्ति से मोह-माया के बंधन छूट जाते हैं और आत्मा को परम शांति व मुक्ति मिल जाती है।
20/08/2026

भगवान की निस्वार्थ भक्ति से मोह-माया के बंधन छूट जाते हैं और आत्मा को परम शांति व मुक्ति मिल जाती है।

हे प्रभु! मैं न तो स्वर्ग का सुख माँगता हूँ, न राजा बनने का वैभव, और न परिवार या धन-संपत्ति। मैं तो केवल यहीं माँगता हूँ...
20/08/2026

हे प्रभु! मैं न तो स्वर्ग का सुख माँगता हूँ, न राजा बनने का वैभव, और न परिवार या धन-संपत्ति। मैं तो केवल यहीं माँगता हूँ, कि जन्म-जन्म तक आपकी भक्ति और सच्चे धर्म में मेरी श्रद्धा बनी रहे। यही मेरे लिए सबसे बड़ा धन है।

तुम्हारा है तुम ही संभालोगे दर्शन 🙏🏻
20/08/2026

तुम्हारा है तुम ही संभालोगे दर्शन 🙏🏻

20/08/2026

नाम बड़ा बैनर बड़ा पदवी पाटा डाल।
निकले हैं शिवमार्ग में साधु पंचम काल।।

गिरते गिरते गिर गया सीमाओं को तोड़।
पीटें साधु देखिए श्रावक का यह हाल।।

#फिरोज़ाबाद_नसिया

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