Lap of God

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29/03/2026
26/03/2026

As you sow in present ,you will reap in future

अभिमन्यु के पुत्र, राजा परीक्षित थे। राजा परीक्षित के बाद उन के लड़के जनमेजय राजा बने।एक दिन जनमेजय वेदव्यास जी के पास ब...
11/01/2026

अभिमन्यु के पुत्र, राजा परीक्षित थे। राजा परीक्षित के बाद उन के लड़के जनमेजय राजा बने।

एक दिन जनमेजय वेदव्यास जी के पास बैठे थे। बातों ही बातों में जन्मेजय ने कुछ नाराजगी से वेदव्यास जी से कहा.. कि,"जहां आप समर्थ थे भगवान श्रीकृष्ण थे, भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य कुलगुरू कृपाचार्य जी, धर्मराज युधिष्ठिर, जैसे महान लोग उपस्थित थे...फिर भी आप महाभारत के युद्ध को होने से नहीं रोक पाए और देखते-देखते अपार जन-धन की हानि हो गई। यदि मैं उस समय रहा होता तो, अपने पुरुषार्थ से इस विनाश को होने से बचा लेता"।

अहंकार से भरे जन्मेजय के शब्द सुन कर भी, व्यास जी शांत रहे।

उन्होंने कहा, पुत्र अपने पूर्वजों की क्षमता पर शंका न करो। यह विधि द्वारा निश्चित था, जो बदला नहीं जा सकता था, यदि ऐसा हो सकता तो श्रीकृष्ण में ही इतनी सामर्थ्य थी कि वे युद्ध को रोक सकते थे।

जन्मेजय अपनी बात पर अड़ा रहा और बोला,"मैं इस सिद्धांत को नहीं मानता। आप तो भविष्यवक्ता है, मेरे जीवन की होने वाली किसी होनी को बताइए... मैं उसे रोककर प्रमाणित कर दूंगा कि विधि का विधान निश्चित नहीं होता"।

व्यास जी ने कहा पुत्र यदि तू यही चाहता है तो सुन...।

कुछ वर्ष बाद तू काले घोड़े पर बैठकर शिकार करने जाएगा दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर पहुंचेगा...वहां तुम्हें एक सुंदर स्त्री मिलेगी.. जिसे तू महलों में लाएगा, और उससे विवाह करेगा। मैं तुम को मना करूँगा कि ये सब मत करना लेकिन फिर भी तुम यह सब करोगे। इस के बाद उस लड़की के कहने पर तू एक यज्ञ करेगा। मैं तुम को आज ही चेता रहा हूं कि उस यज्ञ को तुम वृद्ध ब्राह्मणो से कराना.. लेकिन, वह यज्ञ तुम युवा ब्राह्मणो से कराओगे.... और..

जनमेजय ने हंसते हुए व्यासजी की बात काटते हुए कहा कि,"मै आज के बाद काले घोड़े पर ही नही बैठूंगा..तो ये सब घटनाऐ घटित ही नही होगी।

व्यासजी ने कहा कि ये सब होगा..और अभी आगे की सुन... "उस यज्ञ मे एक ऐसी घटना घटित होगी....कि तुम उस रानी के कहने पर उन युवा ब्राह्मणों को प्राण दंड दोगे, जिससे तुझे ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा...और तुझे कुष्ठ रोग होगा.. और वही तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। इस घटनाक्रम को रोक सको तो रोक लो"।

वेदव्यास जी की बात सुनकर जन्मेजय ने एहतियात वश शिकार पर जाना ही छोड़ दिया। परंतु जब होनी का समय आया तो उसे शिकार पर जाने की बलवती इच्छा हुई। उस ने सोचा कि काला घोड़ा नहीं लूंगा.. पर उस दिन उसे अस्तबल में काला घोड़ा ही मिला। तब उस ने सोचा कि मैं दक्षिण दिशा में नहीं जाऊंगा परंतु घोड़ा अनियंत्रित होकर दक्षिण दिशा की ओर गया और समुद्र तट पर पहुंचा वहां पर उसने एक सुंदर स्त्री को देखा, और उस पर मोहित हुआ। जन्मेजय ने सोचा कि इसे लेकर महल मे तो जाउंगा.... लेकिन शादी नहीं करूंगा।

परंतु, उसे महलों में लाने के बाद, उसके प्यार में पड़कर उस से विवाह भी कर लिया। फिर रानी के कहने से जन्मेजय द्वारा यज्ञ भी किया गया। उस यज्ञ में युवा ब्राह्मण ही रक्खे गए।

किसी बात पर युवा ब्राह्मण... रानी पर हंसने लगे। रानी क्रोधित हो गई ,और रानी के कहने पर राजा जन्मेजय ने उन्हें प्राण दंड की सजा दे दी.. फलस्वरुप उसे कोढ हो गया।

अब जन्मेजय घबरा गया और तुरंत व्यास जी के पास पहुंचा...और उनसे जीवन बचाने के लिए प्रार्थना करने लगा।

वेदव्यास जी ने कहा कि "एक अंतिम अवसर तेरे प्राण बचाने का और देता हूं.... मैं तुझे महाभारत में हुई घटना का श्रवण कराऊंगा जिसे तुझे श्रद्धा एवं विश्वास के साथ सुनना है... इससे तेरा कोढ् मिटता जाएगा।

परंतु यदि किसी भी प्रसंग पर तूने अविश्वास किया.. तो मैं महाभारत का प्रसंग रोक दूंगा.. और फिर मैं भी तेरा जीवन नहीं बचा पाऊंगा... याद रखना अब तेरे पास यह अंतिम अवसर है।

अब तक जन्मेजय को व्यासजी की बातों पर पूरा विश्वास हो चुका था, इसलिए वह पूरी श्रद्धा और विश्वास से कथा श्रवण करने लगा।

व्यासजी ने कथा आरम्भ करी और जब भीम के बल के वह प्रसंग सुनाए.... जिसमें भीम ने हाथियों को सूंडों से पकड़कर उन्हें अंतरिक्ष में उछाला... वे हाथी आज भी अंतरिक्ष में घूम रहे हैं.... तब जन्मेजय अपने आप को रोक नहीं पाया,और बोल उठा कि ये कैसे संभव हो सकता है। मैं नहीं मानता।

व्यास जी ने महाभारत का प्रसंग रोक दिया....और कहा..कि,"पुत्र मैंने तुझे कितना समझाया...कि अविश्वास मत करना...परंतु तुम अपने स्वभाव को नियंत्रित नहीं कर पाए। क्योंकि यह होनी द्वारा निश्चित था।

फिर व्यास जी ने अपनी मंत्र शक्ति से आवाहन किया..और वे हाथी पृथ्वी की आकर्षण शक्ति में आकर नीचे गिरने लगे.... तब व्यास जी ने कहा, यह मेरी बात का प्रमाण है।

जितनी मात्रा में जन्मेजय ने श्रद्धा विश्वास से कथा श्रवण की,

उतनी मात्रा में वह उस कुष्ठ रोग से मुक्त हुआ परंतु एक बिंदु रह गया और वही उसकी मृत्यु का कारण बना।

सार :- कर्म हमारे हाथ मे है लेकिन उस का फल हमारे हाथों में नहीं है।

गीता जी के 11 वें अध्याय के 33 वे श्लोक मैं श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "उठ खड़ा हो और अपने कार्य द्वारा यश प्राप्त कर। यह सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं तू तो केवल निमित्त बना है।

होनी को टाला नहीं जा सकता लेकिन उत्तम कर्म व ईश्वर नाम जाप से होनी के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

अठारह दिनों के महायुद्ध ने द्रौपदी को अस्सी वर्ष की स्त्री-सी थका दिया था—न केवल शरीर से, बल्कि आत्मा और चेतना से भी।चार...
10/01/2026

अठारह दिनों के महायुद्ध ने द्रौपदी को अस्सी वर्ष की स्त्री-सी थका दिया था—
न केवल शरीर से, बल्कि आत्मा और चेतना से भी।
चारों ओर विधवाओं की भीड़ थी।
पुरुष गिने-चुने दिखाई देते थे।
अनाथ बच्चे दिशाहीन भटक रहे थे।
और उन सबके बीच—
हस्तिनापुर के राजमहल में,
महारानी द्रौपदी
निश्चेष्ट बैठी
शून्य को निहार रही थी।
तभी…
श्रीकृष्ण कक्ष में प्रवेश करते हैं।
कृष्ण को देखते ही द्रौपदी संयम खो बैठती है।
वह दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण उसके सिर पर हाथ फेरते रहते हैं—
कुछ कहते नहीं,
उसे रो लेने देते हैं।
कुछ क्षणों बाद
वे उसे अपने से अलग कर
पास के पलंग पर बैठा देते हैं।
द्रौपदी (कातर स्वर में):
“यह क्या हो गया, सखा?
मैंने तो ऐसा अंत कभी नहीं सोचा था…”
कृष्ण (गंभीर शांति से):
“नियति अत्यंत क्रूर होती है, पांचाली।
वह हमारे विचारों के अनुसार नहीं चलती।
वह केवल हमारे कर्मों को
परिणामों में बदल देती है।
तुम प्रतिशोध चाहती थीं—
और तुम सफल हुईं, द्रौपदी।
केवल दुर्योधन और दुःशासन ही नहीं,
सम्पूर्ण कौरव वंश समाप्त हो गया।
तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।”
द्रौपदी (पीड़ा से):
“सखा,
क्या तुम मेरे घावों पर मरहम रखने आए हो
या उन पर नमक छिड़कने?”
कृष्ण:
“नहीं द्रौपदी,
मैं तुम्हें सत्य से परिचित कराने आया हूँ।
हम अपने कर्मों के दूरगामी परिणाम
पहले नहीं देख पाते…
और जब वे सामने आते हैं,
तब उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं रहता।”
द्रौपदी (कंपित स्वर में):
“तो क्या इस युद्ध की
पूर्ण उत्तरदायित्व केवल मेरा है, कृष्ण?”
कृष्ण:
“नहीं, द्रौपदी।
स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो।
किन्तु यह सत्य है—
यदि तुम अपने कर्मों में
थोड़ी-सी भी दूरदर्शिता रखती,
तो स्वयं इतना कष्ट न पाती।”
द्रौपदी:
“मैं क्या कर सकती थी, सखा?”
कृष्ण (धीमे किंतु स्पष्ट स्वर में):
“तुम बहुत कुछ कर सकती थीं।
जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ था—
तब यदि तुम कर्ण का अपमान न करतीं
और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर देतीं,
तो संभव है परिणाम भिन्न होते।
जब कुंती ने तुम्हें
पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया—
यदि तुम उसे अस्वीकार करतीं,
तो परिस्थितियाँ कुछ और दिशा ले सकती थीं।
और फिर—
अपने महल में
दुर्योधन से यह कहना
कि ‘अंधों के पुत्र अंधे होते हैं’—
यदि वह वाक्य न कहा गया होता,
तो चीरहरण की वह विभीषिका
संभवतः घटित न होती।”
कृष्ण क्षण भर रुकते हैं,
फिर कहते हैं—
“द्रौपदी,
हमारे शब्द भी हमारे कर्म होते हैं।
और हर शब्द को बोलने से पहले
उसे तौलना अनिवार्य है।
क्योंकि शब्दों के दुष्परिणाम
केवल बोलने वाले को ही नहीं,
पूरे परिवेश को
दुख और विनाश में झोंक देते हैं।”
वे दृष्टि उठाकर कहते हैं—
“इस संसार में
केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है
जिसका ज़हर उसके दाँतों में नहीं,
उसके शब्दों में होता है।
इसलिए—
शब्दों का प्रयोग
सदैव सोच-समझकर करो।”

03/01/2026

Maa Mansa Devi temple Haridwar Uttarakhand

The planets play a vital role in every joy and sorrow of life.The planetary positions may be favorable at the time of bi...
07/10/2025

The planets play a vital role in every joy and sorrow of life.

The planetary positions may be favorable at the time of birth, but due to our current bad karma, we usually suffer negative consequences.

On the other hand, if the planetary positions are negative and we perform good karma, we will eventually experience good results.
जीवन के हर सुख-दुख में ग्रहों की अहम भूमिका होती है।
जन्म के समय ग्रहों की स्थिति अनुकूल हो सकती है, लेकिन हमारे वर्तमान बुरे कर्मों के कारण, हमें आमतौर पर नकारात्मक परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

वहीं दूसरी ओर, अगर ग्रहों की स्थिति नकारात्मक है और हम अच्छे कर्म करते हैं, तो हमें अंततः अच्छे परिणाम मिलेंगे।

The moon's rays on the night of Sharad Purnima are like nectar. This is why it is considered extremely important from re...
06/10/2025

The moon's rays on the night of Sharad Purnima are like nectar. This is why it is considered extremely important from religious, spiritual, and health perspectives.
On the night of Sharad Purnima, one should worship Goddess Mahalakshmi in a proper manner and prepare saffron-infused kheer (rice pudding) and place it in the moonlight. Then, collect the kheer in the morning and distribute it among the entire family. The moon's rays infuse the kheer with nectar, making it a highly nutritious and divine meal.
Sharad Purnima is a Hindu festival celebrated on the full moon day of the bright fortnight of the month of Ashwin, and is also known as Kojagari Purnima, Raas Purnima, or Kaumudi Vrat. On this day, the Moon is at its full glory. It is believed that nectar falls from the moon's rays on this night and Goddess Lakshmi roams the earth. Therefore, it is traditional to place kheer in the moonlight and consume it as prasad.
This mantra describes the form of the Moon God and is recited to seek his blessings. Om Aim Kleem Somay Namah. You can also chant Om Som Somay Namah
शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की किरणें अमृत के समान होती हैं। इसलिए इसे धार्मिक, आध्यात्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
शरद पूर्णिमा की रात्रि में देवी महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए और केसर युक्त खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखना चाहिए। फिर, सुबह खीर को एकत्र करके पूरे परिवार में वितरित करें। चंद्रमा की किरणें खीर में अमृत घोल देती हैं, जिससे यह अत्यंत पौष्टिक और दिव्य भोजन बन जाता है।
शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला एक हिंदू त्योहार है और इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा या कौमुदी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कला में होता है। ऐसा माना जाता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है और देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं। इसलिए, खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। यह मंत्र चंद्र देव के स्वरूप का वर्णन करता है और उनका आशीर्वाद पाने के लिए इसका जाप किया जाता है। ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः। आप ॐ सोम सोमाय नमः का भी जाप कर सकते हैं।

अपशकुन, बुरा और नकारात्मक नहीं है पितृ पक्ष... कर्ण की कथा से जानिए श्राद्ध का महत्वश्राद्धपक्ष में यज्ञ, तर्पण, पिंडदान...
13/09/2025

अपशकुन, बुरा और नकारात्मक नहीं है पितृ पक्ष... कर्ण की कथा से जानिए श्राद्ध का महत्व
श्राद्धपक्ष में यज्ञ, तर्पण, पिंडदान और दान जैसे कार्य प्रमुख होते हैं. जैसे किसी परिवार में शोक या पुण्यतिथि पर हंसी-ठिठोली या उत्सव नहीं किए जाते, उसी तरह इस काल में भी बड़े उत्सवों से परहेज़ रखा जाता है. पितृ पक्ष के इसी महत्व को महाभारत में कर्ण की कथा से समझाया गया है.
पितृपक्ष का समय, पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का समय माना गया है. इसलिए शास्त्र कहते हैं कि, ये समय ऐसा होना चाहिए कि जब मनुष्य का मन और कर्म पूर्वजों को याद करने और उनसे आशीर्वाद पाने के लिए केंद्रित रहे. तब सांसारिक उत्सव और अन्य क्रिया-कलापों से ये नियम टूट सकता है इसलिए इसलिए विवाह, नया व्यवसाय, नया घर आदि कार्य टाले जाते हैं.
शास्त्रों के अनुसार इस पक्ष में यज्ञ, तर्पण, पिंडदान और दान जैसे कार्य प्रमुख होते हैं. जैसे किसी परिवार में शोक या पुण्यतिथि पर हंसी-ठिठोली या उत्सव नहीं किए जाते, उसी तरह इस काल में भी बड़े उत्सवों से परहेज़ रखा जाता है. यह भी माना जाता है कि पितरों का आशीर्वाद ही हमारे सभी शुभ कार्यों की सफलता का मूल है. अगर हम उनके सम्मान को प्राथमिकता दें, तो वे स्वयं हमें जीवन के हर शुभ कार्य में आशीष देते हैं.

पितृपक्ष को क्यों मानते हैं अपशकुन?
कुछ लोग पितृ पक्ष को 'अपशकुन' जैसा मानने लगे हैं. यह धारणा गलत है. शास्त्र कहीं भी यह नहीं कहते कि पितृ पक्ष बुरा है. वह केवल यह कहते हैं कि इस समय हमें अपनी ऊर्जा और संसाधन पितरों की स्मृति में लगानी चाहिए. यह सोचना भी गलत है कि पितृ हमारी खुशी या प्रसन्नता से नाराज़ हो जाते हैं. वे तो चाहते हैं कि उनकी संतान सुखी और समृद्ध हो. बात केवल इतनी सी है कि पितरों के लिए समर्पित कर्म करते हुए मन और विचार उनके लिए निर्धारित कर्म में लगा रहे. ज्योतिष और पांडित्य की जानकारी रखने वाले ज्योतिषि मनीष मिश्र बताते हैं कि, असल में पितृ पक्ष एक परंपरा है जो अनुशासन का महत्व भी सामने रखती है. वर्ष भर में बारह मास हम अपने लिए जीते हैं, त्यौहार मनाते हैं. लेकिन कम-से-कम पंद्रह दिन ऐसे हों जो केवल पितरों और उनकी स्मृति के लिए हों, यही इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य है.

गीता भी कर्म को बताती है महान
गीता कहती है—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.” कर्म ही प्रधान है. पितृ पक्ष हमें उस कर्म की दिशा दिखाता है जिसमें हम अपने पूर्वजों का स्मरण कर आभार व्यक्त करें.

ज्योतिषी मनीष मिश्र बताते हैं कि इसकी कथा महाभारत में भी आती है. महाभारत में कर्ण को महादानी कहा गया है. उन्होंने जीवनभर सोना, रत्न, भूमि, वस्त्र और जो कुछ भी उनके पास था, सब दान कर दिया. यहां तक कि मृत्यु से पहले अपने शरीर का कवच-कुंडल तक दान कर दिया. इसलिए उन्हें 'दानवीर कर्ण' और 'महादानी' के रूप में स्मरण किया जाता है.

कर्ण की कथा से समझिए पितृपक्ष का महत्व
लेकिन जब कर्ण की मृत्यु के बाद उनका स्वर्गारोहण हुआ, तो उन्हें वहां अन्न और जल का भोजन नहीं मिला. उनके लिए केवल स्वर्ण और रत्नों से बना हुआ भोजन उपस्थित था. आश्चर्यचकित होकर कर्ण ने देवताओं से पूछा- मुझे अन्न और जल क्यों नहीं मिल रहा? देवताओं ने उत्तर दिया, हे कर्ण! तुमने जीवनभर स्वर्ण और रत्न बांटे, किंतु कभी अपने पितरों के नाम से अन्न और जल का तर्पण नहीं किया. इसलिए तुम्हें वही प्राप्त हो रहा है जो तुमने दान किया.'
यह सुनकर कर्ण को गहरा दुख हुआ. तब इंद्र ने उन्हें अवसर दिया और 16 दिन के लिए पृथ्वी पर लौटने की अनुमति दी, ताकि वे अपने पितरों के नाम से अन्न और जल का तर्पण कर सकें.
यही कालखंड आगे चलकर पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहलाया. माना जाता है कि इस समय पितरों के लिए अन्न, जल, तिल और कुश से किया गया तर्पण अत्यंत फलदायी होता है. पितृ पक्ष बुरा नहीं है, बल्कि यह तो श्रद्धा, संयम और कृतज्ञता का पर्व है. इस दौरान नए कार्यों को टालना केवल अनुशासन और परंपरा है, ताकि हमारी भावनाएं पितरों की स्मृति पर केंद्रित रहें.

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