17/03/2026
हाज़िर हो गए दुष्यंत!
विवाद ठंडा, रणनीति गर्म—क्या ‘गट्टू’ प्रकरण सिर्फ सियासी शोर था?
उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज है। कभी आरोपों और विरोध के केंद्र में रहे बीजेपी के प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम अब पूरी सक्रियता के साथ मैदान में लौट आए हैं। सवाल ये नहीं कि वो लौटे हैं—सवाल ये है कि इतनी जल्दी सब कुछ सामान्य कैसे हो गया?
जब अभिनेत्री उर्मिला सनावर ने अंकिता प्रकरण से जोड़ते हुए ‘गट्टू’ जैसे शब्दों से हमला बोला था, तब माहौल गरम था, सियासत उबल रही थी, और विरोध के सुर तेज थे। उस वक्त अंकिता भंडारी का नाम जनभावनाओं का प्रतीक बन चुका था। लेकिन आज… वही मुद्दा जैसे धुंध में खो गया है।
दुष्यंत गौतम ने पहले ही साफ कर दिया था—“मेरा चरित्र उत्तम है, और मेरा इस घटनाक्रम से कोई लेना-देना नहीं।” अब उनके तेवर बता रहे हैं कि वो सिर्फ सफाई देकर नहीं, बल्कि संगठन को फिर से साधकर अपनी स्थिति मजबूत करने निकले हैं।
देहरादून से लेकर हल्द्वानी तक उनका दौरा, आला नेताओं से लेकर मंडल स्तर के पदाधिकारियों तक बैठकों का सिलसिला—ये सब किसी साधारण गतिविधि का हिस्सा नहीं, बल्कि 2027 की बड़ी बिसात बिछाने की शुरुआत है।
लेकिन असली चुभता सवाल अभी भी वही है—
👉 वो तस्वीरें, जो कभी पार्टी कार्यालयों से हटा दी गई थीं… क्या अब फिर से दीवारों पर सजेंगी?
👉 कांग्रेस की चुप्पी—अनजान है या योजनाबद्ध?
👉 और सबसे बड़ा सवाल—अंकिता भंडारी के नाम पर सड़कों पर उतरने वाले लोग आखिर अब कहाँ हैं?
बीजेपी की रणनीति भी साफ नजर आ रही है—गढ़वाल की बजाय कुमाऊं में बैठकों का जोर, संगठन को नीचे तक एक्टिव करना, और दुष्यंत गौतम की पुनः सक्रियता के जरिए एक मजबूत संदेश देना—“विवाद पीछे, जीत आगे।”
पर राजनीति सिर्फ रणनीति से नहीं चलती, भरोसे से भी चलती है।
और यही भरोसा आज सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।
उत्तराखंड की जनता चुप जरूर है, लेकिन अनजान नहीं।
वो देख रही है—कौन मुद्दों के साथ खड़ा था, और कौन मौके के साथ।
सियासत में वापसी आसान है,
पर जनता की अदालत में बरी होना—अब भी बाकी है।