14/04/2026
कार्तिकेय जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन और हिमाचल में कार्तिक स्वामी के रूप में पूजा जाता है भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र माने जाते हैं। इन्हें वीरता, शक्ति और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। हिमाचल प्रदेश के Bharmour क्षेत्र में इनकी विशेष आस्था है, जहाँ लोक परंपराओं के अनुसार "केलंग बजीर" के रूप में भी इनका स्मरण किया जाता है।
भर्मौर क्षेत्र में कार्तिक स्वामी से जुड़ी मान्यता “लंग बाजीर” (स्थानीय देव परंपरा) के साथ भी जुड़ती है, जहाँ देवता को क्षेत्र का रक्षक और न्यायकारी शक्ति माना जाता है। लोक विश्वास है कि यह देव शक्ति प्राकृतिक संतुलन, पशुधन और मानव जीवन की रक्षा करती है। “लोहल” (या स्थानीय बोली में लोहल/लोहलु) से इसका संबंध उस प्राचीन स्थल और परंपरा को दर्शाता है जहाँ देवता की उपस्थिति और शक्ति का विशेष महत्व माना जाता रहा है।
इतिहास की दृष्टि से यह परंपरा वैदिक और स्थानीय जनजातीय आस्थाओं का संगम है। भर्मौर, जो कभी प्राचीन चंबा रियासत की राजधानी रहा, देव संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ कार्तिक स्वामी की पूजा न केवल धार्मिक भाव से, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के प्रतीक के रूप में भी की जाती रही है।
कपट खुलने का धार्मिक महत्व और संदेश:
कार्तिक स्वामी के कपाट खुलना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और नई ऊर्जा का प्रतीक है। यह समय हमें अपने भीतर की नकारात्मकता को त्याग कर सत्य, साहस और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
“कार्तिक स्वामी के पावन कपाट खुलने के इस शुभ अवसर पर हम सभी के जीवन में नई आशा, शक्ति और सकारात्मकता का संचार हो। जैसे देवधाम के द्वार भक्तों के लिए खुलते हैं, वैसे ही हमारे मन के द्वार भी प्रेम, करुणा और सद्भाव के लिए सदैव खुले रहें। देव कृपा से समस्त क्षेत्र में सुख-शांति, समृद्धि और प्राकृतिक संतुलन बना रहे—यही हमारी सच्ची प्रार्थना है।”
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