18/10/2023
जनजाति शक्तिपीठ 3
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विदर्भ की शक्ति स्वरूपा
महाकाली माता
जनजातीय समाज की यह मान्यता है, और बहुत सारे उत्सव, मेले और इतिहास में कहा जाता है की.आत्राम (आत्राम याने 6 देव वाला गोत्र) नाम के एक जमीनदार को तीन लडकिया थी। जिनका विवाह उनके पिता करना चाहते थे। लेकिन उनको विवाह करना मंजूर नही था। इसलिये वह तीनों घर से निकल गई। इनमें से एक बहेन चंद्रपूर में आकर यही बस गई। यही आगे चलकर महाकाली माता के नाम से पहचानी जाने लगी। जैसे-जैसे महाकाली माता के अनेक चमत्कारों की कथा विभिन्न जगह फैल गई, वैसे वैसे श्रद्धालुओं की भीड़ माता के मंदिर में दर्शन के लिए आती गई।आज महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के चंद्रपूर में माता महांकाली का मंदिर न केवल जनजाति समाज का, बल्कि संपूर्ण हिंदू समाज का एक श्रद्धा केंद्र बन गया है।
समाज में मान्य हुई एक कथा के अनुसार,13वीं शताब्दी में गोंड के राजा सुरजा (उर्फ सेर साह) की मृत्यु पर, उनका पुत्र खांडक्या बल्लाल सिंहासन पर बैठा। इस राजकुमार के पूरे शरीर पर गांठें थी। उनकी देखभाल उनकी बुद्धिमान और सुंदर पत्नी करती थी। जब कोई उपाय खांडक्या को ठीक नहीं कर सके तो उसने उसे सिरपुर छोड़ने और वर्धा के उत्तरी तट पर रहने के लिए प्रेरित किया, जहां उसने बल्लालपुर नामक एक किला बनवाया। एक दिन जब राजा बल्लालपुर के उत्तर-पश्चिम में शिकार कर रहा था, तो उसे प्यास लगी और वह पानी की तलाश में झारपट नदी के सूखे तल पर पहुंच गया। उसने देखा कि एक छेद से पानी बह रहा है। उसने इस झरने का पानी तो पिया लेकिन शीतल जल से अपना हाथ पांव और चेहरा भी धोया भी किया। अगले दिन सुबह रानी यह देखकर हैरान हो गई की उसके शरीर पर से कहीं गांठे गायब हो चुकी थी। पूछताछ करने पर खांडक्याने रानी को झारपट के पानी पीने और हाथ पांव धोने की बात कही। रानी ने खांडक्या से उस स्थान पर ले जाने का आग्रह किया। दोनों झरपट की ओर आगे बढ़े और थोड़ी देर में छेद मिल गया। घास और रेत साफ करने पर ठोस चट्टान में गाय के पांच पैरों के निशान दिखे, जिनमें से प्रत्येक में पानी भरा हुआ था। घटनास्थल पर जल का अक्षय स्त्रोत था। वह एक पवित्र तीर्थ कुंड था त्रेता युग का प्रसिद्ध अचलेश्वर तीर्थ!
जब राजा ने इस तीर्थ स्थल के पानी से स्नान किया तो उसके शरीर की सभी गांठें गायब हो गईं। खांडक्या बल्लाळशहा राजाने उस पानी के आगे का शोध किया तो वहा एक भुयार दिखा। उस भुयार की साफसफाई करने के बाद उसे भूतार में एक सुंदर महाकाली की मूर्ति प्राप्त हुई। खांडक्या राजा ने इस स्थान पर माता का एक छोटा मंदिर बनाया। यह छोटा मंदिर आज एक विशाल मंदिर में परिवर्तित हुआ है। महाकाली माता के इस मंदिर में दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
महाराष्ट्र के चंद्रपुर की इस महाकाली माता के मंदिर को एक अनन्य साधारण स्थान प्राप्त है। प्रत्येक वर्ष चैत्र पौर्णिमा को यहा बडी यात्रा होती है। जिसमें महाराष्ट्र,तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगड से लाखों श्रद्धालु महाकाली माता के दर्शन के लिए आते हैं। चंद्रपूर के राजघराणे में आत्राम राजाओं का 500 साल तक राज्य रहा। उसमे राणी हिराई आत्राम का बहुत बडा कार्यकाल रहा है। रानी हिराई एक श्रद्धावान रानी थी। उन्होंने अपने राज्य में कई मंदिर बनवाए। रानी स्वयं एक पराक्रमी रानी थी, जिसने अनेक युद्ध में विजयश्री प्राप्त की। लेकिन युद्ध में विजय प्राप्ति का एकमात्र कारण केवल महाकाली माता की असीम कृपा है, ऐसा उनका विश्वास था। इसलिये रानी हिराई ने माता महांकाली एक भव्य मंदिर बनवाया। आज जो मंदिर चंद्रपुर में खड़ा है उसका निर्माण रानी हिराई द्वारा ही किया गया है।
आज भी यह मंदिर भारत की सनातन परंपरा का एक जीता जागता प्रतीक है। जनजाति समाज चंद्रपुर की इस महाकाली माता को अपना श्रद्धा स्थान मानता है। अपनी इच्छित मनोकामना की पूर्ति करने वाली यह माता है ऐसा जनजाति समाज का विश्वास है। इसी कारण महाराष्ट्र के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में गोंड, कोलाम, कोया समाज के श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां बड़ी श्रद्धा से आते हैं। नवरात्रि में भी यहां श्रद्धालुओं की बहुत बड़ी भीड़ दर्शन के लिए आती है माता किसी को भी निराश नहीं करती, सब की मनोवांछित कामनाएं पूर्ण करती है, ऐसी प्रत्येक श्रद्धालुओं की श्रद्धा होती है।
बोलो... महाकाली माता की जय!!
- प्रकाश गेडाम