19/05/2026
**दरबारी उलमा - मिल्लत के सौदागर या रहबर?**
दरअसल कुछ उलमा ऐतिहासिक तौर पर “दरबारी उलमा” कहलाते रहे हैं। उनकी पहचान यह होती है कि उनकी दोस्ती, उठना-बैठना हमेशा अमीरों और असर-ओ-रसूख़ वाले लोगों के साथ होता है, फिर वह अमीर चाहे जिस दर्जे का भी हो। और इन मुलाक़ातों का इंतज़ाम दुनियादार चेले-चपाटे करते हैं।
हिंदुस्तानी मुसलमानों को जिन सियासी जमाअतों और सियासी चेहरों ने ऐतिहासिक नुक़सान पहुँचाया है, उनमें Samajwadi Party भी शामिल रही है। मगर अफ़सोस कि कुछ उलमा हर दौर में सत्ता के दरवाज़ों पर हाज़िरी देते रहे हैं।
उलमा का काम अमीरों की गदागरी नहीं, बल्कि हक़गोई और मिल्लत की रहनुमाई है। **सबसे अच्छा अमीर वह होता है जो फ़क़ीरों के दर पर हाज़िरी लगाए, और सबसे बुरा व ज़लील फ़क़ीर वह होता है जो अमीरों की गदागरी करे और उनके दर पर हाज़िरी लगाने को अपनी शान समझे।**
तारीख़ गवाह है कि जब-जब उलमा ने व्यक्तिगत तौर पर दरबारों का रुख़ किया है, मिल्लत ने नुक़सान उठाया है। आज़ादी के बाद से “कांग्रेसी उलमा” की एक बड़ी तादाद लगातार मिल्लत का सौदा करती रही है।
सत्ता के क़रीब रहने की ख़्वाहिश ने हक़ बात कहने की जुर्रत छीन ली। गैर-इस्लामी मसलहत-पसंदी उनकी पहचान बन गई, दीन व शरीअत और मज़हब का इस्तेमाल उनका मशग़ला बन गया, और दोहरी ज़िंदगी व अख़लाक़ी तज़ाद उनकी सरदारी और मज़हबी ठेकेदारी की जान बन गया।
नबी करीम( स.अ.व.)की अज़ीम सुन्नत ग़ुरबा, कमज़ोरों और महरूम तबक़ों से ताल्लुक़ रखना है। अशराफ़-ए-मक्का ने इसी ताल्लुक़ पर एतराज़ भी किया था, क्योंकि उन्हें ग़रीबों के साथ बैठने वाला हक़पसंद मिज़ाज पसंद नहीं था।
आज Aparna Yadav के शौहर की ताज़ियत करने वालों में भी अक्सर सफ़ेदपोश वही लोग नज़र आते हैं जो दुनिया के तलबगार, मफ़ादपरस्त और सियासी फ़ायदे के मुतलाशी हैं। यह हक़ीक़त Akhilesh Yadav भी ख़ूब जानते हैं। और वह इसकी सियासी क़ीमत वसूल करना भी जानते हैं, और करना भी चाहिए-आख़िर मौलवियों की दौलत, इज़्ज़त और शोहरत का सबब भी तो वह बन रहे हैं। मगर अफ़सोस तब होता है जब यही लोग ज़ाती मफ़ाद के लिए मिल्लत का सौदा करते हैं।
कुछ गदागर मौलवी अपनी मजबूरियों के क़ैदी हैं, कुछ शोहरत के बुख़ार में मुब्तिला हैं, और कुछ अपने कॉलेज, यूनिवर्सिटी या इदारों की मंज़ूरी और मफ़ादात के लिए सियासी चौखटों के चक्कर लगाते रहते हैं।
यह रवैया दीन की ग़ैरत, उलमा की खुद्दारी और मिल्लत के एतमाद- तीनों को मजरूह करता है।
ख़ास तौर पर मौजूदा हालात में उलेमा-ए-किराम को इंतिहाई खुद्दारी का मुज़ाहिरा करने की ज़रूरत है। अगर वाक़ई मुल्क और मिल्लत के मसाइल के हल के लिए अफ़सरों और सियासी रहनुमाओं से मुलाक़ात ज़रूरी हो, तो ये मुलाक़ातें इज्तिमाई और मुनज़्ज़म अंदाज़ में होनी चाहिए।
हारून रशीद आसिम
जमीयत दार-ए-अर्क़म रजि.(JDA)
087078 12449