15/05/2026
एक ही आदमी। एक ही भाई। दो बिलकुल अलग फैसले।
पहला फैसला — जुए की चौसर पर।
युधिष्ठिर ने सबसे पहले नकुल को दांव पर लगाया। शायद इसलिए कि वह "सौतेला" था, "कमज़ोर" था, "अपना" नहीं था।
दूसरा फैसला — वनवास की एक झील के किनारे।
यक्ष ने चारों भाइयों को मार दिया। कहा — "एक को जीवित कर सकते हो।"
युधिष्ठिर ने फिर नकुल को चुना।
लेकिन इस बार दांव पर लगाने के लिए नहीं — बचाने के लिए।
यक्ष ने पूछा — "अर्जुन को क्यों नहीं? भीम को क्यों नहीं?"
युधिष्ठिर का जवाब — "मेरी माँ कुंती का एक पुत्र मैं ज़िंदा हूँ। मेरी दूसरी माँ माद्री का भी एक पुत्र ज़िंदा रहना चाहिए।"
एक ही नकुल।
पहले — सबसे पहले त्यागने योग्य।
बाद में — सबसे पहले बचाने योग्य।
बीच में सिर्फ़ एक चीज़ थी — वनवास।
बारह साल का तप। जंगलों में भटकना। राजसी वस्त्र छोड़कर वल्कल पहनना। ज़मीन पर सोना।
कोयला कोयला रहता है — जब तक उसे तपाया न जाए।
तप कर ही वह हीरा बनता है।
युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ के राजमहल में "धर्मराज" नहीं बने थे।
वे जंगल में बने।
और शायद आप भी अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा संस्करण किसी आरामदायक कुर्सी पर बैठकर नहीं बनेंगे।
बनेंगे — किसी ऐसे दौर में, जिसे आज आप कोस रहे हैं।
कठिनाइयों से डरिए मत। यही वह भट्टी है जिसमें कोयला हीरा बनता है।