27/04/2026
इतिहास में राजा बनने का कोई निश्चित पैटर्न नहीं दिखाई पड़ता. शुरुआत में कुछ कच्चे व्यापारिक मार्ग होते थे जिनसे होकर लोग एक जगह से दूसरी जगह की यात्राएं किया करते थे. इन यात्राओं का उद्देश्य व्यापारिक, धार्मिक या कभी कभी पर्यटन भी होता था. उस समय कुछ महत्वाकांक्षी लुटेरे सौ पचास मजबूत और लड़ाकू लोगों को लेकर इनमें से किसी मार्ग पर बैठ जाते थे और वहां से आने जाने वालों को जबरदस्ती लूटना शुरू कर देते थे. इस तरह महज लूटना ही जारी रखते तो कुछ दिनों बाद उधर से आवागमन बंद हो जाता और फिर वह किसे लूटते? तो होता यूं था कि जिनको लूटा जाता था उनको लूटने का व्यवस्थित तरीका अपनाया जाने लगा. लूट की एक निश्चित धनराशि तय कर दी गई और इस निश्चित धनराशि का नाम कर या टैक्स रख दिया गया. अब जनता को भी पता था कि लूटने वाला एक निश्चित धनराशि ही लूटेगा और बदले में कुछ दूरी तक, जिसे उस लुटेरे का राज्य कहा जाता था, दुबारा न लूटे जाने की गारंटी होने लगी.
इस तरह लूटे गए धन से किसी स्थान विशेष में लुटेरों के सरगना के लिए ऐशो आराम की सुविधाओं से युक्त एक महल बना दिया जाता था. महल में रहने वाला प्रधान लुटेरा बाकी छोटे छोटे लुटेरों को क्षेत्रवार तैनात कर देता था जिससे लूट की पूरी व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके. इस पूरे लूटतंत्र पर कब्जे के लिए दूसरे लुटेरों के साथ वर्चस्व की लड़ाई बीच बीच में होती रहती थी जिसमें मार काट मचती थी जिसे युद्ध कहा जाता था. फिर जो विजयी होता था, लूट का पूरा तंत्र उसका हो जाता था. यह सिलसिला राजतंत्र कहा जाने लगा.
जनता लूट के इस पूरे तंत्र से विद्रोह न कर दे इसके लिए धर्म का सहारा लिया गया. कुछ पुरोहितों और चारणों-भाटों को लूट में से कुछ हिस्सा देकर अपनी प्रशस्ति गवाई जाती थी और मुख्य लुटेरे, जिसे राजा कहा जाता था, को ईश्वर का अवतार बता कर जनता को भ्रमित रखा जाता था. मुख्य लुटेरों के नाम पर कहानियां गढ़ कर उन्हें कभी सूर्य नाम के तारे या चंद्रमा नाम के उपग्रह का वंशज बता दिया जाता था तो कभी लुटेरे को अत्यंत प्राचीनकाल से ही राजा यानी लुटेरा बताने के लिए फर्जी इतिहास गढ़ा जाता था, ताम्रपत्र तैयार करवाए जाते थे, चारणों भाटों से प्रशस्ति गवाई जाती थी. इस तरह लूट का एक पूरा तंत्र विकसित हो जाता था.
उस दौर में आम जनता के जीवन में राज्य का हस्तक्षेप उस तरह नहीं होता था जिस तरह आज होता है. लोग अपने जीवन में व्यस्त और मस्त थे. राजा कौन बनता है, इससे बहुत ज्यादा सरोकार नहीं होता था. जनता को तो सिर्फ टैक्स देना था. राजा कोई भी होता, लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरह जनता के प्रति कोई जवाबदेही तो थी नहीं. थोड़ा कम या ज्यादा करके सभी राजा अपने ऐशोआराम का ही प्रबंध करते थे. जनता के लिए देश की सीमा 100-200 मील तक ही होती थी. इसके बाद देश ही बदल जाता था. जीने के लिए एक देश अच्छा नहीं तो दूसरे देश चले जाया करते थे. उनके लिए देश की सीमा मायने नहीं रखती.
कई कई सदियों तक राजतंत्र चला ही इसलिए कि राज्य का लोगों के जीवन पर कोई हस्तक्षेप नहीं था. आज के लोकतंत्र में जितना हस्तक्षेप है उसका एक चौथाई भी तब रहा होता तो जनता राजा को पटक-पटक कर मारती.
सोचिए, राजतंत्र में जितने भी राजे रजवाड़े थे वह काम क्या करते थे जिससे उनके पास बड़े बड़े महल होते थे? क्या वह वास्तुकार थे? क्या वह राजगीर थे? उनके पास बड़े बड़े महल बनाने और ऐशोआराम के लिए धन कहाँ से आता था? क्या वह व्यापारी थे? उनके पास खाने के लिए अच्छे से अच्छा भोजन, फल, दूध घी कहाँ से आता था? क्या वह किसान थे? क्या वह पशुपालन करते थे? क्या वह बागवानी करते थे? राजाओं, रानियों, राजकुमारों के पास सुगम यातायात के लिए बढ़िया से बढ़िया घोड़े और रथ कहाँ से आते थे? दान करके दानवीर कहलाने के लिए राजाओं के पास धन कहाँ से आता था? सेवा करने के लिए नौकर चाकर कहाँ से आते थे?
जाहिर सी बात है कि राजे रजवाड़े यह सब कुछ जनता के दिए टैक्स से करते थे. जो अपने अस्त्र शस्त्र के जोर से लोगों को लूट ले, जनता के दिए धन से महल बनवाए और ऐश करे वह वीर और पराक्रमी नहीं, लुटेरा कहलाता है. सच तो यह है कि मनुष्य इस धरती को चाहे जितना खींचतान ले, एक इंच भी जमीन नहीं बढ़ा सकता. यह सब प्राकृतिक है. फिर जमीन के किसी हिस्से पर कब्जा करके वहां रहने वाली जनता से उगाही करना और उसी में से थोड़ा सा दान करके दानवीर बन लेना कोई महानता वहानता नहीं है.
अस्त्र शस्त्र के बल पर दूसरों की हत्या करके उनका धन छीन लेना हत्या, लूट और गुंडागर्दी जैसा अपराध है. सच तो यह है कि अपने उत्पादक श्रम से अर्जित धन का उपभोग ही व्यक्ति का जायज हक़ है, बाकी सब लूट है।
Via:Jat Ethnic
The Jats