मैं और तू - - - - - सत्य क्या है जो मैं, कर रहा है या तू
एक तो मै, यदि तू भी है तो एक साथ तो नहीं रह सकते।
मैं कौन हूं जब मैं खत्म हो जाता है वहां हूँ रह जाता है।।।। वह हूँ मैं
जिसका न कोई वर्चस्व है बस एक उसका तत्व है।।
चारों तरफ हूँ है।
आसमान हूँ घरती हूँ पंछी हूँ नदिया की धारा हूँ पहाड़ हूँ फूल हूँ जीव हूँ जीवन हूँ पत्थर मिट्टी हूँ
पर भी नहीं... मैं.... हूँ।।।।
मैं भी इसी मै को मिटाक
र उस तू को छूने वाला मुसाफिर हूँ।।।
पर मैं वो नहीं जो तुम समझते हो रज
हम सभी एक ही विद्यालय के विधार्थी है।।।।।
एक ही पथ के पथिक हैं।।।
कोई जागा है कोई सो रहा है कोई सोच रहा है और किसी ने अभी तक सोचा आरम्भ ही नहीं किया।
मैं मैं नहीं वो है जो तुम्हें जगाने आया है मैं तुम्हारा सम्बन्धी नहीं वो मित्र हूँ जो तुम्हारे डोलते कदमों को ठहराती बिखरी श्वासों की बिखरती उड़ानों को सही दिशा की तरफ एक मित्र सखा की भांति खींचने आयी हूं।
मैं कोई बाबा नहीं हूँ जो तुम्हारी समस्याओं को दूर करने की आड़ में तुम्हें ही बेवकूफ़ बना डालूं।।
मै कोई तांत्रिक भी नहीं जो तुम्हारी कामनाओं की तिलांजलि देकर तुम्हारी तकलीफों का मजाक बना दूं
।।
तुम्हें स्वयं के शारीरिक तंत्र की रस्सी थामनी होगी।।
मैं कोई ज्योतिष भी नहीं जो गृहों को बदलने का प्रयोजन करता है।
विधाता भी अपने लिखे लेख को नहीं बदलता।।
मेरे पास कोई जादू की छड़ी भी नहीं जो चमत्कार कर तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर सके।
मैं कोई दीपक भी नहीं पर वो है जो तुम्हारे भीतर बुझे दीपक को जगा कर तुम्हें फिर से जीवंत बना सकता है।
जिंदगी से हारे हुए के भीतर जीतने की संभावना जगा सकता है।।
तुम्हारी मुस्कराहट तुम्हारा विश्वास तुम्हारा सम्बल तुम्हारा प्रेम तुम्हारा जोश तुम्हारा होश तुम्हारी आकांक्षा तुम्हारा ध्येय तुम्हारी मंजिल और तुम्हारी ही तलाश।।।।
यदि मिलना है तो चलो बढ़ चलो यह यात्रा किसी की नहीं तुम्हारी है।।।