24/07/2026
*कुछ बातें बीते वक्त की*
नारायणी साहित्य अकादमी सिर्फ एक संस्था भर नहीं है।अनेक विद्वानों द्वारा चिंतन की उपज है, कैसे हम हमारी सभी भाषाओं के प्रति समर्पित भाव से कार्य करते हुए, हिंदी भाषा की प्रगति द्वारा उसका वर्चस्व बढ़ाएं। और विश्व स्तर पर सभी भाषाओं का सम्मान करें।
नामवर सिंह सिर्फ एक आलोचना के क्षेत्र में ही अपना वर्चस्व नहीं स्थापित किए हैं। उन्होंने ने अपने देश में समरसता का बीज बोया है और अपने सत्य सनातन धर्म को आत्मसात करते हुए अपना जीवन व्यतीत किया है। प्रति दिन रामचरितमानस का पाठ करने के बाद भोजन ग्रहण करना उनके धर्म के प्रति समर्पित भाव को प्रमाणित करता है।
महिलाओं के संदर्भ में उनके विचार बहुत ही सुंदर और आत्मीयता से परिपूर्ण रहें हैं। उनकी चिंतन की परिधि में स्त्री के दुःख दर्द से वो बहुत ही अच्छी प्रकार से वाकिफ थे।
एक क्षत्रिय परिवार में जन्म लेकर वह चट्टान की तरह किसी भी परिस्थिति में अडिग रहे और कभी भी समझौता वाली नहीं बनें। नामवर बाबूजी ने मुझे बेटी का दर्जा दिया जबकि मैं उस क्षेत्र की बहू थी।
एक बात और कि मैं 1995 से उनके सानिध्य में रही और साड़ी पहन कर जाना होता था। उन्होंने ने ही सूट पहनने के लिए प्रेरित किया। बेटा यह शहर हैं कहीं भी हादसे हो जाते हैं। सलवार कमीज़ में बेटियां ढंकी रहती हैं। और दो-दो हाथ करने में कामयाब हो सकती हैं।
आज भले ही वह धरती छोड़ कर चले गए हैं। लेकिन मुझे सदैव यह आभास होता है कि वह हमारे बीच मौजूद हैं। मेरे निवास में सिर्फ उनकी तस्वीर लगी है। और उनके सामने सरस्वती माता की। जिससे अपार ऊर्जा मिलती है।
और मैं अपनी रचना धर्मिता निभा पाती हूं।
यह वर्ष बाबू जी का शताब्दी वर्ष है। नारायणी साहित्य अकादमी के सभी सदस्यों ने अपनी अपनी सुविधानुसार जिम्मेदारी निभाते हुए *नामवर शताब्दी समारोह* के लिए
हर्षोल्लास के साथ तैयारी कर रहें हैं।
आखिर उनके लिए हिंदी साहित्य के भीष्म पितामह का यह शताब्दी समारोह है।
सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और ढेरों आशीर्वाद मिल रहा है। साहित्य जगत के ये रंग बिरंगे फूल अपने आयोजन को कामयाब बनाने के लिए अपना सौ प्रतिशत दे रहें हैं।
बातें बहुत सारी हैं और उनके सानिध्य में साहित्यिक कक्षा की मैं एक छात्रा रही और वह भी नर्सरी की अब जब पहली कक्षा में आई तो सिर्फ मैं यह गयी और मेरे बाबूजी चले गए।
प्रतिदिन रविवार को मिलने जाती थी। क्योंकि उसी दिन बच्चों के पिता घर पर होते थे।
और जब तक घर नहीं पहुंच जाती थी तब तक बाबू तीन बार फोन करते थे।बुला पहुंच गयी। इतना प्यार मुझे शायद बचपन में ही मिलता रहा होगा।
मेरी पांडुलिपियां तीन महीने में पूरा पढ़ कर वापस देते थे।और पेंसिल से गलतियां ठीक कर देते थे। मेरी दर्जन भर पुस्तकें नामवर बाबूजी जी द्वारा दिए गए शीर्षक से प्रकाशित हुई हैं।
बस आज इतना ही।
हे साहित्य के शिखर पुरुष,
विचारों के रहे प्रखर पुरुष,
समरसता के मीठे धार रहे,
जीवन में अनेक प्रहार सहे,
अधरों को बंद कर यहां रहे,
चले गए चुप्पी साधे धरा से,
उन आंखों में आंसू भी आए,
किंतु आप कभी नहीं घबराए,
वो सचबयानी रही जिंदगी की,
आपने सभी की यूं बंदगी की।
शताब्दी समारोह में आ जाना,
बहुत एकल हूं नेह जता जाना।
एक प्यारी सी बिटिया
अपने नामवर बाबूजी की।